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हिजाब मामले में आए फ़ैसले पर क्या कहती हैं छात्राएं और राजनेता
कर्नाटक हाई कोर्ट ने मंगलवार को छात्राओं की याचिका ख़ारिज करते हुए कहा है कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है.
इसके बाद से तमाम राजनीतिक दलों, कानून के जानकारों और हिजाब पहनने के पक्षधर लोगों की ओर से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.
बीबीसी ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में अदालत के फ़ैसलों पर प्रतिक्रिया दे रहे लोगों से बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की है.
उत्तर प्रदेश में क्या कहती हैं छात्राएं
बीबीसी संवाददाता अनंत झणाणे ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कुछ छात्राओं से बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की है.
लखनऊ में बीए की पढ़ाई कर रहीं शबीना बानो का मानना है कि लड़कियां जिस भी पोशाक में सहज महसूस करें, उन्हें वो पहनने की आज़ादी मिलनी चाहिए.
वो कहती कि, "यह जो फ़ैसला लिया गया है, उसको हम चुनौती देते हैं. हम लड़कियों को सहज महसूस होता है तो हम पहनेंगे. पर आप उनके कपड़ों को टारगेट नहीं कर सकते. अब पंजाब के लोग पगड़ी पहनते हैं तो आप उनको भी टारगेट करेंगे? संविधान हमें अधिकार देता है कि आप कुछ भी पहन सकते हैं, कुछ भी खा सकते हैं. हम भारत की संस्कृति को फॉलो कर रहे हैं. अगर भारत की संस्कृति को देखा जाये तो जो पर्दा प्रथा है, वो सब जगह है. अगर आप हिन्दू महिलाओं को देखें तो वो भी उसे फॉलो कर रही हैं. आप मुस्लिम को देखिये तो वो भी हिजाब को फॉलो कर रही हैं. वो अपनी ख़ुशी से करती हैं, ना कि किसी दबाव में."
मास कम्युनिकेशन की छात्रा समरीन इस फैसले के बारे में कहती हैं, "हमारी अदालतों को पता है कि हमें संविधान से किस तरह के अधिकार मिले हैं. अगर वो ही हमारे अधिकार छीनेंगे तो वैसे भी पितृसत्तात्मक समाज में हर चीज़ में हमें रोका जाता है. तो अगर हम नकाब और हिजाब नकाब पहन कर हम जा पा रहे हैं और हमारे लिए रास्ते निकल रहे हैं तो हमें नहीं लगता है कि आपको उसे रोकना चाहिए. हमें पढ़ना है, हमें वैसे भी पीछे किया जा रहा है. हर चीज़ हमारे लिए ही क्यों शुरू हो जाती है.
देश को आज़ाद हुए इतने साल हो गए थे, आप अभी तक हिजाब का मुद्दा लेकर क्यों नहीं आए तो अभी क्यों हिजाब का मुद्दा उठाया है? अब समाज में महिलाएं अपनी जगह बना रही हैं तो आप फिर उनको पीछे धकेलना चाहते हैं. और अगर एक हिजाब की वजह से वो आगे आ पा रही हैं तो आपको उससे कोई ऑब्जेक्शन नहीं होना चाहिए. आपको उनको पहनकर आने देना चाहिए."
बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी पाने का प्रयास कर रहीं बुशरा मानती हैं कि महिलाएं जो भी पहने, वो महिलाओं की मर्जी पर निर्भर करता है.
वो कहती हैं कि, "संविधान पर हमें गर्व है. जो अनुच्छेद 21 के तहत हमें मौलिक अधिकार प्राप्त हैं, उसमें हमें हर तरह का अधिकार प्राप्त है, फिर चाहे वो पहनावे का अधिकार हो. हम जो भी पहनें वो हमारी मर्ज़ी पर निर्भर करता है.
"मुस्लिम घरों में बहुत कम लोगों को यह अवसर मिलता है कि वो उच्च शिक्षा हासिल करें. जब उच्च शिक्षा की बात होती है तो लोग रोक देते हैं कि नहीं जाना है. ख़ास तौर से जहाँ कोएड एजुकेशन होती है. इस हिजाब के चलते उन्हें अनुमति दे दी जाती है कि चलो जाओ पढ़ो. तो हमें लगता है कि जो हमें शिक्षा का अधिकार है उसका भी हनन हो रहा है. और अगर हम मुस्लिम समुदाय को हटा दें, तो जैसे पंजाबी हैं तो वो पगड़ी करते हैं, जो हिन्दू हैं वो ब्राह्मण हैं वो पीछे चोटी रखते हैं, जो पंडित कहलाते हैं तो फिर हमें उन पर भी आपत्ति होनी चाहिए."
