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मोलोटोव कॉकटेल: यूक्रेन के देसी बमों का सोवियत नेता से क्या है नाता
युद्ध कुछ लोगों को अविश्वसनीय लगते हैं. कुछ को डराते हैं.
ऐसे लोगों के बीच यूक्रेन के हज़ारों नागरिक भी दिखते हैं. जो कुछ अलग हैं. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 24 फ़रवरी को जब यूक्रेन पर हमले का आदेश दिया, तब इन लोगों ने अपनी सेना के साथ खड़े होने का फ़ैसला किया.
रूस की तुलना में यूक्रेन का सैन्य बल और आबादी काफी कम है. रूस के हमले के बाद जब सरकार ने अपील की तो देश के सभी तबके लोगों ने समर्थन दिया.
कुछ लोगों ने उन देसी बमों को फिर से ज़िंदा कर दिया, जिनकी पहचान 'मोलोटोव कॉकटेल' के तौर पर रही है.
कांच की बोतल के ज़रिए तैयार होने वाले आग उगलते ये बम फेंकते लोगों की तस्वीर पूरी दुनिया में वायरल होने लगी.
देसी बम लोगों ने ख़ुद बनाए तो सरकार ने भी उन्हें हथियार मुहैया कराए. इनके दम पर ही कीएव और खारकीएव जैसे शहर अब भी यूक्रेन के नियंत्रण में हैं.
यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के ज़रिए लोगों को हथियार और बमों के इस्तेमाल का तरीका भी सिखाया.
यूक्रेन के लोगों ने 'मोलोटोव कॉकटेल' कहे जाने वाले जिन देसी बमों का इस्तेमाल किया, उनका नाम सोवियत संघ (यूएसएसआर) दौर के एक अहम शख्स व्याचेस्लाफ़ मिखाइलोविच मोलोटोव ने नाम पर दिया गया है.
मोलोटोव एक अलग सैन्य संघर्ष के अगुवा थे. यहां हम आपको उनकी कहानी बता रहे हैं.
कौन थे मोलोटोव?
मोलोटोव सोवियत संघ के दो बार विदेश मंत्री रहे. पहला कार्यकाल 1939 से 1949 तक और दूसरा कार्यकाल 1953 से 1956 तक रहा.
उनका जन्म साल 1890 में हुआ. पैदाइश के वक़्त उनका सरनेम स्क्रिपाइन था. वो रशियन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े थे. बाद में यही सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी बनी.
अमेरिका स्थित विल्सन सेंटर के मुताबिक साल 1917 की क्रांति के दौरान वो व्लादिमीर लेनिन और जोसेफ स्टालिन के सहयोगी थे. इसी क्रांति के दौरान राजशाही का पतन हुआ और सोवियत संघ के समाजवादी गणराज्य की स्थापना हुई.
बाद में उन्ंहोंने पार्टी में कई ज़िम्मेदारी संभाली. वो पार्टी की सेंट्रल कमेटी के सचिव रहे. उन्होंने मॉस्को में पार्टी कमेटी की अगुवाई भी की.
विल्सन सेंटर के मुताबिक स्टालिन के विरोधियों को दंडित करने के लिए पार्टी ने जो अभियान चलाया, उसके बाद उन्हें पार्टी में आखिरी ज़िम्मेदारी मिली.
साल 1939 की संधि
हालांकि, उनकी ज़्यादा चर्चा साल 1939 की मोलोटोव-रिबनट्रॉप संधि के लिए होती है. ये संधि सोवियत संघ और हिटलर की अगुवाई वाले नाज़ी जर्मनी के बीच हुई थी.
अलग-अलग स्रोतों से मिली जानकारी के मुताबिक इस संधि में एक ऐसा भी समझौता था जिसमें दोनों शक्तियां पोलैंड और बाकी यूरोप में एक दूसरे हितों के रास्ते में नहीं आएंगी.
सितंबर 1939 में जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया. समझौते के बाद उसे सोवियत संघ की फिक्र नहीं थी. यही हमला दूसरे विश्व युद्ध की वजह बना.
सोवियत संघ उसी साल फिनलैंड में दाखिल हुआ. इसे शीत युद्ध के तौर पर जाना जाता है.
इसी संघर्ष के दौरान 'मोलोटोव कॉकटेल' चर्चित हुए.
बम का कैसे रखा गया नाम?
इतिहासकार विलियम ट्रॉटर की किताब 'ए फ्ऱोजन हेल' में बताया गया है कि फिनलैंड के सैनिकों ने अपने देसी बमों का नाम 'मोलोटोव कॉकटेल' क्यों रखा?
उस दौरान मोलोटोव ने सोवियत रेडियो से बात करते हुए कहा कि संघर्ष के दौरान उनके देश ने फिनलैंड में बम नहीं बरसाए बल्कि 'भोजन के पैकेट गिराए.'
उनके इस बयान के बाद सैनिकों ने सोवियत संघ की बमबारी पर तंज करते हुए इसे "मोलोटोव पिकनिक बास्केट" कहना शुरू कर दिया.
इसके बाद उन्होंने अपने देसी बमों का भी मोलोटोव के नाम पर ही नामकरण कर दिया.
हालांकि, इस आलेख में 'मोलोटोव कॉकलेट' का संदर्भ सोवियत संघ के फिनलैंड हमले से जुड़ा दिखता है, लेकिन साल 1936-39 के बीच स्पेन के गृह युद्ध के दौरान भी ऐसे बमों के इस्तेमाल की बात सामने आती है.
अब रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद 'मोलोटोव कॉकलेट' एक बार फिर चर्चा में हैं.
(ये कहानी बीबीसी की स्पेनिश भाषा की सेवा बीबीसी मुंडो से अनुवाद की गई है.)
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