जयंत चौधरी: ‘बाप-दादा की ढहती विरासत’ को यूपी चुनाव में कितना बचा पाएंगे

    • Author, मोहम्मद शाहिद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चार अक्तूबर 2020 को हाथरस में कथित गैंगरेप और हत्या मामले की पीड़िता के परिजनों से मिलने के लिए आरएलडी (राष्ट्रीय लोक दल) का एक दल पीड़िता के घर के क़रीब जमा हुआ था. इसमें आरएलडी के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी भी थे.

मीडिया से बात कर रहे जयंत चौधरी और उनके पार्टी कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने एकाएक लाठीचार्ज शुरू कर दिया. लाठियां खाने और फिर पुलिस से धक्का-मुक्की के बाद आख़िरकार जयंत चौधरी पीड़िता के घर पहुँचने में कामयाब रहे.

इसे मात्र एक संयोग ही कहा जाएगा कि चार अक्तूबर 2020 की इस घटना के ठीक एक साल बाद चार अक्तूबर 2021 को जयंत चौधरी पुलिसवालों को चकमा देकर लखीमपुर खीरी पहुँच गए. वो भी तब जब अधिकतर विपक्षी नेताओं को या तो घर में नज़रबंद कर दिया गया था या उन्हें हिरासत में लिया जा चुका था.

लेकिन इस एक साल के दौरान जिस तरह यमुना में काफ़ी पानी बह चुका है उसी तरह आरएलडी की राजनीति भी काफ़ी करवट ले चुकी है. कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों का प्रदर्शन जारी है और मई 2021 में आरएलडी के तत्कालीन अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह की मौत के बाद अब आरएलडी की राजनीति का पूरा दारोमदार इसके नए अध्यक्ष जयंत चौधरी पर आ गया है.

पिछले साल केंद्र के तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ शुरू हुए किसानों के विरोध प्रदर्शन की एक धुरी जहां पंजाब बना हुआ है वहीं दूसरी धुरी पश्चिमी यूपी है. ख़ुद को किसानों की पार्टी बताने वाली आरएलडी इन प्रदर्शनों से किसी भी क़ीमत पर दूर नहीं रह सकती थी.

इन क़ानूनों के विरोध में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अब तक जितनी भी महापंचायतें और कार्यक्रम होते रहे हैं उनमें आरएलडी के कार्यकर्ता और ख़ुद जयंत चौधरी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं. भाषण के दौरान वो जनता को हाथरस में ख़ुद पर हुए लाठीचार्ज की भी याद दिलाते हैं तो दूसरी ओर 'किसानों के साथ हुए अन्याय' की भी बात करते हैं.

एक तरह से आरएलडी और जयंत चौधरी राज्य की योगी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध जताने का कोई भी मौक़ा चूकने देना नहीं चाहते हैं.

मंगलवार को जब लखीमपुर में मारे गए किसानों की याद में 'अरदास' रखी गई थी तो जयंत चौधरी एक बार फिर वहां पहुँचने के लिए निकल पड़े. इस बार फिर उन्हें यूपी पुलिस ने रोका लेकिन बाद में वो वहां पहुँच गए.

जयंत चौधरी की हालिया पहचान

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई स्थानीय नेताओं का कहना है कि चौधरी चरण सिंह के पोते और अजीत सिंह के बेटे होने के नाते राजनीति का ककहरा जयंत चौधरी काफ़ी पहले ही जानते थे लेकिन सीख अब रहे हैं.

उसका तर्क वो इस तरह देते हैं कि 2009 में मात्र 30 साल की उम्र में वो 'बिना किसी संघर्ष के' संसद ज़रूर पहुँच गए थे लेकिन लगातार दो लोकसभा चुनावों (2014 और 2019) की हार ने उन्हें संघर्ष के लिए ज़मीन पर उतरने को 'मजबूर' कर दिया है.

'मजबूरी' शब्द को वो इस तरह से परिभाषित करते हैं कि 2013 में ही आरएलडी का पारंपरिक वोटर 'जाट' बीजेपी में शिफ़्ट हो गया था जिसके बिना आरएलडी की राजनीति हो ही नहीं सकती है. उसको वापस लाने की जद्दोजहद में जयंत चौधरी लगातार मैदान में बने हुए हैं.

