You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मुगल सम्राट अकबर या गौड़ हिंदू राजा शशांक: किसने की थी बांग्ला कैलेंडर की शुरुआत
- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने पश्चिम बंगाल में इस आशय का एक जोरदार प्रचार और 'जागरूकता अभियान' शुरू किया है कि मुगल सम्राट अकबर नहीं बल्कि गौड़ राजवंश के प्राचीन हिंदू राजा शशांक ने बांग्ला वर्ष या 'बांग्ला कैलंडर' की शुरुआत की थी.
भारत में इस बार बांग्ला नव वर्ष 15 अप्रैल शुक्रवार को मनाया जा रहा है.
आरएसएस से प्रभावित 'बंगीय सनातनी संस्कृति परिषद' ने इस बयान के साथ विभिन्न जिलों में प्रचार अभियान शुरू किया है कि बांग्ला वर्ष की शुरुआत एक हिंदू राजा ने की थी.
संगठन ने कोलकाता में भारतीय विदेश मंत्रालय की सांस्कृतिक शाखा, आईसीसीआर के सभागार में इस अवसर पर नव वर्ष के दिन एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया है.
प्रदर्शनी का शीर्षक 'शशांक से वर्तमान तक' रखा गया है.
लेकिन अचानक राजा शशांक को ही बांग्ला वर्ष के प्रवर्तक के रूप में स्थापित करने की यह पहल क्यों?
पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेता और जाने-माने चेहरे जिष्णु बसु ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "ऐसी धारणा प्रचलित है कि अकबर ने ही बांग्ला वर्ष की शुरुआत की थी."
"लेकिन वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के आधुनिक शोध से पता चलता है कि विभिन्न कारणों से अकबर के लिए बांग्ला के वर्ष या बांग्ला कैलेंडर की शुरुआत करना संभव ही नहीं था."
उन्होंने कहा, "अबुल फजल के प्रशासनिक ग्रंथ आइन-ए-अकबरी में भी साल दर साल की अनेक घटनाओं का जिक्र है, लेकिन वहां भी बांग्ला वर्ष की गणना का कोई जिक्र नहीं है."
"अकबर के जीवनकाल में कभी भी बंगाल पर उनका पूर्ण नियंत्रण नहीं हुआ. सन 1576 में राजमहल की लड़ाई जीतकर मुगलों ने पहली बार बंगाल पर विजय प्राप्त की थी, लेकिन उसके बाद भी कई वर्षों तक युद्ध जारी रहा."
वे कहते हैं, "और ऐसे में अकबर ने उस समय के अशांत बंगाल में अपनी पसंद से एक नया साल शुरू किया होगा, यह बहुत ही अस्वाभाविक है."
शशांक बनाम अकबर
हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता लंबे समय से बांग्ला वर्ष के प्रवर्तक के रूप में गौड़ राजवंश के प्राचीन राजा शशांक को प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनकी राजधानी वर्तमान बहरमपुर शहर के पास कर्णसुवर्ण में थी.
शशांक छठी शताब्दी के अंत में गुप्त साम्राज्य के अधीन एक सामंती शासक थे. हालांकि, बाद में उन्होंने अपने को गौड़ भूमि का स्वतंत्र और संप्रभु शासक घोषित कर लिया था.
राजा शशांक की मृत्यु 637 या 638 ई. के आस पास हुई थी. उन्होंने लगभग 45 साल शासन किया था. राजा शशांक 593 ई. में सत्ता में आए थे और तभी से ही बांग्ला वर्ष की गणना या बांग्ला कैलेंडर शुरू हुआ. ये मान लेने से उनकी बात मेल खा जाती है.
क्योंकि बांग्ला वर्ष और ईसाई वर्ष के बीच का अंतर भी ठीक 593 वर्ष का है. उदाहरण के लिए, अभी बांग्ला का वर्ष 1429 शुरू हो रहा है, और अंग्रेजी या ईसाई वर्ष 2022 है - इस तरह दोनों के बीच की गणना का अंतर 593 वर्ष का है.
