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ईडी की छापेमारी से बीजेपी की उम्मीदवारी तक, राजेश्वर सिंह और अभिषेक मिश्रा की दिलचस्प टक्कर
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश चुनाव में लखनऊ की सरोजनी नगर सीट का मुक़ाबला दिलचस्प बन गया है.
बीजेपी ने इस सीट से विधायक रही स्वाति सिंह का टिकट काट कर राज राजेश्वर सिंह को टिकट दिया है.
राज राजेश्वर सिंह हाल तक प्रवर्तन निदेशालय में संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात थे. मंगलवार को ही उनके वीआरएस के आवेदन को स्वीकृति मिली और उसी दिन उनको बीजेपी ने सरोजनीनगर सीट से अपना उम्मीदवार भी घोषित कर दिया.
इसी सीट से स्वाति सिंह के पति और उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह भी दावेदार थे. बीजेपी के उम्मीदवार की घोषणा के अगले ही दिन समाजवादी पार्टी ने अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी.
अब इस सीट पर राज राजेश्वर सिंह का मुकाबला समाजवादी पार्टी के अभिषेक मिश्रा से है.
कौन हैं राज राजेश्वर सिंह
टिकट मिलने के बाद राज राजेश्वर सिंह सीधे अपनी माँ का आशीर्वाद लेने आगरा पहुँचे. रास्ते में उन्होंने बीबीसी से अपनी दावेदारी को लेकर बात की.
एक ही दिन वीआरएस मिलना और बीजेपी का टिकट मिलना - ये महज़ इत्तेफ़ाक था? इस सवाल पर उन्होंने कहा, "भाजपा में योग्यता के आधार पर टिकट मिलता है. पार्टी ने मुझे योग्य पाया होगा इसलिए टिकट दिया"
क्या ख़ाकी से ख़ादी का सफ़र तय करते हुए एक भी दिन का 'कूलिंग ऑफ़' पीरियड ना रखना, उनके प्रवर्तन निदेशलय के कामकाज पर पार्टी विशेष के प्रति झुकाव को नहीं दर्शाता?
इस सवाल पर वो कहते हैं, " ऐसा बिलकुल नहीं है. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) निष्पक्ष और स्वतंत्र संस्था है. वहाँ जो भी काम करता है, तथ्यों के आधार पर करता है और सबकुछ कोर्ट की निगरानी में होता है. मेरे ऊपर किसी तरह के पक्षपात का कोई आरोप नहीं लगा है."
सोशल मीडिया पर राज राजेश्वर सिंह को इस तरह टिकट मिलने पर काफ़ी चर्चा चल रही है. पी चिदंबरम के बेटे और कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी उनके बीजेपी ज्वाइन करने को लेकर तंज कसा है.
राजेश्वर सिंह 1996 बैच के उत्तर प्रदेश के पीसीएस अधिकारी थे. लखनऊ ही उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है. लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कई शहरों में अहम पदों पर तैनात रहे. 2007 में ईडी में गए थे. 24 साल के कार्यकाल में वे कई हाई प्रोफाइल मामलों की जाँच से जुड़े रहे हैं.
एयरसेल मैक्सिस केस, 2जी घोटाला, कोयला घोटाला, रिवर फ़्रंट घोटाला, आम्रपाली स्कैम, नोएडा पोंजी स्कैम, माइनिंग स्कैम जैसे कई अहम मामलों की जाँच से वो जुड़े रहे हैं. इन घोटालों की जाँच को वो अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानते हैं.
लेकिन उन्होंने टिकट खुद माँगा था या बीजेपी ने उन्हें ऑफ़र दिया, इस पर उन्होंने खुल कर कुछ नहीं कहा.
क्यों कटा स्वाति सिंह का टिकट?
मंत्री स्वाति सिंह का टिकट काट कर राजेश्वर सिंह को मिला है.
तो स्वाति सिंह को राज राजेश्वर सिंह साथ ला पाएंगे? इस सवाल पर उन्होंने कहा, "पार्टी का निर्णय है. मेरी उनसे बात नहीं हुई है, लेकिन मैं उनसे जरूर जाकर मिलूंगा."
हालांकि स्वाति सिंह का टिकट क्यों कटा इस पर ना तो राजेश्वर सिंह और ना ही स्वाति सिंह ने कोई प्रतिक्रिया दी है.
बीजेपी ने सीटिंग विधायक का टिकट काटने का फ़ैसला क्यों लिया?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्रा कहते हैं, " पहली बात तो पति पत्नी के बीच ही एक ही सीट से टिकट को लेकर विवाद था. ये एक वजह हो सकती है कि भाजपा ने तीसरे को टिकट देना उचित समझा होगा. इसके अलावा मंत्री पद के कामकाज को लेकर भी थोड़ी नाराज़गी विधानसभा क्षेत्र के लोगों में थी. कई कार्यक्रमों में वो समय दे कर अंत तक नहीं पहुँचती थीं और कार्यक्रम रद्द करने पड़ते थे. राज राजेश्वर सिंह के तौर पर शायद बीजेपी को एक बेहतर उम्मीदवार मिला और इसलिए बीजेपी ने उन्हें उतारने का फ़ैसला लिया."
