महात्मा गांधी: क्या राष्ट्रपिता अब नोटों और सजावटी सामानों तक ही सिमटकर रह जाएंगे?

    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी बांग्ला, दिल्ली

भारत में आजादी के बाद अहिंसा और सत्याग्रह के मसीहा मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता का सम्मान दिया गया.

लेकिन आज के भारत में, खासकर भाजपा के बीते साढ़े सात साल के शासनकाल में गांधी के विचार और उनके आदर्श इस देश में अब कितना मायने रखते हैं, इस सवाल को बार-बार उठाया गया है.

हाल ही में राष्ट्रपिता की 150वीं जयंती थोड़ी सादगी के साथ ख़त्म हुई है.

दूसरी ओर गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की पूजा और तारीफ खुलेआम की जा रही है. तमाम हिंदुत्ववादी ताक़तें, यहां तक कि भाजपा सांसद भी गोडसे-वंदना में शामिल हैं. बॉलीवुड ने इस साल गांधी जयंती पर गोडसे की बायोपिक बनाने का भी एलान किया है.

क्या आज के भारत में मोहनदास करमचंद गांधी की राष्ट्रपिता की पहचान खत्म हो रही है?

गोडसे पूजा की धूम

हिंदू महासभा, जिसके सदस्य गांधी हत्याकांड के साजिशकर्ता थे, अभी भी मध्य भारत के ग्वालियर में सक्रिय है. उस क्षेत्र में उसका काफी असर भी है.

एक साल पहले ग्वालियर में इसके कार्यालय में गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की मूर्ति लगाई गई थी.

15 नवंबर, 1949 को गांधी की हत्या के आरोपी नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे को अंबाला सेंट्रल जेल में फांसी दी गई.

हिंदू महासभा हर साल इस दिन को 'बलिदान दिवस' के तौर पर मनाती है- मंदिर में पूजा भी की जाती है. दोनों मराठी पुरुषों की मूर्तियों को दूध और घी से धोया जाता है.

हिंदू महासभा उस दिन मीडिया को फोन करना और बताना नहीं भूलती कि उन्हें 'शहीद' नारायण आप्टे और 'शहीद' नाथूराम गोडसे के प्रति सम्मान जाहिर करने के लिए उनका मंदिर बनाने पर गर्व है.

हालांकि भारत में किसी देवता की पूजा करना दंडनीय अपराध नहीं है, लेकिन कुछ साल पहले तक भारत में राष्ट्रपिता के हत्यारे को इस तरह खुले तौर पर श्रद्धांजलि देना कल्पना से परे था.

लेकिन अब इसी तरह की घटनाएं देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रही हैं, खुलकर कहा जा रहा है कि गोडसे ने देश को कितना फ़ायदा पहुंचाया.

भाजपा नेता का प्रमाण पत्र

पिछले आम चुनाव के दौरान भोपाल से भाजपा उम्मीदवार प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने गोडसे को 'देशभक्त' कहने में भी संकोच नहीं किया.

चरमपंथ से जुड़े मामले में जेल से जमानत पर बाहर आई यह नेता बाद में सांसद और रक्षा मामलों की संसदीय समिति की सदस्य बन गईं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वह गोडसे के बारे में उस बयान के लिए प्रज्ञा ठाकुर को कभी माफ नहीं करेंगे- लेकिन हकीकत में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई.

भगवा कपड़े पहनने वालीं साध्वी जो वर्तमान में सांसद हैं, ने बाद में संसद में खड़े होकर गोडसे को देशभक्त करार दिया.

'महान' नाथूराम गोडसे ने किस तरह कोर्ट के सामने 'गांधी-वध' के आरोप पर अपना पक्ष रखा, ऐसी ढेरों पोस्ट लगातार फेसबुक या व्हाट्सऐप पर शेयर की जा रही हैं.

और हिंदू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर को भाजपा शासन के दौरान एक राष्ट्रीय नायक का दर्जा दिया जा रहा है.

