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आंबेडकर के सपने और केजरीवाल की राजनीति में क्या कोई मेल है?
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 1984. बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के बाद कांशीराम की सभाओं में एक नारा ज़ोर शोर से गूंजता था- ''बाबा तेरा मिशन अधूरा, कांशीराम करेंगे पूरा."
बाबा साहब भीम राव आंबेडकर से जुड़े इस नारे के साथ बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश सहित दूसरे कई राज्यों में दलितों का एक बड़ा जनाधार खड़ा कर लिया.
क़रीब 37 साल बाद कांशीराम का वो नारा अब आम आदमी पार्टी में सुनने को मिल रहा है. बदला है तो सिर्फ़ नाम. नारे में अब कांशीराम के बदले अरविंद केजरीवाल का नाम जुड़ गया है. ये नया नारा है, ''बाबा तेरा सपना अधूरा, केजरीवाल करेगा पूरा.''
केजरीवाल इन दिनों अलग-अलग मंचों से और इंटरव्यू में बार-बार इस बात को दोहराते हैं कि बाबा का सपना अब वही पूरा करेंगे. सिर्फ़ नारा ही नहीं आम आदमी पार्टी के दफ़्तरों से लेकर पोस्टरों तक में, बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं.
आख़िर आम आदमी पार्टी को बाबा साहब भीमराव आंबेडकर क्यों याद आ रहे हैं? इसके राजनीतिक मायने क्या हैं? क्योंकि पिछले तीन दशकों से बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के ज़रिए देश की ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियों ने अपनी राजनीतिक ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश की है.
इस कड़ी में अब आम आदमी पार्टी का नाम भी जुड़ गया है. 'आप' की इस राजनीति को समझने के लिए बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के नाम पर शुरू हुई उस सियासत को समझना ज़रूरी है, जो 80 के दशक में शुरू हुई थी.
प्रतीकों की लड़ाई में आंबेडकर
बाबा साहब भीमराव आंबेडकर आख़िरी सांस तक जातीय भेदभाव पर चोट करते रहे और दलितों के हक़ की लड़ाई लड़ते रहे. इस संघर्ष में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने ख़ुद हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था.
साल 1956 में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के देहांत के बाद दलितों के हक़ की लड़ाई अलग-अलग राजनीतिक दलों में बँट गई और वो धीरे-धीरे एक राजनीतिक प्रतीक बनते चले गए.
वरिष्ठ पत्रकार और मायावती की बायोग्राफ़ी 'बहनजी' लिखने वाले अजय बोस का मानना है, ''40 साल पहले के चुनावों में भीमराव आंबेडकर का कोई नाम तक नहीं लेता था. कांग्रेस भी आंबेडकर का नाम नहीं लेती थी. कांग्रेस को दलितों का वोट दलित नेता जगजीवन राम के नाम पर मिलता था. 80 के दशक में कांशीराम और 90 के दशक में मंडल कमिशन के समय राजनीति में आंबेडकर एक बड़े प्रतीक बन गए. आंबेडकर के नाम पर दलितों को एकजुट किया जाने लगा.''
बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के देहांत के 34 साल बाद यानी 1990 में पहली बार संसद के सेंट्रल हॉल में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की तस्वीर लगाई गई.
उस वक़्त विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री थे. उनके समय में ही मंडल कमिशन की सिफ़ारिशें लागू हुईं. मंडल कमिशन के बाद अलग-अलग राजनीतिक मंचों पर बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का महत्व बढ़ता चला गया. कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी पार्टियों भी बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की विचारधारा की बात करने लगी और दलितों के प्रतिनिधित्व को महत्व दिया जाने लगा.
आंबेडकर, आरक्षण और अरविंद केजरीवाल
बात साल 2006 की है. उन दिनों अरविंद केजरीवाल रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड मिलने के बाद सुर्ख़ियों में आ गए थे. ये पुरस्कार उन्हें सूचना के अधिकार को ज़मीन पर लागू करने के प्रयास करने और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए दिया गया था.