हालांकि, नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री और शोधकर्ता अमर्त्य सेन ने अपने कई लेखों, व्याख्यानों और ग्रंथों में स्पष्ट रूप से मुगल सम्राट अकबर को बांग्ला वर्ष की शुरुआत करने वाला बताया है.
साठ के दशक में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला कैलेंडर में सुधार के लिये डॉ मुहम्मद शाहिदुल्ला की अध्यक्षता में सरकार द्वारा गठित समिति का भी स्पष्ट फैसला था कि सम्राट अकबर ने 1585 ई में बांग्ला वर्ष की गणना की शुरुआत की थी.
हालांकि बंगीय सनातनी संस्कृति परिषद के सचिव प्रबीर भट्टाचार्य मानते हैं, "भारत के इतिहास को लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं. अकबर के बांग्ला वर्ष की शुरुआत कराने की बात भी ऐसी ही एक घटना है."
उन्होंने कहा, "बांग्ला वर्ष की गणना या बांग्ला कैलेंडर बंगालियों द्वारा स्वयं तैयार की गई वस्तु है, परंतु कुछ लोग इसका श्रेय भी मुगलों को देना पसंद करते हैं. लेकिन यह वास्तव में ऐतिहासिक रूप से सच नहीं है."
उन्होंने कहा कि बंगाल के एक हिंदू राजा को उसका 'उचित गौरव' वापस लौटाने के लिये परिषद पूरे पश्चिम बंगाल में प्रचार अभियान चला रही है.
इतिहास क्या कहता है?
लेकिन बांग्ला वर्ष की शुरुआत के बारे में इतिहासकार क्या कहते हैं?
कलकत्ता विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर और राजनीतिक इस्लाम के विशेषज्ञ किंग्शुक चटर्जी ने स्पष्ट जवाब दिया, "शशांक के शासनकाल में बांग्ला भाषा ही शुरू नहीं हुई थी. इसलिये यह सोचना कि उन्होंने बांग्ला के लिये अलग वर्ष की शुरुआत करवाई होगी, कुछ ज्यादा ही हो जाता है."
"बल्कि, इतिहास हमें बताता है कि मुगल बादशाह अकबर ने बंगाल पर विजय प्राप्त करने के बाद यहां एक प्रतिनिधिमंडल भेजा था."
"जब उन्होंने देखा कि बंगाल से लगान वसूल करने के लिए एक कैलेंडर की आवश्यकता है, तो सोचा कि इसे हिंदू शक संवत् से जोड़ने की बजाय मुस्लिम हिजरी से जोड़कर गणना की जाए."
किंग्शुक चटर्जी ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "शायद इसी तरह अकबर के दूतों ने बांग्ला कैलेण्डर की शुरुआत की थी."
बंगाल में मुगल काल के इतिहास के विशेषज्ञ वयोवृद्ध इतिहासकार अरुण बंद्योपाध्याय के विचार हालांकि इस मामले में कुछ अलग हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "वास्तव में, फसल के आधार पर वर्ष गिनने की प्रथा, जिसे 'फसली' कहा जाता है, भारत में लगभग हर जगह प्रचलित थी, और बंगाल कोई अपवाद नहीं था."
"हो सकता है कि इसी फसली को अकबर ने बंगाल में कुछ बदलाव करके इसे 'नियमित' किया हो - इसका श्रेय निश्चित रूप से उनको जाता है. लेकिन अकबर को बांग्ला वर्ष या बांग्ला कैलेण्डर की शुरुआत करने वाला बताया जाना कहां तक सही होगा, इस बारे में मैं निश्चित नहीं हूं."
अरुण बंद्योपाध्याय ने कहा, "दरअसल, साल की गिनती का इतिहास एक बात है, इसका क्रियान्वयन दूसरी बात है. अकबर के समय से बहुत पहले, बांग्ला वर्ष की गिनती अपने तरीके से की जाती थी, उस समय शायद तरीका बदला गया था."
