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भारत, इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका का नया गठजोड़
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत, इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात को मध्य-पूर्व में एक नए सामरिक और राजनीतिक ध्रुव के रूप में देखा जा रहा है.
कूटनीतिक हलकों में इन देशों के साथ आने को 'न्यू क्वॉड' या नया 'क्वॉडिलैटरल सिक्यॉरिटी डायलॉग' कहा जा रहा है.
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर, इसराइल के दौरे पर हैं और इस बैठक में वह इसराइल के विदेश मंत्री येर लेपिड के साथ यरुशलम से शामिल हुए.
इस दौरान एशिया और मध्य-पूर्व में अर्थव्यवस्था के विस्तार, राजनीतिक सहयोग, व्यापार और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई.
बैठक के बाद जयशंकर ने इस संबंध में ट्वीट भी किया और उम्मीद जताई कि निकट भविष्य में बैठक में जिन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई, उन्हें आगे बढ़ाया जाएगा.
इस बैठक में अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख़ अब्दुल्लाह बिन ज़ायद अल नहयान भी मौजूद थे.
अमेरिका क्यों चाहता है भारत निभाए महत्वपूर्ण भूमिका
सामरिक मामलों के जानकार मानते हैं कि भारत ने हमेशा मध्य-पूर्व के मामलों में अमेरिका से दूरी ही बनाए रखी थी.
पिछले साल अमेरिका ने कई खाड़ी के देशों के बीच 'एब्रहामिक एकॉर्ड' या 'एब्रहामिक समझौते' पर हस्ताक्षर करने में बड़ी भूमिका निभायी थी, जिसकी वजह से संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए. यह समझौता पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में किया गया था.
लंदन के किंग्स कॉलेज में विदेश मामलों के प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत कहते हैं कि जब जो बाइडन ने सत्ता संभाली तो लगा कि वो ट्रंप के फ़ैसलों और नीतियों से ख़ुद को अलग कर लेंगे.
लेकिन बाइडन ने भी ''एब्रहामिक एकॉर्ड' का सम्मान करते हुए इसे आगे बढ़ाया. चारों देशों के विदेश मंत्रियों की ये बैठक उसी दिशा में आयोजित की गई.
पंत के अनुसार, भारत के संबंध संयुक्त अरब अमीरात से भी काफ़ी अच्छे रहे हैं और इसराइल से भी. इसीलिए अमेरिका भी चाहता है कि मध्य-पूर्व में भारत एक अहम भूमिका निभाए.
पंत का ये भी मानना है कि भारत भी मध्य-पूर्व में नई भूमिका निभाने के अवसर तलाश कर ही रहा था, जो उसे मिल गया है.
पहले से ही यूएई के साथ भारत के व्यावसायिक रिश्ते चले आ रहे हैं. तकनीक और सुरक्षा के कई क्षेत्रों में भारत और इसराइल की साझेदारी भी चली आ रही है.
पंत कहते हैं कि दो मित्र देशों और अमेरिका के साथ मध्य-पूर्व में इस तरह का ध्रुवीकरण भारत के लिए सामरिक रूप से और कूटनीतिक तौर पर लाभदायक होगा.
हालांकि विदेश मामलों के जानकार मनोज जोशी इस ध्रुवीकरण को ज़्यादा महत्त्व नहीं देते हैं. वो मानते हैं कि देशों के बीच इस तरह के समझौते होते रहते हैं.
नया 'क्वॉड'
वह कहते हैं, "ये चार देश एक साथ आए तो हैं. बात भी की है और आपसी सहमति भी बनी है. लेकिन सब कुछ निर्भर करता है कि इसके परिणाम क्या होंगे. तब कहीं इसको गंभीरता से लिया जा सकता है."
मनोज जोशी के अनुसार, "जिस 'क्वॉड' को कभी नए 'नेटो' के रूप में देखा जा रहा था, उसको लेकर अब ज़्यादा उत्साह नहीं दिख रहा है."
लेकिन वह मानते हैं कि इस समय भारत को मध्य-पूर्व देशों के साथ सैन्य समझौते करने पड़ेंगे क्योंकि खाड़ी के देशों में भारत की सामरिक मौजूदगी नहीं है. जबकि अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस के वहाँ अपने सैन्य बेस मौजूद हैं.
सामरिक मामलों के जानकारों को लगता है कि भारत मध्य-पूर्व में क्या भूमिका निभाए, उसको लेकर हमेशा ही उधेड़बुन की स्थिति रही है क्योंकि ईरान के साथ संबंध आड़े आ जाते हैं. भारत ने मध्य-पूर्व के देशों और ईरान के साथ अपने संबंधों में हमेशा से ही बीच का रास्ता ही अपनाया है.
वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत अय्यर मित्रा कहते हैं कि भारत के लिए तीनों देश महत्वपूर्ण हैं. यूएई से भारत के मज़बूत व्यापारिक संबंध चले आ रहे हैं. वहीं, इसराइल और भारत के एक दूसरे के साथ बेहतर राजनयिक संबंधों के तीन दशकों का जश्न मना रहे हैं, जिस वजह से एस जयशंकर वहाँ के दौरे पर गए हुए हैं.
यूं तो भारत ने इसराइल को वर्ष 1952 में ही मान्यता दी थी लेकिन औपचारिक रूप से राजनयिकों की तैनाती नब्बे के दशक से शुरू हुई, जब पी वी नरसिम्ह राव भारत के प्रधानमंत्री थे.
अभिजीत कहते हैं, "भारत ने हमेशा ये माना कि वॉशिंगटन के लिए रास्ता तेल अवीव से होकर ही गुज़रता है. यानी अमेरिका के साथ बेहतर संबंधों के लिए ज़रूरी था कि इसराइल से बेहतर संबंध रहे. वहीं भारत के मध्य-पूर्व के देशों से भी बहुत ही बेहतर संबंध रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से मध्य-पूर्व के नेताओं की ओर हमेशा दोस्ती का हाथ ही बढ़ाया है. चाहे वो सऊदी अरब के मोहम्मद बिन सलमान हों या फिर यूएई के अमीर."
उनका कहना है कि यही वजह भी रही जब जम्मू कश्मीर से अनुछेद 370 हटाया गया तो मध्य-पूर्व के देशों ने इसे भारत के आंतरिक मामले के रूप में ही देखा और प्रतिक्रिया नहीं दी. इसीलिए भारत ने इसराइल और अन्य मध्य पूर्व के देशों के बीच हमेशा 'बैलेंस' ही बनाए रखा है और इसमें सफलता भी मिली है.
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