योगी आदित्यनाथ लखीमपुर हिंसा पर डैमेज कंट्रोल करने में कामयाब रहे या फिर...?

    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले सोमवार से लेकर इस सोमवार के बीच की जिन दो घटनाओं ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो हलचल मचाई है, उससे अंदाज़ा हो रहा है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक गहमागहमी कितनी तेज़ी से बढ़ेगी.

इस गहमागहमी के केंद्र में हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. पहला वाक़या पिछले सोमवार की रात उनके गृह जनपद गोरखपुर के एक होटल में कानपुर के एक कारोबारी की पुलिस की कथित पिटाई से हुई मौत से जुड़ा था. रामगढ़ताल थाने के प्रभारी, गोरखपुर के पुलिस अधीक्षक और ज़िलाधिकारी की भूमिका पर सवालिया निशान लगे.

ऐसी पृष्ठभूमि के बीच योगी आदित्यनाथ दो दिन की यात्रा पर गोरखपुर पहुंचे थे. कानपुर के व्यापारी की मौत के बाद की स्थितियों को उन्होंने बड़ी तेज़ी से संभाला था. उन्होंने व्यापारी की पत्नी को सरकारी नौकरी और 40 लाख रुपये की मदद की घोषणा करके विपक्ष को इसे मुद्दा नहीं बनाने दिया.

हालांकि ज़िले के पुलिस अधीक्षक और ज़िलाधिकारी का समझौता कराने की कोशिशों वाला वीडियो वायरल होने की वजह से उम्मीद की जा रही थी कि इन अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी, लेकिन वह नहीं हुआ.

बहरहाल, रविवार को गोरखपुर के खानिमपुर में जब योगी आदित्यनाथ ने स्थानीय लोगों को पीएनजी गैस कनेक्शन देने की शुरुआत की घोषणा की तो थोड़े सहज मूड में थे. पहले तो उन्होंने स्थानीय सांसद रवि किशन शुक्ला पर चुटकी लेते हुए कहा कि 'उनकी माताजी भोजपुरी में कह रही थीं कि गैस का दाम कितना बढ़ गया है.'

इसके बाद उन्होंने लोगों को समझाया कि पीएनजी से सिलेंडर ढोने की समस्या ख़त्म हो जाएगी, इसे समझाने के लिए हास्य बोध भरे अंदाज़ में योगी आदित्यनाथ बोले, "सिलेंडर ढोना हो तो रवि किशन ले जा सकते हैं, लेकिन शीतल बाबा कैसे ले जाएंगे. अगर सीताराम जी के सिर पर रख कर आप बोलेंगे कि सिलेंडर लेकर चलना है तो बेचारे की क्या हालत होगी?"

योगी आदित्यनाथ दरअसल रवि किशन को गोरखपुर के सहजनवा से बीजेपी विधायक शीतल पांडेय (उम्र 68 साल) और गोरखपुर नगर निगम के महापौर सीताराम जायसवाल (उम्र 71-72 साल) की तुलना में जवान कह रहे थे.

योगी आदित्यनाथ के ट्विटर हैंडल पर इस कार्यक्रम का वीडियो शाम पांच बजकर 49 मिनट पर पोस्ट हुआ है. इसी कार्यक्रम के दौरान उनके पास एक फ़ोन आया और समारोह से थोड़ा हटकर वे 18-20 मिनट तक फ़ोन पर बात करते रहे और वहां मौजूद लोगों ने इस बातचीत के बाद योगी आदित्यनाथ के रवैये में असहजता दिखी.

संभवत: इस फ़ोन से योगी आदित्यनाथ को लखीमपुर खीरी में हुई हिंसक झड़प की पूरी तस्वीर का पता चला क्योंकि इसके बाद उनके अंदाज़ में अचानक कठोरता दिखने लगी.

जब योगी आदित्यनाथ को मिली जानकारी

हालांकि लखीमपुर खीरी में हिंसा की ख़बर उन्हें तीन बजे के आस पास मिल चुकी थी, तब वे डुमरियागंज में एक समारोह में हिस्सा ले रहे थे. डुमरियागंज में उनके कार्यक्रम का वीडियो योगी आदित्यनाथ के ट्विटर हैंडल पर एक बजकर 55 मिनट से शुरू हो रहा है. इस वीडियो में योगी का मंच पर स्वागत हो रहा है और वे क़रीब आधे घंटे तक संबोधन दे रहे हैं, यह वीडियो 40 मिनट का है.

