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खरगोन में 'बुलडोज़र' अभियान से मुसलमान और हिंदू दोनों नाख़ुश - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, खरगोन से
सुबह के आठ बजे का वक़्त है और खरगोन की सड़कों पर एक-एक कर लोग नज़र आने लगे हैं. इस महीने की 10 तारीख़ को रामनवमी के जुलूस के बाद भड़की हिंसा और सांप्रदायिक तनाव को काबू करने के लिए शहर के कई हिस्सों में कर्फ्यू लगा दिया गया था.
हालात बेहतर होते देख प्रशासन ने अब कर्फ्यू में 9 घंटों की ढील दी है. इसके बावजूद, सभी शिक्षण संस्थाएं अब भी बंद हैं.
अधिकारियों का दावा है कि हालात अब काबू में हैं. लेकिन शहर की सीमाओं के बाहर बसे ग्रामीण इलाक़ों में बहिष्कार के लिए संकल्प सभाओं और माइक से की जा रही अपीलों ने सामान्य होते हालात के बीच एक बार फिर से चुनौतियां खड़ा करना शुरू कर दिया है.
बहिष्कार की सभाओं और माइक से की जाने वाली अपीलों के अलावा सोशल मीडिया पर भी इस तरह की अपीलों की भरमार है.
प्रशासन ने दी चेतावनी
नौबत यहां तक आ पहुंची है कि खरगोन के एडीएम एसएस मुजाल्दा ने मंगलवार को सरकारी आदेश के ज़रिए सोशल मीडिया या किसी भी प्रचार वाहन से ऐसी अपील करने वालों पर क़ानूनी कार्रवाई करने की बात कही है.
मंगलवार को ही ज़िले के करही थाने के अंतर्गत आने वाले कतरगांव के इलाक़े में एक माइक से किए जा रहे प्रचार के बाद पुलिस ने प्राथमिकी भी दर्ज की है.
ज़िले के पुलिस अधीक्षक रोहित कासवानी ने मंगलवार की शाम पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "कतरगांव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था, जिसमें दिख रहा है कि माइक से एक धर्म विशेष के लोगों के ख़िलाफ़ घृणा फैलाई जा रही है. इस वीडियो का हमने स्वतः संज्ञान लिया है और मामला दर्ज कर लिया है."
एडीएम मुजाल्दा ने ज़िले के सभी थाना प्रभारियों को निर्देश दिया है कि घृणा फैलाने की किसी भी हरकत पर फ़ौरन क़ानूनी कार्रवाई की जाए.
इससे पहले भी ज़िले के इच्छापुर, उबदी और पिपरी जैसे इलाक़ों में संकल्प सभाओं के आयोजन की भी ख़बरें हैं, जहां लोगों को एक धर्म विशेष के लोगों के साथ व्यापार या उनसे ख़रीदारी न करने का संकल्प दिलाया गया है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इन सभाओं के आयोजन करने वालों पर भी क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.
लेकिन सबसे ज़्यादा चर्चा स्थानीय सांसद गजेंद्र सिंह पटेल की सभा की हो रही है. ये सभा कसरावद में आयोजित हुई थी, जिसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं.
प्रदेश कांग्रेस के महासचिव केके मिश्रा ने इस बारे में जारी एक बयान में कहा, "सांप्रदायिक हिंसा की तपिश से सुलग रहे खरगोन के सांसद ही जब अपने संवैधानिक दायित्वों से हटकर अराजकता फैलाएंगे, तो क्या कहा जाए?"
'एकतरफ़ा कार्रवाई' के आरोप
इस बीच मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित किए गए 'क्लेम ट्रिब्यूनल' के दोनों सदस्यों ने खरगोन पहुंचकर दंगे से प्रभावित लोगों से बात की है. इस ट्रिब्यूनल में सेवानिवृत ज़िला जज शिवकुमार मिश्र और राज्य सरकार में सचिव रह चुके प्रभात पाराशर शामिल हैं.
