अखिलेश यादव ने अज़ान, लाउडस्पीकर विवाद के बीच क्यों नहीं दिया इफ़्तार ?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश में दोबारा मुख्यमंत्री बनने का सपना क्या टूटा, अखिलेश यादव बदले बदले से नज़र आने लगे हैं.

यूपी की राजनीति में इन दिनों चर्चा गरम है - समाजवादी पार्टी की सालाना इफ़्तार पार्टी इस बार नहीं हुई.

हालांकि अखिलेश यादव 28, 29, 30 अप्रैल को लगातार तीन दिन रोज़ा-इफ़्तार पार्टी में शरीक होने ज़रूर गए. उसके बाद उन्होंने ट्विटर पर तस्वीरें भी पोस्ट की.

ईद पर देशवासियों को मुबारकबाद भी दी.

ईद के मौक़े पर ऐशगाह ईदगाह में वो बीजेपी नेता दिनेश शर्मा और ब्रजेश पाठक के साथ शरीक भी हुए.

इसके बाद भी अखिलेश यादव इफ़्तार पार्टी नहीं देने के राजनीतिक मायने ज़रूर तलाशे जा रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के ट्विटर हैंडल पर ग़ौर करें तो पाएंगे कि 2017 में चुनाव हारने के बाद भी साल 2017, 2018 तक लखनऊ पार्टी दफ़्तर में इफ़्तार का चलन था.

2019 में फैज़ाबाद दफ़्तर में इफ़्तार पार्टी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर मौजूद हैं.

उसके बाद दो साल तक कोरोना महामारी का प्रकोप रहा. होली, ईद, दिवाली सब पर प्रतिबंध ही रहा. इस वजह से अखिलेश यादव से ये सवाल नहीं पूछे जा रहे थे.

लेकिन 2022 में अखिलेश यादव से सवाल पूछा जा रहा है, इफ़्तार पार्टी क्यों नहीं दी? आख़िर क्यों?

समाजवादी पार्टी के संभल से सांसद और उसके संस्थापक सदस्यों में से एक शफ़ीक़-उर-रहमान बर्क़ से बीबीसी ने यही सवाल पूछा. जवाब में उन्होंने कहा, "ये पार्टी अध्यक्ष का निजी फैसला है. वो इफ़्तार पार्टी दें या ना दें उनका अधिकार क्षेत्र है."

हालांकि जब उनसे ये पूछा गया कि क्या पार्टी में इस पर चर्चा हुई कि इस बार इफ़्तार का आयोजन किया जाना है या नहीं, उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

अखिलेश के इफ़्तार पार्टी देने को कुछ जानकार राज्य की बदली हुई पॉलिटिक्स के साथ जोड़ कर देख रहे हैं तो कुछ इसे उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता से.

इफ़्तार नहीं देना, क्या अखिलेश की अपरिपक्वता है?

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार परवेज़ अहमद कहते हैं, " 2022 के विधानसभा चुनाव में मुसलमानों ने 'रेस के घोड़े' की तरह समाजवादी पार्टी को वोट दिया. यही वजह है कि उनकी पार्टी के 111 विधायक जीतकर विधानसभा पहुँचे.

लेकिन चुनाव के नतीजे के बाद चाहे वो ईवीएम की चेकिंग का मामला रहा हो, चाहे मुसलमानों के घर गिराए जाने का मामला, चाहे उनके अपने विधायकों के घर गिराए जाने का मामला, चाहे वो आज़म खान का मामला हो, अखिलेश यादव ने ना तो एक शब्द बोला और ना ही कोई ट्वीट किया. इस वजह से यूपी के मुसलमानों को लगता है कि अखिलेश उनकी उपेक्षा कर रहे हैं. पहले जिस इफ़्तार का आयोजन बड़े स्तर पर होता था, अखिलेश के आने के वो आयोजन कुछ समय तक होटल ताज में सिमट गया."

हाल ही में आज़म ख़ान के करीबी और मीडिया सलाहकार फ़साहत अली ख़ान ने रामपुर में खुले मंच से अखिलेश यादव से सवाल किया था, हमने आपको और आपके वालिद साहब (मुलायम सिंह) को चार बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवाया. आप इतना नहीं कर सकते थे कि आज़म ख़ान साहब को नेता विपक्ष बना देते? हमारे कपड़ों से बू आती है राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को. स्टेजों पर हमारा नाम नहीं लेना चाहते हैं."

इस बार समाजवादी पार्टी के 111 विधायकों में से 31 मुसलमान विधायक हैं. तीन अन्य दलों के हैं.

परवेज़ अहमद कहते हैं, " जिन सीटों पर मुसलमान विधायक समाजवादी पार्टी की टिकट पर जीत कर आए हैं, वहाँ यादव वोटरों की बड़ी तादाद भी नहीं है. यानी मुसलमानों ने अपने वोट के साथ अपना प्रबंधन किया और जीते. इस वजह से मुसलमान को अखिलेश यादव से उम्मीद है."

एक सच्चाई ये है कि इस बार अखिलेश यादव ईद के दिन ऐशगाह ईदगाह पहुँचे थे. लेकिन लाल टोपी में. वही लाल टोपी जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि लाल टोपी वालों को लाल बत्ती से मतलब रहा है.

अखिलेश इस बार दूसरी इफ़्तार पार्टी में भी वो इसी लाल टोपी में नज़र आए थे. हालांकि पहले की इफ़्तार पार्टी में वो सफेद टोपी में नज़र आते थे.

शायद इसी वजह से उनसे सवाल भी पूछे जा रहे हैं कि इस बार इफ़्तार से दूरी क्यों?