इसी साल केंद्र सरकार सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव लेकर आई थी. इसके विरोध में 'यूथ फ़ॉर इक्वलिटी' नाम के एक संगठन ने देशव्यापी आंदोलन शुरू कर दिया. एम्स, आईआईटी, आईआईएम समेत देश के कई बड़े संस्थानों के छात्र सड़कों पर उतर आए थे.
दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मनोज कुमार के मुताबिक़, ''केजरीवाल उस समय 'यूथ फ़ॉर इक्वलिटी' के साथ थे. उन्होंने आरक्षण के विरोध में एम्स में भूख हड़ताल भी की थी. कुछ लोगों ने आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली थी. 'यूथ फ़ॉर इक्वलिटी' आरक्षण के विरोध में काम कर रही थी.''
साल 2006 में अरविंद केजरीवाल हालांकि किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े थे, लेकिन उन पर आरोप लगते हैं कि वो आरक्षण के ख़िलाफ़ 'यूथ फ़ॉर इक्वलिटी' नाम के संगठन को लगातार अपना समर्थन दे रहे थे.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के सेंटर फ़ॉर द स्टडी आफ़ सोशल सिस्टम्स के प्रोफ़ेसर डॉ. विवेक कुमार बताते हैं कि यूथ फ़ॉर इक्वलिटी के मंचों पर अरविंद केजरीवाल को देखा गया था, जो आरक्षण के ख़िलाफ़ था. वो पूछते हैं कि तब केजरीवाल बाबा साहब भीमराव आंबेडकर को क्यों याद नहीं कर रहे थे.
अरविंद केजरीवाल पर लगा ये आरोप आज भी उनका पीछा कर रहा है. पत्रकार सबा नक़वी की किताब 'कैपिटल कॉन्क्वेस्ट: हाऊ द आप इंक्रेडिबल विक्टरी हैज़ डिफ़ाइन इंडियन इलेक्शन' में अरविंद केजरीवाल ने इस सवाल पर अपनी सफाई दी है.
इस किताब के मुताबिक़ अरविंद केजरीवाल ने कहा, ''मैं आरक्षण विरोधी नहीं हूँ. ये ग़लत जानकारी है. मैंने आरक्षण विरोधी आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया. मैं 'यूथ फ़ॉर इक्वलिटी' से जुड़े कई छात्रों को जानता हूँ, लेकिन छात्रों को जानने का मतलब ये नहीं कि मैं उन्हें अपना समर्थन देता हूँ.''
पहले गांधी और अब आंबेडकर
साल 2011 में जन लोकपाल क़ानून की मांग को लेकर अन्ना आंदोलन में अरविंद केजरीवाल नायक की तरह उभरे थे. उस समय मंच पर गांधी की तस्वीर और अरविंद केजरीवाल के सर पर गांधी टोपी दिखाई देती थी. उस समय तक बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का कहीं ज़िक्र तक नहीं था.
आम आदमी पार्टी की वेबसाइट के मुताबिक़, अन्ना आंदोलन के अगले ही साल 2012 में आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ था. वेबसाइट के अनुसार, पार्टी की स्थापना की तारीख़ थी 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन.
आम आदमी पार्टी को चुनाव चिह्न मिला- झाड़ू. दिसंबर 2013 में आम आदमी पार्टी ने बिजली पानी के मुद्दे पर दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ा. उस समय भी आम आदमी पार्टी के मंच से बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का नाम सुनाई नहीं दिया.
वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस का मानना है, ''आम आदमी पार्टी को झाड़ू चुनाव चुनाव चिह्न के चलते दलितों का अच्छा ख़ासा वोट मिला. बड़ी संख्या में दलित कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी के साथ चले गए. इसमें वो तबका भी था, जो सफ़ाई के काम से जुड़ा था और उनके लिए झाड़ू की अपनी अहमियत थी.''
