अरविंद केजरीवाल राम के नाम से क्या हासिल करना चाहते हैं

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने अपनी दो दिवसीय अयोध्या यात्रा के दौरान बीते मंगलवार हनुमान गढ़ी और 'राम लला' के दर्शन किए.

इसके बाद उन्होंने एलान किया कि बुधवार से दिल्ली के बुज़ुर्ग नागरिक मुफ़्त में अयोध्या की यात्रा कर सकेंगे.

इस पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केजरीवाल को आड़े हाथों लिया है.

उन्होंने कहा, "(अरविंद केजरीवाल) पहले भगवान राम को गाली देते थे, लेकिन आज जब लगता है कि अब राम के बगैर नैय्या पार होने वाली नहीं है तो अयोध्या में राम जन्मभूमि के दर्शन करने के लिए आ रहे हैं."

योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ कांग्रेस नेता राशिद अल्वी भी अरविंद केजरीवाल के अयोध्या जाने पर टिप्पणी कर चुके हैं.

हालांकि, राशिद अल्वी ने इसके लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि "बीजेपी ने धर्म को राजनीति से जोड़कर अन्य पार्टियों के नेताओं को धार्मिक स्थानों पर जाने के लिए विवश कर दिया है. हर पार्टी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले लोगों में एक संदेश देना चाहती है."

लेकिन सवाल ये उठता है कि अयोध्या जाना अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक विवशता है या ये आम आदमी पार्टी की एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है.

'आप' की मजबूरी या चुनावी रणनीति?

आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए अयोध्या का दौरा किया है. इस दौरान उन्होंने सरयू नदी की आरती से लेकर हनुमानगढ़ी में बजरंग बली एवं राम लला के दर्शन किए हैं.

इससे पहले आप नेता संजय सिंह और मनीष सिसोदिया भी अयोध्या में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने के साथ-साथ तिरंगा यात्रा निकाल चुके हैं. राम जन्मभूमि ट्रस्ट की ज़मीन ख़रीद-फ़रोख़्त से जुड़े विवाद में भी आम आदमी पार्टी ने खुलकर बीजेपी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था.

बीजेपी अक्सर आम आदमी पार्टी के इस रुख़ को चुनावी हथकंडा बताते हुए उसकी आलोचना करती रही है. इस पर आम आदमी पार्टी का कहना है कि राम के नाम पर किसी का पेटेंट नहीं है.

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या ये आम आदमी पार्टी की राजनीतिक विवशता है या एक सोची-समझी चुनावी रणनीति.

सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डिवेलपिंग सोसाइटीज़ के निदेशक संजय कुमार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी की रणनीति स्पष्ट है.

वह कहते हैं, "आम आदमी पार्टी की रणनीति बिल्कुल साफ़ है. रणनीति ये है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट के लिए प्रतिस्पर्धा ज़बर्दस्त है. इसके लिए समाजवादी पार्टी है, बीएसपी है, कांग्रेस है और ओवैसी जी की पार्टी है. इन सबके बीच मुस्लिम वोटों के लिए कॉम्पिटीशन होगा.

ऐसे में आम आदमी पार्टी के लिए ये कोई समझदारी भरा क़दम नहीं होगा कि वह भी मुस्लिम वोट को हासिल करने के लिए रणनीति बनाए. ऐसे में उन्होंने हिंदू मतदाताओं को लुभाने की रणनीति बनाई है. इसके लिए जो कुछ किया जा रहा है, वो हमारे सामने है, सरयू नदी पर जाकर आरती करना, अयोध्या जाना, तिरंगा यात्रा निकालना आदि.

आम आदमी पार्टी द्वारा संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि हम भी शायद उतनी ही बड़ी हिंदूवादी पार्टी हैं जो कि बीजेपी हो सकती है. ऐसे में एक विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश की जा रही है."

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'राम के नाम' की ज़रूरत क्यों?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अरविंद केजरीवाल की अयोध्या यात्रा पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि "पहले भगवान राम को गाली देते थे लेकिन आज जब लगता है कि अब राम के बगैर नैय्या पार होने वाली नहीं है तो अयोध्या में राम जन्मभूमि के दर्शन करने के लिए आ रहे हैं."

इस पर पलटवार करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा, "आज मैंने एलान किया कि दिल्ली के लोगों को कल से अयोध्या तीर्थ यात्रा फ़्री कराएँगे. फिर इसे UP में भी लागू करेंगे. इस योजना से करोड़ों जनता प्रभु के दर्शन कर पाएगी. योगी जी, इसमें आपको आपत्ति क्यों?"

लेकिन सवाल ये उठता है कि बिजली, पानी और स्कूल के मुद्दे पर चुनाव लड़ने और जीतने वाली आम आदमी पार्टी को राम के नाम की ज़रूरत क्यों पड़ती है.

संजय कुमार बताते हैं, "आम आदमी पार्टी के गवर्नेंस मॉडल की एक सीमित अपील है. जैसे ही वो अपने गवर्नेंस मॉडल की बात करेंगे कि हमने दिल्ली के स्कूलों और अस्पतालों में बहुत सुधार किया है, तो इसकी एक लिमिटेड वैल्यू है. इससे वो दूसरे राज्यों में मतदाताओं को लुभा नहीं पाएंगे. लोग जानते हैं कि दिल्ली एक छोटा-सा राज्य है और वहां ये सब कर पाना संभव है. लेकिन यूपी इतना बड़ा राज्य है या किसी अन्य राज्य से तुलना करें तो लोग ये समझते हैं कि इतने बड़े राज्य में ये सब करना संभव नहीं है.

