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नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती: नेताजी की मूर्ति इंडिया गेट पर वहीं लगेगी जहां जॉर्ज पंचम की मूर्ति थी
- Author, विवेक शुक्ला
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
नई दिल्ली के दक्षिणी इलाक़े में अपने फ्लैट में बैठे रेलवे बोर्ड के पूर्व मेंबर डॉ रविन्द्र कुमार ने शुक्रवार को जैसे ही चैनलों पर सुना कि इंडिया गेट की उसी जगह पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगेगी जहां पर कभी सम्राट जार्ज पंचम की प्रतिमा लगी थी तो वे अपने बचपन के दिनों में पहुंच गए.
उन्हें वो दिन अच्छी तरह से याद था जब लाल संगमरमर की छतरी के नीचे सम्राट जार्ज पंचम की प्रतिमा हुआ करती थी. उसके ऊपर रात के वक्त एक चालीस-पचास वाट का बल्ब पीली रोशनी बिखेरता था.
डॉ रविन्द्र कुमार तब वो 15 जनपथ पर रहते थे. वे अपने पिता और डॉ अंबेडकर के सहयोगी श्री होती लाल के साथ इंडिया गेट में घूमने के लिए आया करते थे.
ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम की वह मूर्ति 1968 तक इंडिया गेट पर लगी रही थी. मतलब देश के आजाद के होने के दो दशकों से भी अधिक समय तक.
उसे वहां से हटाने में इतना वक्त क्यों लगा, यह कौन बताएगा? उसमें सम्राट जार्ज पंचम का चेहरा-मोहरा कुछ इस तरह से दिखाया गया था कि मानो वे दिल्ली पर पैनी नजर रख रहे हों.
बहरहाल 1938 में स्थापित सम्राट जॉर्ज पंचम की मूर्ति इंडिया गेट पर 21 सालों तक आबाद रही. फिर उसे 1968 में इंडिया गेट से उतारकर पहुंचाया गया उत्तर-पश्चिम दिल्ली के बुराड़ी के पास स्थित कोरोनेशन पार्क में. वहां पर ब्रिटिश दौर की अनेक खासमखास गोरी शख्सियतों की मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं.
आप कह सकते हैं कि लगभग सदी से भी लंबे इंतजार के बाद इंडिया गेट की खाली पड़ी छतरी फिर से आबाद होने जा रही है. अब यहां लगेगी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 28 फीट ऊंची और 6 फीट चौड़ी प्रतिमा, जो ग्रेनाइट से बनी होगी.
हालांकि जिस जगह पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा लगेगी वहां पर महात्मा गांधी की प्रतिमा को लगाने की चर्चाएं भी सालों तक चलीं. लेकिन यह हो ना सका.
हो सकता है कि आप सवाल करें कि इंडिया गेट परिसर में लगी छतरी के नीचे सम्राट जार्ज पंचम की ही मूरत ही क्यों लगी थी? इसका जवाब ये होगा कि सम्राट जार्ज पंचम का नई दिल्ली से बेहद खास संबंध था. उनकी सदारत में कोरोनेशन पार्क में 11 दिसंबर, 1911 को आयोजित दरबार में एलान हुआ था कि भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली में शिफ्ट की जाएगी.
तो ज़ाहिर है कि नई दिल्ली के इतिहास में उनका एक ख़ास मुकाम था और इसलिए ही उनकी प्रतिमा इंडिया गेट पर स्थापित की गई थी.
नई दिल्ली नगर परिषद (एनडीएमसी) के पूर्व निदेशक श्री मदन थपलियाल ने अपनी किताब 'राजधानी- एक सदी का सफर' में लिखा है, "सम्राट जार्ज पंचम और क्वीन मैरी एक विशेष रेलगाड़ी से 7 दिसंबर, 1911 को सुबह दिल्ली पहुंचे. वे इससे पहले मुंबई आए थे. उनकी गाड़ी के लिए विशेष स्टेशन लाल किले के पीछे सलीमगढ़ के पास बनाया गया. दिल्ली के बुराड़ी गांव के पास खुले मैदान में लगने वाला यह तीसरा दिल्ली दरबार था जिसमें सम्राट और महारानी ने खुद हिस्सा लिया. इससे पहले के दोनों दरबारों में शाही दंपती नहीं आए थे."
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल में ऐलान किया था कि कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती पर इंडिया गेट पर उनकी प्रतिमा लगेगी. इससे पहले सरकार ने यह भी फ़ैसला किया था कि अब गणतंत्र दिवस समारोह नेताजी के जन्मदिन 23 जनवरी से शुरू होंगे और 30 जनवरी को उस दिन समाप्त होंगे जब गांधी क हत्या कर दी गई थी.