कुछ ऐसी ही राय प्रोफ़ेसर विवेक कुमार रखते हैं, ''ये एकदम विशुद्ध राजनीति है. एक प्रकार से अवसरवादी राजनीति है. आम आदमी पार्टी ने जब झाड़ू चुनाव चुनाव चिह्न रखा तब अरविंद केजरीवाल एक विशिष्ट समुदाय के प्रतीक को उठा रहे थे और उसे अपना रहे थे.''
आम आदमी पार्टी दिल्ली में दो बार प्रचंड बहुमत से सरकार बना चुकी है. पार्टी अब दूसरे राज्यों में भी अपना जनाधार मज़बूत कर रही है. इसमें उसे बड़ी कामयाबी पंजाब विधानसभा चुनावों में मिल चुकी है.
पंजाब चुनाव में क्योंयाद आए आंबेडकर?
पंजाब में दलितों की आबादी क़रीब 32 फीसदी है. प्रतिशत के लिहाज़ से यह देश के सभी राज्यों में सबसे ज़्यादा है.
इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के सामने कांग्रेस के दलित मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की चुनौती थी. वैसे समय में आम आदमी पार्टी ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर और भगत सिंह के नाम पर अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश शुरू की.
जनवरी 2021 में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के सरकारी दफ़्तरों में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीर लगाने का एलान किया था. इसके बाद फ़रवरी में दिल्ली में पार्टी ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के जीवन पर आधारित एक भव्य नाटक का आयोजन किया.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार कहते हैं, ''दलित समाज संख्या में अधिक है. इसलिए आम आदमी पार्टी को लगा कि एक ऐसा प्रतीक तलाशना होगा, जिससे वे दलितों को अपनी तरफ आकर्षित कर पाएं. इसलिए आम आदमी पार्टी ने विशिष्ट प्रकार के आयोजन किए, जिसमें बाबा साहब पर नाटक भी शामिल था.''
केजरीवाल की रणनीति काम कर गई और उनकी पार्टी ने पंजाब चुनाव में धमाकेदार जीत हासिल की. इसमें दलित वोटरों का बहुत बड़ा योगदान था.
वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस के मुताबिक़, ''पंजाब में कांग्रेस का दलित वोट बैंक पर क़ब्ज़ा था. आम आदमी पार्टी ने पंजाब में कांग्रेस के दलित वोट बैंक में सेंध लगा दी. केजरीवाल का लक्ष्य है कि कैसे कमज़ोर हो रही कांग्रेस के दलित वोट बैंक को अपने पाले में ले आएं.''
तो क्या आम आदमी पार्टी बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के ज़रिए दलितों के बीच अपना जनाधार मज़बूत करने में कामयाब हो रही है? इस सवाल का जवाब देश की मौजूदा दलित राजनीति में निहित है. इस समय उत्तर प्रदेश में दलितों की राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है.
वहीं बिहार में रामविलास पासवान के निधन के बाद राज्य में दलित जनाधार बिखर चुका है. रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी अब बहुत कमज़ोर हो चुकी है. उधर महाराष्ट्र के दलित नेता रामदास आठवले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया का प्रभाव क्षेत्र सीमित है.
इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस का मानना है, ''देश में इस समय दलित जनाधार में बिखराव की स्थिति है और नेतृत्व का भी संकट है. दलित राजनीति में एक तरह से 'वैक्यूम' आ गया है. अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस अवसर का फ़ायदा उठाने की कोशिशों में जुटी है.''
पंजाब की सफलता से उत्साहित आम आदमी पार्टी, इस साल गुजरात चुनाव की ज़ोर शोर से तैयारी कर रही है. गुजरात में दलितों की आबादी क़रीब 7 फ़ीसदी है. ऐसे में ये देखना होगा कि क्या आम आदमी पार्टी गुजरात में भी पंजाब की तरह आंबेडकर के नाम पर दलितों के दिल में अपनी जगह बनाने की कोशिश करेगी.
