उद्धव ठाकरे, शरद पवार से केसीआर की मुलाक़ात और 'नई शुरुआत' के मायने

उत्तर प्रदेश और पंजाब में चल रही वोटिंग की ख़बरों के बीच आज निगाहें महाराष्ट्र पर भी रहीं. जहां तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाक़ात की. इसके बाद वो एनसीपी प्रमुख शरद पवार से मिले.

दोनों ही बैठकों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की गईं, उसमें ये साफ़ संदेश दिया गया कि ''नए मोर्चे'' की तैयारी एक बार फिर शुरू हो गई है. केसीआर कहते नज़र आए कि जिस तरह से अभी देश चल रहा है, वो सही दिशा में नहीं है और ''देश को परिवर्तन की ज़रूरत है.''

उद्धव ठाकरे के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में केसीआर ने कहा कि मौजूदा वक्त में देश जिस तरह से चल रहा है उसमें बदलाव की ज़रूरत है. वो कहते हैं, ''हम लोग एक बात पर सहमत हुए कि देश में बड़े परिवर्तन की ज़रूरत है. देश के माहौल को ख़राब नहीं करना चाहिए.'' केसीआर आगे कहते हैं, ''ज़ुल्म के साथ हम लड़ना चाहते हैं. नाजायज काम से हम लड़ना चाहते हैं.''

वहीं उद्धव ठाकरे भी इसी बदलाव की ज़रूरत बताते हुए कहते हैं कि मौजूदा राजनीतिक हालात में बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है. उन्होंने कहा, ''हमारा हिंदू बदला लेने वाला नहीं है.''

शरद पवार से मुलाक़ात के बाद केसीआर ने कहा कि ज़ल्द ही देश के कुछ और नेताओं से बातचीत के बाद ''एजेंडा'' पेश किया जाएगा.

उन्होंने कहा, ''नई आशा के साथ, नया एजेंडा लेकर पूरे देश को साथ लेकर चलने का वक्त आ गया है. शरद पवार ने मुझे आशीर्वाद दिया है. देश में नए सिरे से काम करने की ज़रूरत है. हमारी सहमति हो गई है. जल्द से जल्द हम अन्य पक्षों से बात करेंगे. इकट्ठा बैठेंगे. जो लोग हमारे साथ जुड़ना चाहते हैं सबको साथ लेकर चलेंगे. इसके बाद ही देश के सामने एजेंडा पेश करेंगे.''

शरद पवार का कहना है कि विकास की बात करने के लिए ये बैठक की गई है. देश में एक अलग माहौल बनाया जा सकता है, ऐसे ही माहौल बनाने की कोशिश होगी. ममता बनर्जी से जुड़े एक सवाल पर केसीआर कहते हैं कि वो देश के अन्य नेताओं से भी मिलेंगे और ''महाराष्ट्र से जो मोर्चा निकलता है वो कामयाब होता है.''

अब इस कवायद की ज़रूरत क्या है, ये समझते हैं

विपक्ष को एकजुट करने में क्यों लगे हैं केसीआर?

एक वक्त ऐसा था जब केसीआर और ठाकरे दोनों ही एनडीए के साथ मंच पर नज़र आते थे. शिवसेना ने पिछले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अपने लिए अलग रास्ता चुन लिया तो वहीं केसीआर भी आजकल केंद्र सरकार पर बरसते नज़र आते हैं.

सिर्फ़ फ़रवरी महीने की ही बात करें तो ऐसे कई मौके आए जब केसीआर और उनकी टीआरएस पार्टी और बीजेपी के बीच की तल्ख़ियां साफ़ नज़र आईं.

प्रधानमंत्री के तेलंगाना दौर पर उनके स्वागत के लिए मुख्यमंत्री का न पहुंचना, संसद में प्रधानमंत्री मोदी के बयान को 'तेलंगाना बनने के विरोध से जोड़ना' और फ़िर राहुल गांधी पर दिए गए असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के बयान की निंदा कर सरमा के इस्तीफे की मांग करना, ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं.

केसीआर जिस तरह का रुख़ अपनाए हुए हैं, अलग-अलग राज्यों के गैर-बीजेपी नेताओं का भी उन्हें समर्थन हासिल हो रहा है. पिछले हफ्ते उद्धव ठाकरे ने उन्हें फोन कर मुंबई आने का न्योता दिया था.

बीबीसी तेलुगू के संपादक जीएस राममोहन कहते हैं कि शरद पवार और केसीआर की एक घंटे की बैठक से ये संकेत दिया गया कि नए समीकरण के लिए केसीआर को शरद पवार का ''आशीर्वाद'' मिला है. शरद पवार ऐसे नेताओं में से हैं जो किसी भी विपक्षी मोर्चे के लिए बेहद अहमियत रखते हैं.

वो कहते हैं कि केसीआर के साथ प्रकाश राज का आना भी दिलचस्प है. फिलहाल वो किसी पार्टी से जुड़े नहीं है. प्रकाश राज की इमेज एक सेकुलर, लिबरल शख्स के तौर पर रही है तो उनके साथ आने से सिविल सोसाइटीज को भी एक तरह का मैसेज दिया गया है.

एकजुटता से हासिल क्या होगा?

बीबीसी मराठी के संपादक आशीष दीक्षित कहते हैं पहले उद्धव ठाकरे और फ़िर शरद पवार से मुलाकात के बाद जिस तरह की टिप्पणी सामने आई है, उससे साफ़ है कि देश को नया राजनीतिक विकल्प देने की बात हो रही है.

