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निजता के अधिकार से उपजे सवालों के जवाब
निजता के अधिकार को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकार माना है. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने कहा है कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है.
बीबीसी हिंदी रेडियो संपादक राजेश जोशी ने मानवाधिकार कार्यकर्ता और वरिष्ठ वकील एन.डी. पंचौली से बातचीत की और फ़ैसले से पनपे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.
पंचौली कहते हैं, निजता का अधिकार मनुष्य के निजी जीवन यानी कि परिवार, बीवी, बच्चे, पढ़ाई आदि के उत्थान में जो चीज़ें सहायता करती हैं वो सभी निजता के दायरे में आती है.
निजता को मौलिक अधिकार बनाने से क्या फ़र्क होगा?
निजी जीवन के अंदर बहुत सारी चीज़ें ऐसी होती हैं जो कोई सरकार या किसी संस्था से साझा नहीं करना चाहता. अगर सरकार या कोई संस्था किसी शख़्स से ऐसा पूछती है कि आप अपने बेडरूम में क्या कर रहे थे? तो वह शख़्स इसका जवाब नहीं दे सकता है.
बैंक अकाउंट की जानकारी अगर बिना किसी उद्देश्य के पूछी जाती है तो शख़्स उस जानकारी को देने से मना कर सकता है. आयकर के अंतर्गत जो कानून बने हैं, यह उससे अलग होगा. इसके अलावा किसी शख़्स के बारे में कोई निजी जानकारी नहीं पूछी जा सकती है.
क्या आधार कार्ड बनवाने के लिए इनकार कर सकते हैं?
आधार कार्ड बनवाने से बिलकुल इनकार किया जा सकता है. सरकार तर्क देती है कि सब्सिडी का फ़ायदा देने के लिए आधार ज़रूरी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि सब्सिडी का लाभ लेने के लिए आधार ज़रूरी नहीं है.
आधार के लिए यह आवश्यक होता है कि घर का पता दिया जाए और जो लोग बेघर हैं सड़कों पर रहते हैं वह कैसे अपने घर का पता दे पाएंगे. इसका मतलब यह है कि ज़रूरतमंद लोगों को आधार कार्ड के बहाने से सब्सिडी से वंचित किया जा सकता है.
राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले में यह अधिकार छिन सकता है?
इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल ही नहीं उठता. अगर कोई देशविरोधी गतिविधियों में शामिल रहता है या आतंकी गतिविधियों में शामिल रहता है तो उसको लेकर कानून है और उसको लेकर ही लड़ाई चल रही है. लेकिन निजता का अधिकार पहले नहीं था.
निजता का आधार सुरक्षा के लिए रुकावट बन जाए ऐसा कभी नहीं हुआ है. आतंकियों को पकड़ने के लिए सरकार के पास अभी तक कोई रुकावट नहीं है.
आर्टिकल 20 (3) में यह है कि कोई अपराधी है या कोई अभियोगी है उसे सरकार मजबूर नहीं कर सकती कि वह अपने ख़िलाफ़ कुछ बोले और सबूत दे क्योंकि वह सरकार का काम है.
अभियोगी के मामले में पहला अधिकार यह होता है कि वह अपने बारे में ख़ुद कुछ नहीं बताएगा उसके बारे में सरकार ख़ुद पता करेगी. अभियोगी या आतंकी का पुलिस को दिया बयान कोर्ट में मान्य नहीं होता उसके लिए सबूत आवश्यक होते हैं. सरकार किसी आतंकी को बाध्य नहीं कर सकती है.
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