आशुतोष कौशिकः बिग बॉस विजेता अभिनेता जो ख़ुद को 'भुला दिया जाना' चाहता है

    • Author, गीता पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

किसी को आख़िर एक ग़लती की सज़ा कब तक मिलती रहनी चाहिए?

अभिनेता आशुतोष कौशिक चाहते हैं कि इसका फ़ैसला अदालत करे और उन्होंने इसी इरादे से दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है. उनकी याचिका पर गुरुवार को सुनवाई शुरु हुई और अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 1 अप्रैल की तारीख़ तय की है.

वो चाहते हैं कि अदालत उन्हें "राइट टू बी फ़ॉरगॉटेन" यानी "भुला दिए जाने का अधिकार" दे. उन्होंने याचिका में कहा है कि उनकी एक ग़लती का उनकी ज़िंदगी पर अब तक असर पड़ रहा है जो उन्होंने "अनजाने में एक दशक से भी पहले की थी".

जानकारों का कहना है कि "भुला दिए जाने का अधिकार" या "मिटा दिए जाने का अधिकार" का साधारण अर्थ ये है कि आपके बारे में जो भी व्यक्तिगत जानकारियाँ सार्वजनिक हैं उन्हें इंटरनेट से हटा दिया जाए.

इस अधिकार को यूरोपीय संघ में तो मान्यता मिली है, हालाँकि वहाँ भी पूरी तरह से ऐसा नहीं है. मगर भारत के लिए ये बिलकुल नई बात है जिसके बारे में अभी तक कोई क़ानून नहीं है.

कौन हैं ये अभिनेता

आशुतोष कौशिक का नाम 2007 में छोटे पर्दे पर छाया जब वो एमटीवी रोडीज़ के पाँचवें सीज़न के विजेता बने. एक साल बाद वो एक और शो बिग बॉस में भी विजेता बन सुर्खियों में आए.

वो कहते हैं, इन दोनों जीतों के बाद उन्हें "सारे भारत से प्यार और प्रशंसा" मिली.

मगर नाम के एक साल बाद ही बदनामी भी हुई, जब उन्हें शराब पीकर ड्राइव करते पकड़ा गया.

अदालत ने उनपर ढाई हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया और ड्राइविंग लाइसेंस एक साल के लिए सस्पेंड कर दिया. अदालत ने उन्हें सारे दिन कोर्ट में ही रहने का भी आदेश दिया.

ये घटना हेडलाइन बनी. और वो सुर्खियाँ, तस्वीरें, वीडियो आज तक इंटरनेट पर मौजूद हैं.

उनका कहना है, इसकी उन्हें महँगी कीमत चुकानी पड़ रही है. निजी जीवन में भी, और पेशे में भी.

कौशिक ने मुंबई से फ़ोन पर बीबीसी से कहा, "मैं तब 27 साल का था. जो भी चाहता था मिला. मेरे पिता गुज़र गए थे और मुझे राह दिखाने वाला कोई नहीं था. मैं नादान था और एक ग़लती कर बैठा जिसकी मुझे सज़ा मिली. पर अब मैं 42 का हूँ, और मुझे लगता है आज भी मैं उस किए की सज़ा भुगत रहा हूँ."

वो कहते हैं, उस घटना के बाद लोग उनसे किनारा करने लगे.

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सज़ा से बदली ज़िंदगी

कौशिक कहते हैं, "मेरे बारे में लोग पहली राय जो बनाते हैं वो बुरी होती है. मेरा काम छूट गया, शादी के लिए कई बार ख़ारिज कर दिया गया, और जब भी मैं घर बदलता हूँ, पड़ोसी मुझे अलग नज़रों से देखते हैं."

उनकी शादी 2020 में अर्पिता से हुई जो बैंकर हैं. वो कहती हैं कि उनके घर के लोगों में उनके पति को लेकर शुरू से ही विद्वेष की भावना रही है क्योंकि उन्होंने इंटरनेट पर वो वीडियो देखे हैं.

अर्पिता कहती हैं, "मेरे रिश्तेदार उनके अतीत को लेकर बहुत फ़्रिक्रमंद थे. पर मुझे लगता है कि हर कोई जीवन में ग़लतियाँ करता है, तो मेरे पति को जीवन भर उसकी सज़ा क्यों भुगतनी चाहिए?"

कौशिक आगे कहते हैं, "जब एक अदालत किसी अभियुक्त को सज़ा देता है तो वो एक अवधि के लिए होती है, तो डिजिटल सज़ा की भी एक मियाद होनी चाहिए."

वो कहते हैं, पिछले कई सालों में उन्होंने कई न्यूज़ वेबसाइटों और चैनलों से संपर्क कर आग्रह किया कि वो उनके बारे में लेख, फ़ोटो, वीडियो हटाएँ, मगर वो जस की तस हैं.

उन्होंने सूचना प्रसारण मंत्रालय और गूगल को भी लिखा, मगर कोई जवाब नहीं आया.

ज़िला ग़ाज़ियाबाद और किस्मत लव पैसा जैसी फ़िल्मों में अभिनय कर चुके कौशिक ने अपनी याचिका में लिखा है कि इन लेखों की वजह से उन्हें "गहरा दुख" और "मनोवैज्ञानिक दर्द" हुआ है.