इस ट्रिब्यूनल का गठन राज्य सरकार के क़ानून- सार्वजनिक और निजी संपत्ति वसूली अधिनियम, 2021- के प्रावधानों के तहत किया गया है. इस क़ानून के तहत प्रावधान है कि दंगों में संपत्ति को हुए नुक़सान की रक़म अभियुक्तों से भी वसूली जा सकती है.
रामनवमी जुलूस के बाद भड़की हिंसा को लेकर पुलिस ने अब तक कुल 64 प्राथमिकी दर्ज की हैं. पुलिस अधीक्षक का कहना है कि अब तक कुल 175 लोगों को गिरफ़्तार भी किया जा चुका है, जबकि कई फरार बताए जाते हैं. फरार लोगों के लिए इनाम का एलान भी कर दिया गया है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि गिरफ़्तार किए गए लोगों में दोनों संप्रदाय के अभियुक्त हैं.
शहर में हुई व्यापक हिंसा की चपेट में कई परिवार आए हैं. इनमें हिंदू भी हैं और मुसलमान भी. मगर दोनों पक्षों के दावे हैं कि उन्हें ज़्यादा नुक़सान पहुंचा है.
प्रशासनिक अमला भी हिंसा के बाद हरकत में आया है और आरोपियों में से कइयों के मकानों या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर बुलडोज़र चलाया गया है. प्रशासन की दलील है कि बुलडोज़र उन्हीं के यहाँ चला, जिन्होंने अतिक्रमण कर रखा था.
मगर मुस्लिम समाज का आरोप है कि ये प्रशासन की 'एकतरफ़ा कार्रवाई' थी, जिसमें एक ही समुदाय को निशाना बनाया गया है. उनका ये भी आरोप है कि दंगे में जो शामिल नहीं थे या हिंसा में जिनकी संपत्ति का नुकसान हुआ, उन्हें भी अभियुक्त बना दिया गया.
मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि 'दंगाइयों के ख़िलाफ़ जो भी कार्रवाई की जा रही है, वो पूरी तरह से संविधान के दायरे में है.'
उनका कहना था कि राज्य सरकार ने दो क़ानून बनाए हैं, जिसके तहत दंगाइयों से क्षति की रक़म वसूले जाने के प्रावधान किए गए हैं.
नगरपालिका अधिनियम, 1956 के तहत अतिक्रमण के ख़िलाफ़ कार्रवाई किए जाने के प्रावधान भी किए गए हैं.
शांति समिति के सदस्य की दुकान ढहाई
अमजद ख़ान व्यवसायी हैं और बेकरी चलाते हैं. वो शांति समिति के सदस्य भी हैं.
उनका आरोप है कि रामनवमी के दिन पुलिस के बड़े अधिकारियों ने उन्हें शहर के तालाब चौक पर स्थिति क़ाबू में रखने और लोगों को समझाने बुझाने के लिए तैनात किया था.
वो कहते हैं, "मैंने कहा कि ये अति संवेदनशील इलाक़ा है और अगर कोई अप्रिय घटना घटती है, तो मेरा चेहरा ही सीसीटीवी में नज़र आएगा. हुआ भी वही क्योंकि जब पत्थरबाज़ी शुरू हुई और मामला हाथ से निकलने लगा तो कुछ न कर सका. अब पुलिस कहती है कि तुम्हारा चेहरा सीसीटीवी में नज़र आ रहा है, इसलिए कार्रवाई होगी. नगर निगम के अधिकारी अचानक पहुंचे और बिना नोटिस दिए मेरी पूरी बेकरी को बुलडोज़र से तोड़ डाला. मुझ पर कभी कोई आपराधिक मामला ही दर्ज नहीं हुआ है."
आरोप है कि प्रशासन ने निर्दोषों या उन लोगों को दंगा करने का अभियुक्त बनाया है, जिनका ख़ुद का नुक़सान हुआ है.
ऐसे ही लोगों में से एक हैं अकबर ख़ान. उनका घर और पशु आहार के गोदाम में आग लगा दी गयी. अब उन पर भी प्राथमिकी दर्ज की गयी है.