"हम खुद एक हिन्दू स्कूल में पढ़े हुए हैं, हमें कहा जाता था की आप प्रार्थना करिये, जो हमने की, और हमें कोई आपत्ति नहीं थी कि हम मुस्लिम हैं हम प्रार्थना नहीं करेंगे, या फिर ऐसा कुछ धार्मिक हो रहा है तो उसमें हम शरीक़ नहीं होंगे. जब हम लोग उस तरह से किसी भी धर्म में शरीक़ होकर रह सकते हैं तो फिर लोगों को यह आपत्ति क्यों है? इसका मतलब यही है कि लड़कियां पीछे तो हैं ही, और पीछे हो जाएँ. खास तौर से एक कम्युनिटी की लड़कियां और पीछे हो जाएं. जब वो पढ़ेगी नहीं तो फिर वो आगे क्या बढ़ेंगी?"
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राजस्थान में क्या बोले हिजाब के पक्षधर
कर्नाटक में हिजाब मामला सामने आने के बाद राजस्थान में भी विरोध प्रदर्शन हुए थे और यह मामला राजस्थान विधानसभा में भी उठाया गया था. हिजाब को लेकर अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद राजस्थान में नेताओं और मुस्लिम संगठन की प्रतिक्रिया सामने आई है.
बीबीसी के सहयोगी पत्रकार मोहर सिंह मीणा ने राजस्थान में हिजाब पर आए फ़ैसले के बाद कुछ लोगों से प्रतिक्रियाएँ लीं.
सीकर ज़िले में एक निजी कॉलेज से बीएड की छात्रा हिना ख़ान का कहना है, "सबके अपने धर्म की परंपराएं हैं, इसी तरह हमारे धर्म में हिजाब है. हिजाब पर पाबंदी नहीं लगानी चाहिए."
वहीं, मुस्लिम परिषद संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष युनुस चौपदार ने बयान जारी कर कहा है, "हिजाब पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ दायर की गई याचिकाओं को खारिज करने के फैसला चिंताजनक है. यह फैसला मौलिक अधिकारों और बहुलवाद के संवैधानिक मूल्यों की आत्मा के खिलाफ है."
"देश की मुस्लिम महिलाएं जिनके लिए हिजाब उनकी आस्था और पहचान का अभिन्न हिस्सा है, उनकी भावनाओं के प्रति अदालत की यह असंवेदनशीलता अत्यंत आश्चर्यजनक है. एक लोकतांत्रिक देश में अपने धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या का अधिकार उस धर्म के मानने वालों को ही दिया जाना चाहिए."
इसके साथ ही राजस्थान अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष व आदर्श नगर विधायक रफीक़ ख़ान ने कहा है, "कोर्ट का निर्णय सर्वोपरि है. लेकिन, हिजाब ऐसी चीज नहीं है जिससे शिक्षा पर कोई फर्क पड़े. कॉलेज में कोई ड्रेस कोड नहीं होता है. धर्म मानने वालों को अपना अधिकार मिले."
इसके साथ ही स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफई) के सीकर शहर अध्यक्ष शरफराज जाटू ने अपने बयान में कहा है, "कर्नाटक उच्च न्यायालय का हिजाब निर्णय समानता की संवैधानिक गारंटी के विपरीत है. हिजाब प्रतिबंध को निरस्त करें और कर्नाटक में अध्ययन के प्रतिकूल वातावरण को सुनिश्चित करें."
उन्होंने कहा है, "न्यायपालिका से भेदभावपूर्ण नीतियों को कायम रखने की अपेक्षा नहीं की जाती है. सिर को ढकने के लिए स्कार्फ पहनना कभी भी वर्दी का उल्लंघन नहीं माना गया है, सुप्रीम कोर्ट से न्याय की तत्काल आवश्यकता है."
भाजपा प्रदेश अल्पसंख्यक मोर्चा के महामंत्री हमीद खान मेवाती ने कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया है. उन्होंने कहा है कि कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान है और हमें मंज़ूर है."
मध्य प्रदेश में क्या कहते हैं राजनीतिक दल
कर्नाटक हाई कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद मध्य प्रदेश में बीजेपी नेता प्रज्ञा ठाकुर ने अपनी प्रतिक्रिया दी है.
मध्य प्रदेश में बीबीसी के सहयोगी पत्रकार शुरैह नियाज़ी ने बीजेपी और कांग्रेस से बात करके इस फ़ैसले पर उनकी राय जानने की कोशिश की है.
भोपाल की सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने इसे एक अच्छा फैसला बताया है और इसका स्वागत किया है.
प्रज्ञा ठाकुर ने कहा कि जब स्कूल-कॉलेज शिक्षा ग्रहण करने जाते है तो अनुशासन और समानता का व्यवहार होना जरुरी है. शिक्षा के बीच में धर्म और पंथ नहीं आना चाहिए.
उन्होंने कहा कि कोर्ट का फैसला देश के हित में है जिसका सम्मान किया जाना चाहिये.
वहीं कांग्रेस के विधायक आरिफ़ मसूद ने कहा है कि इस फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जायेंगे. हालाँकि, उन्होंने कहा कि कोर्ट का पूरा फ़ैसला पढ़ा नहीं है.
मसूद ने कहा, "कोर्ट का यह कहना कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, बिल्कुल सही बात नहीं है. हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है. उन्होंने माना कि स्कूल-कॉलेज में ड्रेस कोड होना चाहिए लेकिन अगर कोई सर ढकना चाहे तो उसे रोकना नहीं चाहिये."
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