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केसीआर: कभी इधर, कभी उधर, आख़िर हैं किधर?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
यूं तो प्रधानमंत्री का मुख्यमंत्री को जन्मदिन पर बधाई देना शिष्टाचार के दायरे में आता है और ऐसे बधाई संदेश सुर्खियां नहीं बटरोते.
लेकिन गुरुवार को प्रधानमंत्री मोदी ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) को जन्मदिन की बधाई दी, तो उनकी बधाई सुर्खियों में आ गई.
इसकी वजह रही, हाल के दिनों में दोनों के रिश्तों में आई तल्ख़ी.
कभी एनडीए के साथ मंच पर दिखने वाले के चंद्रशेखर राव बीते कुछ दिनों से पीएम मोदी और बीजेपी को लगातार निशाना बना रहे हैं.
दोनों के रिश्तों में आई तल्खी की बानगी है पिछले दिनों की कुछ घटनाओं से साफ़ जाहिर होती है.
5 फ़रवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब तेलंगाना दौरे पर थे, तो मुख्यमंत्री उनके स्वागत में एयरपोर्ट नहीं पहुँचे. उन्होंने अपनी जगह पशुपालन, मतस्य पालन, डेयरी विकास राज्य मंत्री तलसानी श्रीनिवास यादव को भेजा था. मुख्यमंत्री की हवाई अड्डे पर अनुपस्थिति के लिए बीजेपी उन पर प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने का आरोप लगाया जिसके जवाब में तेलंगाना राष्ट्र समिति ने कहा कि 'एक निजी दौरे पर पीएम के स्वागत के लिए सीएम का आना ज़रूरी नहीं है.'
8 फ़रवरी को पीएम मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कहा था कि कांग्रेस सरकार ने बहुत शर्मनाक तरीके से आंध्र प्रदेश का विभाजन किया था. माइक बंद कर दिए गए. मिर्च स्प्रे की गई और कोई चर्चा नहीं हुई. टीआरएस ने प्रधानमंत्री के इस बयान को 'तेलंगाना बनने के विरोध से जोड़ा' और राज्य में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन भी किया. राज्यसभा में टीआरएस ने विशेषाधिकार हनन का भी दिया.
13 फ़रवरी को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को बर्खांस्त करने की माँग भी उन्होंने बीजेपी से की थी. केसीआर, हिंमत बिस्वा सरमा के राहुल गांधी पर दिए विवादास्पद बयान पर बोल रहे थे. इतना ही नहीं, उन्होंने राहुल गांधी के सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगने को भी सही ठहराया था.
इससे पहले केसीआर ने इस साल के बजट को भी 'दलित विरोधी' करार दिया था.
इतना ही नहीं पिछले कुछ दिनों से केसीआर ग़ैर बीजेपी शासित राज्यों के प्रस्तावित गठबंधन का हिस्सा बनते नज़र आ रहे हैं.
केसीआर इसी 20 फ़रवरी यानी रविवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाक़ात करेंगे.
कुछ दिनों पहले पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी तेलंगाना के सीएम केसीआर और तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन को फ़ोन करके ग़ैर बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक की बात कही थी.
10 मार्च को विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद उनकी बैठक प्रस्तावित है, जिसमें ममता बनर्जी, केसीआर, उद्धव ठाकरे, एमके स्टालिन, हेमंत सोरेन और पिनराई विजयन के शामिल होने के कयास लगाए जा रहे हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर इस बैठक की तारीख और शामिल होने वाले नेताओं की कोई सूची सामने नहीं आई है.
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बीजेपी से दोस्ती
लेकिन केसीआर हमेशा से बीजेपी और मोदी के प्रति ऐसा ही रवैया रखते हों- ये भी सच नहीं है.
केसीआर की मोदी और बीजेपी की तल्ख़ी इस वजह से भी सुर्खियों में है क्योंकि कुछ साल पहले तक केसीआर भारतीय राजनीति में बीजेपी विरोधी खेमे से दूरी बनाए रखने के लिए जाने जाते थे.
