केंद्र के प्रस्ताव पर किसानों की और स्पष्टीकरण की मांग, आंदोलन के भविष्य पर बैठक जारी

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संयुक्त किसान मोर्चा ने मंगलवार को एक बैठक के बाद यह जानकारी दी कि सरकार की ओर से उन्हें उनकी मांगों को लेकर एक प्रस्ताव दिया गया है. मोर्चे ने इस पर चर्चा की और बताया कि सरकार के प्रस्ताव पर फ़िलहाल कोई सहमति नहीं बनी है और यह बैठक अभी बुधवार को जारी रहेगी.
पिछले 15 महीनों से आंदोलन कर रहे किसानों के संगठन संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि उसे सरकार के प्रस्ताव पर और स्पष्टीकरण की आवश्यकता है. संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि इस संबंध में सरकार को पत्र भेजा जाएगा और फिर उनके जवाब पर बुधवार को चर्चा होगी. किसान नेताओं ने कहा कि पहली बार सरकार ने लिखित प्रस्ताव भेजा है.
संयुक्त किसान मोर्चा ने अपनी बैठक के बाद कहा, "सरकार ने हमें एक प्रस्ताव भेजा है, हमारी पांच सदस्यीय समिति ने उस पर विचार किया. सरकार के प्रस्ताव पर पूरी तरह से सहमति नहीं बनने पर हमारी बैठक बुधवार को फिर होगी."
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किसानों की आपत्तियां
संयुक्त किसान मोर्चा के नेता युद्धवीर सिंह ने बताया, "पाँच सदस्यीय कमेटी की एक बहुत महत्वपूर्ण बैठक हुई. उसमें सरकार की तरफ़ से प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा हुई. उस प्रस्ताव पर संयुक्त किसान मोर्चा के साथियों के साथ बैठक हुई, चर्चा हुई. कुछ साथियों को प्रस्ताव पर स्पष्टीकरण चाहिए था."
केंद्र सरकार ने आंदोलन कर रहे किसानों को उनकी मांगों को लेकर लिखित आश्वासन दिया है. इन आश्वासनों में एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के लिए क़ानूनी गारंटी भी शामिल है.
केंद्र सरकार ने किसान संगठनों से कहा है कि वो एमएसपी के मुद्दे पर एक समिति का गठन करेगी. इस कमेटी में केंद्र और राज्यों के अधिकारी रहेंगे.
साथ ही विशेषज्ञों और संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा. हालाँकि किसान नेताओं को लगता है कि सरकार उन संगठनों को भी इस कमेटी में शामिल करेगी, जो कृषि क़ानून को सही मानते थे.
एमएसपी पर कमेटी के बारे में यह कहा गया है कि "उसमें किसान संगठन और संयुक्त किसान मोर्चे के नुमाइंदे भी होंगे. इस पर हमें आपत्ति है. एक साल तक आंदोलन संयुक्त किसान मोर्चा ने लड़ा है. हमारी आपत्ति ये है कि उन किसान संगठनों को भी शामिल किया जाएगा जो इसका हिस्सा नहीं थे."

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इसके अलावा हरियाणा और यूपी में सुरक्षाबलों के साथ हिंसक संघर्ष का मामला भी है. केंद्र सरकार किसानों के ख़िलाफ़ सभी पुलिस केस को वापस लेने पर भी सहमत हो गई है.
लेकिन सरकार ने कहा है कि आंदोलन वापस लेने के बाद ही वे केस वापस लेंगे. किसान नेताओं को इस पर आपत्ति है.
संयुक्त किसान मोर्चा ने बैठक के बाद कहा कि, "इस पर कई साथियों को संदेह है कि यह प्रक्रिया कब होगी. अकेले हरियाणा में 48,000 केस चल रहे हैं, यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश में भी मुक़दमे दर्ज हैं. देश भर में रेल विभाग के सैकड़ों मुक़दमे हैं. समयबद्ध तरीक़े से इसे वापस लिया जाना चाहिए."
"वहीं मुआवज़े के बारे में सरकार ने सैद्धांतिक रूप से कहा है कि मुआवज़ा मंज़ूर है. हम चाहते हैं कि पंजाब सरकार ने जो मॉडल दिया है कि हर किसान के परिवार को पांच लाख का मुआवज़ा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी, वो देनी चाहिए."
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इसके अलावा पराली जलाने से जुड़ा मामला भी है.
इन्हीं सब मुद्दों पर किसान नेताओं ने केंद्र से स्पष्टीकरण मांगा है.

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एक साल से दिल्ली के बॉर्डर पर डटे हैं किसान
बीते एक साल से भी अधिक समय से पंजाब, हरियाणा के हज़ारों किसान राजधानी दिल्ली से सटी सीमाओं पर विवादास्पद तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की मांग पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. उन्हें देश भर के किसानों, ख़ास कर यूपी के किसानों का भारी समर्थन मिला.
हालांकि इस वर्ष प्रकाश पर्व के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से माफ़ी मांगते हुए तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने की घोषणा की और संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान सरकार ने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस ले लिया.
लेकिन कृषि उपज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य को क़ानूनी रूप से लागू करने और किसानों पर दर्ज सभी मुक़दमों (धारा 302 और 307 के केस छोड़कर) को वापस लेने की मांग पर किसानों ने दिल्ली की सीमा पर डटे रहने का फ़ैसला किया. इस दौरान दो दिन पहले ही किसानों ने एक पांच सदस्यीय समिति भी बनाई है जो सरकार के साथ उनके किसी भी मुद्दे पर बात करेगी.
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क्या है किसानों की मांग?
तीन कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने का स्वागत करते हुए संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली की सीमा से वापस लौटने को लेकर कहा था कि उनकी कुछ और मांगे हैं उसे पूरा किए जाने के बाद ही किसान अपने अपने घर लौटेंगे.
जिन मांगों पर किसान अब भी दिल्ली बॉर्डर पर डटे हैं उनमें सबसे अहम एमएसपी की गारंटी की मांग है.
इसके अलावा किसान आंदोलन के दौरान जिन किसानों पर दिल्ली, यूपी और हरियाणा में मुक़दमे दर्ज किए गए हैं, (धारा 302 और 307 के केस छोड़कर) उन्हें भी वापस लेने की मांग की गई है.
साथ ही आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों के परिवारों को मुआवज़ा दिए जाने की मांग भी है.
इसके अलावा बिजली बिल 2020 को रद्द किए जाने की मांग और पराली जलाने पर होने वाली कार्रवाई को रोकने की मांग भी की गई है.
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