बहुत संभव है कि उन्हें इस हादसे के बारे में शुरुआती जानकारी तीन बजे के आस पास मिली होगी. योगी आदित्यनाथ के टीम के अहम सदस्य के मुताबिक, 'वे डुमरियागंज में थे, तभी उन्हें जानकारी मिली थी, उन्होंने इस मामले पर नज़र रखने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया था.'

गोरखपुर के खानिमपुर में पीएनजी गैस कनेक्शन वाले समारोह के दौरान फ़ोन से उन्हें मामले की गंभीरता के बारे में जानकारी मिली. इसके बाद उन्हें गीता वाटिका में हनुमान प्रसाद पोद्धार जयंती समारोह में भाग लेना था, योगी आदित्यनाथ वहां पहुंचे और क़रीब 18 मिनट तक 'कल्याण' पत्रिका के संपादक रहे हनुमान प्रसाद पोद्दार के 129वीं जयंती पर बोले.

लेकिन इस भाषण की शुरुआत के पहले 17 सेकेंड में योगी आदित्यनाथ एकदम ठिठके नज़र आए. इन 17 सेकेंडों में उन्होंने चार बार माइक को अपने हाथों से ऊपर नीचे किया और फिर बोलने की शुरुआत की. 18 मिनट के भाषण में योगी आदित्यनाथ धर्म और धार्मिक मान्यता पर भी बोले, लेकिन उनके चेहरे पर महज़ एक बार मुस्कान उभरी और कुछ ही पलों में फिर से चेहरे पर कठोरता का भाव आ गया.

इस आयोजन के तुरंत बाद वे एयरपोर्ट की ओर रवाना हो गए. एयरपोर्ट पर स्टेट प्लेन पहले से ही तैयार था. योगी आदित्यनाथ की कोर टीम में शामिल एक अधिकारी ने बताया, "घटना की जानकारी मिलते ही उन्होंने आगे का कार्यक्रम रद्द कर दिया और आठ बजे के क़रीब लखनऊ पहुंच गए थे. गोरखपुर एयरपोर्ट आने के रास्ते में भी वे लगातार निर्देश दे रहे थे."

रात नौ बजे से शुरू हुई मीटिंग

योगी आदित्यनाथ के लखनऊ पहुंचने तक स्थिति स्पष्ट हो गई थी कि इस हिंसक झड़प में आठ लोगों की मौत हो चुकी थी. एक तरफ़ किसानों के प्रदर्शन में शामिल चार किसान थे तो दूसरी ओर दो बीजेपी कार्यकर्ता सहित चार लोगों की मौत हो चुकी थी. कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी लखनऊ पहुंचने वाली थीं. जबकि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेता भी इस मौके पर जल्द से जल्द लखीमपुर खीरी पहुंचने की कोशिश करने लगे थे.

योगी आदित्यनाथ के सामने सबसे बड़ी चुनौती हालात को काबू में रखने के साथ विपक्ष के नेताओं पर भी अंकुश लगाने की थी. चीफ़ सेक्रेटरी राकेश तिवारी, एडिशनल चीफ़ सेक्रेटरी (होम) अवनीश अवस्थी, पुलिस महानिदेशक मुकेश गोयल, डीजी (इंटेलीजेंस) डीएस चौहान और एडिशनल चीफ़ सेक्रेटरी (सीएम) एसपी गोयल मुख्यमंत्री निवास पर पहुंच चुके थे.

वहीं एडिशनल डायरेक्टर लॉ एंड ऑर्डर कुमार प्रशांत, एडिशनल चीफ़ सेक्रेटरी (कृषि) देवेश चतुर्वेदी, आईजी लक्ष्मी सिंह और डायल 112 के अजय पाल शर्मा उससे पहले लखीमपुर खीरी के लिए रवाना हो चुके थे.

इस बैठक की गतिविधियों से अवगत एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "रात नौ बजे से बैठक शुरू हुई, इसमें हर मुद्दे पर बात हुई. इसी बैठक में तय किया गया कि विपक्ष के किसी भी नेता को घटनास्थल पर नहीं पहुंचने दिया जाएगा. बैठक के दौरान एडीजी लॉ एंड ऑर्डर से भी मुख्यमंत्री अपडेट लेते रहे थे."

पांच बजे तक चला मीटिंग का दौर

यह सुनने में भले सहज लग रहा हो लेकिन बैठक के बीच में ही लिए गए फ़ैसलों पर अमल भी हो रहा था. अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी और सतीश मिश्रा को हाउस अरेस्ट करने की तैयारी पर अमल शुरू हुआ, इंटरनेट पर अंकुश लगाने का फ़ैसला भी लिया गया और केवल किसान नेता राकेश टिकैत को वहां पहुंचने की अनुमति देने का फ़ैसला लिया गया.

