अर्जेंटीना-ब्रिटेन में फॉकलैंड द्वीप पर तनाव में बीजेपी नेताओं की चर्चा क्यों?

फॉकलैंड

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

फॉकलैंड या मअविनस द्वीप दक्षिण-पश्चिम अटलांटिक महासागर में स्थित है. ब्रिटेन के लोग इसे फॉकलैंड द्वीप कहते हैं जबकि अर्जेंटीना के लोगो मअविनस द्वीप.

यह एक ऐसा द्वीप है, जिस पर अब भी ब्रिटेन का नियंत्रण है. ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच इसकी संप्रभुता को लेकर विवाद है. अब इस विवाद में बीजेपी भी शामिल हो गई है.

अर्जेंटीना की सरकार ने रविवार को भारत में इस द्वीप पर नियंत्रण को लेकर ब्रिटेन से बातचीत के लिए एक अभियान की शुरुआत की थी. इस बातचीत का मक़सद फॉकलैंड के विवाद को सुलझाना है. इस कैंपेन कमीशन का गठन अर्जेंटीना की सरकार ने किया है और इसका मक़सद संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के अनुरूप फॉकलैंड विवाद पर ब्रिटेन से बातचीत शुरू करवाना है.

अर्जेंटीना ने भारत में इस अभियान की शुरुआत तब की, जब दो दिन पहले ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भारत के दौरे से लौटे हैं. इसके अलावा फॉकलैंड को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच 1982 में हुए युद्ध की बरसी भी थी.

अर्जेंटीना के विदेश मंत्री सैंटियागो कैफियेरो भारत में रायसीना डायलॉग में शामिल होने आए हैं. सैटिंयागो ने ही फॉकलैंड को लेकर भारत में अभियान की शुरुआत की है.

एस जयशंकर

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बीजेपी क्यों हुई असहज?

इस कैंपेन के उद्घाटन समारोह में बीजेपी के दो नेताओं को भी सदस्य के तौर पर शामिल होना था. इस कैंपेन में बीजेपी प्रवक्ता शाज़िया इल्मी और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु को सदस्य के तौर पर शामिल होना था. लेकिन कहा जा रहा है कि बोरिस जॉनसन के आने के बाद बीजेपी इस अभियान को लेकर असहज हो गई थी.

अर्जेंटीना के इस कैंपेन कमीशन के सदस्य पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु, बीजेपी नेता शाज़िया इल्मी, कांग्रेस के लोकसभा सांसद शशि थरूर और जानी-मानी शांतिदूत तारा गांधी भट्टाचार्जी भी हैं.

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इस समारोह में शाज़िया इल्मी गई थीं लेकिन कैंपेन के उद्घाटन से पहले ही वह निकल गई थीं. लेकिन शाज़िया ने ट्वीट कर कहा है कि वह भी शामिल नहीं हुई थीं. सुरेश प्रभु के इस ट्वीट को रीट्वीट करते हुए शाज़िया इल्मी ने लिखा है, ''गुड लक सुरेश भाई! मैं भी इस समारोह में शामिल नहीं हो पाऊंगी. आपका दौरा सुखद रहे!''

अर्जेंटीना के इस कैंपेन में सुरेश प्रभु ने ख़ुद के शामिल नहीं होने पर अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की रिपोर्ट को रीट्वीट करते हुए लिखा है, ''मैं अभी अमेरिका में हूँ और यहाँ के कई विश्वविद्यालयों में मुझे बोलना है. रिपोर्ट में जिस तरह से बताया गया है, उस तरह से इस समारोह का मैं हिस्सा भी नहीं था.''

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शाज़िया क्यों बच रही हैं?

शाज़िया इल्मी से पूछा कि आपके बारे में रिपोर्ट छपी है कि आप गई थीं लेकिन आपने ट्वीट किया है कि नहीं गई थीं. आख़िर ऐसा क्यों है? इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''हाँ गई थी लेकिन लॉन्चिंग में से पहले मैं आ गई थी.''

बोरिस जॉनसन के भारत दौरे के बाद क्या बीजेपी अर्जेंटीना के इस कैंपेन से दूरी बना रही है या ख़ुद को असहज पा रही है? इस सवाल के जवाब में शाज़िया इल्मी ने बीबीसी से कहा, ''भारत के रुख़ में कोई परिवर्तन नहीं है आया है. सुरेश प्रभु अमेरिका में थे, इसलिए शामिल नहीं हो पाए.''

लेकिन शाज़िया कैंपेन की लॉन्चिंग से पहले ही क्यों निकल गईं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कुछ नहीं कहा. वह कहती हैं, ''अर्जेंटीना के विदेश मंत्री की मुलाक़ात हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर जी से हुई है और भारत का रुख़ उन्हें बता दिया गया होगा. भारत के रुख़ में बोरिस जॉनसन के आने के बाद से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है.''

अगर बीजेपी नेताओं को जाना ही नहीं था तो वे इस कमीशन के सदस्य क्यों बने थे? क्या भारत का रुख़ उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ बदल रहा है? क्या बीजेपी बोरिस जॉनसन के दौरे के बाद इस कैंपेन को लेकर दबाव में थी?

