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उत्तराखंड की पांच सीटें जिन पर टिकी हैं सबकी नज़रें
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, देहरादून से बीबीसी हिंदी के लिए
विधानसभा चुनाव मतदान के दूसरे चरण में सोमवार को उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों के लिए मतदान हो रहा है. संभवतः ऐसा पहली बार हो रहा है कि मुख्यमंत्री पद के लिए तीन उम्मीदवार स्पष्ट रूप से मैदान में हैं.
इस बार भी मुख्य मुक़ाबला सत्तारूढ़ बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही नज़र आ रहा है, लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) तीसरी शक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है.
2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 70 में से 57 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई थी हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस बार मुक़ाबला कड़ा है.
बीबीसी ने 70 में से उन पांच सीटों की स्थिति का जायज़ा लिया जिन पर जीत और हार चुनाव परिणाम पर असर तो डालेगा ही, चुनाव के बाद की राजनीति पर भी जिनका असर रहेगा.
ये सीटें हैं- कोटद्वार, लैंसडाउन, हरिद्वार ग्रामीण, सल्ट और गदरपुर.
कोटद्वार
कोटद्वार सीट कई मायने में महत्वपूर्ण है. इसी सीट से हार की वजह से 2012 में बीजेपी सत्ता गंवा बैठी थी.
2012 में तीसरी विधानसभा के गठन के लिए हुए चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी से चुनाव हार गए थे.
उस चुनाव में कांग्रेस 32 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और बीजेपी एक सीट से पिछड़ गई. अगर खंडूरी जीत जाते तो बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होती और फिर सरकार बनाने के लिए उसे ही मौक़ा मिलता. राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि तब बीएसपी और निर्दलीयों के साथ मिलकर सरकार खंडूरी ही बनाते.
उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव में इस बार स्थिति 2017 से अलग है. राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि अब मोदी लहर ऐसी नहीं कि एंटी-इनकमबेंसी के बावजूद बीजेपी को जितवा दे. आम आदमी पार्टी मामले को त्रिकोणीय बना रही है तो बीएसपी भी कुछ सीटों पर रेस में है.
ऐसे में कोटद्वार सीट एक बार फिर 2012 की तरह निर्णायक साबित हो सकती है. यहां से इस बार जनरल (रिटायर्ड) बीसी खंडूरी की बेटी और यमकेश्वर की विधायक ऋतु खंडूरी बीजेपी के टिकट पर मैदान में हैं. उनके सामने हैं खंडूरी को 2012 में हराने वाले कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी.
स्थानीय पत्रकार अनुपम भारद्वाज के अनुसार, अब मामला टक्कर का नज़र आने लगा है. हालांकि शुरुआत में ऋतु खंडूरी कमज़ोर नज़र आ रही थीं, लेकिन शनिवार, 12 फ़रवरी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रैली के बाद स्थितियां कुछ बदली हैं.
दरअसल ऋतु खंडूरी 2017 में गढ़वाल की ही यमकेश्वर सीट से विधायक बनी थीं. इस बार पार्टी ने यमकेश्वर से उन्हें टिकट नहीं दिया. कोटद्वार से मौजूदा विधायक हरक सिंह रावत के पार्टी से निष्कासन के बाद अंतिम समय में पार्टी ने ऋतु खंडूरी को कोटद्वार से चुनाव मैदान में उतारा.
भारद्वाज कहते हैं कि पहले से यहां चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे भाजपा नेता धीरेंद्र चौहान इससे नाराज़ हो गए और निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गए. पार्टी कार्यकर्ताओं की सहानुभूति भी धीरेंद्र चौहान के साथ थी.
दूसरी और सुरेंद्र सिंह नेगी पिछले पांच साल से चुनाव की तैयारियों में लगे हैं और उनकी ज़मीन पर पकड़ मजबूत है.
ऋतु खंडूरी के पक्ष में योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार करने के बाद कोटद्वार के लोगों ने और पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें कुछ गंभीरता से लेना शुरू किया.