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कई ज़िलों की पुलिस को हाई अलर्ट पर रखा गया. इतना ही नहीं छत्तीसगढ़ और पंजाब के मुख्यंत्रियों के विमान को लखनऊ एयरपोर्ट पर उतरने की अनुमति भी नहीं देने का फ़ैसला लिया गया. इन बैठकों का दौर सुबह पांच बजे तक चला.

इसके बाद साढ़े नौ बजे सुबह से सारे अधिकारी फिर से योगी आदित्यनाथ के पास पहुंच गए थे, लेकिन योजना के मुताबिक ही प्रशांत कुमार की अगुवाई में टीम किसान यूनियन के नेताओं के साथ समझौता करने में कामयाब रही.

प्रशांत कुमार ने इस समझौते के बारे में बताया कि दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी, मृतक के परिवार को 45-45 लाख रुपये, घायलों को 10 लाख रुपये, मृतक के परिवार के एक सदस्य को स्थानीय स्तर पर योग्यता के मुताबिक़ नौकरी दी जाएगी.

क्या समस्या को संभाल लिया गया?

इस पूरे घटनाक्रम से ऐसा लग रहा है कि योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर से विपक्ष को उतना मौका नहीं दिया कि वे इसे बड़ा मुद्दा बना पाएं.

लेकिन क्या वास्तविकता भी यही है, क्या लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा का मुद्दा पूरी तरह ख़त्म हो जाएगा या फिर यह आने वाले दिनों में योगी आदित्यनाथ की मुश्किलों को बढ़ाने वाला साबित होने वाला है?

इस बारे में समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्रा कहते हैं, "देखिए अपना हक़ मांग रहे किसानों के साथ जो अत्याचार हो रहा है, उसका जवाब तो योगी आदित्यनाथ सरकार को देना होगा. पहले जिस आंदोलन को केवल पश्चिमी यूपी का आंदोलन बताया जा रहा था, आज वह पूरे राज्य का आंदोलन बन चुका है और ये लोग इस सरकार को उखाड़ फेकेंगे."

अभिषेक मिश्रा कहते हैं, "किन लोगों के चलते आम लोगों और किसानों को मुश्किल हो रही है, गोरखपुर की पुलिस ने कानपुर के व्यापारी की हत्या कर दी, क्या कार्रवाई हुई है अब तक और अब तो केंद्र सरकार के मंत्री जी की ज़ुबान और उनके बेटे की करतूत को भी लोग देख चुके हैं."

उत्तर प्रदेश की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता मानते हैं कि योगी आदित्यनाथ की मुश्किलें आने वाले दिनों कम नहीं होंगी.

वे कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ की सरकार ने चाहे वो कानपुर के व्यवसायी की मौत हो या फिर लखीमपुर खीरी की घटना, दोनों जगह डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की है. पैसा और नौकरी देने से ऐसा लगता ज़रूर है कि बात दब गयी, लेकिन इनसे सरकार की छवि पर जो असर पड़ता है वह इतनी जल्दी नहीं जाता."

डैमेज कंट्रोल की कोशिश

शरद गुप्ता यह भी कहते हैं कि अगर उत्तर प्रदेश के चुनाव नज़दीक नहीं होते तो योगी आदित्यनाथ की सरकार डैमेज कंट्रोल इस रफ़्तार से शायद ही करती. वे कहते हैं, "यह डैमेज कंट्रोल इलेक्शन को मैनेज करने की कोशिश है. इस आकलन की वजहें भी हैं, इतना बड़ा हादसा हो गया है और सेंट्रल लीडरशिप की ओर से क्या कुछ कहा गया है, देखिए. किसानों का प्रदर्शन तो दस महीने से चल रहा है, क्या किया गया है उनकी मांगों को लेकर अब तक."

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत और उनके साथी किसानों ने यह स्पष्ट कहा कि है यूपी सरकार के साथ जो समझौता हुआ है उसके तहत आठ दिन के अंदर अभियुक्तों की गिरफ़्तारी करनी है. यही वह पहलू है जहां योगी आदित्यनाथ की सरकार का असली इम्तिहान होना है.

सरकार के सामने अपनी ही पार्टी के सांसद और केंद्र में अमित शाह के गृह मंत्रालय के जूनियर मंत्री अजय मिश्र टेनी और उनके बेटे आशीष मिश्र पर कार्रवाई करने का दबाव है.