वो चाहते हैं कि अदालत भारत सरकार, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया, गूगल को ये आदेश दे कि वो "विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स से सामग्रियाँ हटा लें".

अकेला मामला नहीं

इसी तरह की अनेक याचिकाएँ भारत की विभिन्न अदालतों में दायर की गई हैं जिनमें बहुत से ऐसे लोग हैं जो या तो निर्दोष पाए गए या अपनी सज़ाएँ काट चुके हैं.

एक मामले में, एक वैवाहिक मुक़दमे में पक्ष रहने वाली एक महिला एक लीगल वेबसाइट से ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को हटवाना चाहती हैं क्योंकि इनमें उनका पता और अन्य व्यक्तिगत जानकारियाँ लिखी हैं.

भारत सरकार का कहना है कि अभी तैयार हो रहे निजी डेटा सुरक्षा विधेयक में भुला दिए जाने के अधिकार से संबंधित प्रावधानों को शामिल किया गया है.

गूगल के एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि उनके सर्च में "सामान्यतः जो भी वेब पर होता है वो दिखता है, तो यदि लोग इन सामग्रियों को वेब से हटाना चाहते हैं तो हम उन्हें कहते हैं कि वो उन वेबसाइटों से संपर्क करें जिनपर ये सामग्रियाँ लगी हैं."

प्रवक्ता ने कहा, "हमारा लक्ष्य सदा ये होता है कि ज़्यादा से ज़्यादा सूचनाएँ उपलब्ध कराई जाएँ…हम पूरी कोशिश करते हैं कि यूज़र्स उन सामग्रियों के बारे में बताएँ जो हमारी नीतियों का उल्लंघन करते हैं, इनमें स्थानीय क़ानूनों के तहत अवैध ठहराई गईं सामग्रियाँ भी शामिल हैं."

मुश्किल काम

मगर तकनीकी मामलों के जानकार प्रशांतो के रॉय कहते हैं कि अभी भारत में लोगों के लिए भुला दिए जाने के अधिकार का इस्तेमाल करना आसान नहीं है.

वो कहते हैं,"गूगल और माइक्रोसॉफ़्ट के लिए इंटरनेट एक बहुत बड़ा मंच है जहाँ से सूचनाएँ निकलती हैं. इसके बाद विकीपीडिया, मीडियम और फ़ेसबुक व ट्विटर जैसे अन्य प्लेटफ़ॉर्म्स हैं, और दसियों हज़ार ब्लॉग हैं."

वो कहते हैं कि "बरसों पहले उन्होंने गूगल से अनौपचारिक तौर पर एक महिला के बारे में बात की थी जिनके ख़िलाफ़ लगातार लांछन लगाया जा रहा था और उन 'पतियों' से जोड़ा जा रहा था जो उनके थे ही नहीं. मगर वो बहुत मददगार नहीं निकले. एक अन्य मामले में एक क़ानून का पालन करवाने वाले अधिकारी को अपना नाम हटवाना था, तब भी अनौपचारिक आग्रहों का असर नहीं हुआ, मगर आधिकारिक आग्रहों से काम हो गया."

उनका कहना है, "गूगल बहुत आसानी से और स्वच्छ तरीक़े से किसी यूआरएल और फ़्रेज़ेज़ को ब्लॉक कर सकता है जो वो यूरोपीय यूनियन में करता है, जिसे क़ानूनी मंज़ूरी मिली है. मगर भारत में, इस दिग्गज कंपनी को लगता है कि ऐसे आग्रहों की बाढ़ आ जाएगी, जहाँ सोशल मीडिया बहुत नाज़ुक और संवेदनशील है और लोग बहुत जल्दी बुरा मान जाते हैं."

उम्मीद

कौशिक के वकील अक्षत बाजपेयी स्वीकार करते हैं कि भारत में अभी इसे लेकर क़ानून चुप है, मगर अदालतों के पिछले फ़ैसलों के आधार पर उनके मुवक्किल को अनुमति मिल सकती है.

ओडिशा और कर्नाटक में हाई कोर्टों ने भुला दिए जाने के अधिकार को निजता के अधिकार का अहम हिस्सा माना है. और 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है.

बाजपेयी कहते हैं,"50 साल बाद जब कौशिक के पोते-पोतियाँ गूगल करेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने बिग बॉस और रोडीज़ जीता था, मगर उन्हें ये भी पता चलेगा कि वो एक ऐसी घटना में लिप्त हुए थे जिसमें उनकी बदनामी हुई. उन्हें क़ानून के हिसाब से सज़ा मिल चुकी, और अब वो अपनी प्राइवेसी के हक़दार हैं."

वो कहते हैं कि ये एक ऐसा मुद्दा है जिसपर अदालतों और समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए.

बाजपेयी कहते हैं," किसी व्यक्ति के भुला देने के अधिकार का किसी दूसरे व्यक्ति के जानने के अधिकार से संघर्ष हो सकता है. मगर मुझे उम्मीद है कि अदालत बीच का कोई रास्ता निकालेगी. बलात्कार या हत्या जैसे गंभीर अपराधों में समाज को जानने का अधिकार है, मगर अपराध यदि गंभीर नहीं है, तो शायद अदालतें भुला दिए जाने के अधिकार की अनुमति दे सकती हैं."

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