अनुपम भारद्वाज के अनुसार, ''चुनाव प्रचार के आखिरी दिन यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मैदान में उतरने के बाद ऋतु खंडूरी रेस में आ गई हैं क्योंकि अब कम से कम पार्टी कार्यकर्ताओं में धीरेंद्र चौहान या ऋतु खंडूरी को लेकर जो असमंजस था वह ख़त्म हो गया है.''
इसके अलावा योगी आदित्यनाथ ने संन्यास ग्रहण करने से पहले अपने कॉलेज की पढ़ाई कोटद्वार से ही की थी, इसलिए उन्हें लेकर लोगों में कुछ अपनत्व, कुछ गर्माहट का भाव भी है और इसका असर भी पड़ने की संभावना है.
इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि ऋतु खंडूरी मज़बूत स्थिति में हैं. कुछ जानकारों को लगता तो अब भी ऐसा ही है कि लीड सुरेंद्र सिंह नेगी की है हालांकि अब उन्हें ऋतु खंडूरी से चुनौती मिल रही है.
लैंसडाउन
पौड़ी गढ़वाल की लैंसडाउन सीट भी इस बार सुर्ख़ियों में है. यहां बीजेपी के दो बार के विधायक महंत दिलीप रावत को उत्तराखंड की राजनीति के सबसे माहिर खिलाड़ियों और सबसे चर्चित नेताओं में से एक हरक सिंह रावत की पुत्रवधू और पूर्व ब्यूटी क्वीन अनुकृति गुसाईं चुनौती दे रही हैं.
कोटद्वार से लगती इस सीट का महत्व दरअसल हरक सिंह रावत की वजह से बढ़ गया है. तीन दशक से भी ज़्यादा समय से चुनावी राजनीति में सक्रिय हरक सिंह रावत सिर्फ़ एक विधानसभा चुनाव हारे हैं.
उनके समर्थक मानते रहे हैं कि उनके पास से कैबिनेट मंत्री को अलॉट होने वाला बंगला नहीं छिन सकता. 2002, 2012 और 2017 में तो वह सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे ही, 2007 में बतौर नेता प्रतिपक्ष उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल रहा.
राज्य बनने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि वह चुनाव मैदान में नहीं हैं. अपनी पुत्रवधु अनुकृति गुसाईं को चुनाव लड़वाने के लिए वह बीजेपी में अड़ गए थे और अब तक छह बार पार्टी बदल चुके हरक सिंह रावत को पहली बार निष्कासित किया गया.
कांग्रेस में आने के लिए उन्हें सार्वजनिक रूप से माफ़ी भी मांगनी पड़ी और जिस हनक के लिए हरक सिंह रावत जाने जाते हैं, वह ख़त्म होती भी दिखी. अब उनका सारा राजनीतिक कौशल अनुकृति गुसाईं को विधानसभा भेजने के ही काम आना है.
बीजेपी से अनुकृति गुसाईं के टिकट की मांग पर मौजूदा विधायक महंत दिलीप रावत ने खुलकर नाराज़गी जताई थी और अब अनुकृति उन्हीं के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में हैं.
अनुपम भारद्वाज कहते हैं कि अनुकृति को टिकट दिए जाने का कांग्रेस में काफ़ी विरोध भी हुआ था लेकिन संभवतः यह हरक सिंह के राजनीतिक कौशल और धनबल का कमाल है कि अब कोई भी खुलकर उनके ख़िलाफ़ मैदान में नहीं है.
हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि अनुकृति गुसाईं को सब ने स्वीकार कर लिया है.
अनुपम यह भी कहते हैं कि हरक सिंह रावत के कोटद्वार विधायक रहते हुए उन पर भ्रष्टाचार, अवैध खनन को प्रश्रय देने के जो आरोप लगे हैं, वह इससे सटी हुई सीट लैंसडाउन तक भी पहुंच रहे हैं.
हरक सिंह रावत के पुराने साथी रहे विनोद रावत बीजेपी प्रत्याशी के लिए प्रचार कर रहे हैं. वह लोगों के बीच जाकर कह रहे हैं जो (हरक सिंहल रावत) 20 साल रहकर भी उनका नहीं हो सका, वह किसी का क्या होगा.
