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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में बीजेपी के लिए क्यों ज़रूरी है पश्चिम यूपी?
"भारत में केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रता है", राजनीतिक गलियारों की ये कहावत न तो पहली बार कही जा रही है और न ही आख़िरी. 10 फ़रवरी से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मतदान शुरू हो गया है. राज्य में सात चरणों में 7 मार्च तक मतदान होंगे और नतीजा 10 मार्च को आएगा.
गुरुवार को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे यूपी के पश्चिमी ज़िलों में मतदान हुआ. पहले चरण के लिए यहां के 11 ज़िलों की 58 विधानसभा सीटों पर वोट डाले गए.
मेरठ से बीबीसी संवाददाता गीता पांडे और दिल्ली से विकास पांडे बता रहे हैं कि कैसे पश्चिमी यूपी की वोटिंग पर बहुत कुछ दांव पर लगा है.
बीते सप्ताह, कड़ाके की ठंड के बीच भारत की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सैकड़ों समर्थक उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में एक गाँव के छोटे से मैदान में जुटे हुए थे.
इनमें से कई तो उन ट्रैक्टरों पर भगवा झंडों के साथ खड़े थे जो आसपास के गाँवों से लोगों को रैली में शामिल होने के लिए लाए थे. ये सब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आने का इंतज़ार कर रहे थे.
योगी से राजनेता बने 49 वर्षीय आदित्यनाथ मंच पर आए तो भीड़ ने पार्टी के झंडे दिखाते हुए "योगी-योगी" और "योगी आदित्यनाथ ज़िंदाबाद" के नारों से उनका स्वागत किया.
अपने 10 मिनट के छोटे से भाषण में आदित्यनाथ ने विपक्षी पार्टियों पर निशाना साधते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं.
उन्होंने मैदान में मौजूद लोगों से सवाल किया, "क्या आप मेरे उम्मीदवार को वोट देंगे?" इसपर भीड़ ने सकारात्मक जवाब दिया.
सीएम योगी के जाने के बाद उनके समर्थकों ने बीबीसी न्यूज़ को बताया कि वे बीजेपी को इसलिए वोट देंगे क्योंकि पार्टी ने किसानों के कल्याण के लिए कदम उठाए हैं और इलाके में क़ानून-व्यवस्था में भी सुधार किया है.
इन सबके बावज़ूद ऐसे कई संकेत थे जो यह बता रहे थे कि पार्टी के लिए यहां चीज़ें उतनी आसान भी नहीं हैं. रैली में काले रंग के स्वेटर या जैकेट पहनकर पहुंचे लोगों को इन्हें खोलने के लिए कहा गया था. एक स्थानीय पत्रकार ने बताया कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि आयोजकों को डर था कि काले रंग के कपड़ों का इस्तेमाल कोई मुख्यमंत्री को काला झंडा दिखाने के तौर पर न कर ले.
बीजेपी नेताओं के विरोध से मतदाता दे रहे संकेत?
बीते कुछ हफ़्तों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अंदर ऐसे दर्ज़न भर से भी ज़्यादा मामले देखने को मिले, जहां बीजेपी प्रत्याशियों पर कीचड़ फेंकी गई, उन्हें काले झंडे दिखाए गए या फिर उनपर पत्थरबाज़ी की गई हो.
मेरठ और इससे सटे पश्चिमी यूपी के ज़िलों में गुरुवार को सात में से पहले चरण के चुनाव के दौरान मतदान हुआ. साल 2017 के बीते विधानसभा चुनाव में इस इलाके में लोगों ने बीजेपी को अपनी पहली पसंद बनाया लेकिन इस बार ये राह थोड़ी मुश्किल है.
यहां बीजेपी के ख़िलाफ़ लोगों में गुस्से का अंदाज़ा ठीक एक साल पहले के एक और कड़ाके की ठंड वाले दिन से लगाया जा सकता है, जब इस क्षेत्र से ताल्लुक़ रखने वाले प्रमुख किसान नेता राकेश टिकैत ने रोते हुए एक वीडियो जारी किया था. इस वीडियो में वे अपने समर्थकों से दिल्ली की सीमा पर डटे रहने को कह रहे थे.
ये किसान केंद्र की मोदी सरकार के लाए तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर नवंबर 2020 से ही विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. वीडियो के आने से कुछ दिनों पहले तक सीमाओं पर किसानों की भीड़ कम होने लगी थी.
राकेश टिकैत का वीडियो तेज़ी से वायरल हुआ, जिसके बाद ट्रैक्टरों और ट्रकों में भर-भरकर युवा धरनास्थल पर एक बार फिर जुटने लगे. मोदी सरकार के तीन कृषि क़ानूनों से पहले से ही नाराज़ इन किसानों का गुस्सा राकेश टिकैत का वीडियो वायरल होने से और बढ़ गया. किसानों ने इसे अपने नेता के अपमान के तौर पर देखा.
