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उत्तर प्रदेश: बुंदेलखंड के किसानों के लिए पानी और बिजली की समस्या कितनी गंभीर?
- Author, ब्रजेश मिश्र
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बुंदेलखंड से
"बिजली की व्यवस्था करवाओ आप सबसे पहले. बिजली की परेशानी है जिससे सब काम रुका है. चौबीस घंटों में केवल सात-आठ घंटे बिजली आती है. शाम को बिजली चाहिए तो मिलती नहीं. रात में 12 या साढ़े 12 बजे बिजली आती है."
"फ़सल पूरी तरह ख़राब हो चुकी है. किसान को क्या मिलेगा? उड़द और सोयाबीन की फ़सल पूरी तरह ख़राब हो चुकी है. किसानों की लागत भी नहीं निकली."
उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले के किसान अपनी समस्याएं बताते हुए बेहद लाचार दिखते हैं. हाथ में मुरझाई फसल के दाने लिए एक किसान कहते हैं कि इस साल तो खेती की लागत भी नहीं निकलेगी, हमारी सारी मेहनत बर्बाद हो गई.
मूल रूप से खेती पर निर्भर उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में किसानों की स्थिति बेहद ख़राब है. लगभग हर साल सूखे की मार झेलने वाले इस इलाक़े में किसानों की मेहनत पर पानी फिर रहा है. सिंचाई के पर्याप्त साधन न होने के चलते फसलें तबाह हो रही हैं.
बुंदेलखंड में उड़द, सोयाबीन और मूंगफली की खेती करने वाले किसान निराश हैं. इस साल सही वक़्त पर बारिश न होने और सिंचाई की व्यवस्था न होने से फसलें ख़राब हो गई हैं. किसानों को चिंता है कि उनकी बची हुई फसल अब आधे दाम में भी नहीं बिकेगी.
बारिश के पानी के जमा रखने का इंतज़ाम न होने से किसानों को खेती के लिए तालाबों और नहरों से पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता. इसके चलते किसान नलकूपों के सहारे खेती करने को मजबूर हैं.
लेकिन यहां भी एक गंभीर समस्या है और वो है बिजली की सही सप्लाई न होना.
खड़ी फसल पर छोड़ दी बकरियां
ललितपुर और महोबा ज़िले के कुछ गांवों के किसानों ने बीबीसी से बातचीत में अपना दुख साझा किया.
महोबा ज़िले के रावतपुरा गांव के संतोष ने मूंगफली की फसल पर अपनी बकरियां छोड़ दीं क्योंकि उनकी फसल बर्बाद हो गई. वो कहते हैं, "पानी न मिलने के चलते फसल ख़राब हो गई है और अब इसमें से उन्हें कुछ नहीं मिलना."
संतोष कुमार कहते हैं, "क्या करें भइया! मजबूरी है. ज़मीन पूरी सूख गई. फसल बर्बाद हो गई. मूंगफली बोई थी, वो सब सूख गई. पानी की व्यवस्था नहीं है. सरकारी मदद भी नहीं मिल रही. क्या करें!"
रावतपुरा गांव की राजकुमारी भी खेती किसानी करती हैं. उनका पूरा परिवार खेती पर ही निर्भर है.
वो भी पानी की समस्या से परेशान हैं. वो बताती हैं कि सूखे के चलते उनकी खेती इस साल बर्बाद हो गई. पानी न मिलने से मूंगफली और उड़द की फसल कमज़ोर हुई, अब उन्हें इसके सही दाम नहीं मिलेंगे.
राजकुमारी कहती हैं, "खेती के लिए पानी नहीं है. पानी की किल्लत की वजह से कहीं मटर बोते हैं तो कहीं राई. गेहूं की फसल के लिए पानी नहीं है. दूसरे से पानी मांगते हैं तो वो भी नहीं देता. सबको अपनी पड़ी है. फसल नहीं होती है तो खाने के लिए अनाज खरीदते हैं."
वो चाहती हैं कि यदि सरकार पानी की व्यवस्था कर दे तो उनकी ज़िंदगी सुधर जाएगी और वो सुकून से रह सकेंगे.