अमर्त्य सेन का बयान
अमर्त्य सेन को बादशाह अकबर को बांग्ला वर्ष की गणना या बांग्ला कैलेंडर की शुरुआत करने का श्रेय देने में कोई झिझक नहीं है. उन्होंने अपनी पुस्तक 'द आर्गुमेंटेटिव इंडियन' में भी स्पष्ट रूप से यह बात लिखी हैं.
लगभग तीन साल पहले कलकत्ता में इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में एक स्मारक भाषण में उन्होंने कहा, "बांग्ला वर्ष की एक विशेषता ये है कि कबर ने बहुत से धर्मों में स्वीकार्य कैलेंडर 'तारीख-ए-इलाही' पूरे भारत में लागू करने का विफल प्रयास किया था. लेकिन उसका प्रभाव अभी भी केवल बांग्ला वर्ष या बांग्ला कैलेंडर पर बना हुआ है."
उस भाषण में उन्होंने यह भी कहा, "अकबर के शासनकाल के दौरान, जब मुस्लिम कैलेंडर या हिजरी की पहली सहस्राब्दी समाप्त हो रही थी - तब उन्होंने अपने शासन में एक बहु-सांस्कृतिक कैलेंडर लागू करने की आवश्यकता महसूस की थी. यही था तारीख-ए-इलाही.
"ये कैलेंडर हिंदू सूर्य सिद्धांत परंपरा का पालन करता था, और साथ ही इसमें मुस्लिम हिजरी की भी कुछ विशेषताओं को शामिल किया गया था- जैसे कि हिजरी का चंद्र इतिहास."
दिलचस्प बात यह है कि जहां अकबर का दरबार था, उस दिल्ली-आगरा में भी तारीख-ए इलाही को स्वीकार करने योग्य नहीं पाया गया. लेकिन उस कैलेंडर की एक शाखा अभी भी पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में गर्व से मौजूद है - इसका नाम बांग्ला वर्ष या बांग्ला कैलेंडर है.
हालांकि, बहुत से शोधकर्ता अमर्त्य सेन की इस बात से सहमत नहीं हैं.
अकबर या शशांक के अलावा एक तीसरा सिद्धांत कहता है कि प्रसिद्ध तिब्बती शासक श्रंग सन गम्पो के पिता श्रंग सन ने एक बार पूर्वी भारत के विशाल क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की थी- और उस समय उनके बेटे का जन्म हुआ था और उसे यादगार बनाने के लिये उन्होंने उस क्षेत्र में 'वर्ष' की शुरुआत की थी
इन तीन सिद्धांतों पर विचार करने के बाद शोधकर्ता और प्रोफेसर तमाल दासगुप्ता ने एक लेख में लिखा है, "बांग्ला वर्ष या बांग्ला कैलेण्डर के प्रवर्तक के रूप में शशांक के बारे में दावा सबसे मजबूत है, और अकबर को लेकर दावा सबसे कमजोर है."
उन्होंने शंशाक को लेकर दावे के समर्थन में उदाहरण दिया कि मुर्शिदाबादक्षेत्र में शैव शासक शशांक के समय से एक धार्मिक उत्सव (शिव-चंडी मेला) चल रहा है.
तमाल दासगुप्ता प्रश्न करते हैं, "यदि शशांक द्वारा शुरू किया गया एक शैव-तांत्रिक उत्सव बंगाल में लगातार चौदह सौ वर्षों तक जारी रह सकता है, तो क्या उसके द्वारा शुरू की गई वर्ष की गणना नहीं जारी रह सकती?"
संघ परिवार अब हिंदू राजा शशांक के समर्थन में इस तरह के तर्कों का सहारा लेकर उन्हें बांग्ला वर्ष के प्रवर्तक के रूप में स्थापित करना चाहता है - इस पहल का हालांकि एक राजनीतिक उद्देश्य भी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)