अनुकृति गुसाईं को विरासत में अपने ससुर का राजनीतिक प्रभाव ही नहीं मिला है, उनके हिस्से की नाराज़गी भी उनके हिस्से आई है.
अनुपम भारद्वाज के अनुसार लैंसडाउन से दो बार के बीजेपी विधायक महंत दिलीप रावत की भी स्थिति अच्छी नहीं मानी जा रही है. उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्त इंटी-इनकमबेंसी की चर्चा है क्योंकि 10 साल में उनके क्षेत्र में ज़्यादा काम नहीं हुए हैं. सड़कों की हालत तो ख़ासतौर से ख़राब है.
अनुपम कहते हैं कि लैंसडाउन की जनता को दरअसल चुनाव इस बात का करना है कि किसे वोट न दें.
लैंसडाउन विधानसभा से अनुकृति गुसाईं की हार या जीत उनके राजनीतिक करियर की दिशा तो तय करेगी ही, हरक सिंह रावत और उनके जैसी राजनीति के भविष्य का भी फ़ैसला करेगी.
हरिद्वार ग्रामीण
हरिद्वार ग्रामीण सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के चुनाव अभियान का नेतृत्व कर रहे हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत दो बार के विधायक और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद को चुनौती दे रही हैं.
2017 में मुख्यमंत्री रहते हुए हरीश रावत इस सीट से भी चुनाव लड़े थे और स्वामी यतीश्वरानंद ने उन्हें शिकस्त दी थी. यह कहा जा रहा है कि अनुपमा रावत अपने पिता की हार का बदला लेने के लिए मैदान में हैं.
स्थानीय पत्रकार धर्मेंद्र चौधरी कहते हैं कि ''अनुपमा रावत हरिद्वार ग्रामीण में स्वामी यतीश्वरानंद को कांटे की टक्कर दे रही हैं, लेकिन उनके खिलाफ़ भी उनके पिता हरीश रावत की तरह रणनीति बनाकर उन्हें घेरने की कोशिश की जा रही है.''
बीएसपी ने एक मुसलमान उम्मीदवार को मैदान में उतारा है जिससे मुसलमानों का वोट बंटने का अंदेशा है. इससे सीधा नुक़सान कांग्रेस को होगा.
हालांकि धर्मेंद्र चौधरी कहते हैं कि इस बार ज़्यादातर मुसलमान वोटर्स बीजेपी को हराने के लिए वोट करने का मन बना चुके हैं और इसलिए संभवतः इस बार मुस्लिम वोट न बंटें.
स्थानीय पत्रकार एमएस नवाज़ को भी लगता है कि ''80 फ़ीसदी मुस्लिम वोट अनुपमा रावत को जा सकता है. इसके अलावा वह अन्य वोटों में भी सेंध लगाएंगी. पहाड़ी वोटर्स भी बड़ी संख्या में कांग्रेस को सपोर्ट कर सकते हैं.''
नवाज़ कहते हैं कि ''सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार मोदी लहर नहीं है जिसमें पिछले चुनाव में हरीश रावत समेत कई बड़े नेता उड़ गए थे. इस बार मुक़ाबला कांटे का नज़र आ रहा है.''
हरिद्वार ग्रामीण से अगर अनुपमा रावत चुनाव जीत जाती हैं तो हरीश रावत की राजनैतिक उत्तराधिकारी के तौर पर उत्तराखंड की राजनीति में स्थापित हो जाएंगी. वरना इस बार के कड़े मुक़ाबले में उनकी हार पार्टी को महंगी पड़ सकती है.
गदरपुर
गदरपुर से उत्तराखंड के स्कूली शिक्षा मंत्री अरविंड पांडे चुनाव मैदान में हैं. इस सीट पर उन्हें कांग्रेस के प्रेमानंद महाजन और आम आदमी पार्टी के जरनैल सिंह काली से चुनौती मिल रही है.
उत्तराखंड के कई चुनावी मिथकों में से एक यह भी है कि राज्य का शिक्षा मंत्री रहा नेता कभी अगला चुनाव नहीं जीत पाया है. अरविंद पांडे के सामने इस मिथक को तोड़ने की भी चुनौती है.
