मध्य प्रदेश का चढ़ता सियासी पारा, किसकी कुर्सी बचेगी और किसकी जाएगी?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्य प्रदेश में भीषण गर्मी की लहर के बीच राजनीतिक पारा भी चढ़ा हुआ है और अगले साल होने वाले विधानसभा के चुनावों को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के खेमों में मंथन और बदलाव के दौर चल रहे हैं.
दोनों खेमों में जिस तरह की कवायद चल रही है उससे ये संकेत ज़रूर मिल रहे हैं कि आने वाले विधानसभा के चुनाव काफी संघर्षपूर्ण हो सकते हैं. लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए राहत की बात ये है कि संगठन के आला कमान ने उन्हें हटाने के कोई संकेत नहीं दिए हैं.
मगर, कांग्रेस पार्टी ने अहम फैसला करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की जगह विपक्ष के नेता के रूप में वरिष्ठ नेता गोविन्द सिंह को नियुक्त किया है. कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस कमिटी की कमान संभाले रहेंगे और ये भी तय ही दिख रहा है कि कांग्रेस उनके ही नेतृत्व में आने वाले विधान सभा के चुनावी समर में कूदेगी.
शिवराज सिंह चौहान को हटाने पर हुई थी चर्चा?
इसी महीने की 22 तारीख़ को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भोपाल में कई कार्यक्रम हुए जिसमें उन्होंने आदिवासियों के लिए राज्य सरकार की योजना ही शुरुआत की और फिर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ मंथन भी किया. उनके इस दौरे के बाद राजनीतिक गलियारों में अटकलें भी शुरू हो गयी थीं और अनुमान लगाए जा रहे थे कि शायद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हटाया जा सकता है.

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मगर गुरुवार को दिल्ली में भाजपा के कोर ग्रुप की बैठक के बाद मुख्यमंत्री को हटाये जाने की कोई बात नहीं की गयी. अलबत्ता इस बात पर ज़रूर मंथन हुआ कि राज्य के मंत्रिमंडल का जल्द विस्तार किया जाए और खाली पड़े निगम या योग के पदों को भी जल्द ही भरा जाए. इस विस्तार में 'समाज के सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व' देने की बात भी कही गयी.
वर्ष 2018 में हुए विधानसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत रूप से ख़राब रहा था जब पार्टी सिर्फ 109 सीटों पर ही जीत दर्ज करने में कामयाबी हासिल कर पाई थी. उससे पहले के विधानसभा के चुनावों में भाजपा के खाते में 165 सीटें थीं. पिछले विधानसभा के चुनावों में मत प्रतिशत भी घटा था.
कोर ग्रुप की बैठक में इन सब मुद्दों पर चर्चा की गयी जिसमें संघ की तरफ़ से अरुण कुमार भी शामिल थे. ज़्यादा बल आदिवासी बहुल इलाकों पर देने की बात कही गयी जहां भाजपा को पिछले चुनावों में सबसे अधिक नुकसान का सामना करना पड़ा था.
आदिवासी बहुल इलाकों की 82 आरक्षित सीटों में से भाजपा सिर्फ 33 ही जीत पायी थी. कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी मगर कुछ ही दिनों में ज्योतिरादित्य सिंधिया के वफ़ादार 22 विधायकों ने कांग्रेस छोड़ दी थी और भाजपा में शामिल हो गए थे. शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बन तो गए मगर उनके सिर हार का ठीकरा तो फूट ही गया था.

मोदी ही एमपी चुनाव का रहेंगे चेहरा
भारतीय जनता पार्टी की मध्य प्रदेश की इकाई के नेता दिल्ली की कोर कमिटी के बैठक के बारे में ज़्यादा कुछ कहना नहीं चाहते. वो सिर्फ इतना कहते हैं कि इस बात पर चिंतन किया गया कि मत प्रतिशत को किस तरह बढ़ाया जा सकता है.
वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित को लगता है कि भले ही मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान बने रहेंगे लेकिन ये संकेत ज़रूर मिलने लगे हैं कि आने वाला चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को सामने रख कर ही लड़ा जाएगा.
वो कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ था. मध्य प्रदेश में अपने हर दौरे में गृह मंत्री कहते रहे हैं कि शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री की योजनाओं को लागू करने का काम किया है. मतलब ये है कि दिख रहा है कि भले ही शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी पर फ़ौरन तो कोई ख़तरा नहीं है, मगर चुनाव तो नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे रख कर ही लड़ा जाएगा."
भाजपा के स्थानीय नेता बताते हैं कि कोर कमिटी की बैठक में आदिवासी बहुल इलाकों में लागू पेसा कानून की भी चर्चा की गयी. मध्य प्रदेश में पूरी आबादी के 37 प्रतिशत आदिवासी हैं जिन्हें इस बार भाजपा लुभाने की कोशिश में लग गयी है.

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दीक्षित कहते हैं कि पता चल रहा है कि कोर कमिटी की बैठक में सरकार की परफार्मेंस पर भी चर्चा नहीं की गयी जो काफी रोचक है. इस बैठक में जेपी नड्डा के अलावा पार्टी के महासचिव बीएल संतोष और मध्य प्रदेश के प्रभारी पी मुरलीधर राव के अलावा प्रदेश के महत्वपूर्ण मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा भी शामिल थे.
कांग्रेस की क्या है रणनीति
लेकिन कांग्रेस में परिवर्तनों का सिलसिला शुरू हो गया है और गोविन्द सिंह ने गुरुवार को विधायक दल के नेता के रूप में कमान संभाल भी ली. उन्होंने पद सँभालने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि 'ये ज़िम्मेदारी कमलनाथ ने उन्हें दी है.'
उनके इस बयान से स्पष्ट है कि कमलनाथ के नेतृत्व में ही कांग्रेस चुनाव लड़ेगी. कांग्रेस के प्रवक्ता पियूष बाबेले ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि कांग्रेस के सभी नेताओं को अलग-अलग ज़िम्मेदारियां दी गयी हैं.
वो कहते हैं, "गोविन्द सिंह सात बार के विधायक हैं और कांग्रेस के समर्पित नेता भी हैं. इसके अलावा वो संगठन के उस खालीपन को भी दूर करेंगे जो खालीपन ज्योतिरादित्य सिंधिया के जाने से पैदा हुआ है. उस क्षेत्र में उन्होंने इस कमी को बहुत हद तक पूरा भी कर दिया है."

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बाबेले कहते हैं कि किस तरह चुनाव लड़ा जाए इसके उस्ताद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह तो हैं ही साथ ही दूसरे बड़े नेता जैसे अरुण यादव और अजय सिंह को भी अलग-अलग ज़िम्मेदारियां दी गयी हैं.
इस पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राकेश दीक्षित कहते हैं कि कांग्रेस ने जो फैसला लिया है वो उसका सबसे बेहतर निर्णय है क्योंकि कमलनाथ को एक जीत हासिल करने वाले नेता के रूप में मान्यता मिल चुकी है. 2018 के विधानसभा चुनावों में जीत के वही नायक रहे हैं.
उनका कहना था, "इससे बेहतर निर्णय कांग्रेस ले ही नहीं सकती थी. इसका असर चुनावों में भी देखने को मिल सकता है. अगर कमलनाथ उसी तरह से अपनी रणनीति बनाते हैं तो भाजपा को कड़ा मुकाबला पेश कर सकते हैं."
आने वाले विधानसभा के चुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती हैं ही क्योंकि इन चुनावों में ज्योतिरादित्य की साख भी दांव पर लगी हुई है और कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की भी.
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