क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफ़िकेशन) बिल-2022 क्या है, क्यों हो रहा है विरोध?

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोमवार को लोकसभा में क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफ़िकेशन) बिल, 2022 रखा गया. बिल को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ने पेश किया. बिल के समर्थन में अजय मिश्रा ने कई बातें रखीं. उन्होंने कहा कि अपराधियों पर नकेल कसने, दोष सिद्ध करने और जांच एजेंसियों के हाथ मज़बूत करने के लिए ये बिल लाया जा रहा है.
इस बिल को बर्बर कहते हुए विपक्ष ने इसका ज़ोरदार विरोध किया. कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा कि ये बिल नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है.
क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफ़िकेशन) बिल का विरोध ना सिर्फ़ राजनीतिक पार्टियां कर रही हैं बल्कि इस पर समाज के अलग-अलग वर्गों से सवाल उठाए जा रहे हैं. ऐसा इस बिल में क्या है जिसे लेकर इतनी चर्चा हो रही है?
क्या है क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफ़िकेशन) बिल 2022
इस वक्त देश में अपराधियों की पहचान 'बंदी शिनाख़्त अधिनियम 1920' के तहत होती है. इस क़ानून में दोषी ठहराए गए अपराधियों के शरीर की सीमित माप की अनुमति दी गई है. इस क़ानून के तहत एक साल या उससे अधिक कारावास होने पर ही अपराधी के फ़िंगरप्रिंट और फ़ुट प्रिंट लिए जाते हैं. उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति को दो साल की सज़ा होती है तो इसी क़ानून के तहत उसके फ़िंगरप्रिंट और फ़ुट प्रिंट लिए जाएंगे.
अब सरकार इस 102 साल पुराने क़ानून को ख़त्म कर नया क्रिमिनल प्रोसीजर आइडेंटिफ़िकेशन क़ानून बनाना चाहती है जिसे लोकसभा में प्रस्तावित किया गया है.
नए बिल में पुलिस और जेल अधिकारी को फ़िंगरप्रिंट, हथेली के प्रिंट, फ़ुट प्रिंट, तस्वीरें, आइरिस और रेटिना स्कैन, फ़िजिकल और बायोलॉजिकल सैंपल और उनका विश्लेषण, व्यवहार संबंधी विशेषताएं जिसमें हस्ताक्षर, लिखावट या अन्य जांच करने का अधिकार दिया गया है.
प्रस्तावित बिल के अनुसार पुलिस अधिकारी हेड कॉन्स्टेबल के और जेल अधिकारी हेड वॉर्डन के रैंक से नीचे का नहीं होना चाहिए.

बिल का विरोध क्यों ?
संविधान और साइबर कानून एक्सपर्ट विराग गुप्ता के मुताबिक़ 'बंदी शिनाख़्त अधिनियम 1920' में अपराध सिद्ध होने पर सैंपल लिए जाते हैं, लेकिन नए प्रस्तावित बिल में अभियुक्त के अलावा संदिग्ध लोगों के सैंपल इकट्ठा किए जाने का भी उल्लेख है. इसका मतलब है कि पुलिस शक़ के आधार पर भी किसी व्यक्ति के बायोमेट्रिक और बायोलॉजिकल सैंपल ले सकती है.
प्रस्तावित क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफ़िकेशन) बिल 2022 में प्रिवेंटिव डिटेंशन को समझाते हुए एडवोकेट राजेश जाखड़ कहते हैं कि 'अगर कोई व्यक्ति प्रदर्शन करने जा रहा है और पुलिस को लगता है कि इससे शांति भंग होगी तो उसे गिरफ़्तार कर सकती है. ऐसे में पुलिस उनके बायोमेट्रिक और बायोलॉजिकल सैंपल भी ले सकती है.'
बीबीसी से बातचीत में पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह कहते हैं, ''पुराना क़ानून अप्रांसगिक हो गया है. आज के समय में अपराध के तरीक़े बदल रहे हैं, इसलिए इस तरह का क़ानून बनाने की ज़रूरत है ताकि अपराधियों को पकड़ने में आसानी हो. वहीं प्रिवेंटिव डिटेंशन के बहाने पुलिस किसी आम शख़्स का बायोमेट्रिक और बायोलॉजिकल सैंपल लेकर बाद में उसे परेशान भी कर सकती है''
प्रस्तावित बिल में डेटा को 75 साल तक सुरक्षित रखने का प्रावधान है जिसका विरोध हो रहा है.