हालांकि इन दोनों ने अब तक अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है और ना ही किसान संगठनों की ओर से ऐसी कोई तस्वीर या वीडियो ही सामने आयी है जिससे आशीष मिश्र के हादसे की जगह मौजूद होने की पुष्टि होती हो. हालांकि किसानों को कुचलने का एक वीडियो वायरल हो रहा है उससे यह पुष्टि ज़रूर हुई है कि गाड़ी अजय मिश्र की ही है. इस वीडियो के आने के बाद मंत्री और उनके बेटे पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा है लेकिन यह सब अभी जांच प्रक्रिया से गुजरेगा.

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीम मायावती ने इस आशंका को देखते हुए ही ट्वीट किया है, "दुःखद खीरी काण्ड में भाजपा के दो मंत्रियों की संलिप्तता के कारण इस घटना की सही सरकारी जाँच व पीड़ितों के साथ न्याय तथा दोषियों को सख़्त सज़ा संभव नहीं लगती है."

शरद गुप्ता कहते हैं, "जांच समिति का गठन ही इसलिए किया जाता है. जांच समिति जांच करेगी, फिर अपनी रिपोर्ट देगी और उसके बाद उसकी जो भी अनुशंसा हो, वह करने की बारी आएगी, तब तक तो यूपी का चुनाव निकल जाएगा."

वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता आनंद दुबे कहते हैं, "देखिए यह पूरा मामला ऐसा है कि इसमें कुछ भी प्रथम दृष्टया नहीं कहा जा सकता है, इसलिए न्यायिक जांच ज़रूरी है और हमारी सरकार पारदर्शी जांच में भरोसा रखती है, इसलिए हमारे नेता और उनके समर्थकों के ख़िलाफ़ भी जो तहरीरें आ रही हैं, उसके तहत मुक़दमा दर्ज किया जा रहा है."

बीजेपी को साज़िश की आशंका

आनंद दुबे यह भी दावा करते हैं कि लखीमपुर खीरी की घटना एक साज़िश का हिस्सा है. उन्होंने कहा, "देखिए यह तो कई मौकों पर ज़ाहिर हो चुका है कि किसानों का यह प्रदर्शन किसानों का प्रदर्शन नहीं है बल्कि विपक्षी दलों की मदद से चलने वाला प्रदर्शन है. किसानों के प्रदर्शन का सहारा लेकर विपक्षी दल राज्य सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की साज़िश कर रहे हैं, लेकिन यह होने वाला नहीं है."

वैसे यह जानना दिलचस्प है कि लखीमपुरी खीरी परंपरागत तौर पर बीजेपी का गढ़ नहीं रहा है, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां की सभी आठ सीटों पर बीजेपी को ज़ोरदार जीत मिली थी.

इससे पहले 2007 और 2012 में बीजेपी को लखीमपुर खीरी में तब की सात सीटों में एक-एक सीट ही हासिल हुई थी. इस लिहाज़ से देखें तो लखीमपुर में बीजेपी की स्थिति मज़बूत हुई है और इसी मज़बूती को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार में अजय मिश्र टेनी को गृह विभाग जैसे अहम मंत्रालय में मंत्री बनाया गया है.

लेकिन इस घटना के बाद बीजेपी के सामने दोनों चुनौती है, एक तो अजय मिश्र और उनके परिवार को बचाने की चुनौती और दूसरी ज़िले में पार्टी के दबदबे को बनाए रखने की चुनौती. और इसका असर पूरे राज्य तक नहीं पहुँचे यह भी चुनौती है.

वैसे अजीब संयोग यह है कि लखीमपुर खीरी का मामला योगी आदित्यनाथ की यूपी की राजनीति की दो मुश्किलों को भी जोड़ता है. लखीमपुर खीरी मामले के केंद्र में बीजेपी के दो नेता हैं- एक तो स्थानीय दबंग लेकिन ब्राह्मण नेता अजय मिश्र हैं, जिनको ब्राह्मण कार्ड के तौर पर केंद्र सरकार में शामिल किया गया.

शरद गुप्ता कहते हैं, "अगर योगी सरकार अजय मिश्र और उनके बेटे पर कार्रवाई करती है तो फिर योगी आदित्यनाथ के प्रति बीजेपी के अंदर ही नाराज़गी उत्पन्न हो सकती है. ब्राह्मण समुदाय बीजेपी के साथ तो है लेकिन योगी उनकी पहली पसंद हों, ज़रूरी नहीं है."

