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नज़रियाः '150वीं जयंती पर महात्मा गांधी भी देखेंगे गर तमाशा हुआ'
- Author, अरविन्द मोहन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कस्तूरबा की 150वीं जयंती पर सरकारी आयोजन उनके आदर्शों के उलट जा सकता है.
साल भर से राष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्रियों, कई मंत्रालयों और चुने हुए गांधीवादी कार्यकर्ताओं द्वारा कई भारी-भरकम बैठकोँ के बाद निकलकर आए कार्यक्रमों की सूची, खर्च, भव्यता, दिखावे में तो काफ़ी बड़ी लगती हैं पर गांधी के विचारों, उनकी सादगी, उनके कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने और सामाजिक जीवन मेँ गांधी की याद दिलाने के पैमाने पर कई सवाल छोड़ती है.
इसकी तुलना मेँ पचास साल पहले हुए गांधी शताब्दी वर्ष के आयोजन काफ़ी बेहतर लगते हैं.
बा और गांधी
बा को सिर्फ उनकी मृत्यु के 75वें वर्ष के संदर्भ में याद करने की बात कही गई है और 22 फरवरी 2019 को कस्तूरबा दिवस के रूप मेँ मनाने का फ़ैसला हुआ है.
बा क्या थीं और गांधी के जीवन और आंदोलन मेँ उनका क्या योगदान था, ये बताने की कोई कोशिश नहीं दिखती.
पर गांधी कथा पिछले दिनों दिल्ली मेँ यमुना के पेट में नुकसानदेह हरकतों के चलते ग्रीन ट्रिब्यूनल से जुर्माने की सजा पाए श्री श्री रविशंकर, गांधी से दूर-दूर का नाता न रखने वाले जग्गी वासुदेव (जो एक यात्रा निकालकर इन दिनों सरकार के दुलारे बने हुए हैं), मुरारी बापू और ब्रह्मकुमारियोँ के माध्यम से देश में फैलेगा तो ये बाबा अपना धंधा चलाने कब जाएंगे.
और अब तक ये गांधी का कौन सा काम कर रहे थे, ये सात पर्दो मेँ ही छुपा होगा वरना हमें आपको भी कुछ मालूम होता ही.
'महात्मा की बात'
आयोजनप्रिय मोदी सरकार कार्यक्रम करे और भव्यता न हो ये कैसे सम्भव है.
150 नोबल पुरस्कार प्राप्त लोगोँ का जलसा, उनके 150 लेखों का संकलन, गणतंत्र दिवस पर सभी राज्यों समेत सारी झांकियों का विषय गांधी रखना, 150 नौजवानों द्वारा 150 दिनों तक देश के हर गांव मेँ यात्रा करना, 'महात्मा की बात' कार्यक्रम को 'मन की बात' जितनी धूमधाम से चलाना, डाक टिकट, सिक्के जैसे न जाने कितने भव्य कार्यक्रम हैं.
इस भव्यता और खर्च मेँ कहीं गांधी, उनकी सादगी, उनका जीवन दर्शन भी आएगा, ये प्रोग्राम देखे-सुने बगैर कैसे कहा जा सकता है.
जो कार्यक्रम आया है उसमें फ़िल्म, वीडियो, नाटक, प्रदर्शनियों और गोष्ठियों-सेमिनारों की धूम मचनी है.
'गांधी ब्लैक बेल्ट'
प्रमुख रेलों का नामकरण, मार्गों का नामकरण, सभी रेलवे स्टेशनों पर पेंटिंग, देश-विदेश के गायकों-कलाकारों को जोड़कर वैष्णव जन जैसे भजनोँ के नए एलबम बनाना भी शामिल है.
और इसी कड़ी में मार्शल आर्ट में 'गांधी ब्लैक बेल्ट' देने का कार्यक्रम अगर किसी को हैरान करे तो अपनी बला से.
पर उससे ज्यादा ख़तरा अगले ही साल हो रहे आम चुनाव से है. गांधी जी चुनाव में काम आए तो मुश्किल, चुनाव में आड़े आएं तो ज़्यादा मुश्किल.
