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कांग्रेस: क्या 'अपनों' को बचाने के लिए हटाए सोनिया गांधी ने प्रदेश अध्यक्ष?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बात 2014 के लोकसभा चुनाव की है.
एक साल पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के हाथों हुई हार के बाद राहुल गांधी पार्टी का 'वर्किंग स्टाइल' बदलना चाहते थे.
उन्होंने 16 लोकसभा क्षेत्र चुने थे जहाँ कार्यकर्ताओं से पूछ कर उम्मीदवारों का चयन कांग्रेस पार्टी करना चाहती थी. कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की चांदनी चौक लोकसभा सीट भी उनमें से एक थी.
कपिल सिब्बल को जैसे ही इस बात का पता चला वो भागे भागे राहुल-सोनिया- प्रियंका के पास पहुँचे और अपनी सीट का नाम उस लिस्ट से हटाने में सफल हुए.
आज वही कपिल सिब्बल पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की माँग कर रहे हैं, जिसकी 'अंतरिम' अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं और 'असल' अध्यक्ष राहुल गांधी माने जाते हैं.
कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठता देख, सोनिया गांधी हरकत भी हरकत में आई. उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के प्रदेश अध्यक्षों से इस्तीफा माँग लिया गया.
सभी प्रदेश अध्यक्षों ने इस्तीफा दे भी दिया.
वैसे बीजेपी के लिए ये लाइन प्रचलित है - 'यहाँ इस्तीफे नहीं होते' लेकिन कांग्रेस में भी 2014 के बाद ये 'प्रथा' सी बन गई थी.
हार के लिए प्रदेश अध्यक्ष कितने ज़िम्मेदार
साल 2014 के बाद अलग-अलग राज्यों में पार्टी की हुई हार के बाद शायद ये पहला मौक़ा है जब हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हुए, पार्टी अध्यक्ष को इस्तीफा देने के लिए कहा गया हो.
हालांकि यहाँ ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि किसी प्रदेश अध्यक्ष ने स्वत: इस्तीफे की पेशकश नहीं की थी. गोवा के अध्यक्ष को छोड़ कर.
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं, "हार करारी थी, इस वजह से कुछ ना कुछ तो करते नज़र आना था. कई तो ऐसे थे जो घर के चिराग़ थे, और घर को ही आग लगा दी. उनमें से एक तो नवजोत सिंह सिद्धू है. उत्तर प्रदेश में अजय लल्लू तो अपना ही चुनाव हार गए. उत्तराखंड में हरीश रावत ने पार्टी को दो जगह गिराया. एक जगह अपने कर कमलों से और दूसरा पंजाब में जो किया वो पूरा एकतरफ़ा था. हरीश रावत पर भी गाज गिरनी चाहिए."
हालांकि हरीश रावत पाँच राज्यों में किसी भी राज्य के प्रदेश अध्यक्ष नहीं है. वो पिछले साल अक्टूबर तक पंजाब के प्रभारी थे. बाद में उन्हें उस पद से हटा दिया गया था. उसके बाद वो उत्तराखंड में चुनाव लड़े और अपनी सीट भी नहीं बचा पाए.
विनोद शर्मा मानते हैं कि चुनाव में कांग्रेस की हार के लिए ज़िम्मेदारी प्रदेश अध्यक्षों की बनती है. लेकिन वो ये भी सवाल पूछते हैं कि आख़िर ये नुमाइंदे किसके थे? इन्हें उस पद पर बिठाया तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने था. ये सभी प्रदेश अध्यक्ष केंद्रीय नेतृत्व की पंसद से ही तो बने थे. तो सवालों के घेरे में केंद्रीय नेतृत्व का 'टैलेंट हंट' भी है. उसका दोष किस पर है और इसकी भरपाई कौन करेगा?
इन इस्तीफ़ों से कई ऐसे प्रश्न निकलते हैं.
विनोद शर्मा जो सवाल पूछ रहे है, दबी ज़बान में बहुत सारे कांग्रेसी नेता भी यही कह रहे हैं. कपिल सिब्बल ने यही बात खुल कर अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस से कही.