वहीं इस आयोजन में शामिल होने वाले दूसरे नेता राज्य के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य हैं. जानकारों के मुताबिक उनके रिश्ते योगी आदित्यनाथ के साथ सहज नहीं हैं. समय समय पर दोनों के बीच खटपट की जानकारी सार्वजनिक होती रही है. हालाँकि केशव प्रसाद मौर्य घटनास्थल तक नहीं पहुँचे, लेकिन अजय मिश्रा के साथ उनके संबंध मधुर रहे हैं.

शरद गुप्ता कहते हैं, "बीजेपी के अंदर भी एक तबका तो है जो योगी आदित्यनाथ की वापसी नहीं चाहता. ऐसी घटनाओं से नुक़सान तो योगी आदित्यनाथ को ही उठाना होगा, इसलिए वे ख़ुद तेज़ी सक्रिय होते हैं."

विपक्ष दलों की सक्रियता

दूसरी ओर लखीमपुर खीरी की घटना को विपक्षी दलों ने भी बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की है. इसमें प्रियंका गांधी दूसरों की तुलना में थोड़ा ज़्यादा प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहीं. मध्य रात्रि में पैदल शीला कौल भवन से बाहर निकल कर वह पुलिस अधिकारियों से लड़ते-भिड़ते सीतापुर तक पहुंचीं ज़रूर, लेकिन वहां से आगे नहीं बढ़ सकीं.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय प्रसाद लल्लू कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ की सरकार एक डरी हुई सरकार है. यह हमारी नेता प्रियंका जी से इतना डर गयी है कि उन्हें 24 घंटे से ज़्यादा समय से क़ैद करके रखा है, उनकी गिरफ़्तारी किस धारा के तहत की गयी है, यह बताने वाला कोई नहीं है, लेकिन जनता सब देख रही है."

वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव अपने घर के बाहर धरने पर बैठे जहां पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार किया, जिसके पर उन्होंने लिखा कि 'ये नहीं गिरफ़्तारी है, ये तो जंग हमारी है.'

अखिलेश यादव की पार्टी के कार्यकर्ता राज्य के दूसरे ज़िलों में भी विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़क पर उतरे और गिरफ़्तारियां दीं. ऐसा विरोध प्रदर्शन बहुजन समाज पार्टी की ओर से नहीं दिखा, जबकि कांग्रेस का सारा अमला सीतापुर पीएसी गेस्टहाउस के आसपास ही नज़र आया जहां प्रियंका गांधी को गिरफ़्तारी के बाद रखा गया था.

यही वो पहलू है जो योगी आदित्यनाथ के लिए राहत की बात लग रही है, लेकिन पिछले सात दिनों में जिस तरह से दो मामले में विपक्षी दलों ने सक्रियता दिखाई है, उससे आने वाले दिनों में ऐसे मामलों के बढ़ने से योगी आदित्यनाथ के लिए भी मुश्किलें बढ़ेंगी.

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता आनंद दुबे कहते हैं, "आप पूरे राज्य में देख लीजिए, योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता के सामने कोई नहीं है. इसलिए उनकी वापसी को कोई नहीं रोक सकता है. इसी वजह से विपक्षी दलों में बेचैनी दिख रही है."

एक तरफ़ लखीमपुर खीरी की घटना ने किसान आंदोलन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से रुहेलखंड और सेंट्रल यूपी तक पहुंचा दिया है, अब विपक्षी दल के सामने इसे पूर्वांचल और बुंदेलखंड के किसानों तक ले जाने की चुनौती है.

वहीं दूसरी ओर यूपी में योगी आदित्यनाथ के लिए मुश्किलें पैदा करने वाले मामले आगे नहीं होंगे, इसका भरोसा कोई नहीं दे सकता. शरद गुप्ता इसकी वजह बताते हैं, "पिछले कुछ सालों में यह साफ़ नज़र आया है कि योगी आदित्यनाथ अपने तमाम फ़ैसलों के लिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर निर्भर हैं. उन पर उनकी पकड़ तो है लेकिन आम नेताओं और लोगों के लिए वह सहज उपलब्ध नहीं हैं."

"दूसरी तरफ़ उनकी पार्टी में ऐसे तमाम नेता हैं जिनके बड़बोलेपन पर या उकसाने वाले बयानों पर कभी अंकुश लगाने की कोशिश नहीं हुई है, तो ऐसे लोगों पर अंकुश लगाने की चुनौती भी आसान नहीं होगी."

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