उत्तराखंड में क्यों उठ रही अलग भू-क़ानून की माँग, जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शन

    • Author, धुव्र मिश्रा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तराखंड के हरे-भरे पहाड़ों में तमाम ख़ूबसूरत नज़ारों के बीच अलग-अलग जगहों पर युवा हाथों में पोस्टर लेकर राज्य में ज़मीन ख़रीदने के लिए अलग भू-क़ानून की माँग करते नज़र आ रहे हैं. हाथों में पकड़े इन पोस्टरों में लिखा है, 'उत्तराखंड माँगे भू-क़ानून'.

उत्तराखंड में इन दिनों राज्य के लिए एक सख़्त भू-क़ानून की माँग तेज़ हो गई है. तमाम सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर लोग इस माँग को लेकर पोस्ट करते नज़र आ रहे हैं. लोगों की माँग है कि उत्तराखंड में भी ज़मीनों को लेकर हिमाचल प्रदेश की तरह एक सख़्त क़ानून लाया जाए.

अचानक क्यों उठने लगी भू-क़ानून की माँग?

बॉलीवुड अभिनेता मनोज वाजपेई जून के महीने में उत्तराखंड के अल्मोड़ा में एक ज़मीन ख़रीदने के लिए आए थे. 25 जून को उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने ख़ुद एक ट्वीट के ज़रिए इसकी जानकारी दी.

उन्होंने बॉलीवुड अभिनेता मनोज वाजपेई के साथ अपनी तस्वीर शेयर करते हुए लिखा था, "हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध कलाकार मनोज वाजपेई लमगड़ा के कपकोट में ख़रीदी भूमि की रजिस्ट्री के लिए अल्मोड़ा पहुँचे. उन्होंने भूमि ख़रीदने की सभी औपचारिकताएं पूरी कर मेरे 'मल्ला महल' निरीक्षण कार्यक्रम में मुझसे मुलाक़ात की और बताया कि अल्मोड़ा में पर्यटन विकास के लिए उनसे जो भी सहयोग होगा, वह करेंगे."

इस तस्वीर को कई लोगों ने रीट्वीट किया और यहीं से #उत्तराखंड_माँगे_भू_क़ानून ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर भू-क़ानून को लेकर आवाज़ें उठने लगीं. सोशल मीडिया से शुरू हुआ यह कैंपेन अब प्रदेश के सड़कों तक पहुँच गया है और सभी राजनीतिक पार्टियां भी भू-क़ानून की वकालत करती हुई नज़र आ रही हैं.

राज्य के नये मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से बातचीत में कहा कि भू-क़ानून समेत जो भी राज्य के हित में होगा वो करेंगे.

लेकिन कैबिनेट मंत्री और शासकीय प्रवक्ता सुबोध उनियाल कहते हैं कि क़ानूनों के ज़रिए इसको नहीं रोका जा सकता, इसके लिए स्थानीय लोगों को जागरूक होना पड़ेगा और उनको ज़मीन बेचने से गुरेज़ करना चाहिए.

भू-क़ानून की माँग को ख़ारिज करते हुए सुबोध उनियाल कहते हैं, "चुनाव सामने हैं इस वजह से कुछ लोग जिनकी ज़मीन खिसक चुकी है वह भू-क़ानून पर लोगों को भड़का कर अपनी ज़मीन तलाशने का काम कर रहे हैं."

वो आगे कहते हैं, "उत्तराखंड डेवलपिंग स्टेट है, नया राज्य है इसका औद्योगिकीकरण होना है. बहुत ज़्यादा कंज़रवेटिव होना भी उचित नहीं होगा. स्थानीय स्तर पर जागरूकता होनी चाहिए. मैंने कई बार लोगों से अपील भी की है कि अगर कोई आदमी होटल इंडस्ट्री खोलना चाहता है तो उसको ज़मीन बेचने की बजाय उसके साथ मिलकर काम करें, यह ज़्यादा हितकारी होगा."

पहले भी उठी थी भू-क़ानून की माँग

ये पहला मौक़ा नहीं है जब उत्तराखंड में भू-क़ानून की माँग की गई है. जब यह राज्य बन रहा था उस वक़्त भी उत्तराखंड के लिए एक भू-क़ानून की माँग की गई थी. उसके बाद भी समय-समय पर क्षेत्रीय पार्टियां और आंदोलनकारी भू-क़ानून की माँग करते रहे हैं.