कुछ ये भी सवाल पूछ रहे हैं कि क्या अजय कुमार लल्लू फ़ैसले ख़ुद ले रहे थे? प्रियंका गांधी जब ख़ुद को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा बता रही थी, तो उनकी ज़िम्मेदारी नहीं बनती. इस्तीफ़ा महासचिवों और प्रदेश प्रभारी का नहीं होना चाहिए.
पहले हुए इस्तीफ़े पर कांग्रेस में क्या हुआ?
ऐसा सवाल पूछने वालों में वरिष्ठ पत्रकार औरंगज़ेब नक़्शबंदी भी हैं. औरंगज़ेब कांग्रेस को राजनीतिक दल के तौर पर सालों से कवर कर रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "प्रदेश अध्यक्षों से ज़्यादा तो प्रदेश प्रभारी की ज़िम्मेदारी ज़्यादा बनती है. उनकी देखरेख में ही प्रदेश अध्यक्ष सभी फैसले लेते हैं. क्या अध्यक्षों का इस्तीफ़ा इसलिए लिया गया क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव की पूरी कमान प्रियंका गांधी के हाथ थी."
औरंगज़ेब यहां कांग्रेस पार्टी में पूर्व में चुनाव बाद हुए इस्तीफ़े के बारे में भी याद दिलाते हैं.
"2010 में बिहार चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने भी इस्तीफ़ा दिया था लेकिन 2013 तक वो केयरटेकर बन कर पद पर बने रहे थे. उसी तरह से गोवा के प्रदेश अध्यक्ष गिरीश चोडनकर ने इससे पहले दो बार इस्तीफ़ा दिया है. पहली बार 2019 में राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद और 2020 में भी ज़िला परिषद चुनाव के बाद अपने इस्तीफ़े की पेशकश की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया?
उसी तरह से राहुल गांधी ने भी 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन आज तक पार्टी के फैसलों में किसकी चलती है, ये बात किसी से छिपी नहीं है.
प्रियंका-राहुल क्या बच गए?
हालांकि पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू से इस्तीफा लेने को कई जानकार 'बड़ी कार्रवाई' मान रहे हैं.
सिद्धू पर प्रियंका और राहुल का हाथ था, ये बात उन तस्वीरों से साफ़ जाहिर होती थी जो यदा कदा वो ख़ुद पोस्ट करते थे.
औरंगज़ेब कहते हैं कि इससे पार्टी ने इस फ़ैसले से कार्यकर्ताओं को संदेश तो भेजा ही है.
विनोद शर्मा कहते हैं, पार्टी या उसका नेतृत्व जब कमज़ोर होता है तो व्यापक स्तर पर पार्टी में फेरबदल नहीं हो सकता है. चूंकि हार करारी रही इस वजह से कुछ करते हुए नेतृत्व दिखना चाहता है ताकि पार्टी काडर का हौसला ना टूटे.
विनोद शर्मा कहते हैं, गांधी परिवार एक ही समय में कांग्रेस के लिए लाभदायक और हानिकारक दोनों हैं.
लाभदायक इसलिए क्योंकि जब वो शीर्ष पर होते हैं, तो पार्टी टूटती नहीं है. एक दो लोग निकल कर भले ही चले जाएं. लेकिन लीडरशीप लेने के लिए मुठभेड़ नहीं होती. जैसा नरसिम्हा राव और सीता राम केसरी के समय हुआ था.
हानिकारक इसलिए क्योंकि इनके रहते दूसरे प्रतिभाशाली लोगों को वो जगह नहीं मिल पाती, जिसके वो हक़दार होते हैं. और फ़ैसले मिल जुल कर नहीं लिए जाते.
इस वजह से विनोद शर्मा कहते हैं कि पार्टी को एक ऐसा तंत्र विकसित करने की ज़रूरत है जहाँ टेलेंटेड लोगों को रोल मिले और फ़ैसले सीडब्लूसी में लिए जाए, जो फिलहाल एक रबर स्टैम्प बन गया है.