इसके साथ ही सरकार ने 1971 के भारत-पाक युद्ध के शहीदों की याद में इंडिया गेट में 26 जनवरी, 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा शुरू की गई अमर जवान ज्योति को नेशनल वार मेमोरियल की ज्योति में समाहित करने का फ़ैसला किया है. अमर जवान ज्योति को बंद करने से देश में बेशक निराशा का भाव तो है क्योंकि वह दशकों तक इंडिया गेट का अहम हिस्सा रही है.
कौन बनाएगा नेताजी की मूरत?
अब देखने वाली बात ये होगी कि इंडिया गेट में छतरी के नीचे स्थापित होने वाली नेताजी की मूर्ति को कौन शिल्पकार बनाएगा. इतना तय है कि मूर्तिशिल्पी का नाम जल्दी ही तय हो जाएगा. संभव है कि यह ज़िम्मेदारी दिग्गज मूर्तिकार राम सुतार या उनके पुत्र अनिल सुतार को दी जाए.
पिता-पुत्र की जोड़ी आजकल सरयू नदी के किनारे स्थापित होने वाली भगवान राम की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने के काम में लगे हैं. इस प्रतिमा की लंबाई 251 फीट होगी. राम सुतार ने ही सरदार पटेल की चर्चित प्रतिमा 'स्टेच्यू आफ यूनिटी' तैयार की थी.
महाराष्ट्र से संबंध रखने वाले सुतार की प्रतिमाओं में गति व भाव का शानदार समन्वय रहता है. संसद भवन में स्थापित छत्रपति शिवाजी की 18 फीट ऊंची तांबे की मूर्ति को भी राम सुतार ने सुंदर तरीके से तैयार किया था. वे इससे पहले और बाद में संसद भवन में देश की कई शख्सियतों की स्थापित प्रतिमाओं को बना चुके हैं, जैसे-महात्मा गांधी, महाराजा रंजीत सिंह, ज्योतिराव फूले, छत्रपति साहू महाराज, पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, सरदार पटेल, जय प्रकाश नारायण वगैरह.
संसद भवन में उनकी चप्पे-चप्पे पर उपस्थिति हैं. उनके काम को बिना देखे कोई आगे नहीं बढ़ सकता. राम सुतार निस्संदेह आधुनिक भारतीय मूर्ति कला के सबसे महत्वपूर्ण नामों में से एक माने जाएंगे. सुतार के बारे में कहा जाता है कि वो पूरा शोध करने के बाद ही किसी प्रतिमा पर काम करना आरंभ करते हैं और अपनी शर्तों पर काम करते हैं.
तब एडवर्ड की मूर्ति हटी थी, लगी थी नेता जी की
बहरहाल, नेताजी की प्रतिमा को भारत के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक इंडिया गेट पर लगाने के निहितार्थ कुछ भी हों और उन पर तीखी बहस ज़रूर होगी. पर राजधानी में उनकी पहली प्रतिमा लुटियंस दिल्ली की बजाय लाल किले के पास 23 जनवरी 1975 को एडवर्ड पार्क में ही लग गई थी.
एडवर्ड ब्रिटेन के सम्राट ही थे और 1901 में महारानी विक्टोरिया के बाद गद्दी पर बैठे थे. ज़ाहिर है कि वहां पर नेताजी की मूर्ति लगने के बाद एडवर्ड पार्क का नाम हो गया सुभाष पार्क. इसके साथ ही सम्राट एडवर्ड की मूर्ति भी कोरोनेशन पार्क में भेज दी गई.
सुभाष पार्क में लगी मूर्ति में नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) के साथियों के साथ हैं. उसका अनावरण तब के उप राष्ट्रपति बी.डी. जत्ती ने किया था. इस मूर्ति को यहां पर स्थापित करने में कम से कम दस दिन लगे थे. मूर्ति लगने के कई दिनों के बाद तक दिल्ली में रहने वाले कई लोगों को इसके सामने हाथ जोड़कर खड़े रहते देखा जा सकता था.
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सुभाष पार्क में लगी मूरत को महाराष्ट्र के महान मूर्तिशिल्पी सदाशिवराव साठे ने बनाया था. महात्मा गांधी की राजधानी में पहली आदमकद प्रतिमा चांदनी चौक के टाउन हॉल के बाहर 1952 में लगी थी. उस नौ फीट ऊंची मूरत को भी सदाशिव राव साठे ने ही बनाया था. सदाशिव राव साठे का पिछले साल मुंबई में निधन हो गया था. वे 95 साल के थे. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उनके काम के अनन्य प्रशंसको में थे.