उत्तर प्रदेश सरकार सिंचाई के लिए बांध बनाने की योजनाओं पर काम कर रही है. खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले नलकूपों के लिए सरकार अलग से बिजली कनेक्शन भी देती है. लेकिन बिजली की कटौती की समस्या इतनी अधिक है कि किसानों की फसल को समय रहते पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता.
सूखे की वजह से फसलें बर्बाद होने और सिंचाई के लिए पर्याप्त व्यवस्था न होने के मुद्दे पर महोबा के ज़िलाधिकारी सत्येंद्र कुमार कहते हैं, "सरकार लगातार इस दिशा में काम कर रही है. आने वाले कुछ महीनों में किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकताओं में से एक है."
बिजली कटौती से परेशान किसान
ललितपुर ज़िले के साढूमल गांव के रहने वाले सुरेंद्र कुमार कहते हैं, "किसान परेशान है क्योंकि खेती नहीं हो रही. बारिश न होने की वजह से फ़सलें नष्ट हो गई. सब कुछ ख़राब ही चल रहा है. जब पानी की ज़रूरत है तो फसलों को पानी नहीं मिलता. बिजली की समस्या भी है तो खेती कैसे करेंगे?"
वो बताते हैं कि किसानों को मंडियों में सही भाव नहीं मिल पाते. किसानों को कम दाम में अनाज बेचना पड़ता है. छोटे किसान मंडियों तक पहुंच ही नहीं पाते.
एक किसान ने कहा, "मज़दूरी अब साढ़े तीन सौ रुपये लगने लगी है. ट्रैक्टर की मज़दूरी डीज़ल के दाम बढ़ने की वजह से महंगी हो गई है. आदमी खेती करने के लिए मजबूर है लेकिन ऐसे कब तक झेलेगा. सिंचाई का कोई साधन नहीं हैं- न नहर है न नल की व्यवस्था है, नलकूप तो हैं लेकिन पर्याप्त बिजली नहीं मिलती.''
इसी गांव के कमल कुमार जैन कहते हैं, "डीज़ल-पेट्रोल के दाम बढ़ने से आम आदमी परेशान है. किसान कैसे गुज़ारा करेगा? रसोई गैस के एक सिलेंडर की क़ीमत हज़ार रुपये के करीब हो गई है. ग़रीब आदमी इतनी बड़ी रकम कैसे भरेगा?"
बांध बनने से कई हुए भूमिहीन
ललितपुर ज़िले के धौरीसागर क्षेत्र का सकरा गांव में अधिकतर परिवार ग़रीबी की मार झेल रहे हैं. यहां अनुसूचित जनजाति सहरिया की आबादी काफ़ी है.
खेती के नाम पर गांव के बहुत से लोगों के पास जो कुछ था, वो हाल ही में बने बांध में चला गया और अब वो बाज़ार से अनाज खरीदकर अपना पेट भर रहे हैं.
सकरा गांव के परम सहरिया बताते हैं, "ज़मीन बांध में डूब गई. अब पेट भरने के लिए मज़दूरी करनी पड़ती है. काम मिल गया और मज़दूरी मिल गई तो खाने को कुछ मिल जाता है, वरना भूखे रहते हैं. राशन कार्ड नहीं बना, इसलिए सरकारी राशन भी नहीं मिल पाता."
वो कहते हैं, "पीने के पानी की गंभीर समस्या है. न सड़क है, न सरकारी अस्पताल. अगर किसी की तबीयत ख़राब हो जाए तो यहां से 40 किलोमीटर दूर मड़ावरा ब्लॉक जाना पड़ता है. आने-जाने का कोई साधन भी नहीं. अंधेरे रास्ते में जाते हैं. साधन न मिलने पर पैदल ही जाना पड़ता है. ज़्यादा बीमार आदमी तो रास्ते में ही मर जाता है."
सरकार की ओर से आने वाली योजनाओं के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है. गांव के अधिकतर लोगों को सरकारी योजनाओं का पता नहीं है. गांव के प्रधान पर भी वो पक्षपात का आरोप लगाते हैं.
बीबीसी ने गांव के प्रधान संतोष सहरिया से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.
