यूपी में अखिलेश यादव की सपा और जयंत चौधरी की आरएलडी का हो पाएगा गठबंधन?

    • Author, अनंत झणाणे, लखनऊ से
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव अब ज़्यादा दूर नहीं रह गए हैं. विधायकों की संख्या के आधार पर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, छोटे-छोटे दलों, बसपा और भाजपा के बाग़ी विधायकों को पार्टी में शामिल कर रहे हैं.

उनकी कोशिश प्रदेश के हर इलाक़े में छोटे छोटे दलों के साथ अपनी पार्टी से गठबंधन को अमली जामा पहनाने की दिख रही है.

इस साल मार्च के महीने में मथुरा में जयंत चौधरी और अखिलेश यादव ने 2022 का उत्तर प्रदेश चुनाव साथ लड़ने का ऐलान किया था. किसान आंदोलन से राजनीतिक मज़बूती लेते हुए किसान महापंचायत में यह ऐलान किया गया था, लेकिन फ़िलहाल कुछ दिनों से अखिलेश यादव और जयंत चौधरी साथ-साथ नहीं दिख रहे हैं , ऐसे में इस वैचारिक गठबंधन को लेकर अटकलें लगने लगीं कि दोनों दलों में सीटों के बंटवारे को लेकर रस्साकशी चल रही है.

उत्तर प्रदेश की विधान सभा में अभी समाजवादी पार्टी के 49 विधायक हैं और आरएलडी का एक भी विधायक नहीं हैं. खुद 2019 में भाजपा की लहर में जयंत चौधरी भी बागपत से लोकसभा का चुनाव हार गए थे. लेकिन लगातार चले रहे किसान आंदोलन और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट बिरादरी पर इसके असर ने जाटों से जुड़ी राजनीति करने वाले राष्ट्रीय लोक दल में न जान फूंकी है.

समाजवादी पार्टी को भी पश्चिम उत्तर प्रदेश की घनी मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर ठीक-ठाक वोट मिलने की उम्मीद है और 2022 में दोनों पार्टियों की कोशिश 100 सीटों पर जाट और मुसलमान बिरादरी के वोटरों को जोड़ने की होगी.

आरएलडी की पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग 13 ज़िलों में अच्छी पकड़ और मज़बूत कैडर है जो किसान आंदोलन से पुनर्जीवित हुआ है और उम्मीद जताई जा रही है कि सपा-आरएलडी का गठबंधन पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसानों की भाजपा से नाराज़गी का फ़ायदा उठा सकता है.

क्या कहता है आरएलडी का संकल्प पत्र

अभी तक दोनों पार्टी की ओर से इस गठबंधन का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है. यही वजह है कि आरएलडी और सपा के चुनावी गठबंधन को लेकर अटकलें शुरू हुईं क्योंकि जयंत चौधरी ने लखनऊ में रविवार को एक बड़ा कार्यक्रम कर पार्टी का 2022 संकल्प पत्र जारी कर दिया. वैचारिक गठबंधन के बावजूद समाजवादी पार्टी की ओर से कोई भी इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अलग संकल्प पत्र जारी करना आरएलडी की सपा पर ज़्यादा सीटें देने के लिए दबाव बनाने की कोशिश है?

आरएलडी के संकल्प पत्र में 22 वादे किए गए. घोषणापत्र में आरएलडी ने कहा है सरकार बनने पर वो एक करोड़ नौकरियां, महिलाओं को पदों की भर्ती में 50 फ़ीसदी आरक्षण, शहीद जवानों के परिवार वालों को एक-एक करोड़ की आर्थिक सहायता देगी.

इनमें निजी और सरकारी क्षेत्र में एक करोड़ नौकरियां देना, किसानों को आलू का डेढ़ गुना ज़्यादा दाम देना, गन्ना किसानों को लागत का डेढ़ गुना दाम देना, किसान सम्मान निधि को दुगना करना, जैसे कई बड़े वादे हैं.

जब हमने जयंत चौधरी से पूछा कि गठबंधन धर्म के आधार पर लोग सपा आरएलडी के साझे घोषणा पत्र की उम्मीद कर रहे थे, तो उन्होंने कहा, "जो आप कह रहे हैं वह प्वाइंट है लेकिन हमने राष्ट्रीय लोक दल के मुद्दे को आगे रखा है. जब गठबंधन होता है तो वैचारिक गठबंधन होता है. मुद्दों पर चर्चा भी होती है और एक समन्वय भी बनाया जाता है.''