एडवर्ड से सुभाष पार्क- भगत सिंह के लिए गांधी की सभा
एडवर्ड पार्क (यानी सुभाष पार्क) में 7 फरवरी, 1931 को सारी दिल्ली से लोग एकत्र हो रहे थे. वजह भी खास थी- महात्मा गांधी को एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करना था.
वो सभा इसलिए आयोजित की गई थी ताकि गोरी सरकार पर दबाव डालकर भगत सिंह और उनके दोनों साथियों राजगुरु और सुखदेव को फांसी के फंदे से बचाया जाए.
सभा को संबोधित करते हुए गांधी जी ने कहा था "मैं किसी भी स्थिति में, किसी को फांसी की सज़ा देने को स्वीकार नहीं कर सकता हूं. मैं यह सोच भी नहीं सकता हूं कि भगत सिंह जैसे वीर पुरुष को फांसी हो."
महात्मा गांधी उन दिनों एडवर्ड पार्क के पास दरियागंज में कांग्रेस के नेता डॉ. एम.ए. अंसारी के घर में ही ठहरे हुए थे. डॉ.अंसारी बापू के निजी चिकित्सक थे. बापू उस दौरान ब्रिटिश वायसराय लार्ड इरविन से बार-बार भगत सिंह को फांसी के फंदे से मुक्ति दिलाने के लिए मिल रहे थे. इसी सिलसिले में वे 19 मार्च, 1931 को वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) में जाकर लार्ड इरविन से मिले.
इस मुलाक़ात केबाद उन्हें कांग्रेस के कराची में होने वाले सत्र में शिरकत करने के लिए निकलना था. पर वे जब कराची जाने के लिए पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो उन्हें खबर मिली कि भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई है. ये 23 मार्च,1931 की बात है.
इंडिया गेट का डिजाइन किससे प्रभावित
ड्यूक ऑफ़ कनॉट ने 10 फरवरी 1921 को वॉर मेमोरियल यानी इंडिया गेट का शिलान्यास किया था. ड्यूक ऑफ़ कनॉट के नाम पर ही कनॉट प्लेस का नाम रखा गया था. इसके लिए वृताकार प्रिंसेस पार्क के केन्द्र में स्थान चुना गया. सर एडवर्ड लुटियंस ने इसका और छतरी का डिजाइन एक साथ बनाया था.
इंडिया गेट का डिजाइन पेरिस में स्थित आर्क डी ट्रौम्फ़ स्मारक से प्रभावित है. इधर प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए सैनिकों का स्मारक है.
खैर, शिलान्यास के दस बरसों के बाद इंडिया गेट का 12 फरवरी, 1931 को उदघाटन हुआ. यह सबको पता है कि ये पहले विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में बना था. इंडिया गेट को लाल और धूसर रंग के पत्थरों और ग्रेनाइट से मिलकर बनाया गया है. इंडिया गेट के अंदर मौजूद लगभग 300 सीढ़ियों को चढ़कर आप इसके ऊपरी गुंबद तक पहुंचते हैं.
बॉलीवुड को प्यारा इंडिया गेट
अगर नेताजी की मूरत और अमर जवान ज्योति से हटकर बात करें तो इंडिया गेट बॉलीवुड की फिल्मों की शूटिंग के लिए बेहद मुफीद जगह रही है.
नामवर खेल कमेंटेटर गौस मोहम्मद इंडिया गेट से सटे हैदराबाद हाउस में गुज़रे 50 सालों से रहते हैं. उन्हें याद है जब इंडिया गेट में छतरी के पास 'रोटी, कपड़ा और मकान' फ़िल्म की शूटिंग हुई थी. उसमें मनोज कुमार और अमिताभ बच्चन को सैकड़ों लोग देख रहे थे.
जेसिका लाल हत्याकांड पर आधारित 'नो वन किल्ड जेसिका' फिल्म का एक बड़ा सीन भी इंडिया गेट पर ही शूट हुआ है, इस सीन में लोग कैंडल मार्च निकालते दिखते हैं.
इसके अलावा 'फना', 'रंग दे बसंती', 'जन्नत 2', 'बैंड बाजा बारात', 'चक दे इंडिया', 'न्यू दिल्ली टाइम्स' वगैरह की भी शूटिंग इधर ही हुई है. 'न्यू दिल्ली टाइम्स' में संपादक का किरदार निभा रहे शशि कपूर एक सीन में इंडिया गेट के गोल चक्कर पर अपनी फिएट कार चलाते हैं.
