मोदी सरकार हमारे बीच फूट डालने की कोशिश कर रही है- किसान संगठनों का आरोप

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कृषि क़ानूनों को लेकर आंदोलन कर रहे किसान संगठनों ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार 'पीछे के दरवाज़े से' कुछ किसान नेताओं से संपर्क कर रही है और उन्हें आंदोलन ख़त्म करने के लिए "प्रलोभन" भी दे रही है.

उनका ये भी आरोप है कि संयुक्त किसान मोर्चा से सीधे तौर पर संपर्क करने की बजाय, सरकार किसानों के बीच 'फूट डालने' की कोशिश में लगी हुई है.

संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं का कहना है कि जिन संगठनों से सरकार संपर्क कर रही है उनमें से कुछ पंजाब के हैं जहाँ विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं.

मोर्चा के रणनीतिकारों का कहना है कि कुछ एक संगठन चुनावों में शामिल होना चाहते हैं, इसलिए ये बातें आ रही हैं.

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत का कहना है कि मोर्चा के घटक कई किसान संगठन ज़रूर हैं. लेकिन रणनीति का फ़ैसला कोई एक संगठन या कुछ चुनिंदा संगठन नहीं कर सकते. इसके लिए आम सहमति की ज़रूरत होती है.

वहीं मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य अवीक साहा ने बीबीसी से बात करते हुए ये ज़रूर स्वीकार किया कि पंजाब के कुछ संगठनों ने ये इच्छा ज़ाहिर की है कि बाकी मांगों को लेकर आंदोलन जारी रहे, मगर धरना ख़त्म कर दिया जाना चाहिए.

सभी संगठन इस पर एकमत नहीं हैं.

वे कहते हैं, "जो जाना चाहते हैं वो जा सकते हैं उनपर कोई रोक नहीं है. कई किसान संगठन ऐसे हैं जो राजनीति या चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेते हैं और सिर्फ़ किसानों के मुद्दों को लेकर काम करते हैं. लेकिन ये भी सही है कि कुछ किसान संगठन चुनावी प्रक्रिया में बढ़ चढ़ कर शामिल भी होते हैं. चूँकि पंजाब में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं तो कुछ ऐसे ही संगठन चाहते हैं कि वो उसमे शामिल हों. उनके लिए कोई रोक नहीं है."

"आंदोलन को कुचलने का काम"

संयुक्त किसान मोर्चा की अगली बैठक शनिवार को बुलाई गई है, लेकिन उससे पहले ही धरने को लेकर किसान संगठनों के बीच मतभेद नज़र आने शुरू हो गए हैं.

अवीक साहा कहते हैं, "सरकारें हमेशा मतभेद पैदा कर आंदोलनों को कुचलने का काम करती रहीं हैं. वो अब भी वैसा ही कर रही हैं. लेकिन वो अपने प्रयास में सफल नहीं हो पाएंगी क्योंकि जिन मुद्दों को लेकर आन्दोलन इतना लंबा चला वे (मुद्दे) हर किसान के लिए ज़िंदगी और मौत का सवाल हैं. किसानों का कोई भी संगठन हो,किसी भी राज्य का क्यों न हो, सभी संगठन बुनियादी मांगों पर अडिग हैं."

उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि धरना समाप्त करने को लेकर पंजाब के कुछ किसान संगठनों ने बैठक भी की है, लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया है. वे ये भी कहते हैं कि किसान संगठनों की राज्यों में भी समन्वय समितियां हैं जो अपने प्रस्ताव राष्ट्रीय समन्वयक समितियों को भेजती हैं. उन प्रस्तावों पर फिर विचार किया जाता है और रणनीति तय की जाती है.

मंगलवार को सरकार ने कुछ किसान संगठनों से संपर्क किया था और उनसे न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर प्रस्तावित समिति में अपने पांच प्रतिनिधियों के नाम प्रस्तावित करने को कहा था.