सो सारा कुछ चुनाव के शर्त से जुड़ा लगता है. ये कहने का एकाएक आधार आयोजन में शामिल होने वाले गांधिवादियों का चुनाव है.
जिस किसी गांधीवादी संस्था और उसके कर्ताधर्ता लोग सरकार के सोलह आना समर्थक नहीं बने हैं, उन्हें सीधे आयोजन समिति से बाहर कर दिया गया है.
'गांधी 150' और 'बा-बापू 150'
अभी तक प्रमुख गांधीवादी संस्थाओं के पदेन लोग विदेशी मेहमानों के राजघाट के कार्यक्रम समेत गांधी से जुडे सारे प्रमुख सरकारी आयोजनों में शामिल किए जाते थे.
इस बार उनका अपना अलग 'गांधी 150' और 'बा-बापू 150' चल रहा है.
गांधी का आंदोलन मर गया है. मारने में अभी तक की सरकारों और एक हद तक मठी गांधीवादियों का भी दोष है.
पर गांधीवाद मरा हो ये मानने की भूल कोई नहीं करेगा. दुनिया भर के आंदोलनों और अकादमिक जगत के लिए गांधी अब भी सबसे बड़े आकर्षणों में हैं.
खुद उनका साहित्य काफी ज़्यादा है. उन पर लिखा साहित्य और ज़्यादा है. ये क्रम जारी है.
गांधी विरोधी राजनीति
इतने भव्य आयोजन की जगह सादगी के साथ आयोजन और बड़े पैमाने पर गांधी-साहित्य का प्रचार-प्रसार, खादी समेत अन्य कार्यक्रमों पर ख़र्च हो तो शायद बेहतर रिजल्ट आते.
कम से कम श्री श्री और जग्गी वासुदेव जैसों से गांधी कथा कराने का क्या नतीजा होगा, बाबा मंडली मालामाल होगी या गांधी बाबा, ये विवाद तो नहीँ होता.
और किसी सरकार से, खासकर गांधी विरोधी दर्शन और राजनीति वाली सरकार से इससे ज़्यादा की उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए.
असल मेँ गांधी 150 का आयोजन और यह तैयारी एक अन्य वजह से भी दिखती है.
गांधी की चम्पारण यात्रा का 100वाँ वर्ष जब बीत गया तब बिहार सरकार जागी (क्योंकि 2016 मेँ वह गुरु गोविंद सिंह से जुड़े आयोजन में लगी थी) और उसने एक शानदार कार्यक्रम कर डाला.
आम चुनाव का साल
कई अच्छी योजनाएँ भी थीं जिन पर अभी तक अमल नहीँ हुआ है. तब नीतीश कुमार विरोधी खेमे मेँ थे. उनकी सफलता देखकर सरकार ने आनन-फानन में राष्ट्रीय संग्रहालय में मोदी ने एक कार्यक्रम किया और बिहार में समांतर प्रयास किए.
एक समय मोतिहारी में सात-सात केंद्रीय मंत्री जुटे पर भीड़ न जुटी. मजा तब आया जब गांधी की रेल यात्रा की झांकी प्रस्तुत करते-करते दो-दो गांधी उतरे और उनके समर्थकों में मारपीट जैसी स्थिति दिखी.
इस बार वो स्थिति न दिखे, कोई नया आदमी चुनौती न बन जाए (इस बीच नीतीश कुमार भी पाले मेँ आ चुके हैं और गांधी 150 भुला चुके हैं), इसलिए तैयारी पूरी है.
सोच कैसी और कितनी है, दोहराने की जरूरत नहीं है. पर ये दोहराना जरूरी है कि 2019 गांधी और बा का 150वाँ साल ही नहीं, हमारे आम चुनाव का साल भी है.
गांधी का प्रचार हो न हो चुनाव मेँ प्रचार की ज़रूरत तो रहती ही है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं. लेखक गांधी के चम्पारण सत्याग्रह पर 'चम्पारण प्रयोग' नाम से किताब लिख चुके हैं.)
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