''लेकिन समन्वय बनाने से पहले हमने अपने घोषणा पत्र को जारी करके अपने कार्यकर्ताओं को और प्रदेश की जनता को बताया है कि आरएलडी के लिए मुद्दे क्या हैं. जब गठबंधन होगा, जो भी कॉमन मिनिमन चीज़ें होंगी वह हम सब साथ बैठकर तय करेंगे. सिर्फड हम और समाजवादी पार्टी नहीं, और भी जो पार्टी इस गठबंधन में शामिल होंगी, वो सब साथ होंगे."

जयंत चौधरी दावा करते हैं कि उनके संकल्प पत्र से राज्य की हर पार्टी पर मुद्दों की बात करने का दबाव बढ़ेगा. उन्होंने कहा, "हमने एक मज़बूत संदेश भेजा है. सभी पार्टियों पर दबाव बनाया है कि चुनाव के चार महीने पहले, हम मुद्दों की बात कर रहे हैं. हम चुनाव की बात नहीं कर रहे, प्रत्याशी कौन होगा उसकी बात नहीं कर रहे हैं. सिंबल किसका होगा हम उसकी बात नहीं छेड़ रहे हैं. हम मुद्दों की बात कर रहे हैं."

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक जानकार रतन मणि लाल का कहना है, "देखिए आरएलडी को हमेशा से अपनी ताक़त, अपनी पहुँच, और उन्हें समर्थन करने वाले लोगों के बारे में अति-आत्मविशवास रहता है. खुशफ़हमी रहती है कि पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश में हम छाए हुए हैं. लेकिन 2014, 2017 और 2019 के चुनावों में पार्टी का काफ़ी ख़राब प्रदर्शन रहा है. समाजवादी पार्टी को कोई ग़लतफ़हमी नहीं है कि आरएलडी की ताक़त क्या और कितनी है. और वो आरएलडी को उतनी ही सीटें ऑफ़र करेंगी, जिस पर उनके जीतने की संभावना होगी."

कहाँ तक पहुँची सीटों को लेकर बातचीत

मार्च में हुए वैचारिक गठबंधन के आधार पर अब तक सीटों का बंटवारा कहाँ तक पहुंचा है?

इस सवाल के जवाब में जयंत चौधरी का कहना है कि आरएलडी और सपा 403 सीटों पर साथ मिल कर चुनाव लड़ेंगी.

उन्होंने कहा, "जब अलायंस होता है तो किसी सीट पर कोई भी पार्टी लड़े, उस पार्टी के दोनों दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ मिल कर लड़ाना पड़ेगा. तय हो रहा है कि कौन सी सीट पर कौन सा सिंबल जनता के बीच लेकर जाया जाए. प्रत्येक सीट पर हम लोग बात कर रहे हैं और अच्छी सकारात्मक बातचीत का जल्दी हल निकल जायेगा. हमारी 403 सीट पर बातें होती हैं, चाहे सिंबल हमारा हो या समाजवादी पार्टी का हो, उसका कोई मतलब नहीं है. आगे जाकर साझा कार्यक्रम होंगे. मंच साझा भी होगा और साझा कार्यक्रम भी होगा."

उत्तर प्रदेश में अपने चुनावी रथ यात्रा पर निकले अखिलेश यादव ने समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा कि, "सपा और आरएलडी का गठबंधन फ़ाइनल है, बस अब सीटों का बंटवारा फ़ाइनल करना है."

सीटों की खींचतान के बारे में रतन मणि लाल का कहना है, "संकल्प पत्र जारी करके आरएलडी यह दिखाना चाहती है कि वो ज़्यादा से ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है. सिर्फ चार सीटों के लिए संकल्प पत्र में इतनी बड़ी-बड़ी घोषणाएं थोड़ी ना कर रहे हैं. पर आरएलडी का कॉन्फिडेंस अपनी जगह है और समाजवादी पार्टी का आरएलडी के बारे में आकलन अपनी जगह होगा."

पश्चिम उत्तर प्रदेश में आरएलडी और जाट वोट की अहमियत

पश्चिम उत्तर प्रदेश के 13 ज़िलों में जाट वोट का असर राजनीति पर देखने को मिलता है. किसानों में सबसे बड़ी आबादी जाटों की है और मौजूदा किसान आंदोलन से जुड़ने वाले पश्चिम उत्तर प्रदेश के अधिकतर किसान जाट बिरादरी के ही हैं.