परवेज़ अहमद कहते हैं कि इफ़्तार से किनारा मुसलमानों से दूरी बनाने का एक संदेश जैसा है. ईद की बधाई तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी दी है और प्रधानमंत्री मोदी ने भी. अखिलेश ने क्या अलग किया. मुसलमानों से दूरी बना कर वो राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दे रहे हैं.

अपनी इस टिप्पणी को वो विस्तार से समझाते हुए कहते हैं, "अखिलेश की ये राजनीतिक ग़लती है. राजनीतिक दूरदर्शिता की कमी है. मैं इसे हिंदू वोटरों को आकर्षित करने का कोई प्लान नहीं मानता. अगर आपके पास जेब में 1 रुपये है और दूसरे के पास 5 रुपये, तो उस पाँच रुपये को हासिल करने के लिए एक रुपये ख़र्च करना कहाँ की समझदारी है."

इफ़्तार नहीं देना, क्या अखिलेश की मजबूरी है?

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन का नज़रिया थोड़ा अलग है.

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन कहती हैं, "इन दिनों जितने भी विपक्षी दल हैं उन्होंने बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे के सामने ख़ुद को थोड़ा नरम दिखाने की कोशिश शुरु की है. पहले के मुकाबले पार्टियों द्वारा इफ़्तार पार्टी का चलन इस वजह से थोड़ा कम हुआ है. कांग्रेस को ही देख लें . उनके नेता भी अब मंदिर जाना शुरु कर चुके हैं. इस वजह से समाजवादी पार्टी ने भी ख़ुद को थोड़ा बदला है. बीजेपी समाजवादी पार्टी पर सबसे बड़ा आरोप मुस्लिम तुष्टीकरण का लगाती आई है. अखिलेश इस वजह से एक 'न्यूट्रल चेहरा' पेश करने की कोशिश कर रहे हैं."

अखिलेश यादव की पार्टी का चेहरा बदलने की इस कवायद को सुनीता एरॉन राजनीति की ज़रूरत करार दे रही हैं. वो कहती हैं, "बीजेपी जब से भारत की राजनीति के सेंटर स्टेज में आई है, हिंदू वोट एकजुट हो गया है. पहले वो जातियों में बंटे थे. उसी रणनीति के तहत समाजवादी पार्टी मुसलमान और यादव वोट बैंक को अपने पक्ष में एकजुट रखने की कवायद में जुटी रहती थी. इस बार उस कुनबे में ओबीसी को जोड़ने की कोशिश अखिलेश यादव ने की. लेकिन उसमें ज़्यादा सफलता उन्हें नहीं मिली.

सुनीता एरॉन आगे कहती हैं, "हिंदू और हिंदुत्व की इस राजनीति के सामने अब केवल मुसलमान वोट और यादव वोट के साथ अखिलेश चुनाव नहीं जीत सकते, जाटव और मुसलमान वोट के साथ मायावती नहीं जीत सकती. इस वजह से जाति और समुदाय का एक 'रेनबो- कोलीशन' विपक्षी पार्टियों को बनाने की ज़रूरत है. ठीक उसी तरह से जैसे मुलायम सिंह यादव मुसलमान और यादवों के साथ किसान, युवा और पिछड़े की बात राजनीति में करते थे."

उत्तर प्रदेश में ईद के दौरान मुख्यमंत्री के ईदगाह जाने का चलन पुराना है. फिर धीरे धीरे ये चलन ख़त्म हुआ और बाद में इफ़्तार पार्टी का चलन शुरू हुआ. इफ़्तार पार्टी नेहरू के जमाने से चलता आया जिसे अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जारी रखा. राष्ट्रपति भवन में भी पहले इफ़्तार पार्टी दिए जाने का चलन था. प्रणब मुखर्जी के दौर में इसका चलन ख़त्म हो गया.

बिहार और पश्चिम बंगाल में राजनीति कितनी अलग ?

अखिलेश यादव इफ़्तार क्यों नहीं दे रहे हैं? इस चर्चा के बीच दो तस्वीरें और सामने आई. उनमें से एक तस्वीर पटना से नीतीश कुमार की थी. नीतीश कुमार दो साल बाद दोबारा से पटना के गांधी मैदान में पारंपरिक टोपी पहने हुए नमाज में शामिल हुए. दूसरी तस्वीर में ममता बनर्जी की आई. ईद की बधाई देते हुए कोलकाता के रेड रोड पर उन्होंने कहा,"सभी को ईद की मुबारकबाद, हम डरते नहीं है, हम लड़ते हैं और लड़ना जानते हैं."

बिहार की तस्वीर पर सुनीता एरॉन कहती हैं, "नीतीश कुमार के ऐसा करने पर बीजेपी की तरफ़ से इसकी आलोचना नहीं की गई होगी. बीजेपी और जेडीयू सत्ता में बिहार में साझेदार हैं. लेकिन अगर यही काम प्रियंका और राहुल गांधी ने किया होता तो आप सोचिए बीजेपी का क्या रिएक्शन होता. बिहार में बीजेपी को सूट करता है कि मुस्लिम वोट नीतीश अपने खेमे में रखें ताकि आरजेडी के साथ वो ना जा पाएं."

पश्चिम बंगाल की तस्वीर पर बात करते हुए वो कहती हैं, वहां की पॉलिटिक्स बिहार-यूपी से अलग है. ममता अपनी तरह की पॉलिटिक्स करती हैं. मुस्लिम वोट बैंक उनका अहम सपोर्ट बेस है. दूसरी तरफ़ बीजेपी का पश्चिम बंगाल में उतना बड़ा होल्ड भी नहीं है. जैसे-जैसे बीजेपी का प्रभाव बंगाल में बढ़ेंगा वैसे वैसे ममता बनर्जी की राजनीति में भी ये बदलाव देखने को मिल सकता है."

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