बढ़ती निगहबानी, दूर हुए खिलाड़ी
अब ये गुज़रे दौर की बातें हो गई है, जब इंडिया गेट में छुट्टी वाले दिनों में सैकड़ों बच्चे क्रिकेट खेला करते थे. यहां क्रिकेट की प्रेक्टिस करना अब लगभग असंभव हो गया.
यहां सुरक्षा का पहरा लगातार बढ़ता जा रहा है, इसलिए इंडिया गेट में अब पहले की तरह घूमना आसान नहीं रहा.
इंडिया गेट में दिल्ली की कई पीढ़ियों ने क्रिकेट खेली है. कीर्ति आज़ाद, अजय जडेजा, मनिंदर सिंह जैसे बड़े क्रिकेटरों ने इंडिया गेट के मैदानों में सालों तक प्रेक्टिस की है.
पर अब वहां के एक बड़े भाग में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के बनने के बाद क्रिकेट खेलना लगभग नामुमकिन-सा हो गया है. लंबे समय तक निज़ाम क्रिकेट चैंपियनशिप यहां ही हुआ करती थी. इसमें राजधानी, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बड़े क्रिकेट क्लब भाग लेते थे.
दिल्ली की रणजी ट्रॉफी और दिलीप ट्रॉफी टीम के कप्तान रहे वेंकट सुंदरम कहते हैं कि उन्होंने इंडिया गेट ग्राउंड में लंबे समय तक बैटिंग प्रैक्टिस की है. वहां पर ही उनके मद्रास कल्ब का नेट लगा करता था.
इंडिया गेट के वे पतंगबाज
इंडिया गेट में जमकर पतंगबाजी भी हुआ करती थी और अधिकतर पतंगबाज़ दिल्ली-6 के होते थे. ये छुट्टी वाले दिन सुबह से ही पतंग उड़ाना चालू कर देते थे.
ये अपने साथ आठ-दस पतंगें और मांजें की चरखड़ियां लेकर आते थे. हर एक पतंगबाज़ के साथ उसके एक-दो साथी भी होते थे. पतंगबाजों में शर्तें भी लगती थी. उस दौर में कमाल का समां बंधता था.
पतंगबाज़ी के मुकाबलों को देखने के लिए बहुत लोग इंडिया गेट आया करते थे. राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनने के बाद यहां से पतंगबाज़ों से लेकर चाय, चाट, गुब्बारे और दूसरा खाने का सामान बेचने वाले भी अब दूर हो गए हैं. और सवाल ये उठ रहा है कि क्या इंडिया गेट पर नेताजी की मूरत लगने के बाद इधर की सुरक्षा और कड़ी होगी?
पर, क्या नहीं बदला इंडिया गेट का?
इंडिया गेट का माहौल हाल के बरसों में बहुत बदलता रहा पर इंडिया गेट के गोल चक्कर पर रात 9 बजे के बाद का समां अब भी कमोबेश पहले जैसा ही है.
यहां की रातें बहुत हसीन होती हैं, जब यहां पर आइसक्रीम खाने वालों की भीड़ लग जाती है. हां, कमबख्त कोरोना ने इंडिया गेट से आइसक्रीम बेचने और खाने वालों को कुछ हद तक तो दूर कर दिया है.
इधर लगभग डेढ़-दो दर्जन आइसक्रीम बेचने वाले वैंडर रात के एक-डेढ़ बजे तक खड़े रहते हैं.
जब राजीव-सोनिया गांधी आते थे इंडिया गेट
राजीव गांधी 1980 से पहले बिलकुल किसी सामान्य इंसान की तरह जिंदगी बिता रहे थे. वे अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ अपनी फिएट या एम्बेसेडर कार में आइसक्रीम का आनंद लेने इंडिया गेट आया करते थे.
दोनों पति-पत्नी आइसक्रीम लेने के बाद इंडिया गेट के आसपास कुछ पल सुकून से गुजारते. ये उन दिनों की बातें हैं जब दिल्ली या देश आतंकवाद से दो-चार नहीं हुआ था.
खैर, इंडिया गेट में हो रहे बदलाव को गुज़रे लगभग साठ सालों से देख रहे डॉ रविन्द्र कुमार को अब इंतजार है उस दिन का जब यहां पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आदमकद प्रतिमा लगेगी.
उनका कहना है कि जिस दिन इंडिया गेट में नेताजी की उपस्थिति होगी उसी दिन वे अपने परिवार के साथ इंडिया गेट में जाएंगे.
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