ऐसे में अगर आम आदमी पार्टी सिर्फ गवर्नेंस के मुद्दे पर प्रचार करने की कोशिश करेगी और मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करेगी तो उसमें वह सफल होती हुई दिखाई नहीं पड़ती. इसीलिए उन्हें गवर्नेंस प्लस की ज़रूरत है. और ये जो प्लस है, वो इतना बड़ा प्लस चिह्न है जिससे हिंदू मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की जा रही है.

और ये बताया जा रहा है कि आप दूसरी पार्टियों पर तो आरोप लगा सकते हैं कि वो मुस्लिम तुष्टिकरण करती हैं, लेकिन हमारी पार्टी ऐसी नहीं है. आप देखिए, हमारे नेता सारे हिंदू प्रतीकों के साथ हैं. वो पूजा भी कर रहे हैं और मंदिर भी जा रहे हैं.

ऐसे में ये मिला-जुला कॉम्बिनेशन है, लेकिन इस कॉम्बिनेशन में चूंकि विकास का मॉडल पूरी तरह सफल नहीं हो सकता, ऐसे में विकास के मॉडल और हिंदुत्व का सहारा लिया जा रहा है."

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बीजेपी से निराश वोट लेने की कोशिश?

उत्तर प्रदेश में आम आदमी पार्टी के नेताओं के बयानों और चुनाव प्रचार सामग्री पर नज़र डाली जाए तो वह स्कूल से लेकर बिजली, पानी, अपराध जैसे अहम मुद्दों पर सरकार को घेरते नज़र आते हैं.

मनीष गुप्ता हत्याकांड से लेकर आगरा में सफ़ाई कर्मचारी की मौत जैसे मामलों को संजय सिंह ने ज़ोरशोर से उठाया है.

लेकिन सवाल ये उठता कि क्या आम आदमी पार्टी गवर्नेंस के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए बीजेपी से निराश मतदाताओं को अपनी ओर खींचना चाहती है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान मानते हैं कि आम आदमी पार्टी अपने आपको एक पैकेज के रूप में पेश कर रही है.

वह कहते हैं, "आम आदमी पार्टी फ़्री बिजली और पानी की बात करते हुए हिंदू प्रतीकों के साथ नज़र आ रही है. ऐसे में वह ख़ुद को एक पैकेज के रूप में पेश कर रही है जिसमें वो सब चीज़ें शामिल हैं जो उसने दिल्ली में डिलीवर की हैं और हिंदू धर्म के प्रति सहजता और स्वीकार्यता का भाव भी है.

क्योंकि उत्तर प्रदेश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो कि बीजेपी का मतदाता है, लेकिन बीजेपी को विकल्प हीनता की वजह से वोट देता है. ये वर्ग गले में भगवा गमछा डाले हुए युवाओं की टोलियों, लिंचिंग और अतिवाद को पसंद नहीं करता है.

इस वर्ग को बेसिक सुविधाएं जैसे पानी, बिजली, आसानी से सरकारी कामों के होने और हिंदू सभ्यता और संस्कृति के प्रति स्वीकार्यता के भाव की दरकार है. ऐसे में इस वर्ग तक आम आदमी पार्टी अपनी पहुंच बना सकती है."

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क्या कट्टर हिंदुत्व की ओर बढ़ रही है 'आप'?

सहज सरल ढंग से राम राज्य आदि की बात करने वाली आम आदमी पार्टी कभी-कभी कुछ मुद्दों पर आक्रामक रुख़ लेती हुई भी दिखती है.

इसकी झलक मनीष सिसोदिया के उस बयान में मिलती है जो उन्होंने सूरत में चुनाव प्रचार करते हुए दिया था.

मनीष सिसोदिया ने मंगोलपुरी के रिंकू शर्मा हत्याकांड पर अमित शाह को घेरते हुए कहा था, "ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश में जय श्री राम कहने पर किसी की हत्या कर दी जाती है."

कुछ इसी तरह के बयान हिंदूवादी संगठनों और बीजेपी की ओर से भी आए थे. मंगोलपुरी के जिस मोहल्ले में रिंकू शर्मा का परिवार रहता है, वहां भी इस तरह के पोस्टर लगाए गए थे, जबकि दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ये सांप्रदायिक मामला नहीं है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी चुनावी ज़रूरत के आधार पर कट्टर हिंदुत्व का सहारा ले सकती है.

आम आदमी पार्टी की राजनीति पर एक लंबे समय से नज़र रख रहे वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे मानते हैं कि आम आदमी पार्टी और बीजेपी को एक नज़र से देखना ग़लत है.

वे कहते हैं, "आम आदमी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के वर्चस्व को चुनौती देना चाहती है और ऐसा करने के लिए कुछ ख़ास युक्तियां है जिन्हें वह अपना रही है.

मौजूदा राजनीति में जो आध्यात्मिक और धार्मिक मुहावरा है, उस मुहावरे को 'आप' सेकुलर तरीके से इस्तेमाल करना चाहती है. गांधी जी से लेकर लोहिया तक रामराज्य की चर्चा करते थे. बीजेपी के राम अल्पसंख्यक विरोधी राम हैं. शेष पार्टियों के राम अल्पसंख्यक विरोधी राम नहीं हैं."

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