लेकिन, भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत इसे 'सिर्फ़ हवाबाज़ी' कहते हैं. वो कहते हैं कि जब आन्दोलन संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले चलाया जा रहा है तो सरकार को चाहिए था कि वो मोर्चा से ही संपर्क स्थापित करती न कि अलग से कुछ किसान संगठनों के नेताओं से.

उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर क़ानून की मांग के अलावा जितने मामले किसानों पर दर्ज किये गए हैं वो जबतक वापस नहीं लिए जाते हैं तब तक किसान अपनी जगहों पर डटे रहेंगे. उनका आरोप है कि आंदोलन के दौरान 50 हज़ार किसानों पर मामले दर्ज किये गए हैं जिनमें सबसे ज़्यादा मामले सिर्फ़ हरियाणा में दर्ज हुए हैं.

वहीं आवीक साहा कहते हैं कि इनमें से कई मामले झूठे भी हैं. उन्होंने ख़ुद पर दर्ज हुए मामले का उदहारण देते हुए कहा कि जिस प्रदर्शन में वो शामिल ही नहीं हुए थे उसके संबंध में दायर प्राथमिकी में उनका भी नाम दर्ज किया गया है.

वे कहते हैं कि किसानों के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा मामले भाजपा शासित राज्यों और राजधानी दिल्ली में दर्ज किए गए हैं.

"बरगलाने की कोशिश बंद करे सरकार"

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि सरकार 'किसानों को बरगलाने की कोशिश' बंद कर दे क्योंकि इससे कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है.

मंगलवार को सरकार के प्रतिनिधियों ने पंजाब के एक किसान संगठन - जम्हूरी किसान सभा - से संपर्क कर उनसे पांच प्रतिनिधियों के नाम मांगे थे जिन्हें सरकार की समिति में शामिल किया जाएगा.

इस संगठन के कुलवंत सिंह संधू ने बाद में स्पष्ट किया कि कृषि क़ानूनों की वापसी हो गई है और अगर किसानों पर दर्ज मामले वापस ले लिए जाएँ और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर क़ानून बन जाए तो किसान अपने घर लौट जाएंगे.

मोर्चे की अगली बैठक 4 दिसंबर को

ये कहा जा रहा था कि बुधवार को ही किसान संगठनों की संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले सरकार के प्रस्ताव पर बैठक होगी. लेकिन ये बैठक नहीं हुई क्योंकि मोर्चा का कहना है कि सरकार ने उनसे कोई संपर्क तो नहीं ही किया है बल्कि उस चिट्ठी का जवाब भी अभी तक नहीं दिया है जो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बिल वापसी की घोषणा के बाद सरकार को भेजी थी.

अब मोर्चा की बैठक, पहले से तय की गयी तारीख़, यानी 4 दिसंबर को ही होगी.

इसकी पुष्टि करते हुए अवीक साहा का कहना था कि बैठक में तय होगा कि किसान संगठनों के प्रतिनिधि क्या चाहते हैं. सबकी सर्वसम्मति के बाद ही कोई फ़ैसला होगा और आगे की रणनीति भी तय की जाएगी.

लेकिन, वो कहते हैं कि इतना तो तय है कि जो समिति सरकार गठित करना चाहती है वो सिर्फ़ और सिर्फ़ न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर ही हो न कि उसमें दूसरे मुद्दे भी जोड़ दिए जाएँ.

बीबीसी से उनका ये भी कहना था कि दूसरे मुद्दों के लिए अलग समितियाँ बनाई जा सकती हैं लेकिन एमएसपी पर समिति बिल्कुल अलग होनी चाहिए.

अभी तक सरकार की तरफ़ से इन मांगों को लेकर रुख स्पष्ट नहीं किया गया है, सिवाय केंद्रीय कृषि मंत्री के इस आश्वासन के कि एमएसपी को लेकर सरकार गंभीर है.

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