लेकिन, पहले भू-क़ानून की जो माँग की जाती थी उनमें इस तरह का जनसमर्थन देखने को नहीं मिला था. आजकल हर वर्ग की तरफ़ से ऐसे क़ानून की माँग की जा रही है और ख़ासकर इसमें बढ़-चढ़कर युवाओं की भागीदारी देखने को मिल रही है.

लोगों का आरोप है कि उत्तराखंड के बड़े-बड़े उद्योगपति और रसूख़दार लोग तेज़ी से ज़मीनें ख़रीद रहे हैं. उनका कहना है कि अगर ज़मीनों की ख़रीद-फ़रोख़्त नहीं रुकी तो एक दिन ऐसा आएगा जब यहां लोगों के पास ज़मीनें नहीं रह जाएंगी.

उत्तराखंड में सख़्त भू-क़ानून ज़रूरी क्यों है

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत बीबीसी से कहते हैं, "उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की जो माँग थी उसके पीछे सिर्फ़ आर्थिक कारण नहीं थे, यहां सांस्कृतिक पहचान का भी सवाल था. जब उत्तराखंड राज्य आंदोलन चला था तो उसमें यह सवाल भी था कि राज्य तो हमें मिल जाएगा लेकिन हमारी ज़मीनें सुरक्षित कैसे रहेंगी, बाहर के लोग आएंगे और हमारी सारी ज़मीनें ख़रीद लेंगे. इससे वहां की डेमोग्राफ़ी बदलेगी जिसकी वजह से हमारी संस्कृति भी बगल जाएगी."

उत्तराखंड में कई लोगों का कहना है कि उन्हें पिछले कुछ वर्षों में सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे ख़त्म होती हुई नज़र आ रही है.

राज्य आंदोलन में हिस्सा लेने वाले योगेश भट्ट ने बीबीसी को बताया, "रसूख़दार लोगों ने यहां काफ़ी ज़मीन ख़रीद ली है और बाड़े लगा दिए हैं. इससे गांव के लोगों के लिए जंगलों से पशुओं के लिए चारा लाना या जलाने की लकड़ियां लाना मुश्किल हो गया है. यहां पर बाउंसर कल्चर भी आ गया है. रसूख़दार लोगों ने पहाड़ों पर अपने-अपने बाउंसर खड़े कर दिए हैं जो लोगों को उनके ही जंगलों में जाने से रोकते हैं."

राष्ट्रीय सुरक्षा का भी सवाल

केदारनाथ से कांग्रेस विधायक मनोज रावत इस मसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़कर देखते हैं.

वो बीबीसी से कहते हैं, "उत्तराखंड की सीमा चीन और नेपाल से लगी हुई है. यह इलाक़ा सामरिक दृष्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण है. त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के समय में ज़मीन ख़रीद के नियमों को जिस तरह से छूट दी गई थी, इससे अब यह डर भी पैदा हो गया है कि चीन से लगी सीमा पर मौजूद गांव में अगर कोई चीनी कंपनी निवेश के नाम पर ज़मीन ख़रीद लेती है या फिर भारत की ही किसी पार्टनर कंपनी के साथ मिलकर बॉर्डर इलाक़े के गांवों की सारी ज़मीनें ख़रीद लेती है तो देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा हो सकता है."

हिमाचल की किस तर्ज़ पर भू-क़ानून लाने की माँग की जा रही है?

देहरादून में रह रहे अधिवक्ता समीर मुंडेपी ने भू-क़ानून पर गहन अध्ययन किया है. वो बीबीसी से कहते हैं, "साल 1971 में पंजाब से अलग होकर हिमाचल प्रदेश एक अलग राज्य बना था. इसके बाद हिमाचल प्रदेश में अन्य राज्यों के लोगों द्वारा तेज़ी से ज़मीनें ख़रीदी जाने लगीं. इसलिए साल 1972 में एक क़ानून बना जिसके तहत हिमाचल प्रदेश के लोगों की ज़मीनों को ख़रीदने के लिए सख़्त नियम बनाए गए थे."

इस क़ानून के अनुसार कोई भी ग़ैर-कृषक व्यक्ति या ऐसा व्यक्ति जो हिमाचल का नहीं है वह हिमाचल में कृषि भूमि नहीं ख़रीद सकता. हिमाचल का किसान भी अपनी ज़मीन किसी दूसरे ग़ैर-कृषक व्यक्ति को बेच या लीज़ पर नहीं दे सकता है. सिर्फ़ हिमाचल का किसान ही वहां ज़मीन को ख़रीद सकता है.