इसके बाद गाज़ियाबाद सहित दिल्ली के अन्य सभी सीमाओं पर नवंबर 2021 यानी तब तक किसानों का प्रदर्शन जारी रहा, जब तक पीएम मोदी ने तीनों कृषि क़ानून को वापस लेने की घोषणा नहीं की.
क़ानूनों की वापसी की टाइमिंग इसलिए भी अहम थी क्योंकि देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव सिर पर थे. विशेषज्ञों ने कहा कि क़ानून इसलिए वापस लिए गए क्योंकि मोदी और उनकी पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने मतदाताओं को ख़ोने का डर था.
लेकिन क़ानून वापसी तक पर्याप्त नुकसान हो चुका था. अब राकेश टिकैत राज्य में बीजेपी विरोधी किसानों का चेहरा बन चुके हैं.
साल 2017 में, इस क्षेत्र में विधानसभा की 70 में से 50 से अधिक सीटें बीजेपी को मिली थी. यूपी में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं. उस समय राष्ट्रवाद और हिंदू वोटों के एकजुट होने से बीजेपी ने ये करिश्मा कर दिखाया.
लेकिन सवाल ये है कि क्या बीजेपी अपने इस करिश्माई प्रदर्शन को दोहरा पाएगी? राकेश टिकैत ने यूं तो किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं किया है लेकिन उन्होंने अपने समर्थकों को ऐसे पर्याप्त संकेत दिए हैं कि "वे किसानों का अपमान करने वाली पार्टी को वोट न दें".
किसानों का विरोध और जयंत चौधरी बीजेपी की चुनौती
एक और कारण है, जिसकी वजह से बीजेपी को झटका लग सकता है. भूली-बिसरी क्षेत्रीय पार्टी राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) का जयंत चौधरी के नेतृत्व में एक बार फिर से उभरना. भारत के पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह के पोते और अलग-अलग सरकारों में मंत्री रह चुके अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी ने आरएलडी में एक बार फिर जान फूंकी है.
साल 2017 में, आरएलडी को अपने मज़बूत गढ़ों में भी बीजेपी से हारना पड़ा था क्योंकि उस समय यहां अहम भूमिका निभाने वाले जाट समुदाय ने पार्टी का साथ नहीं दिया था.
जाट हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने की भाजपा की रणनीति का उसे भरपूर फ़ायदा भी मिला. लेकिन इस बार, किसान आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाने वाले जाट वोटर बीजेपी के साथ ही रहेंगे इसकी गारंटी नहीं है.
आंदोलन के दौरान ख़ुलकर किसानों के पक्ष में बोलने वाले जयंत चौधरी को उस समय बहुत समर्थन मिला जब अक्टूबर 2020 में उनपर पुलिस के हमले का वीडियो वायरल हुआ.
हाथरस बलात्कार पीड़िता के परिवार से मुलाक़ात के लिए जाते समय पुलिस ने जब चौधरी को रोकने के लिए बल प्रयोग किया तो वो चोटिल हुए. उस समय ये रेप मामला इसलिए तूल पकड़ता दया क्योंकि पुलिस ने कथित तौर पर पीड़िता के शव का परिवार की इजाज़त के बिना ही अंतिम संस्कार कर दिया.
पुलिस ने आरोपों को खारिज किया लेकिन इससे विपक्षी पार्टियों को योगी आदित्यनाथ की सरकार पर हमला करने का मौका मिल गया.
उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया है. राज्य में सपा मुखिया अखिलेश यादव ही अभी तक योगी आदित्यनाथ के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी माने जा रहे हैं.
आरएलडी का किसानों के बीच बड़ा समर्थन है, तो वहीं सपा के पास मुसलमान और पिछड़ी जातियों के वोट का आधार है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुल वोटरों में से ये 26 प्रतिशत से ऊपर हैं.
अगर ये तीनों समुदाय एकतरफ़ा वोटिंग करेंगे, जिसकी विशेषज्ञ संभावना जता भी रहे हैं, तो ये निश्चित तौर पर बीजेपी के लिए चुनौती भरा साबित होगा.
उत्तर प्रदेश क्यों है ज़रूरी?
करीब 24 करोड़ की आबादी के साथ यूपी भारत का सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाला राज्य है. अगर यूपी को अलग देश माना जाए तो चीन, भारत, अमेरिका और इंडोनेशिया के बाद ये आबादी के लिहाज़ से दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश होगा.
उत्तर प्रदेश में देश की सबसे अधिक 80 लोकसभा सीटें हैं और यह कहा जाता है कि जो पार्टी उत्तर प्रदेश में जीतती है केंद्र में वो सत्ता में रहती है.
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और मौजूदी पीएम नरेंद्र मोदी के साथ ही यूपी कई प्रधानमंत्रियों का चुनावी क्षेत्र रहा है.
इस बार यूपी में सात चरणों में हो रहे चुनाव में 15 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे.
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