वो ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की तरह ही मुद्दों पर आधारित समर्थन बीजेपी को समय समय पर देते नज़र आए.
नोटबंदी और जीएसटी बिल पर उन्होंने केंद्र सरकार का समर्थन किया था, तीन तलाक़ क़ानून पर उनके सांसद वोटिंग से ग़ैर हाज़िर रहे जिससे बिल पास कराने में मोदी सरकार को मदद मिली.
पिछले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने बीजेपी का समर्थन किया था.
साल 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाने पर भी टीआरएस बीजेपी के साथ रही.
हालांकि नए कृषि क़ानून पर टीआरएस ने विपक्ष का साथ दिया था.
बीजेपी से दोस्ती से लेकर दरार तक के टीआरएस के कई किस्से हैं.
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तेलंगाना में केसीआर का राजनीतिक सफ़र
साल 2009 में भी केसीआर अलग तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर एनडीए के प्लेटफॉर्म पर साथ आ चुके हैं, जिसका उनकी पार्टी में बहुत विरोध भी हुआ था.
वो यूपीए का हिस्सा भी रहे हैं, लेकिन अलग तेलंगाना के मुद्दे पर यूपीए 2 में वो अलग हो गए थे.
साल 2014 में जब अलग तेलंगाना राज्य बना, तो वो पहले मुख्यमंत्री बने. इस चुनाव में उनकी पार्टी ने 119 में से 63 सीटों पर जीत हासिल की थी.
साल 2018 के अंत में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 88 सीटों पर जीत दर्ज़ की.
दोनों चुनाव में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी बन कर उभरी. 2014 में कांग्रेस के पास 21 सीटें थी. वहीं 2018 में कांग्रेस के पास 19 सीटें ही रह गई.
लेकिन उसके बाद से राज्य में बीजेपी तेजी से उभरती हुई नज़र आ रही है. ऐसा कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं.
तेलंगाना में बीजेपी के बढ़ते क़दम
ऐसे ही राजनीतिक विश्लेषक हैं जिनका नागाराजू.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा, "तेलंगाना की राजनीति में पहले एक धारणा थी- बीजेपी यहाँ कभी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकती है. लेकिन पिछले दो उपचुनाव और ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के नतीज़ों में बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन से ये धारणा टूट गई है. इस वजह से टीआरएस को लग रहा है कि कहीं राज्य में बीजेपी मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर ना उभर जाए."
टीआरएस की लगातार होती हार और बीजेपी की इन तीनों चुनावों में हुई जीत को नागाराजू दोनों की बीच की बढ़ती तल्ख़ी की सबसे अहम वजह मानते हैं.
जिन दो उपचुनावों की नागाराजू कह रहे हैं वो हैं दुब्बाक और हुजूराबाद विधानसभा सीट.
आँकड़ों की बात करें तो नवंबर 2020 में दुब्बाक सीट के उपचुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 13.75 फ़ीसदी से बढ़कर 38.5 फ़ीसदी हो गया था.
साल 2021 हुजूराबाद सीट का उपचुनाव में बीजेपी एटाला राजेंदर ने जीता, जो पहले टीआरएस में थे. भ्रष्टाचार के आरोप पर केसीआर ने उनको मंत्रिमंडल से हटाया था, जिसके बाद एटाला राजेंदर ने पार्टी इस्तीफ़ा दे दिया और बीजेपी जॉइन कर ली.
2020 में ही ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में भी बीजेपी की वजह से टीआरएस की सीटें 99 से घटकर 55 पर आ गई थी. बीजेपी ने 48 सीटों पर जीत दर्ज की.