एक दशक पहले, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तत्कालीन भाजपा सरकार ने अंडमान में पोर्ट ब्लेयर हवाई अड्डे का नाम बदलकर 'वीर सावरकर' कर दिया था.

'गोडसे के प्रशंसक मुख्यधारा के लोग नहीं हैं'

भाजपा के पॉलिसी रिसर्च सेल के सदस्य और नीतिकार अनिर्बान गांगुली का दावा है कि गोडसे की तारीफ करने वालों का भाजपा की मुख्यधारा से कोई लेना-देना नहीं है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "गोडसे की स्वीकृति या आकर्षण हमेशा एक वर्ग के भीतर रहा है."

"उन्होंने गांधी को क्यों मारा, इस पर गोडसे ने अपना तर्क रखा था- कुछ उनसे सहमत हो सकते हैं, कुछ उनके खिलाफ हो सकते हैं."

गांगुली का कहना है कि, "गोडसे को राष्ट्रभक्त मानना लोगों पर निर्भर करता है. लेकिन आजकल सोशल मीडिया के चलन से वे बातें सबको पता चल रही हैं, जो पहले लोगों को पता भी नहीं थीं. लेकिन क्या इसे मुख्यधारा की सोच कहा जा सकता है? कभी नहीं."

वह कहते हैं, "भाजपा ने कभी गोडसे की पूजा नहीं की, ऐसा कुछ 'समाज से बाहर के लोग' कर रहे हैं. और खुद गोडसे ने अपनी जिंदगी में ही हिंदू महासभा या सावरकर को भी नकार दिया था."

'भाजपा का डीएनए गोडसे समर्थक'

लेकिन भारत के पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह और अब तृणमूल कांग्रेस के सांसद जवाहर सरकार का कहना है कि भाजपा-आरएसएस-जनसंघ-हिंदू महासभा और गोडसे-सावरकर का दर्शन असल में एक दूसरे से जुड़ा हुआ है.

वह कहते हैं, "गोडसे अपने शुरुआती जीवन में आरएसएस के सदस्य थे, लेकिन बाद में ज्यादा चरमपंथी संगठन हिंदू महासभा में चले गए."

जवाहर सरकार का कहना है कि, "उस समय सावरकर खुद हिंदू महासभा का कामकाज देखते थे. नतीजतन गोडसे में दो जींस हैं- आरएसएस और हिंदू महासभा का.

"और इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा का डीएनए सावरकर समर्थक या गोडसे समर्थक है- यही वजह है कि मोदी जब भी सावरकर की मूर्ति देखते हैं दंडवत हो जाते हैं और पूजा करते हैं."

जवाहर सरकार के अनुसार, अगर आप सावरकर के लेखन और बयानों को पढ़ेंगे, तो आप समझ जाएंगे कि वह गांधी विरोधी, शांति विरोधी शख्स हैं.

"पहले तो वे स्वतंत्र भारत की राजनीतिक धारा में शामिल नहीं होना चाहते थे. बाद में उन्होंने 1953 में जनसंघ पार्टी बनाई. और अगर उन्हें राजनीति में रहना है, तो उन्हें लोगों को दिखाने के लिए कुछ रस्मो-रिवाज निभाना ही होगा. उनकी गांधी-पूजा भी ऐसी ही है."

जवाहर सरकार ने बीबीसी से कहा, "फिर भी वे गोडसे या सावरकर के बारे में लगातार बात करते रहेंगे."

'किसान आंदोलन में हैं गांधी'

लेकिन अगर नाथूराम गोडसे की तारीफ को सामाजिक रूप से स्वीकार्यता मिल रही है तो क्या इसका मतलब यह है कि देश भी महात्मा गांधी को भुला रहा है?

देश की जानी-मानी इतिहासकार और नेहरू मेमोरियल म्यूजियम की पूर्व प्रमुख मृदुला मुखर्जी इसका सीधा जवाब देती हैं:

"तथ्य यह है कि इस देश के किसान पिछले एक साल से गांधी के दिखाए सत्याग्रह और अहिंसक विरोध के रास्ते पर चल रहे हैं, यह दर्शाता है कि गांधी उनको याद हैं."