इस इलाक़े में पानी की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने ललितपुर ज़िले के मड़ावरा ब्लॉक के धौरीसागर गांव में बंडई बांध परियोजना शुरू की है. यहां पर धसान नदी की सहायक बंडई नदी पर 303 करोड़ रुपये की लागत से बांध बनाया गया. ये बांध सिंचाई और पीने के पानी की सुविधा के लिए बनाया गया है. इसी साल 9 मार्च को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस बांध का लोकार्पण किया.
बांध में सैकड़ों किसानों की ज़मीन चली गई. इसका मुआवज़ा भी मिला. हालांकि परम सहरिया जैसे कई लोग हैं, जो कहते हैं कि उनकी ज़मीन बांध के दायरे में आई, लेकिन उन्हें सरकार से मुआवज़ा नहीं मिला.
किसानों के लिए पानी उपलब्ध कराने की योजना
महोबा के ज़िलाधिकारी सत्येंद्र कुमार बताते हैं, "अभी सरकार सिंचाई और पीने के पानी के लिए भी पूरे ज़िले में एक नेटवर्क फैला रही है. सिंचाई का दायरा बढ़ाने की ज़रूरत थी. सिंचाई के लिए पानी न होने की समस्या से निपटने के लिए सरकार की ओर से अर्जुन सहायक परियोजना चलाई जा रही है, जिसके अंतर्गत क़रीब 50 हज़ार हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षेत्र बनाया जा रहा है. इसमें चार बड़े बांध महोबा में बनाए गए हैं और नहरों का लंबा नेटवर्क भी तैयार किया जा रहा है."
हालांकि दिलचस्प संयोग ये है कि ये सब करने के दावे चुनाव के नज़दीक आने पर किए जा रहे हैं. दो-तीन महीनों में इसके लोकार्पण की योजना है.
लेकिन राहत की बात यह है कि बड़ी संख्या में किसानों को पहले ही इससे लाभ मिलना शुरू हो गया है. करीब 2,500 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट से लोगों को पानी मुहैया कराने की योजना है.
डीएम सत्येंद्र कुमार कहते हैं, "पूरे बुंदेलखंड में देखें तो हमारे महोबा ज़िले में पानी की कमी सबसे ज़्यादा है. यहां बारिश का औसत अनुपात पूरे देश का क़रीब आधा है. यहां हमेशा ये समस्या रही है. महोबा ज़िले में कोई बड़ी नदी भी नहीं है. जो नदियां हैं भी वो महोबा ज़िले की सीमा पर हैं. इसलिए पानी की समस्या पुरानी है."
हालांकि वो यह भी कहते हैं कि लोगों को जागरूक होने की ज़रूरत है. अगर लोग बारिश के पानी का संरक्षण करेंगे तो पानी की समस्या कम ही होगी. इसके लिए बीते पांच-सात सालों में खेतों के बीच तालाब बनाए जा रहे हैं.
सत्येंद्र कुमार बताते हैं, "खेतों में तालाब बनाने का काम मनरेगा के तहत भी हो रहा है और भूमि संरक्षण विभाग की ओर से भी काम किया जा रहा है. इसी साल हमने महोबा ज़िले में करीब 2,500 तालाबों पर काम शुरू किया है. इसमें से क़रीब एक हज़ार तालाब बनकर तैयार होने की स्थिति में हैं. बीते कुछ सालों से लगातार रेन वाटर हार्वेस्टिंग के प्रयास किए जा रहे हैं. इसका असर दिख रहा है. कुछ इलाक़े ऐसे हैं, जहां पानी की समस्या बहुत गंभीर थी, अब वहां भूमिगत जल का स्तर बेहतर हुआ है."
हालांकि सरकारी दावों और वादों से इतर हक़ीक़त यह है कि बुंदेलखंड विशेष पैकेज के तहत अब तक हज़ारों करोड़ की राहत राशि दिए जाने के बावजूद यह क्षेत्र सूखे की मार झेल रहा है. पानी के संकट की वजह से यहां के लोगों के हालात बेहतर होने के बजाय बदतर हो रहे हैं.
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