नागाराजू कहते हैं, "पहले बीजेपी और टीआरएस में काफ़ी नज़दीकी थी. अलग अलग बिलों पर संसद में टीआरएस ने केंद्र सरकार को समर्थन भी दिया है. इस वजह से जब राज्य में बीजेपी, टीआरएस के लिए कभी मुश्किल खड़ी भी करती, तो केसीआर बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व से मिल कर उन्हें शांत करवा देते थे. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के अच्छे प्रदर्शन के बाद बीजेपी की राज्य इकाई, केंद्रीय नेतृत्व को समझाने में कामयाब रही की बीजेपी राज्य में अब अच्छा कर रही है. फिर केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई पर भरोसा जताया. अब प्रदेश में बीजेपी बेरोज़गारी से लेकर खेती-किसानी तक हर मुद्दे पर राज्य सरकार के ख़िलाफ़ आए दिन प्रदर्शन करती है."
2019 में लोकसभा चुनाव हुए तो राज्य की 17 सीटों में से बीजेपी के पास 4 सीटें आई, कांग्रेस के पास 3 सीटें, एआईएमआईएम के खाते में 1सीट. बाक़ी की 9 सीटों पर टीआरएस ने क़ब्ज़ा किया.
कांग्रेस के ध्यान भटकाने की कोशिश
नागाराजू की बात से वरिष्ठ पत्रकार दिनेश आकुला सहमत नज़र नहीं आते.
उनका कहना है कि बीजेपी ने पिछले कुछ चुनावों में कुछ सीटें भले ही जीतीं हो, लेकिन राज्य में जल्द ही बीजेपी, कांग्रेस की जगह ले ले ऐसा भी नहीं है.
हैदराबाद से बीबीसी से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, "राजनीति में बने रहने के लिए हमेशा एक विलेन की ज़रूरत होती. केसीआर के लिए पहला विलेन था, आंध्र प्रदेश. जब तेलंगाना नया राज्य बना तो वो मुद्दा धीरे-धीरे ख़त्म हो गया. फिर उन्होंने चंद्र बाबू नायडू को विलेन की भूमिका बना कर पेश किया. फिर वो मुद्दा भी ख़त्म हो गया. अब 2023 के अंत में विधानसभा चुनाव होने है. केसीआर जानते हैं कि जनता उनसे पिछले दो बार के काम का हिसाब मांगेगी. तो पहले ही उन्होंने बीजेपी को विलेन बनाने की मुहिम शुरू कर दी है."
दिनेश कहते हैं, "कांग्रेस ने नया प्रदेशाध्यक्ष बनाया है, जो काफ़ी मुखर है. केसीआर नहीं चाहते की कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी बने, क्योंकि सीटें नहीं जीतने के बाद भी वो बीजेपी के मुकाबले ज़्यादा मज़बूत है. केसीआर चाहते हैं उनके सामने एक कमज़ोर विपक्ष रहे. इस लिहाज से बीजेपी को वो विपक्ष का दर्ज़ा देंगे तो उनके लिए बेहतर होगा. केसीआर, बीजेपी और मोदी पर हमला करके, कांग्रेस से ध्यान भटकाना चाहते हैं. यही उनकी रणनीति है."
राष्ट्रीय राजनीति में रोल
वैसे कुछ जानकार मोदी और बीजेपी पर केसीआर के हाल के बयानों को उनके राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षा से भी जोड़ कर देखते हैं.
हालांकि दिनेश इस रणनीति से इत्तेफ़ाक नहीं रखते हैं. नागाराजू कहते हैं कि अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा केसीआर ख़ुद प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज़ाहिर कर चुके हैं.
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी केसीआर ने ऐसी पहल की थी, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए थे. उस दौरान उन्हें ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और मायावती से भी मुलाक़ात की थी.
अब 2024 का लोकसभा चुनाव सामने है. इस बार ममता बनर्जी सभी को एकजुट करने के प्रयास में जुटी है. ऐसे में केसीआर अपने लिए तीसरे मोर्चे में अपनी भूमिका और जगह तलाशने में एक बार फिर से जुट गए हैं.
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