भले ही गांधी का आदर्श किसी के मन में न हो, लेकिन जिस तरह से उनके हत्यारे को आज स्वीकार किया जा रहा है, मृदुला मुखर्जी इसे किसी कीमत पर कुबूल करने को तैयार नहीं हैं.

वह कहती हैं, "पूरी घटना हकीकत से परे, दुखद और अक्षम्य है."

वह सवाल करती हैं, "आप एक हत्यारे की पूजा कैसे कर सकते हैं जिसे अदालत में मौत की सजा सुनाई गई है? तब तो गांधी की हत्या सही है, ऐसा ही है ना? और गोडसे को लेकर इस तरह की बातें करने वालों के खिलाफ क्या कोई कार्रवाई की गई?"

हकीकत यह है कि, भारत में कहीं भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई. गांधी के परपोते और लेखक-शोधकर्ता तुषार गांधी कहते हैं कि इसमें कोई अचंभे की बात नहीं है.

'महात्मा गांधी फाउंडेशन' के अध्यक्ष तुषार गांधी ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "जो लोग जानते हैं कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर और नरेंद्र मोदी एक ही विचार और विचारधारा से आते हैं, उन्हें हैरानी नहीं होगी."

तुषार गांधी कहते हैं, "पहले भी गोडसे की छिपे तौर पर पूजा की जाती थी, लेकिन जब वे देख रहे हैं कि देश की सरकार भी उनकी ही विचारधारा को मानती है, तो वे अब ऐसा खुलकर कर रहे हैं. कायर लोग हमेशा ऐसा ही करते हैं."

गांधी, गोडसे और बॉलीवुड

राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी की 150वीं जयंती पर बॉलीवुड सितारों से सजी महफिल में मोदी दिखे.

प्रधानमंत्री के आह्वान पर उस दिन आमिर खान-शाहरुख खान से लेकर कंगना रनौत-आलिया भट्ट-सोनम कपूर तक सभी एक छत के नीचे आए.

इनमें से कई सितारे फेस्टिवल के सरकारी विज्ञापन में भी दिखे.

नरेंद्र मोदी ने बॉलीवुड से गांधी की विचारधारा पर फिल्म बनाने का भी आग्रह किया- लेकिन एक भी फिल्म बाजार में नजर नहीं आई.

इसके उलट इस साल गांधी जयंती पर घोषणा आई है कि बॉलीवुड प्रोड्यूसर महेश मांजरेकर गोडसे की जिंदगी पर एक फिल्म बनाएंगे. उन्होंने सावरकर की बायोपिक भी बनाई है.

महेश मांजरेकर ने एक बयान में कहा कि नाथूराम गोडसे की कहानी हमेशा उनकी पसंदीदा रही है- और गोडसे "ना सही था, ना गलत." वह चाहते हैं कि दर्शक उनकी फिल्म देखने के बाद फैसला करें.

गोडसे की बायोपिक बनाने के ट्वीट के साथ उन्होंने गांधी का पसंदीदा भजन "रघुपति राघव राजा राम" पोस्ट किया है.

हालांकि, यह जानना मुश्किल नहीं है कि गांधी या गोडसे किसके नजरिये से कहानी कहने की कोशिश करेंगे.

नरेंद्र मोदी और गांधी की गुजराती पहचान

भारत के पूर्व सांस्कृतिक सचिव और प्रसार भारती बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जवाहर सरकार को लगता है कि नरेंद्र मोदी को असल में मोहनदास गांधी की गुजराती पहचान की परवाह नहीं है.

जवाहर कहते हैं, "वे गांधी से पूरी तरह निजात नहीं पा सकते क्योंकि गांधी को जिंदा रखने का एक राजनीतिक फायदा है- इसमें सभी की दिलचस्पी है."