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बायोलॉजिकल सैंपल क्या होता है ?
प्रस्तावित क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफ़िकेशन) बिल 2022 में सबसे ज़्यादा बहस बायोलॉजिकल सैंपल पर हो रही है.
बीबीसी से बातचीत में फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट इंद्रजीत राय बताते हैं, ''बायोलॉजिकल सैंपल में ख़ून, नाखून, बाल, लार, यूरिन जैसी कई अन्य चीज़ें शामिल हैं. फ़ोरेंसिक साइंस की मदद से पुलिस के लिए इन चीज़ों के आधार पर अपराधी की पहचान करना आसान हो जाता है. इस बिल को देखें तो पुलिस शरीर से जुड़ा कोई भी सैंपल इकट्ठा कर सकती है.''
वहीं बायोमेट्रिक के तहत फ़िंगरप्रिंट, फ़ुट प्रिंट, आइरिस और रेटिना स्कैन जैसे सैंपल जमा किए जाते हैं.
सवाल है कि सरकार को नए बिल में बायोलॉजिकल सैंपल को शामिल करने की क्या ज़रूरत है? इसका जवाब देते हुए फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट इंद्रजीत राय कहते हैं, ''क़रीब 80 प्रतिशत मामलों में फ़िंगरप्रिंट की क्वालिटी ठीक नहीं आती है. ज़्यादातर क्राइम सीन पर आधा या एक चौथाई फ़िंगरप्रिंट ही मिलता है. इस तरह के फ़िंगरप्रिंट का डेटा बेस से मिलान करना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती होती है.''
इसे थोड़ा और समझाते हुए इंद्रजीत राय बताते हैं, ''डीएनए कि अगर सैंपलिंग की जा रही है तो उसमें आधा या एक चौथाई नहीं होता. डीएनए हमेशा पूरा होता है और एक डीएनए दूसरे डीएनए से नहीं मिलता जबकि दस लाख में एक फ़िंगरप्रिंट का ग़लत मिलान संभव है. ऐसे में पुलिस के लिए अपराधी की पहचान करना आसान हो जाता है. डीएनए सैंपल को अदालत में सबूत की तरह पेश किया जा सकता है. भारत सरकार देश भर में डीएनए सैंपल को जमा करने के लिए डीएनए डेटा बैंक भी बना रही है.''

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बायोलॉजिकल सैंपल का विरोध
क़ानून की मूल अवधारणा अब तक यही रही है कि जब तक कोई व्यक्ति अदालत में दोषी सिद्ध नहीं हो जाता तब तक उसे निर्दोष माना जाता है.
बीबीसी से बातचीत में एडवोकेट राजेश जाखड़ बताते हैं, ''किसी भी व्यक्ति को अपने ख़िलाफ़ सबूत देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. लेकिन नए प्रस्तावित बिल में व्यक्ति को बायोलॉजिकल सैंपल के लिए बाध्य किया जा सकता है.''
दूसरी तरफ़ संविधान और साइबर कानून एक्सपर्ट विराग गुप्ता 'आधार' के इस्तेमाल को लेकर 2017 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले का ज़िक्र करते हैं. बीबीसी से बातचीत में विराग गुप्ता कहते हैं, ''2017 में आए पुट्टास्वामी जजमेंट में निजता के अधिकार को मान्यता दी गई थी.''
एनसीआरबी के हवाले डेटा
प्रस्तावित बिल में कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो को केंद्रीय एजेंसी के रूप में सैंपल इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी दी गई है. फ़िलहाल देश में अपराधियों से जुड़े फ़िंगरप्रिंट इकट्ठा करने का काम एनसीआरबी पहले से ही कर रही है.
विराग गुप्ता के मुताबिक़, ''फ़िंगरप्रिंट का डेटाबेस तैयार करने का काम यूपीए सरकार के समय में ही हो गया था. उस समय इसे 'क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क' का नाम दिया गया था. इसके तहत ही फ़िंगरप्रिंट लिए जाते हैं. प्रस्तावित बिल के पास होने पर इस सिस्टम में आइरिस और फ़ेशियल स्कैन जैसी चीज़ें और जोड़ी जाएंगी. केंद्र सरकार के पास दस लाख और राज्य सरकारों के पास क़रीब तीस लाख फ़िंगरप्रिंट का डेटा है. सरकार अब इस डेटा बेस को बढ़ाना चाहती है.''
विराग गुप्ता बताते हैं कि ''अमेरिका की जांच एजेंसी एफ़बीआई के पास क़रीब चार करोड़ फ़िंगरप्रिंट हैं. इसी तरह भारत भी अपराध रोकने के लिए एक बड़ा डेटा बेस तैयार करना चाहता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में आधार के डेटा के दूसरी जगह इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी.''

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कितना सुरक्षित है डेटा
देश में डेटा की सुरक्षा का क़ानून अभी नहीं बना है. इसलिए जिस डेटा को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो को दी गई है उस पर सवाल उठ रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में एडवोकेट राजेश जाखड़ कहते हैं, ''डेटा में छेड़छाड़ करने से किसी व्यक्ति को आसानी से कसूरवार साबित किया जा सकता है. कई केस में एफ़एसएल रिपोर्ट में पता लगा है कि डेटा से छेड़छाड़ की गई थी. डेटा को जमा करने का काम भी सरकारी एजेंसी के पास ही है. इससे अपराध किए बिना अपराधी साबित करने के लिए पुलिस को सहयोग मिल सकता है.''
एडवोकेट राजेश जाखड़ एक ज़रूरी बात कहते हैं, ''डेटा को सुरक्षित रखने के लिए सालाना ऑडिट और थर्ड पार्टी का इस्तेमाल करना चाहिए. थर्ड पार्टी और ऑडिट से ये सुनिश्चित हो पाएगा कि डेटा का ग़लत इस्तेमाल सरकारी एजेंसियां नहीं कर रही हैं.''

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क़ानून पर राज्य बनाम केंद्र
भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत 'पुलिस' और 'क़ानून व्यवस्था' राज्य के विषय हैं, इसलिए अपराध रोकने, पता लगाने, दर्ज करने और जांच-पड़ताल करने तथा अपराधियों के विरुद्ध अभियोजन की मुख्य ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की है.
बीबीसी से बातचीत में विराग गुप्ता कहते हैं, ''फ़िलहाल बिल में जो केंद्रीय मॉडल प्रस्तावित किया गया है, अभी ये देखना होगा कि इसमें राज्य सरकारें किस तरह के बदलाव कर पाएंगी?
इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में सैंपल्स की जांच के लिए लैबोरेट्री भी एक बड़ी समस्या है. जानकारों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर पुलिस किस तरह सैंपलिंग कर पाएगी.
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