सभी राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर सहमत ज़रूर हैं कि किसानों के प्रदर्शन ने पश्चिमी यूपी में लगभग समाप्ति की ओर बढ़ चुके आरएलडी को एक 'पॉलिटिकल माइलेज' दिया है.

पत्रकार और 'जनज्वार' समाचार वेबसाइट के संपादक अजय प्रकाश कहते हैं कि किसान प्रदर्शनों का थोड़ा बहुत लाभ यूपी चुनाव में जयंत चौधरी को ज़रूर होगा.

वो कहते हैं, "जो पार्टी पश्चिमी यूपी में पिछले दो लोकसभा चुनावों और विधानसभा चुनावों में लगभग समाप्त हो चुकी थी वो इस चुनाव में ज़रूर कुछ पकड़ बना सकती है क्योंकि किसान आंदोलन ने जाटों को और जयंत चौधरी को मज़बूती दी है और उन्होंने अपना राजनीतिक महत्व बरक़रार रखा है. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि जातीय वर्चस्व की लड़ाइयां पूरब से ज़्यादा पश्चिम में मज़बूत रही हैं और जब एक तबक़ा किसी राजनीतिक दल की तरफ़ मूव करता है तो सबके सब उधर ही चल देते हैं."

अजय प्रकाश कहते हैं कि अभी भी चुनाव में चार-पाँच महीने हैं और इस दौरान बहुत सी 'तिकड़में' होंगी जो एक तबक़े को कहीं से कहीं भी शिफ़्ट कर सकती हैं लेकिन जयंत चौधरी जाट नेता के तौर पर पहचान ज़रूर बना चुके हैं.

आरएलडी का अंक गणित

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विधानसभा की तक़रीबन 142 सीटें हैं जिनमें से 23 सीटें ऐसी हैं जहां पर जाट समुदाय की आबादी 60 से 90 हज़ार तक है और वो जीत-हार तय कर सकता है. लेकिन भारतीय राजनीति में केवल एक तबक़े के वोट से ही जीत-हार सुनिश्चित नहीं हो जाती है.

इसी की काट निकालने के लिए आरएलडी हमेशा से जाटों के साथ-साथ मुसलमानों को भी साथ लेकर चलती रही है. 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद जहां जाट आरएलडी से रूठ चुका था वहीं मुसलमान भी 2009 में बीजेपी के साथ गठबंधन में लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद उससे दूरी बनाने लगे थे. रही सही कसर दंगों के बाद पूरी हो गई जब मुसलमानों ने आरएलडी पर भरोसा करना छोड़ दिया था.

शामली ज़िले के अच्छे-ख़ासे मुस्लिम आबादी वाले क़स्बे कांधला के रहने वाले इनाम-उल-हक़ कहते हैं, "मुसलमानों की चौधरियों से नाराज़गी जायज़ थी. उन्होंने दंगों पर कुछ नहीं कहा लेकिन समय के साथ-साथ ज़ख़्म भर जाते हैं. अगर आरएलडी समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है तो मुसलमान उसे ही वोट देंगे."

इनाम-उल-हक़ के तर्क से साफ़ हो जाता है कि अगर आरएलडी सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है तो उसका दूसरा कोर वोटर ग्रुप मुसलमान फिर से उसके पाले में आ सकता है. यही तर्क राजनीतिक विश्लेषक भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए दे रहे हैं.

लेकिन क्या 42 साल के 'युवा नेता' जयंत चौधरी इसी रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं?

आरएलडी से कितनी अलग है जयंत चौधरी की राजनीति

पारंपरिक तरीक़े से राजनीति करने के साथ-साथ जयंत चौधरी ने एक अलग राह भी पकड़ी है. कभी कुर्ता-पायजामा तो कभी पैंट-शर्ट में गले में गमछा डालकर वो रैलियां करते हैं लेकिन पिछले कुछ महीनों में जयंत चौधरी ने जनसंपर्क के जो तरीक़े अपनाए हैं वो अपने आप में ज़रा हट के हैं.

अगस्त महीने से ही न्याय यात्रा, आशीर्वाद यात्रा और लोक संकल्प यात्रा आरएलडी के कार्यकर्ता निकाल रहे हैं.