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भारत का रुख़

इन सवालों के जवाब में भारत पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने बीबीसी से कहा, ''कमीशन का सदस्य बनने में कोई समस्या नहीं है. ब्रिटेन के सांसद और नेता भी ऐसे कई कमिशनों के सदस्य बनते हैं. लेकिन इससे सरकार के रुख़ में कोई परिवर्तन नहीं आता है. मुझे लगता है कि फॉकलैंड को लेकर भारत को तटस्थ ही रहना चाहिए. न तो ब्रिटेन का समर्थन करना चाहिए और न ही अर्जेंटीना का.''

कंवल सिब्बल कहते हैं कि जहाँ तक उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ मुखर होने की बात है तो हर देश अपने हित के हिसाब से ही अपनी मुखरता दिखाते हैं और भारत भी ऐसा ही कर रहा है.

फॉकलैंड को लेकर कैंपेन का उद्घाटन करते हुए अर्जेंटीना के विदेश मंत्री ने रविवार को कहा कि भारत पारंपरिक रूप ब्रिटेन के साथ विवाद सुलझाने का समर्थन करता रहा है.

उन्होंने यह भी कहा कि अर्जेंटीना और भारत उपनिवेशवाद विरोधी विरासत और मूल्यों के साझेदार हैं.

इस उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए शशि थरूर ने कहा था, ''भारत फॉकलैंड को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच के विवाद को बातचीत के ज़रिए सुलझाने का समर्थन करता रहा है. उपनिवेशवाद को ख़त्म करने में भारत की भूमिका अग्रणी रही है. भारत वार्ता के ज़रिए इस विवाद को भी सुलझाने का समर्थन करता है.''

अर्जेंटीना के विदेश मंत्री ने इस समारोह में ब्रिटेन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की है कि 1982 के युद्ध से जुड़े दस्तावेज़ों को सार्वजनिक किया जाए. उन्होंने कहा कि ब्रिटेन ने युद्ध के दौरान दक्षिण अटलांटिक में परमाणु हथियारों का बड़ा ज़खीरा जमा किया था. अर्जेंटीना के विदेश मंत्री ने कहा कि 21वीं सदी में उपनिवेश के लिए कोई जगह नहीं है.

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फॉकलैंड किसका?

इस द्वीप पर नियंत्रण को लेकर 1982 में ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच युद्ध हो चुका है. अर्जेंटीना के दावे को ब्रिटेन की सेना ख़ारिज करती रही है. अर्जेंटीन का कहना है कि उसका इस द्वीप अधिकार है क्योंकि यह 1800 के दशक में स्पेनिश साम्राज्य का हिस्सा था. इसके अलावा अर्जेंटीना लातिन अमेरिकी मेनलैंड से नज़दीकी का हवाला देकर भी अपना दावा करता है.

वहीं ब्रिटेन लंबे समय से अपने प्रशासन और वहाँ के नागरिकों के ब्रिटिश होने का तर्क देता है. इस द्वीप में तेज़ हवा चलती है और पेड़ न के बराबर है. पूर्वी और पश्चिमी फॉकलैंड दो अहम द्वीप हैं. इसके अलावा सैकड़ों छोटे-छोटे द्वीप हैं. यह द्वीप स्वायत्त है लेकिन यहाँ के विदेशी मामलों और रक्षा से जुड़े मामलों को ब्रिटेन देखता है. इस द्वीप में कोई दलीय राजनीति नहीं है. एक जनवरी 2009 को एक नया संविधान लागू हुआ था, जिसमें कार्यकारी परिषद को और अधिकार दिए गए थे.

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फॉकलैंड पर एक नज़र

  • 1690 - अंग्रेज़ कैप्टन पहली बार यहाँ पहुँचे.
  • 1764 - पूर्वी फॉकलैंड में फ़्रांस के नेविगेटर ने पहली बस्ती बसाई.
  • 1765 - ब्रिटेन ने पश्चिम फॉकलैंड बसाया. स्पैनिश 1770 में यहाँ से वापस चले गए थे लेकिन 1771 में फिर से लौट आए थे. 1774 में ये फिर से वापस चले गए थे.
  • 1820 - स्वतंत्र अर्जेंटीना ने फॉकलैंड की संप्रभुता पर अपना दावा किया.
  • 1831 - अमेरिकी युद्धपोतों ने अर्जेंटीना के ठिकानों को नष्ट कर दिया था. अमेरिका ने ऐसा तीन अमेरिकी पोतों को ज़ब्त किए जाने के जवाब में किया था.
  • 1833 - ब्रिटिश बलों ने बाक़ी के बचे अर्जेंटीना के अधिकारियों को वहाँ से हटा दिया और अपने एक गवर्नर को नियुक्त किया. अर्जेंटीना लगातार ब्रिटेन के इस क़ब्ज़े का विरोध करता रहा.
  • 1965 - संयुक्त राष्ट्र ने ब्रिटेन और अर्जेंटीना को विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत के लिए आमंत्रित किया.
  • 1982 - अर्जेंटीना ने हमला किया और युद्ध भड़क उठा.
  • 1990 - 1982 के युद्ध के बाद अर्जेंटीना और ब्रिटेन के बीच राजनयिक संबंध कायम हुए.
  • 2013 - यहाँ के रहने वालों ने ब्रिटिश नियंत्रण के पक्ष में वोट किया था.

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