केसीआर और शरद पवार दोनों ने ही कहा कि देश में विकास नहीं हो रहा है तो विकास के लिए एजेंडा देने की बात कही गई है. इससे पहले कोई भी फ्रंट बनता था तो शरद पवार का नाम सामने आता था और आज की बातचीत में जिस तरह से केसीआर ने कहा कि वो शरद पवार का आशीर्वाद लेने आए हैं और पवार भी केसीआर के कामकाज की तारीफ़ करते दिखे तो ये संभव दिखता है कि केसीआर इस नए मोर्चे का नेतृत्व कर सकते है.

जहां तक बात रही शिवसेना कि तो समझा जाना चाहिए कि शिवसेना जब 2019 के बाद बीजेपी से अलग हुई तो वो ममता बनर्जी की तरह मोदी सरकार पर आए दिन जुबानी हमला करती नहीं दिखती थी. उद्धव और शिवसेना ''बचाव'' की मुद्रा में ज़्यादा नज़र आते थे लेकिन पिछले दिनों में शिवसेना ये समझ चुकी है कि बीजेपी के ख़िलाफ़ खुलकर खेलने का वक्त आ गया है.

आशीष कहते हैं कि अगले कुछ दिनों में बीएमसी के चुनाव होने जा रहा हैं, जो शिवसेना के लिए काफी अहमियत रखता है और यहां पार्टी का सीधा मुक़ाबला बीजेपी से ही है. इसलिए शिवसेना बिना किसी हिचक के सामने आकर बीजेपी के ख़िलाफ़ बोलने लगी है.

अब यहाँ एक बात और अहम है जो गैर-बीजेपी शासित राज्य हैं उन्हें केंद्रीय एजेंसियों और राजभवन के नियंत्रण का भी ''डर'' बना रहता है. केसीआर, प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना करते हुए राज्य सरकार के अधिकारों में दख़ल, जीएसटी, प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्ति, केंद्रीय एजेंसियों के दख़ल जैसे मुद्दे उठा रहे हैं.

केसीआर और ठाकरे की प्रेस कॉन्फ्रेंस में केसीआर ने यहाँ तक कहा कि केंद्र सरकार इन एजेंसियों को बेहद गलत तरीके से इस्तेमाल कर रही है और इसका नुकसान उन्हें भुगतना होगा.

आशीष दीक्षित कहते हैं कि शिवसेना के कई बड़े नेताओं के पीछे लगी केंद्रीय एजेसियां लगी हुई हैं. शिवसेना के एक विधायक ने तो उद्धव ठाकरे को चिट्ठी लिखी थी कि वो बीजेपी के साथ जाएं ताकि ये एजेंसियां पीछा छोड़ दें. ऐसे वक्त में नेताओं के साथ आने से एक मैसेज भी जाता है कि इन मुद्दों पर ग़ैर-बीजेपी शासित राज्य एक साथ हैं.

नई ''शुरुआत'' में कांग्रेस कहां है?

अब इस नई 'शुरुआत' में कांग्रेस कहां है? इस सवाल के जवाब से दोनों ही नेता बचते नज़र आए. उद्धव ठाकरे वैसे ही कांग्रेस के साथ गठबंधन वाली सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं. शिवसेना कुछ भी ऐसा नहीं करेगी जिससे कांग्रेस नाराज़ हो.

वहीं केसीआर भी हाल फिलहाल में कांग्रेस के प्रति नरम नज़र आए हैं, राज्य में कांग्रेस उनकी विपक्षी पार्टी है लेकिन वो बीजेपी पर ही हमलावर दिख रहे हैं.

इससे पहले जब ममता बनर्जी ने ऐसे ही मोर्चे की कोशिश की थी तो वो कांग्रेस की आलोचना कर रही थीं. इस लिहाज़ से केसीआर की कोशिश में कांग्रेस के लिए पॉजिटिव सिग्नल भी नज़र आ रहा है. इस मोर्चे की पहुंच बढ़ाने के लिए कांग्रेस, टीएमसी, आप जैसी पार्टियों की ज़रूरत भी होगी.

बीजेपी के नेता ई. राजेंद्रा जो एक वक्त टीआरएस के बड़े नेता और केसीआर के दाहिने हाथ माने जाते थे, उनका कहना है अगर बड़ी पार्टियां साथ नहीं आती हैं तो ऐसी छोटी पार्टियां ज्यादा असर नहीं डाल सकेंगी.

बैठक की टाइमिंग ''ख़ास'' है?

इस मुलाक़ात की टाइमिंग को भी देखना ज़रूरी है. 5 राज्यों में चुनाव का माहौल है तो दूसरी तरफ़ केसीआर नए मोर्च की शुरुआत के लिए जुटे हैं. इस लिहाज से अगर उत्तर प्रदेश में बीजेपी को भारी जीत मिलती है तो एक बार फिर केसीआर की कवायद की रफ़्तार धीमी होगी. वहीं अगर बीजेपी की सीटों में गिरावट होती है तो इस मोर्चे का उत्साह बढ़ेगा.

साथ ही राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव को भी देखना होगा. इस साल दोनों ही पदों पर चुनाव होंगे. विपक्षी पार्टियां अगर एक साथ आती हैं तो बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्ष का मजबूत उम्मीदवार उतारा जा सकेगा और उसके जीतने की भी संभावना बढ़ सकती है.

कॉपीः अभय कुमार सिंह

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