जाट किसानों की वजह से पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलन का माहौल बना. पिछले दिनों अजीत सिंह की कोरोना से हुई मौत के चलते भी जयंत चौधरी के साथ सहानुभूति फैक्टर है.

इन सबके चलते सपा के साथ गठबंधन में आरएलडी को सम्मानजनक भागीदारी की उम्मीद है.

जयंत चौधरी और अजीत सिंह दोनों ही लोक सभा चुनाव हारे गए थे और भाजपा के जाट नेता जीते हों लेकिन अजित सिंह और जयंत के हारने से जाटों की दिल्ली में चौधराहट भी कमज़ोर पड़ी है. और जाटों को इस बात का भी एहसास है.

पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वालों की मानें तो दोनों पार्टियों के बीच सीटों को लेकर बातचीत सिर्फ चंद सीटों पर अटकी हुई है. मसलन, बुलंदशहर की शिकारपुर सीट जो जाट बाहुल्य मानी जाती है, लेकिन वहां पर सपा के रामगोपाल यादव के करीबी माने जाने वाले नेता को भी सपा से टिकट की उम्मीद है.

इसी तरह बुलंदशहर की अनूपशहर विधान सभा सीट पर भी क्या-करें-क्या-ना-करें वाली स्थिति उत्पन्न हुई है. इसी तरह मथुरा की मांट सीट को लेकर भी रस्साकशी चल रही है.

पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी का कहना है कि, "अगले सात से दस दिन में फाइनल हो जाएगा. दोनों तरफ से काफी आत्मविश्वास के साथ बात चल रही है. हो सकता है कि आरएलडी को 30 के ऊपर सीटें मिलें. और ऐसा भी नहीं है कि इनमें कोई दरार पड़ने वाली बात हो. यह 2019 से साथ में हैं. आप इसे समाजवादी पार्टी की मजबूरी कह सकते हैं और इस एक बहुत ही साकारात्मक दोस्ती भी कह सकते हैं."

प्रियंका गांधी के साथ दिल्ली लौटे जयंत चौधरी

वैसे जयंत चौधरी और प्रियंका गांधी की मुलाकात की भी ख़ासी चर्चा देखने को मिली है. रविवार को प्रियंका गाँधी गोरखपुर से कांग्रेस की प्रतिज्ञा यात्रा ख़त्म कर दिल्ली लौट रही थीं, और लखनऊ में आरएलडी का संकल्प पत्र जारी करने के बात जयंत चौधरी भी अपनी फ्लाइट पकड़ने के लिए लखनऊ के चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट पर पहुंचे थे.

दोनों की वहां मुलाकात हुई और अपनी फ्लाइट छोड़ जयंत चौधरी प्रियंका गाँधी के साथ दिल्ली उनके चार्टर विमान में वापस लौटे. दोनों नेताओं ने तकरीबन दो घंटे साथ में बिताए तो लखनऊ में अटकलों का बाज़ार गर्म होना ही था.

जयंत चौधरी से इस मुलाकात को राजनीतिक शिष्टाचार बताते हुए कहा, "आपको पता है कि हम लोग पार्लियामेंट में सेंट्रल हॉल में एक साथ बैठते हैं, जब मैं एमपी था, मैं सबके साथ बैठता था. शिष्टाचार है कि जब आप किसी से मुलाकात करते हैं, तो उन्होंने कहा कि हमारा हवाई जहाज़ जा रहा है तो हम साथ चले आएं. जिस तरह का मतलब इस बातचीत का और इस भेंट का निकाला जा रहा है वैसा कुछ नहीं है. हमारे पहले से रिश्ते हैं, और राजस्थान में हम साथ भी है."

राजस्थान में आरएलडी के डॉ सुभाष गुप्ता पार्टी के भरतपुर से विधायक हैं. वो पार्टी के प्रदेश के इकलौते विधायक हैं और गहलोत सरकार में राज्य मंत्री भी हैं.

कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता हिलाल नक़वी ने कहा, "हम लोग किसी के साथ कोई गठबंधन नहीं कर रहे हैं. हम अकेले चुनाव लड़ेंगे. अगर कोई छोटे दल कांग्रेस के साथ आना चाहते हैं तो कांग्रेस उनके प्रस्तावों के बारे में विचार करेगी. कुछ दिन पहले प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव भी फ्लाइट पर मिले और संयोग से जयंत चौधरी की भी मुलाकात ऐसे ही हुई. हम लोगों के विचारधाराएं भले ही अलग हों लेकिन राजनीतिक शिष्टाचार बरक़रार है."

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