अगर कोई निवेशक हिमाचल आएंगे या लोग यहां रहने आएंगे तो उनके लिए उन्होंने एक प्रोविज़न अलग रखा था. इसके तहत नगर निगम और नगर पालिका के इलाक़ों में 500 वर्ग मीटर ज़मीन मकान और 300 वर्ग मीटर ज़मीन दुकान के लिए लीज़ पर ले सकते हैं लेकिन इस ज़मीन पर कभी भी उनका मालिकाना हक़ नहीं होगा. इस क़ानून को उन्होंने कंट्रोल एंड ट्रांसफ़र ऑफ़ लैंड नाम दिया था.

इससे फ़ायदा यह हुआ कि यहां की उपजाऊ ज़मीन पर बाहर के लोगों ने निवेश किया और इसका फ़ायदा यहां के स्थाई निवासियों को मिला. साथ ही उनकी ज़मीनें भी सुरक्षित रहीं.

उत्तराखंड अलग राज्य बनने पर वहां क्या व्यवस्था थी?

उत्तर प्रदेश से अलग होकर साल 2000 में उत्तराखंड एक अलग राज्य बना. उस समय उत्तराखंड में ज़मीन ख़रीदने को लेकर हिमाचल जैसा कोई सख़्त क़ानून नहीं था. इस दौरान काफ़ी बड़ी संख्या में भू-माफ़िया यहां आ गए. उत्तराखंड की ज़मीनें बहुत तेज़ी से बिकनी शुरू हो गईं.

इस पर आधिकारिक आंकड़े तो मौजूद नहीं हैं लेकिन प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने अपनी फ़ेसबुक पोस्ट पर लिखा है, "उत्तराखंड राज्य गठन के बाद प्रतिबंधों के बावजूद कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार 4500 हेक्टेयर भूमि प्रतिवर्ष खेती के दायरे से बाहर हो रही है."

उत्तराखंड की पहली निर्वाचित सरकार में नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने थे. उनकी सरकार पर काफ़ी दबाव था कि प्रदेश की कुल 12 फ़ीसद कृषि भूमि की ख़रीद-फ़रोख़्त को किसी भी तरह से रोका जाए.

तिवारी सरकार ने 2003 में एक क़ानून बनाया जिसके तहत कोई भी ग़ैर-कृषक व्यक्ति उत्तराखंड में 500 वर्ग मीटर से ज़्यादा कृषि भूमि नहीं ख़रीद सकता था और उत्तराखंड का कृषक 12.5 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन अपने पास नहीं रख सकता था.

बाद में बीजेपी के मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूरी ने कृषि ज़मीन ख़रीद की 500 वर्ग मीटर की सीमा को घटाकर 250 वर्ग मीटर कर दिया.

ज़मीन ख़रीद के नियमों में कमियां

उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन करने वालों में से एक योगेश भट्ट बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि तिवारी और खंडूरी सरकार में ज़मीनों की ख़रीद के लिए जो नियम बनाए गए थे उनमें भी 'लूपहोल्स' छोड़ दिए गए थे.

वो कहते हैं, "जो 500 वर्ग मीटर की सीमा थी जिसे बाद में खंडूरी के शासनकाल में 250 वर्ग मीटर कर दिया गया था, ये सीमा नगरीय क्षेत्रों में लागू नहीं थी. वहां आप जितनी मर्ज़ी चाहें उतनी ज़मीनें ख़रीद सकते थे. सरकारों ने यह चालाकी की थी कि वो नगरीय क्षेत्रों का विस्तार करते गए जिससे कि वहां ज़मीन ख़रीद का क़ानून लागू नहीं होता और ज़मीनें धड़ल्ले से बेचीं गईं."

लेकिन इन आरोपों पर सफ़ाई देते हुए मौजूदा कैबिनेट मंत्री और शासकीय प्रवक्ता सुबोध उनियाल कहते हैं कि नया-नया राज्य था और राज्य का औद्योगिकरण भी होना था, इसलिए ऐसा प्रावधान रखा गया था कि अनुमति के साथ कोई भी ज़मीन ख़रीद सकता था.