पति पत्नी की दावेदारी में उलझी बीजेपी
राज राजेश्वर सिंह को बीजेपी का टिकट मिलने के पहले स्वाति सिंह और दयाशंकर सिंह को इस सीट से प्रबल दावेदार माना जा रहा था. दोनों पति-पत्नी हैं और एक ही सीट से एक ही पार्टी से टिकट माँग रहे थे.
स्वाति सिंह को पिछले चुनाव में बीजेपी ने टिकट दिया था, जब उन्हें राजनीति में आए कुछ ही महीने हुए थे. वो इस सीट से जीतीं और महिला कल्याण एवं बाल विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनीं.
दयाशंकर सिंह फिलहाल उत्तर प्रदेश भाजपा में प्रदेश उपाध्यक्ष हैं.
सरोजनी नगर सीट से टिकट न मिलने पर दयाशंकर सिंह मायूस नहीं है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "पार्टी ने बेहतर उम्मीदवार को चुना है इसकी उन्हें खुशी है. पार्टी ने उन्हें प्रदेश में उपाध्यक्ष का पद दिया है, वो उस पर काम करते रहेंगे. सरोजनीनगर सीट से बीजेपी उम्मीदवार राज राजेश्वर सिंह के साथ मिल कर भी काम करेंगे"
बलिया से भी क्या उनकी दावेदारी है? इस पर वो सीधे सीधे जवाब नहीं देते, लेकिन इतना ज़रूर कहते हैं कि 2007 में भी वो बलिया से बीजेपी के उम्मीदवार रह चुके हैं.
सरोजनी नगर सीट से टिकट न मिलने पर स्वाति सिंह ने कहा, " मुझे क्या पार्टी ने निकाल दिया गया है? मैं इस पार्टी का हिस्सा थी, हूँ और आजीवन रहूंगी. इस पार्टी में मेरा वही सम्मान बना रहेगा. पार्टी के निर्णय पर किसी कार्यकर्ता को सवाल नहीं खड़ा करना चाहिए. 2017 में जब मुझे टिकट मिला तो किसी का टिकट काट कर ही तो मुझे मिला था. इसलिए टिकट ना मिलना कोई प्रश्न ही नहीं है? "
सरोजनीनगर के चुनावी समीकरण
2017 के पहले भारतीय जनता पार्टी को इस सीट पर कभी जीत नहीं मिली थी. 2002 और 2007 में बसपा के इरशाद ख़ान इस सीट से विधानसभा पहुँचे थे. वहीं 2012 में सपा के शारदा प्रसाद शुक्ला विजयी रहे. 2017 में समाजवादी पार्टी ने अनुराग यादव को टिकट दिया था.
सरोजनी नगर विधानसभा क्षेत्र में क़रीब पांच लाख वोटर हैं. चुनाव लड़ने वाले नेताओं के मुताबिक यहां ठाकुर, ब्राह्मण के साथ-साथ मुसलमान मतदाताओं की तादाद लगभग एक बराबर ही है. दलितों की संख्या थोड़ी ज़्यादा है. इस सीट का ज़्यादातर इलाका ग्रामीण है, लेकिन पिछले कुछ सालों में शहरीकरण भी तेज़ी से हुआ है.
समाजवादी पार्टी ने अभिषेक मिश्रा को इस सीट से उम्मीदवार बनाया है. अभिषेक मिश्रा समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव हैं, 2017 में लखनऊ उत्तर से चुनाव लड़े और पूर्व में सपा सरकार में मंत्री रह चुके हैं. इस बार उनकी सीट बदल दी गई है. सीट बदलने को लेकर बीबीसी ने उनसे फोन पर सम्पर्क करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं हो सकी.
योगेश मिश्रा की माने तो जातीय समीकरण के लिहाज से ये मुक़ाबला अब और दिलचस्प हो गया है.
"सरोजनी नगर में ब्राह्मण वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं. ये बीजेपी की कोई पारंपरिक सीट नहीं रही है. 2017 में बीजेपी की हवा चली, जिसमें ये सीट बीजेपी ने जीत ली.
बीजेपी से ब्राह्मणों की नाराज़गी की ख़बरों के बीच समाजवादी पार्टी इस बार उन्हें अपने साथ करने की कोशिश में जुटी है. 2012 में इस सीट से सपा के ब्राह्मण उम्मीदवार की जीत हुई थी. उससे पहले ये सीट बसपा के खाते में गई थी. उस जीत में भी बसपा उम्मीदवार को ब्राह्मणों का समर्थन मिला था. इस वजह से समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण उम्मीदवार को उतारा है."
इस सीट पर 23 फ़रवरी को मतदान होगा.
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