कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने के फ़ैसले पर बोले किसान, अब राम और राष्ट्र के नाम पर नहीं बटेंगे...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह राष्ट्र को संबोधित करते हुए तीनों विवादित कृषि क़ानूनों को रद्द करने का एलान किया है.

उन्होंने कहा है, "आज मैं आपको, पूरे देश को, ये बताने आया हूँ कि हमने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है. इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में, हम इन तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे."

ये एक ऐसा मुद्दा था जिसकी वजह से केंद्र सरकार और किसानों के बीच बीते एक साल से तनातनी जारी थी.

बीती 26 नवंबर से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत कई प्रदेशों के किसान दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

इसके साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों में भी किसानों की ओर से सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं.

केंद्र सरकार का फ़ैसला

इस दौरान केंद्र सरकार ने आंदोलन ख़त्म कराने के तमाम प्रयास भी किए लेकिन किसानों का आंदोलन जारी रहा.

और आख़िरकार 19 नवंबर को केंद्र सरकार ने इन तीनों कानूनों को वापस लेने का फ़ैसला कर लिया है.

इसके साथ ही पीएम मोदी ने किसानों से आग्रह किया है कि वे अपने-अपने घर लौट जाएं.

इस फ़ैसले पर देश भर से किसानों, किसान नेताओं की ओर से मिलीजुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं.

बीबीसी ने भी आंदोलन के केंद्र बिंदू रहे गाज़ीपुर बॉर्डर से लेकर अलग-अलग इलाकों के किसानों एवं आम लोगों की प्रतिक्रियाएं ली हैं.

'जब लिखित रूप से रद्द होगा तभी मानेंगे'

बीबीसी संवादाता सलमान रावी ने गाज़ीपुर बॉर्डर पर आम किसानों के बीच जाकर ये समझना चाहा कि पीएम मोदी के इस एलान को वे किस तरह देखते हैं.

यहां मौजूद एक किसान सुरेन्द्रपाल कहते हैं, "हमने जितने दर्द झेले हैं, अभी हम ख़ुश नहीं हो सकते. और जिस संसद से ये क़ानून बने है जब उसी संसद से आधिकारिक तौर पर लिखित रूप में घोषणा होगी तभी हम मानेंगे कि क़ानून रद्द हो गए हैं."

यहीं मौजूद एक अन्य किसान संजय ने पीएम मोदी के उस बयान पर अपनी टिप्पणी दी जिसमें पीएम मोदी ने कहा था कि किसान इन कृषि कानूनों को समझ नहीं पाए या सरकार उन्हें समझा नहीं पाई.

संजय ने कहा कि उनका ये स्टेटमेंट ही उनको झूठा साबित करता है. असल बात ये है कि वो समझ गए हैं कि किसानों को ये क़ानून समझ में आ गए हैं. अब इन्हे मीठे-मीठे शब्दों से या राम और राष्ट्र के नाम पर बाँट कर नहीं बहकाया जा सकता है."

उन्होंने कहा कि "ये जीत की तरफ़ एक छोटा सा क़दम है. हमारी लड़ाई जिन पूँजीपतियों से है वो अपनी फ़ौज फिर बिठाएंगे. संयुक्त किसान मोर्चा की एमएसपी की मांग भी अभी पूरी नहीं हुई है, अगर वो इसमें एमएसपी को और उन सात सौ आठ सौ मरने वाले किसानों के बच्चों को भी सहारा दे देते, तो इस गुरुपर्व में और भी चार चाँद लग जाते, तब पता चलता कि मोदी जी का दिल मानवता के लिए भी धड़कता है."

'नासूर बन गया था आंदोलन'

बीबीसी के सहयोगी अनंत झणाणे ने सरकार के इस फ़ैसले की ख़बर मिलने के बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कुछ लोगों से बात की है.

लख़नऊ के रहने वाले रविश कुमार अग्रवाल ने कहा कि "किसान आंदोलन की वजह से लोगों को हॉस्पिटल पहुँचने में मुश्किल हो रही थी. इस आंदोलन की वजह से वहां इंडस्ट्री बंद हो गई हैं, ये आंदोलन अब नासूर बन गया था सरकार ने क़ानून रद्द करने का फ़ैसला बहुत सही लिया है. सरकार की नियत में कोई फ़र्क़ नहीं था, लेकिन विपक्ष ने इसको ऐसी हवा दी कि उन्हें मजबूरन इसे वापिस लेना पड़ा."