"दूसरी वजह गुजरात को लेकर मोदी का पक्षपाती होना है. हालांकि वे देश के प्रधानमंत्री हैं, मगर बेशर्मी से गुजरात समर्थक रुख दिखाते हैं, मानो उस राज्य में सब कुछ अच्छा है. और गांधी भी गुजराती हैं, ऐसे में वह उन्हें एकदम बाहर भी नहीं कर सकते हैं. गांधी गुजराती थे, और मैं भी हूं- बस इतनी सी बात है!"

जवाहर सरकार कहते हैं, "इन्होंने गांधी की 150वीं जयंती भी बेहद सादगी के साथ मनाई... जब मैं संस्कृति मंत्रालय में था सरकार ने रवींद्रनाथ-विवेकानंद जयंती भी भव्य अंदाज में मनाई थी, गांधी के मामले में इसका एक प्रतिशत भी नहीं किया गया."

बीजेपी ने गांधी को सम्मान दिया

लेकिन तब क्या पिछले साढ़े सात साल में मोदी सरकार ने गांधी की विचारधारा को लागू करने के लिए कुछ किया है?

भाजपा नेता अनिर्बान गांगुली के अनुसार, आलोचक जो भी कहें- उन्होंने असल में पिछली कांग्रेस सरकारों के मुकाबले मोहनदास गांधी के प्रति कहीं ज्यादा सम्मान दिखाया है.

वह कहते हैं, "कांग्रेस ने उन सभी जगहों को संरक्षित करने के लिए क्या किया है जहां गांधी गए या देश में रहे? गांधी ने तो कांग्रेस पार्टी को भंग कर देने के लिए कहा था."

"1917 में गांधीजी ने स्वच्छता की बात करते हुए तर्क दिया था कि अगर हम अपने परिसर, घरों, शहरों और गांवों को साफ नहीं रख सकते हैं, तो हम स्वराज को चलाने में सक्षम नहीं होंगे.

"आज, भाजपा सरकार ने उनको श्रद्धांजलि के रूप में 'स्वच्छ भारत अभियान' शुरू किया है. यह कार्यक्रम बहुत सफल रहा है.

"गांधीजी के साबरमती आश्रम को अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से संवारा जा रहा है ताकि लाखों दर्शक वहां आ सकें- और यह नरेंद्र मोदी सरकार ने ही शुरू किया है."

अनिर्बान गांगुली का दावा है कि भाजपा ने न केवल स्वच्छता अभियान के 'लोगो' में बल्कि गांवों में शौचालय बनाकर और खादी ब्रांड को नया जीवन देकर राष्ट्रपिता को नया दर्जा दिया है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "गांधी जी हमेशा शौचालयों की सफाई खुद करने की बात करते थे- उनके फीनिक्स, साबरमती या वर्धा आश्रम में यही नियम था."

अनिर्बान गांगुली याद दिलाते हैं कि कांग्रेस पार्टी के सत्र में शौचालयों से गंदा पानी निकलता देख महात्मा गांधी ने वहां सफाई की प्रथा शुरू की थी.

"तो कोई यह नहीं पूछ रहा है कि उनकी विचारधारा का झंडाबरदार होने का दावा करने वाली पार्टी आजादी के बाद इतने सालों तक देश के दूरदराज इलाकों या ग्रामीण इलाकों में शौचालय क्यों नहीं बना पाई है."

"और खादी को मत देखो..वह खादी जिसे हमारा 'फैब्रिक ऑफ फ्रीडम' कहा जाता है, इसे पहना नहीं जा रहा था! वह खादी जो गांधीजी का पर्याय है- उस खादी की जर्जर दुकानें क्यों चल रही हैं? आज खादी रोजाना करोड़ों रुपये का कारोबार कर रही है."

इनका रास्ता गांधी विरोधी है?

तुषार गांधी का कहना है कि, गांधी का कथित विकास कार्यक्रम एक बात है, और सभी जातियों और धर्मों को साथ लेकर चलने की उनकी विचारधारा से राज्य को उलटी दिशा में चलाना दूसरी बात है.

वह कहते हैं, "यह बात कि गांधी को राष्ट्रपिता कहा जाता है, इस बात को असल में पूरी तरह अर्थहीन बना दिया गया है."