'न्याय यात्रा' के तहत पार्टी कार्यकर्ता उन-उन जगहों पर गए हैं जहां-जहां दलितों पर अत्याचार हुए हैं. एक तरह से इसे दलित समाज के बीच पार्टी को स्थापित करने के तौर पर देखा जा रहा है. आरएलडी में दलित नेता रहे हैं लेकिन हमेशा से ऐसा माना जाता रहा है कि जाट बहुल पार्टी में सिर्फ़ रिज़र्व सीट से चुनाव लड़ाने के लिए ही दलित नेता रखे गए थे.

आरएलडी के एससी/एसटी सेल के अध्यक्ष प्रशांत कनौजिया कहते हैं कि जयंत चौधरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी ने सोशल इंजीनियरिंग पर काम करना शुरू किया है. इसी के तहत 62 दिन लंबी 'न्याय यात्रा' निकाली गई.

वो कहते हैं, "इस यात्रा के दौरान वो लोग पार्टी में आए जिन्हें पहले लगता था कि ये सिर्फ़ जाटों की पार्टी है और इस मिथ को इस यात्रा से तोड़ा गया है. आरएलडी के यूपी के यूथ विंग के अध्यक्ष भी मुस्लिम हैं तो हमारा मानना है कि हिंदू-मुस्लिम की राजनीति की जगह सिर्फ़ मुद्दे की राजनीति होनी चाहिए."

प्रशांत कनौजिया की मुद्दे की राजनीति वाली बात को आरएलडी की 'लोक संकल्प यात्रा' से समझा जा सकता है. इस यात्रा का मक़सद जनता से बात करके पार्टी के घोषणापत्र को तैयार करना है. पार्टी लगातार घोषणापत्र के कुछ-कुछ बिंदु सार्वजनिक कर रही है. इनको देखकर लगता है कि पार्टी वाक़ई में सोशल इंजीनियरिंग पर काम करते दिख रही है.

इसमें शहरी मज़दूरों को रोज़गार गारंटी देने के लिए 'माननीय कांशीराम शहरी श्रमिक सम्मान योजना', किसानों को 12,000 रुपये सालाना आर्थिक सहायता देने के लिए 'चौधरी चरण सिंह किसान सम्मान निधि', पिछड़ा, दलित और आदिवासी वर्गों के लिए आर्थिक सहायता देने के लिए 'सर्वोदय योजना' जैसी घोषणाएं की गई हैं.

इन योजनाओं का लागू होना दूर की कौड़ी लगती है क्योंकि पश्चिमी यूपी में सिमटी हुई एक पार्टी कैसे राज्य में सरकार बना पाएगी ये तो समझ से परे है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र में इन यात्राओं के ज़रिए जयंत चौधरी एक ईमानदार कोशिश करते हुए ज़रूर नज़र आते हैं.

वहीं पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि आरएलडी का किसी भी दल से गठबंधन उसके इस घोषणापत्र पर सहमति बनने के बाद ही होगा.

यूपी चुनाव से पहले क्या बढ़त हासिल है

उत्तर प्रदेश में चुनाव अगले साल की शुरुआत में हैं लेकिन आरएलडी उससे पहले ही ज़मीन पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में जुटी हुई है और इसकी वजह है उसके पक्ष में बह रही हवा.

किसान आंदोलन, पिता की मौत से उपजी सहानुभूति, और पश्चिमी यूपी में ज़िला पंचायत चुनावों में सपा-आरएलडी के गठबंधन को मिली बढ़त ऐसी घटनाएं हैं जो जयंत चौधरी के पक्ष में माहौल बना रही हैं.

दूसरी ओर उनकी पहचान जयंत चौधरी के नाम से बनी हुई है लेकिन वो अपने नाम का उल्लेख ट्विटर बायो और राजनीतिक पोस्टरों में चौधरी जयंत सिंह के तौर पर करते हैं. एक तरह से इसे चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजीत सिंह की विरासत की फ़ेहरिस्त में ख़ुद को दिखाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.