एक और व्यक्ति ने कहा कि "ये विपक्ष का प्रोपेगैंडा था सरकार अच्छा करे या ग़लत विपक्ष को तो बस विरोध करना है, ये किसानों की बदक़िस्मती है कि ये क़ानून वापस हो गए."

'सब पूछ रहे हैं कि घर कब जाओगे?'

वहीं, आंदोलन के गढ़ रहे सिंघु बॉर्डर पर मौजूद एक किसान ने बीबीसी संवादाता सलमान रावी से कहा कि "हर कोई हमसे यही सवाल कर रहा है कि हमारी घर वापसी कब होगी, तो हम घर वापस तभी जाएंगे जब संसद से क़ानून रद्द करके हमें भरोसा दिलाया जायेगा और क़ानून बना कर एमएसपी की गारंटी दी जाएगी."

"इसके अलावा हमारे किसान भाइयों के ऊपर जो मुक़दमे चल रहे हैं, उनका क्या होगा, इन सबके बाद ही ये आंदोलन पूरे तौर पर खत्म होगा. अभी तो उप चुनाव के रिज़ल्ट और वोट बैंक खिसकने के दबाव में इन्होने ये फैसला किया हैं.

उन्होंने कहा कि 'लोग ये भी सवाल कर रहे हैं, कि अब तो क़ानून वापस हो गए हैं अब भी किसान क्यों आ रहे हैं, तो इसका जवाब ये है कि हमने एक साल इन सड़कों पर गुज़ारा है, हमारे सात सौ साथी शहीद हुए हैं. ये आधी अधूरी जीत है जब तक हमारी सारी मांगे पूरी नहीं होती, तब तक हम वापस नहीं जायेंगे.'

वहीं, लखीमपुर खीरी में मौजूद बीबीसी संवादाता अनंत झणाणे से एक किसान मनोहर सिंह ने कहा कि देर से मिला न्याय अहम नहीं होता है, वो शून्य के बराबर होता है. सरकार किसानों की इतनी शहादतों के बाद, बैकफ़ुट पर आई है. और यह भी अधूरा न्याय है, जब तक एमएसपी का क़ानून नहीं बनता तब तक ये न्याय अधूरा है.'

'एमएसपी से कम पर फसल न बिके तब सफल होगा आंदोलन'

लखीमपुर खीरी की घटना पर एक किसान ने कहा कि 'हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज प्रदीप कुमार श्रीवास्तव को लखीमपुर खीरी मामले में न्यायिक अधिकारी बनाया गया है. मैं समझता हूँ कि उनके आने से ये पूरी प्रक्रिया विधिवत न्यायिक तरीक़े से पूरी होगी. इसके अलावा आज प्रधानमंत्री जी ने जो आज ये तीन काले क़ानूनों को वापस लिया है, इसके लिए मैं उनको बधाई देता हूँ. लेकिन ये अभी अधूरा है, क्योंकि एक तो इसका संसद में बिल पास होना है जब दोनों सदनों से ये पास हो जायेगा तब ये लीगल तरीके से वापस माना जायेगा.'

'दूसरी जो सबसे बड़ी समस्या है जैसे कि मोदी जी कहते थे कि एमएसपी थी एमएसपी है और रहेगी. इसका किसानों को फ़ायदा नहीं मिल रहा है. इसकी गारंटी का क़ानून पास होना चाहिए कोई भी आढ़ती, कोई भी मिल मालिक, कोई भी दुकानदार, कोई भी ठेकेदार एमएसपी से कम पर फ़सल न ले, न्यूनतम से बोली शुरू हो और अधिक लगाए, तभी हमारा ये किसान आंदोलन सफल होगा. जब तक एमएसपी का क़ानून नहीं बनता तब तक ये आंदोलन ख़त्म नहीं होगा.'

एक और किसान ने कहा कि 'ये काम बहुत दिन पहले हो जाना चाहिए था. इसमें एक साल क्यों लग गया. साढ़े सात सौ से ज़्यादा जानें चली गईं, उसके एक साल बाद ये क़ानून वापस लिए गए और माफ़ी मांगी गई. माफ़ी मांगी है अच्छी बात है हम इसकी सराहना करते हैं, लेकिन बहुत समय लगा कर ये काम किया गया. ये पहले कर देना चाहिए था.'

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