स्थानीय पत्रकार चंदन बंगारी के अनुसार, ''गदरपुर सीट पर शिक्षा मंत्री को कांग्रेस उम्मीदवार प्रेमानंद महाजन से अच्छी चुनौती मिल रही है. उनके पक्ष में अच्छी बात यह है कि पार्टी के अंदर उनके ख़िलाफ़ कोई गुटबंदी नहीं है.''
महाजन क्षेत्र में अच्छी-खासी तादाद में मौजूद बंगाली समुदाय से भी आते हैं. इसके अलावा गदरपुर उन सीटों में शामिल है जिन पर किसान आंदोलन का अच्छा असर है.
गदरपुर सीट पर आम आदमी प्रत्याशी जनरैल सिंह काली भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं और माना जा रहा है कि वह भी अच्छे खासे वोट बटोर सकते हैं.
गदरपुर सीट पर मौजूदा शिक्षा मंत्री की हार या जीत एक चुनावी मिथक को पुष्ट करेगा या तोड़ेगा. इसके अलावा किसान आंदोलन के उत्तराखंड की चंद सीटों पर असर की भी इस चुनाव परिणाम से पड़ताल हो जाएगी.
सल्ट
अल्मोड़ा की सल्ट सीट कांग्रेस की राजनीति और ख़ासकर हरीश रावत की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डालने वाली सीट है.
कांग्रेस ने काफ़ी उठापटक के बाद सल्ट से इस बार पार्टी के चार कार्यकारी अध्यक्षों में से एक रणजीत रावत को चुनाव मैदान में उतारा है. राजनीतिक हलकों में यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि किसी समय हरीश रावत के ख़ासमखास रहे रणजीत रावत अब उनके धुर विरोधी हैं.
रणजीत रावत 2007 में सल्ट से विधायक बने थे, लेकिन 2012 और 2017 में बीजेपी के सुरेंद्र सिंह जीना के हाथों उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था. इसके बाद उन्होंने रामनगर का रुख़ किया और 2022 का चुनाव लड़ने के लिए वह पिछले पांच साल से रामनगर में सक्रिय थे.
कांग्रेस ने अपनी दूसरी लिस्ट जारी की तो रामनगर का टिकट हरीश रावत को दे दिया गया. हरीश रावत रामनगर से चुनाव लड़ने की तैयारी करने लगे और रणजीत रावत खुलकर नाराज़गी जताते हुए रामनगर से ही निर्दलीय उतरने की.
इसके बाद कांग्रेस ने संशोधित लिस्ट जारी की और हरीश रावत को लालकुआं से और रणजीत रावत को उनकी पुरानी सीट सल्ट से चुनाव मैदान में उतार दिया गया.
सल्ट से रणजीत रावत को दो बार हराकर विधायक बने सुरेंद्र सिंह जीना का 2020 में कोरोना की वजह से निधन हो गया था. बीजेपी ने उनकी जगह उनके भाई महेश जीना को टिकट दिया था, जो अब विधायक हैं और पार्टी के उम्मीदवार भी.
स्थानीय पत्रकारों के अनुसार रणजीत रावत सल्ट में देर से और न चाहते हुए भले ही पहुंचें हों, उनकी स्थिति वहां कमज़ोर नहीं है. वह महेश जीना को टक्कर दे रहे हैं और पासा किसी भी ओर पड़ सकता है.
सल्ट में रणजीत रावत की हार-जीत पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों के साथ ही हरीश रावत की भी नज़र रहेगी.
अगर रणजीत रावत सल्ट से जीत जाते हैं तो कांग्रेस में वह हरीश रावत के एक खुले विरोधी के रूप में मौजूद रहेंगे, जिनके आसपास असंतुष्ट जगह तलाश सकते हैं.
अगर रणजीत रावत यह चुनाव हार जाते हैं तो राजनीतिक रूप से हरीश रावत म़जबूत हो जाएंगे और उनका विरोध करने वाले कोई भी क़दम उठाने से पहले कई बार सोचेंगे.
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