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योगी और बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश में सिरदर्द बनते जाट वोट
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या बीजेपी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों की नाराज़गी के बावजूद आने वाले विधानसभा चुनाव में साल 2014, 2017 और 2019 जैसा प्रदर्शन कर पाएगी?
ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब तलाशना बीजेपी के लिए दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा है.
पाँच सितंबर को मुजफ़्फ़रनगर में 'किसान महापंचायत' के आयोजन के बाद से परिस्थितियाँ तेज़ी से बदल रही हैं. इस महापंचायत में किसान नेताओं ने खुलकर बीजेपी की आलोचना की थी.
इसके बाद से बीजेपी चुनाव के दौरान जाट बहुल इलाक़ों में होने वाले संभावित नुक़सान की भरपाई करने का रास्ता तलाश रही है.
इसी सिलसिले में योगी आदित्यनाथ बुधवार से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बिजनौर, शामली और दादरी का दौरा कर सकते हैं. ख़बरों के अनुसार, वह 21 सितंबर को बिजनौर में एक मेडिकल कॉलेज का शिलान्यास करेंगे.
और शामली का दौरा करते हुए ऊँचा गुर्जरपुर गाँव में एक पीएसी कैंप और फ़ायरिंग रेंज का शिलान्यास करेंगे. इसके बाद 22 सितंबर को वह दादरी में सम्राट मिहिरभोज की प्रतिमा का अनावरण करेंगे.
ऐसा माना जा रहा है कि बीजेपी जाटों की नाराज़गी से पैदा हुई चुनौती का सामना गुर्जर समुदाय के सहारे करने की कोशिश कर रही है.
बीजेपी के सामने कितनी बड़ी चुनौती?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें, तो पाँच सितंबर की 'किसान महापंचायत' ने बीजेपी नेताओं को चिंता में डाल दिया है. क्योंकि ये महापंचायत उस क्षेत्र में हुई थी, जिसके दम पर बीजेपी ने पिछले तीन चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन किया है.
साल 2013 से पहले तक इस क्षेत्र में राष्ट्रीय लोकदल सशक्त स्थिति में था. लेकिन 2013 में हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद इस क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों में भारी बदलाव देखा गया.
साल 2012 के चुनाव में बीजेपी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल 38 सीटों पर जीत हासिल की थी. लेकिन दंगों के बाद बदले राजनीतिक माहौल की वजह से साल 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था. इसके बाद साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने 88 सीटों पर जीत हासिल की है. 2019 में भी इस क्षेत्र में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया.
इस क्षेत्र की राजनीति को बेहद क़रीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरवीर सिंह बताते हैं, "दंगों से पहले तक यहाँ चौधरी अजीत सिंह की पार्टी आरएलडी का बोलबाला था. लेकिन दंगों से पहले सपा सरकार की पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रति बेरुख़ी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सबसे ज़्यादा फ़ायदा बीजेपी को मिला. 2014 के चुनावों में बीजेपी ने इस क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन किया. इसके बाद साल 2017 और 2019 के चुनाव में बीजेपी को जाट समुदाय का समर्थन मिला. लेकिन इस बार जाट समुदाय बीजेपी से नाराज़ नज़र आ रहा है."
बता दें कि 2019 के आम चुनाव तक बीजेपी को जाटों का समर्थन मिला था. लेकिन पिछले दो सालों से जाट समुदाय धीरे-धीरे बीजेपी से दूर हटता दिख रहा है.
क्या गुर्जरों के सहारे नैया पार हो सकती है?
उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय राजनीतिक रूप से काफ़ी प्रभावशाली माना जाता है और बीजेपी साल 2013 के बाद से लगातार इस समुदाय को अपने साथ रखने की कोशिशें करती रही है.
इन्हीं कोशिशों के दम पर बीजेपी ने साल 2017 के विधानसभा चुनाव में 2012 की अपेक्षा बेहतरीन प्रदर्शन किया.
लेकिन गन्ना किसानों की समस्याओं और किसान आंदोलन की वजह से अब यह समुदाय बीजेपी से दूरी बनाता हुआ दिख रहा है.
हरवीर सिंह बताते हैं, "पाँच सितंबर को जो महापंचायत हुई, उसमें कम से कम चार-पाँच लाख किसान अपने आप शामिल हुए. और संख्या के लिहाज़ से ये पिछले 30 सालों में सबसे बड़ी किसानों की सभा थी. इसमें सरकार के प्रति नाराज़गी खुलकर दिखाई दी. अब सवाल उठता है कि इसका फ़ायदा किसे मिलेगा, तो इसका जवाब राष्ट्रीय लोकदल है. ये बीजेपी की चिंता का सबसे बड़ा सबब है."
ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी अपनी इस चिंता के निदान के लिए क्या कर सकती है.
राजनीतिक हल्कों में कयास लगाए जा रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ इसी समस्या का हल निकालने के लिए गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं.
क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर, जाटों के बाद दूसरा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समुदाय है. इसका प्रभाव सहारनपुर से लेकर गौतम बुद्ध नगर तक है.
सीटों के लिहाज़ से देखा जाए तो सहारनपुर में गंगोह, शामली में कैराना और मेरठ-मुजफ़्फ़रनगर क्षेत्र में हस्तिनापुर और खतौली, बागपत और लोनी और गौतमबुद्ध नगर और दादरी गुर्जर बाहुल्य इलाक़े हैं.
दादरी में राजा मिहिरभोज की प्रतिमा के अनावरण को इसी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
हरवीर सिंह बताते हैं, "कई बीजेपी नेताओं ने व्यक्तिगत बातचीत में मुझे बताया है कि उन्हें ये समझ नहीं आ रहा है कि वे जाट बाहुल्य क्षेत्रों में जो नुक़सान होने जा रहा है, उसकी भरपाई कैसे करें. एक कोशिश ये है कि गुर्जरों के साथ ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर के साथ-साथ कश्यप, सैनी, गड़रिया आदि जातियों को साथ लाकर जाटों की नाराज़गी की भरपाई की जाए."
उत्तर प्रदेश की राजनीति और जाति समीकरण पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र मानते हैं कि जाटों के समर्थन की वजह से बीजेपी को शानदार जीत मिली थी.
वह कहते हैं, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का प्रभाव लगभग 100 विधानसभा सीटों पर दिखाई पड़ता है. वहीं, गुर्जर समुदाय का असर 15 से 20 सीटों पर है. ऐसे में बीजेपी का ये सोचना ग़लत है कि वह कुछ जातियों को एक साथ लाकर अपने नुक़सान की भरपाई कर सकती है. क्योंकि क्लास (वर्ग) हमेशा कास्ट (जाति) पर भारी पड़ता है. इसलिए जाति को पकड़कर एक वर्ग में तब्दील होते किसानों, जिनमें जाट गुर्जर और मुसलमान सभी शामिल हैं, की नाराजगी से पैदा हुई चुनौती का सामना नहीं किया जा सकता."
"राकेश टिकैत मंगलवार को सीतापुर आए थे, जहाँ उनको सुनने के लिए लगभग 50 हज़ार लोगों की भीड़ जुटी थी जिसमें से लगभग 10 हज़ार लोग बाहर से आए थे. ऐसे में आप टिकैत की ताक़त को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. इसके साथ ही उन्हें देशद्रोही करार देने से बीजेपी अपना ही नुकसान करेगी क्योंकि आप जितना इस आंदोलन के ख़िलाफ़ बोलते जाएँगे. वह किसानों के बीच मज़बूत होते जाएँगे. हल सिर्फ़ एक है कि तमाम जातियों पर ध्यान देने की बजाए किसानों के मुद्दे को सुलझाया जाए. जो करना बीजेपी के लिए बहुत मुश्किल नहीं है."
सवाल
सवाल ये उठता है कि क्या बीजेपी इस सोशल इंजीनिरिंग की बदौलत संभावित नुक़सान की भरपाई कर सकती है.
बीजेपी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों को छोड़कर अन्य जातियों को एक साथ लाने की कोशिशें कर रही है. इसके साथ ही बीजेपी इस बार जाटव समुदाय में भी सेंध मारने की कोशिश कर सकती है.
लेकिन हरवीर सिंह मानते हैं कि बीजेपी के लिए इस योजना को अमलीजामा पहनाना आसान नहीं होगा.
वह कहते हैं, "ये कोशिश तो है लेकिन ये करना इतना आसान नहीं है. क्योंकि गुर्जर के प्रभाव वाली सीटों पर जीत की गुंज़ाइश जितनी बीजेपी की है, उतनी ही सपा-आरएलडी के गुर्जर उम्मीदवार की होगी. कई सीटें ऐसी हैं, जहाँ गुर्जर ज़्यादा संख्या में हैं लेकिन अगर मुसलमान और जाट एक तरफ़ा वोट दें, तो गुर्जर उम्मीदवार को जीतने में दिक़्क़त होगी. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि बीजेपी अपनी ओर से कोशिशें कर रही है, लेकिन ये कोशिशें कितनी सफल होंगी, ये कहना मुश्किल है."
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