सुबोध उनियाल कहते हैं, "नगरीय क्षेत्रों में ज़मीन खरीदने की बहुत ज़्यादा गुंजाइश नहीं होती क्योंकि ज़्यादातर लोग कृषि भूमि को ही ख़रीदना पसन्द करते हैं. उसके दाम भी कम होते हैं. नई कॉलोनी बनाने या कुछ और करने के लिए लोगों का फ़ोकस कृषि भूमि पर ही होता है. शहरी क्षेत्रों में तो वैसे भी ज़मीन बहुत महंगी हैं. आप कहीं भी किसी शहर में चले जाइए बहुत ज़्यादा ज़मीन ख़ाली पड़ी हो, ऐसी गुंजाइश दिखती नहीं है."

उत्तराखंड में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे किशोर उपाध्याय ख़ुद को उत्तराखंड आंदोलन का एक सिपाही क़रार देते हैं. वो कहते हैं, "मेरा उस समय तिवारी जी से थोड़ा विवाद हो गया था. मेरा विचार यह था कि यहां पर्यावरण हितैषी उद्योग लगने चाहिए और हमारे पास ज़मीन अभी बहुत कम है और वह ख़राब हो जाएगी. मेरी जो उस समय आशंका थी आज वह बिल्कुल सही साबित हो रही है."

भाजपा सरकार पर ज़मीन ख़रीद के नियमों को कमज़ोर करने के आरोप

साल 2017 में भाजपा सरकार 57 विधायकों वाले भारी भरकम बहुमत के साथ सत्ता में वापस आई. त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया. इस सरकार में उत्तराखंड में ज़मीनों की ख़रीद को लेकर पहले जो नियम बनाए गए थे, सबसे पहले उनको ख़त्म और शिथिल करने का काम शुरू किया गया.

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत कहते हैं, "मौजूदा समय में उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित हुई गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का मुद्दा उत्तराखंड बनने से पहले ही उठना शुरू हुआ था क्योंकि यहाँ से पहाड़ के लोगों की जनभावनाएं जुड़ीं हुईं थीं. 2012 में विजय बहुगुणा की कांग्रेस सरकार ने गैरसैंण में ज़मीनों की ख़रीद पर रोक लगा दी थी. लेकिन मार्च, 2017 में आई त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने जुलाई 2017 में सबसे पहले गैरसैंण में ज़मीन की ख़रीद पर लगी रोक को ख़त्म कर दिया और यहां ज़मीनों को ख़रीदने की खुली छूट दे दी."

निवेश के नाम पर ज़मीन ख़रीदने के नियम बदलने के आरोप

त्रिवेंद्र सिंह रावत पर आरोप है कि उनकी सरकार में निवेश के नाम पर उत्तराखंड में ज़मीन ख़रीद के सख़्त प्रावधानों को कमज़ोर कर दिया गया था. अक्टूबर 2018 में रावत सरकार एक अध्यादेश लेकर आई जिसके तहत अगर आप उद्योग लगाने के लिए कृषि भूमि ख़रीदते हैं तो वो केवल सात दिनों में स्वत: ही ग़ैर-कृषिक भूमि मान ली जाएगी. पहले कृषि भूमि को ग़ैर-कृषि बनाने में काफ़ी कड़े प्रावधान थे.

इसके अलावा इन्होंने सीलिंग लिमिट से जुड़ी धारा 154 में भी बदलाव किया. धारा 154 के तहत कोई भी व्यक्ति 12.5 एकड़ से ज़्यादा कृषि भूमि नहीं ख़रीद सकता था, लेकिन अब 154 (2) के तहत औद्योगिक उद्देश्य के लिए अब कोई भी व्यक्ति कितनी भी ज़मीन ख़रीद सकता है.

सरकार के फ़ैसले का बचाव करते हुए कैबिनटे मंत्री सुबोध उनियाल कहते हैं, "कारण यह था कि अगर कोई व्यक्ति इस राज्य में उद्योग के लिए ज़मीन ले रहा हो तो उस स्थिति में उसको लालफ़ीताशाही से परेशानी ना हो क्योंकि कहीं ना कहीं निवेश पर इसका प्रभाव पड़ेगा. जो सुधार थे वह केवल औद्योगिक विकास के उद्देश्य से थे, जिससे कि यहां रोज़गार के अवसर पैदा हो सकें."