जाट समुदाय और पश्चिमी यूपी की जनता चौधरी चरण सिंह को किसानों के मसीहा के तौर पर याद करती है और इस बात को जयंत चौधरी अपनी हर रैली में बार-बार जनता को याद भी दिलाते हैं. चौधरी चरण सिंह का पोता होना उनको कोई ख़ास वोट ज़रूर दिलाए या न दिलाए लेकिन ये जनता से उनका एक कनेक्शन जोड़ता है.

इसके अलावा उनके पिता की मौत से उपजी सहानुभूति और आरएलडी में वापस लौटते पुराने नेता भी पार्टी को मज़बूती ज़रूर दे रहे हैं.

मुज़फ़्फ़रनगर के स्थानीय पत्रकार संजीव चौधरी कहते हैं कि चौधरी अजीत सिंह के समय जो पार्टी के बड़े नेता 'ईगो क्लैश' की वजह से पार्टी छोड़ चुके थे वो जयंत चौधरी के पार्टी संभालने के बाद वापस लौट रहे हैं.

वो कहते हैं, "सोमपाल शास्त्री जैसे बड़े नेता ने पार्टी में वापसी की है. यह एक तरह से जयंत चौधरी के लिए प्लस पॉइंट है. बहुत से लोग लोक दल से अपनी राजनीतिक शुरुआत करने के लिए छटपटाते रहे हैं वो भी अब पार्टी में शामिल हो रहे हैं. लोगों को जयंत में संभावनाएं दिखाई दे रही हैं और जयंत अखिलेश की दोस्ती भी अच्छी है. इसको इस तरह से भी प्रमोट करने की चर्चाएं हैं कि जयंत डिप्टी सीएम हो सकते हैं लेकिन यह फ़िलहाल अफ़वाहें हैं."

"जयंत चौधरी इस बार जो प्रयोग करेंगे वही इनकी स्थाई राजनीति का मॉडल बनने जा रहा है. समाजवादी पार्टी के साथ इन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा था और शायद इस बार विधानसभा चुनाव में भी इनका गठबंधन न टूटे तो इससे आरएलडी की गाड़ी एक राजनीतिक दिशा में चल निकलेगी."

संजीव चौधरी कहते हैं, "यह जयंत काल की पॉलिटिक्स का ट्रायल रन है जो जाट और मुसलमानों के हाथों में है. अगर इस बार ये फ़ेल हो जाते हैं तो मुझे नहीं लगता कि छोटे दलों का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कोई वजूद बचेगा."

क्या-क्या हैं चुनौतियां

चौधरी अजीत सिंह के समय ही आरएलडी सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी थी. उससे उसका पारंपरिक जाट और मुस्लिम वोट बैंक छिटक चुका था और जयंत चौधरी को एक तरह से बिना जनाधार का संगठन विरासत में मिला है.

जयंत चौधरी के 'पॉलिटिकल स्किल' का अब तक कोई इम्तिहान नहीं हुआ है. स्थानीय लोग ज़रूर उनकी क़द-काठी और आभा की चौधरी चरण सिंह से तुलना कर देते हैं लेकिन यही चुनाव जिताने के लिए काफ़ी नहीं है.

सहारनपुर ज़िले के एक राजनीतिक विश्लेषक अपना नाम न सार्वजनिक करने की शर्त पर कहते हैं, "जयंत चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पढ़े हुए हैं, वो बिना लाग-लपेट के बात करने में ईमानदार लगते हैं, उनकी छवि बेदाग़ है लेकिन जो राजनीति संघर्ष करके सीखी जाती है वो उन्होंने अब तक नहीं सीखी थी."

अजय प्रकाश कहते हैं कि 'आरएलडी जैसी छोटी पार्टियां अस्तित्व के संकट से गुज़र रही हैं और इनको इस बात का भी भय है कि ये जितना अधिक समय तक सत्ता से बाहर रहीं तो ख़त्म हो जाएंगी, पॉलिटिक्स एक बिज़नेस मॉड्यूल पर चलती है और वो बिज़नेस मॉड्यूल उनके सांसद, विधायक होते हैं. अगर उनकी मौजूदगी विधानसभा और संसद में नहीं है तो उनकी पूछ नहीं होती है.'

इस समय जयंत चौधरी के आगे सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी का राजनीतिक महत्व बनाए रखने की है और वो तभी मज़बूती से बन पाएगा जब उनकी पार्टी के सदस्य विधानसभा और संसद में होंगे. इस समय आरएलडी का सिर्फ़ एक विधायक राजस्थान विधानसभा में है.

राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि जयंत चौधरी के आगे तीन सबसे बड़ी चुनौतियां हैं.

पहली चुनौती समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करना है क्योंकि इसकी आधिकारिक घोषणा अब तक नहीं हुई है. वो कितनी चालाकी से सीट शेयरिंग पर बात करते हैं और ख़ुद के लिए गठबंधन में कितनी सीटें रखवा पाते हैं, यह चुनौती है क्योंकि अकेले चुनाव लड़ने से उनकी पार्टी को कुछ हासिल नहीं हो पाएगा.

दूसरी चुनौती यह है कि वो जाट-मुस्लिम वोट बैंक का कितना इस्तेमाल कर पाते हैं. यूपी ज़िला पंचायत चुनाव में सपा-आरएलडी ने एक प्रयोग के तहत नौ मुस्लिम उम्मीदवार वाली सीटों पर साथ चुनाव लड़ा था लेकिन उसमें से सिर्फ़ एक उम्मीदवार जीता था क्योंकि सभी मुस्लिम उम्मीदवारों पर जाटों का वोट ट्रांसफ़र नहीं हुआ था.

जाट उम्मीदवार वाली सीटों पर मुस्लिम वोटों के आ जाने से ही इस वोट बैंक का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाएगा बल्कि मुस्लिम उम्मीदवारों वाली सीटों पर जयंत चौधरी कितना जाट वोट ट्रांसफ़र करा पाते हैं यह उनके लिए कई चुनौतियों में से एक चुनौती है.

तीसरी चुनौती जयंत चौधरी के आगे ये होगी कि अगर वो गठबंधन करते हैं तो कितनी सीटों पर उम्मीदवार जिता पाते हैं और इसी से उनके भविष्य की राजनीतिक दशा और दिशा तय होगी.

वहीं, किसान आंदोलन के सहारे जयंत महंगाई, बेरोज़गारी, अर्थव्यव्सथा को मुद्दा बना रहे हैं लेकिन किसान आंदोलन की अगुवाई करने वाला भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) खुलकर अब तक आरएलडी के समर्थन में नहीं कूदा है.

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर किसान आंदोलन की अगुवाई कर रहे बीकेयू नेता राकेश टिकैत के गांव सिसौली (मुज़फ़्फ़रनगर) में हाल ही में जयंत चौधरी गए थे जहां पर राकेश के बड़े भाई नरेश टिकैत ने उन्हें पगड़ी पहनाई. इससे यह माना गया कि आरएलडी को उनका समर्थन है लेकिन राकेश टिकैत ने इस पर अब तक कुछ भी नहीं कहा है.

बीकेयू के समर्थकों को आरएलडी का वोटर समझा जाता रहा है लेकिन जयंत चौधरी के आगे चुनौती बीकेयू का मौखिक समर्थन पाने की भी है.

जयंत चौधरी के आगे इनके अलावा जो सबसे बड़ी चुनौती होगी वो ख़ुद सत्तारूढ़ बीजेपी है. बीजेपी को सत्ता बचाने के लिए पश्चिमी यूपी को जीतना उतना ही ज़रूरी है जितना आरएलडी को अपना अस्तित्व बचाने के लिए. बीजेपी की रणनीति क्या होगी और उसकी आरएलडी क्या काट निकालेगी ये देखना दिलचस्प होगा.

संजीव चौधरी कहते हैं, "इस बार का चुनाव काफ़ी रोचक होने जा रहा है और देखना ये है कि बीजेपी किस तरह का प्रयोग करने जा रही है. चुनाव में अभी काफ़ी समय है और हर घंटे में एक्शन सीक्वेंस चेंज होगा, इस दौरान आरक्षण कार्ड से लेकर लोक-लुभावन योजनाओं के पत्ते भी फेंके जा सकते हैं."

हाल ही में योगी सरकार ने गन्ने के समर्थन मूल्यों में प्रति क्विंटल 25 रुपये की बढ़ोतरी की थी जिसके बाद बीजेपी समर्थकों को अपनी पार्टी को किसान हितैषी बताने का एक और तर्क मिल गया था.

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