आम आदमी पार्टी, संगठन और सरकार में दलितों को प्रतिनिधित्व देने पर ज़ोर दे रही है.
आम आदमी पार्टी के नेता रत्नेश गुप्ता बताते हैं, ''अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की विचारधारा को लागू किया है. दिल्ली विधानसभा में दलित नेता राखी बिड़लान को डिप्टी स्पीकर और राजेंद्र पाल गौतम को मंत्री बनाया गया है. ये हमारी मज़बूरी नहीं थी''
सरकार में दलितों के प्रतिनिधित्व पर बात करते हुए प्रो. विवेक कुमार कहते हैं कि बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि सरकार के अंदर प्रतिनिधित्व चाहिए. वे सिर्फ़ यहीं नहीं रुके. उन्होंने कहा कि कैबिनेट में चाहिए, क्योंकि निर्णय वहीं लिए जाते हैं. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में सिर्फ़ एक दलित नेता को मंत्री बनाया हुआ है.
पंजाब की जीत के बाद भगवंत मान मुख्यमंत्री दफ़्तर में जब अपना कामकाज संभाल रहे थे, तो उनके पीछे बाबा साहब भीमराव आंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीर लगी थी, जबकि महात्मा गांधी की तस्वीर नहीं थी. इसे लेकर आम आदमी पार्टी पर सवाल उठे कि क्या वो महात्मा गांधी को भूल गए?
इस सवाल का दूसरा पहलू ये भी है कि आम आदमी पार्टी के लिए बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की अहमियत क्यों बढ़ती जा रही है?
आंबेडकर की विचारधारा के कितने क़रीब है 'आप'
पंजाब के बाद आम आदमी पार्टी गुजरात में चुनाव के लिए कमर कस चुकी है. साथ ही दूसरे राज्यों में भी पार्टी के विस्तार की कोशिशें हो रही हैं. कमज़ोर होती कांग्रेस और सिमट रही बीएसपी के दलित जनाधार पर पार्टी की नज़र है. ऐसे में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर आम आदमी पार्टी के लिए एक ज़रूरत बन गए हैं.
लेकिन क्या ये सिर्फ़ चुनावी हित साधने का मामला है? क्या आम आदमी पार्टी बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की विचारधारा पर खरी उतर पाएगी?
एक तरफ़ अरविंद केजरीवाल सॉफ़्ट हिंदुत्व की राह पर हैं. वो मंच से हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, बुज़ुर्गों को धार्मिक तीर्थ स्थल की मुफ़्त में यात्राएं करवाते हैं. दूसरी तरफ़ वो बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की राह पर चलने की बात करते हैं.
ज़ाहिर है अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी एक ख़ास तरह का राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश में है, ताकि हर वर्ग में उनका जनाधार स्थापित हो सके.
वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस मानते हैं, ''ये विचारधारा का समय नहीं है. आम आदमी पार्टी परिस्थितियों के मुताबिक़, व्यावहारिक समझौते करती है. ये पार्टी किसी भी मुद्दे पर साफ़ विचारधारा नहीं रखती. 'आप' को लगता है कि जनता का भला होना चाहिए, अत्याचार नहीं होना चाहिए. ये सब न्यूट्रल टर्म हैं. ये पार्टी कास्ट और क्लास न्यूट्रल है.''
हालांकि बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के जरिए दलित राजनीति की राह आम आदमी पार्टी के लिए आसान नहीं है. बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की तस्वीरें देश की दूसरी राजनीतिक पार्टियों के दफ़्तरों में भी नज़र आती है.
हर जगह बाबा साहब के विचारों पर चलने की बात होती है और ज़्यादातर पार्टियों में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के नाम पर दलितों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है.
इन सब के बीच आम आदमी पार्टी बाबा साहब आंबेडकर पर आधारित ये नारा अधिकार पूर्वक लगा रही है कि ''बाबा तेरा सपना अधूरा, केजरीवाल करेगा पूरा.''
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