उस अध्यादेश को विधानसभा में बिल के रूप में पारित कराए जाते समय बिल का विरोध करने वाले विपक्षी पार्टी कांग्रेस के विधायक मनोज रावत बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "त्रिवेंद्र रावत सरकार काफ़ी सोच समझ कर पहले से तैयारी करके इस अध्यादेश को बिल के रूप में पेश करने के लिए विधानसभा में लेकर आई. जहां तक मुझे याद है उस दिन विधानसभा का अंतिम दिन था. इसके ठीक एक दिन पहले सदन में विपक्ष द्वारा अन्य मुद्दों पर काफ़ी हँगामा हुआ था. जिसकी वजह से यह बिल सर्कुलेट नहीं हो पाया, जब मैंने कार्यसूची में देखा तो मुझे शक हो गया था कि यह बिल लेकर आ रहे हैं लेकिन जब सदन में एक दिन पहले हंगामा हुआ तो हमें लगा ये लोग बिल को इस बार नहीं ला रहे होंगे."

मनोज रावत के अनुसार सबसे बड़ी हैरानी ये हुई कि अगले दिन अख़बारों में भी कुछ नहीं छपा और सामाजिक जीवन में भी कोई हलचल नहीं हुई. मनोज रावत का दावा है कि सबसे ताज्जुब की बात यह थी कि जल, जंगल और ज़मीन की बात करने वाले जो बुद्धिजीवी वर्ग के लोग थे उनको भी इस बारे में कुछ पता नहीं चला.

विपक्ष पर ख़ामोश रहने के आरोप

कांग्रेस विधायक मनोज रावत चाहे अब जो कहें लेकिन विपक्षी कांग्रेस पार्टी पर भी आरोप लगे थे कि वो बिल के पास हो जाने के बाद भी ख़ामोश रही और उसने इसके ख़िलाफ़ कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं किया.

इस आरोप पर कांग्रेस के किशोर उपाध्याय कहते हैं, "जनता ने जितनी ताक़त प्रतिपक्ष को दी है उसी हिसाब से मुद्दों को लोग उठा सकते हैं. उतना ही बल विधानसभा में बनता है."

पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत आजकल सोशल मीडिया पर भू-क़ानून और इसकी ज़रूरतों के बारे में सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि पहले उन्होंने इस बारे में क्यों नहीं कुछ कहा.

बीबीसी ने हरीश रावत से बात करने की कोशिश की पर रिपोर्ट के लिखे जाने तक उनसे बात नहीं हो पाई.

किशोर उपाध्याय कहते हैं, "2019 में लोकसभा के चुनाव थे और लोगों का ध्यान उस तरफ़ चला गया. हमने भी इसमें आपत्तियां उठाई थीं लेकिन सरकार ने हमारी बात नहीं सुनी. जब यह क़ानून आया था उस समय निश्चित रूप से हमने इसका विरोध किया था लेकिन जब तक जन सहयोग ना हो, लोग खड़े ना हों तब तक विरोध सफल नहीं होता."

वहीं योगेश भट्ट हरीश रावत पर आरोप लगाते हुए कहते हैं, "जब वह मुख्यमंत्री थे तब उनके शासनकाल में उत्तराखंड के ग्रामीणों की ज़मीन एक बड़े उद्योगपति को दे दी गई थी, उस समय पूरे प्रदेश में काफ़ी बड़ा आंदोलन चला था."

ग्रामीणों की ज़मीनों को उद्योपति को देने के विरोध में जो आंदोलन चला था, उसमें हिस्सा लेने वाले पूरन चंद तिवारी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "अल्मोड़ा के नैनीसार में क़रीब हज़ार बारह सौ नाली का क्षेत्र है. (जैसे मैदानी इलाक़ों में हैक्टेयर ज़मीन मापने का आधार होता है वैसे ही पहाड़ में ज़मीन की माप नाली होता है.) उसमें से 353 नाली (7.01 हेक्टेयर) ज़मीन तत्कालीन हरीश रावत की सरकार ने हरियाणा के एक उद्योगपति को एक इंटरनेशनल स्कूल बनाने के लिए दे दी थी. इसके लिए न तो कोई विज्ञापन निकाला और ना ही इसके बार में किसी को पता चला."

इस विवाद पर पार्टी का बचाव करते हुए किशोर उपाध्याय कहते हैं, "मैं उस समय कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष था. मैंने तब भी इस बारे में अपनी बात और अपनी आपत्तियां लिखित में सरकार को दी थीं. मैं ख़ुद वहां जाना चाहता था, लेकिन नहीं जा पाया. वह मामला कोर्ट में चला गया था, अभी कोर्ट में क्या स्थिति है मुझे उसकी जानकारी नहीं है."

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