"भारत में बहुत कम लोग गांधी को उस तरह से देखते या उनका अनुसरण करते हैं, और ऐसा आज पहली बार नहीं है. लेकिन कहने की जरूरत नहीं है कि यह दर्जा और ज्यादा डांवाडोल हो गया है."

तुषार गांधी कहते हैं, "यह सच है कि गांधी को अपनी गुजराती जड़ों पर नाज़ था, लेकिन उस पहचान के साथ वे पूरी दुनिया की मानवता के हो गए."

वह कहते हैं, "आज एक तरफ प्रधानमंत्री गर्व से कहते हैं कि वह भी गांधी की तरह गुजराती हैं- दूसरी तरफ उनकी सरकार देश के नागरिकों के एक वर्ग को बढ़ावा देने तक सीमित हो जाती है. मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसा कर सकता है."

तुषार गांधी कहते हैं, "इससे बड़ा गांधी विरोधी कदम नहीं हो सकता है."

भारत में 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' की नेता और गांधीवादी मेधा पाटकर भी ऐसा ही मानती हैं कि इस सरकार का रास्ता अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते से कोसों दूर है.

उनका मानना है कि भारत में हमेशा 'मोदी बनाम गांधी' की लड़ाई चलती रही है.

"इस सरकार के सभी मॉडल- आर्थिक, राजनीतिक या सामाजिक- गांधी की विचारधारा के खिलाफ हैं."

"मैं उन्हें गांधी समर्थक कैसे कह सकती हूं जबकि उन्होंने अहिंसा के बजाय हिंसा को चुना है, वे हमेशा सत्य के बजाय असत्य का आचरण कर रहे हैं?"

गांधी की धर्मनिरपेक्षता पर प्रहार किया

जवाहर सरकार का मानना है कि भाजपा का राष्ट्रपिता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात उसकी धार्मिक सांप्रदायिकता की राजनीति है.

उनका विचार है कि, धर्म के बावजूद देश को धर्मनिरपेक्ष रखने का गांधी का मंत्र आज भारत में खात्मे के कगार पर है.

जवाहर सरकार कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं है कि गांधी ने इस देश में कट्टरवाद के खिलाफ सबसे मजबूत स्टैंड लिया. नेहरू ने धर्म से दूरी बनाए रखी, लेकिन गांधी ने दिखाया कि धार्मिक होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष रहा जा सकता है."

"कहा जा सकता है कि यह एक अजीब भारतीय चरित्र है... विदेशों में धर्मनिरपेक्षता (सेकुलरिज्म) का मतलब है धर्म का त्याग करना, लेकिन भारत में इसका मतलब है अपने धर्म में विश्वास रखते हुए दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु होना."

जवाहर सरकार कहते हैं, "नेहरू एक पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष, धर्म-विरोधी विचारधारा के शख्स थे- जो भारत में चलना मुमकिन नहीं है. लेकिन भारत की केंद्रीयता या केंद्रीय दर्शन- धार्मिक होने के बावजूद गैर-सांप्रदायिक होना- और सभी को साथ लेकर चलना- यह गांधी का योगदान है."

"भले ही उन्होंने रघुपति राघव भजन गाया हो, लेकिन उन्होंने कभी राम के नाम पर मस्जिद तोड़ने का समर्थन नहीं किया. आज न राम हैं, न पहले जैसी अयोध्या है."

"मोहनदास करमचंद गांधी समग्र रूप से भारत की राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था में अप्रासंगिक होते जा रहे हैं- दूसरी ओर, नाथूराम गोडसे-सावरकर के समर्थक ज्यादा से ज्यादा मुखर हो रहे और खुलकर सामने आ रहे हैं."

"शायद वह दिन दूर नहीं है- जब भारत के राष्ट्रपिता सिर्फ सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर, सरकारी कर्मचारियों के कोटपिन पर या करेंसी नोटों की तस्वीरों पर सजे दिखेंगे."

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