ये भी पढ़ें : कांग्रेस की दुविधा: गांधी परिवार मजबूरी या मज़बूती?
नए चेहरों पर फ़ैसला कब?
इस चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए वोट शेयर पर नज़र डालना भी ज़रूरी है.
कांग्रेस के प्रदर्शन के बारे में ये भी नहीं कहा जा सकता कि वोट मिले पर सीटों में तब्दील नहीं हो पाए. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वोट शेयर 3.91 प्रतिशत से गिर कर इस बार 2.33 प्रतिशत रह गया. पंजाब में पार्टी को सीटों का सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ. गोवा में कांग्रेस के वोट शेयर में 4.89 प्रतिशत की गिरावट आई है जबकि मणिपुर में 18.28 प्रतिशत की कमी आई है. उत्तराखंड अकेला राज्य रहा जिसमें कांग्रेस के वोट शेयर में 4.42 फीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.
इस वजह से औरंगज़ेब मानते हैं कि इस्तीफ़े अपनी जगह हैं, लेकिन कांग्रेस को 'रिवाइवल प्लान' की सख़्त ज़रूरत है.
"इन चेहरों की जगह कौन से नए चेहरे आएंगे? इस पर फ़ैसला कब आएगा. पहले जो इस्तीफ़े हुए उसमें दो-तीन साल बाद अब नए लोग नियुक्त कर पाए. अध्यक्ष का चुनाव अब तक नहीं हो पाया. हिमाचल प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष बदलने की सुगबुगाहट कब से चल रही है, लेकिन कोई फैसला नहीं हो पा रहा. कांग्रेस नेतृत्व को वहाँ फैसला लेने की ज़रूरत है."
कांग्रेस संगठन के चुनाव जल्द से जल्द पूरे हों ऐसा विनोद शर्मा का मानना है.
प्रदेश अध्यक्षों के इस्तीफ़े में जी-23 नेताओं का हाथ?
यहाँ एक और बात है, जिस पर सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है. वो है इस्तीफ़े की टाइमिंग. विधानसभा चुनाव के नतीज़े 10 मार्च को आए, दो दिन बाद रविवार को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई, मंगलवार को कपिल सिब्बल का अख़बार में इंटरव्यू छपा और शाम को प्रदेश अध्यक्षों का इस्तीफ़ा माँगा गया.
बुधवार को ही जी-23 नेताओं के डिनर पर बैठक होने वाली है.
तो क्या नाराज़ नेताओं की बैठक से ठीक पहले, प्रदेश अध्यक्षों के इस्तीफे की माँग करके पार्टी नेतृत्व कोई संदेश देना चाहती है?
इस पर विनोद शर्मा कहते हैं, " कांग्रेस एक यथा स्थिति (स्टेटस-को) वाली पार्टी है. और इस स्टेटस-को के भोगी जी-23 के नेता ही रहे हैं. जी-23 के ज़्यादातर नेता राज्यसभा से आते हैं. चुनाव में जी-23 में से कितने नेता सक्रिय थे? ये नेता प्रतिभाशाली ज़रूर हैं, जिनकी ज़रूरत किसी भी पार्टी को सरकार बनने के बाद होती है. ये अच्छे मंत्री और पॉलिसी बनाने वाले हो सकते हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या इनकी जनता में इतनी पैठ है कि वो चुनाव जीता सकते हैं. क्या कांग्रेस अध्यक्ष के लिए इनकी तरफ़ से कोई नया नाम आया है?
ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिसका जवाब आना बाक़ी है.
हालांकि औरंगजे़ब कहते हैं जी-23 में वो नेता हैं जो ताउम्र 'पॉलिटिक्स ऑफ कन्वीनियंस' करते है. फिलहाल ये दवाब के राजनीति कर रहे. आज भी उनको कोई ना कोई पद दे दें तो वो उस गुट से निकल जाएंगे.
इस बीच नज़रे कपिल सिब्बल पर भी है. कांग्रेस नेतृत्व उन पर कोई फ़ैसला लेती है या नहीं.
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