ग़ाज़ीपुरा के अख़्तर ख़ान भी हैं, जिनका इन दंगों में बहुत नुक़सान हुआ है. इसमें उनका घर और गोदाम पूरी तरह से जल गए हैं. अब उनके ख़िलाफ़ भी दंगों में शामिल होने की प्राथमिकी दर्ज की गयी है.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं कि अपनी बेटी की शादी के लिए जो कुछ उन्होंने बचाकर रखा था, वो सब राख़ में तब्दील हो गया है और अब वो बेघर हैं. वो कहते हैं, "हमारा माल भी लूट लिया गया और हमें मुजरिम भी बना दिया गया. हमारी कोई सुनवाई नहीं हो रही है."
प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल दोनों समुदाय कर रहे हैं. आनंद नगर और रहीमपुरा के रहने वाले हिंदू परिवार भी सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काट रहे हैं. यहां रहने वाले पांच युवकों को पुलिस ने हिंसा के दौरान इबरेज़ खान की हुई हत्या के लिए गिरफ़्तार किया है.
गिरफ़्तार किए गए दिलीप गांगले के पिता रमेश और मां सुनीला का रो-रोकर बुरा हाल है. उनका आरोप है की दिलीप को पुलिस ने हिरासत में बहुत पीटा है.
उसी तरह सचिन वर्मा की पत्नी ऊषा का भी आरोप है कि पुलिस ने उनके सामने ही सचिन को बुरी तरह पीटा और जेल भेज दिया.
उनका कहना था, "रिमांड में लेकर पुलिस ने इतनी यातनाएं दीं कि उन्हें मजबूरन अपना जुर्म स्वीकार करना पड़ा. वो मेरे घर के एकमात्र कमाने वाले हैं. हमारा घर जला. तीन छोटे बच्चों के साथ अब हम क्या करेंगे."
बुलडोज़र का विवाद
ये आरोप लग रहे हैं कि बुलडोज़र की कार्रवाई एकतरफ़ा हुई है, जिसमें सिर्फ़ एक धर्म विशेष के लोगों को ही निशाना बनाया गया है.
हालांकि मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने इसका खंडन करते हुए बीबीसी से कहा कि कार्रवाई रामनवमी के पहले से जारी थी.
खरगोन के खसखसवाड़ी की जिस हसीना फ़ख़रू के मकान को तोड़े जाने की बात कही जा रही है, उसका नोटिस उन्हें 4 अप्रैल को ही दिया गया था, जबकि दंगे 10 अप्रैल को हुए.
बुलडोज़र की चपेट में मस्जिद के सामने 'अतिक्रमण कर बनायी गयी दुकानें' भी आयीं, जिनके बारे में प्रशासन का कहना है कि उन्हें भी दंगों से पहले ही नोटिस दिया गया था.
खरगोन के बुलडोज़र अभियान से मुसलमान भी क्षुब्ध हैं और हिंदू भी, क्योंकि बस स्टैंड के सामने स्थित श्री राम धर्मशाला को भी नहीं बख़्शा गया.
श्री राम धर्मशाला के ट्रस्टी मनोज रघुवंशी भी बीबीसी से बात करते हुए प्रशासन पर अपरिपक्वता का आरोप लगा रहे हैं.
वो कहते हैं, "धर्मशाला की ज़मीन नगर पालिका ने ट्रस्ट को 99 सालों की लीज़ पर दी थी. मगर बिना नोटिस के बाहर के हिस्से और भव्य मुख्य द्वार को बुलडोज़र से गिरा दिया गया. न नोटिस, न सुनवाई. क़ानून नहीं बल्कि मनमर्ज़ी से अधिकारी काम कर रहे हैं, जिन पर आला अधिकारियों और सरकार का कोई नियंत्रण नहीं दिख रहा है."
रघुवंशी कहते हैं कि खरगोन में रहने वाले दोनों समुदायों के लोगों को समझना पड़ेगा कि शरारती तत्व और दंगा फैलाने वालों पर समाज को भी लगाम कसनी होगी और उन्हें सज़ा दिलाने के लिए आगे आना होगा. साथ ही जो भड़काऊ भाषण और प्रचार किए जा रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी होगी. तभी शांति का रास्ता बनेगा."
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