जाति के आधार पर जनगणना: नीतीश तेजस्वी साथ-साथ, सुशील मोदी की राय अलग क्यों?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जातिगत जनगणना कराने के मुद्दे पर राज्य के प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी से मुलाक़ात की.

प्रतिनिधिमंडल में राज्य की 10 पार्टियों में राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधियों के अलावा बिहार बीजेपी के जनक राम भी शामिल थे. जनक राम बिहार में बीजेपी कोटे से खान एवं भूतत्व मंत्री भी है. 

प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, " प्रधानमंत्री ने हमारी बात ध्यान से सुनी. उन्होंने हमारी बात को नकारा नहीं. अब उन्हें इस पर फ़ैसला लेना है."

ये मुलाक़ात तब हो रही है जब विपक्ष जोर शोर से जातिगत जनगणना का मुद्दा उठा रहा है. नीतीश कुमार की पार्टी केंद्र और राज्य में सरकार में बीजेपी के साथ गठबंधन में है.

जातिगत जनगणना पर बिहार बीजेपी की राय 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नीतीश कुमार के साथ की सोमवार को हुई मुलाक़ात से ठीक पहले बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री और वर्तमान में राज्यसभा सांसद सुशील मोदी ने भी एक के बाद एक छह ट्वीट कर जातिगत जनगणना का समर्थन किया है.

उनका कहना है, "भाजपा कभी जातीय जनगणना के विरोध में नहीं रही, इसलिए हम इस मुद्दे पर विधान सभा और विधान परिषद में पारित प्रस्ताव का हिस्सा रहे हैं. वर्ष 2011 में भाजपा के गोपीनाथ मुंडे ने जाति जनगणना के पक्ष में संसद में पार्टी का पक्ष रखा था. उस समय केंद्र सरकार के निर्देश पर ग्रामीण विकास और शहरी विकास मंत्रालयों ने जब सामाजिक, आर्थिक, जातीय सर्वेक्षण कराया, तब उसमें करोड़ों त्रुटियां पायी गईं. जातियों की संख्या लाखों में पहुंच गई. भारी गड़बड़ियों के कारण उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई. वह सेंसस या जनगणना का हिस्सा नहीं था.

ब्रिटिश राज में 1931 की अंतिम जनगणना के समय बिहार, झारखंड और उड़ीसा एक थे. उस समय के बिहार की लगभग 1 करोड़ की आबादी में मात्र 22 जातियों की ही जनगणना की गई थी. अब 90 साल बाद आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ा फर्क आ चुका है. जातीय जनगणना कराने में अनेक तकनीकी और व्यावहारिक कठिनाइयां हैं, फिर भी भाजपा सैद्धांतिक रूप से इसके समर्थन में है."

सुशील मोदी के साथ जातिगत जनगणना के समर्थन में बीजेपी कोटे से बिहार के उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद भी उतर आए. उन्होंने भी खगड़िया में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा, "बीजेपी को जातिगत जनगणना से आपत्ति कहाँ है? अगर आपत्ति होती तो प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री को मिलने के लिए बुलाते ही नहीं. इस प्रतिनिधिमंडल में भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि शामिल ही नहीं होते. ये तो केंद्र सरकार का विषय है."

बिहार बीजेपी के इन दोनों नेताओं के हालिया बयान के उलट केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने पिछले ही महीने 20 जुलाई 2021 को लोकसभा में दिए जवाब में कहा कि फ़िलहाल केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा किसी और जाति की गिनती का कोई आदेश नहीं दिया है. पिछली बार की तरह ही इस बार भी एससी और एसटी को ही जनगणना में शामिल किया गया है.

ऐसे में सवाल उठता है कि बिहार में तो बीजेपी जातिगत जनगणना के समर्थन में है, लेकिन केंद्र सरकार इस मुद्दे पर अलग राय अलग क्यों दे रही है? 

सोमवार की मुलाक़ात में भी इस मुद्दे पर कोई ठोस आश्वासन प्रधानमंत्री से नहीं मिला है.

इसके लिए जानकार मानते हैं कि बिहार की राजनीति पर गौर करने की ज़रूरत है और ख़ास तौर पर ओबीसी वोट बैंक की राजनीति. ऐसा इसलिए क्योंकि अनुसूचित जाति और जनजाति की गिनती तो जनगणना में हमेशा से होती ही आई है. ओबीसी और दूसरी ऊँची जातियों को गिनती अलग से नहीं होती है. बिहार में सत्ता में जो भी पार्टी आए, उन्हें ओबीसी वोट बैंक की राजनीति करनी पड़ेगी. ये सच सब जानते हैं.

बिहार विधानसभा के आँकड़ों में छिपा गणित

सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि पिछले दो लोकसभा चुनाव में ओबीसी वोट बैंक में बीजेपी ने अच्छी सेंधमारी की है. लेकिन विधानसभा चुनाव में ओबीसी का वही वोट बैंक क्षेत्रीय पार्टियों के साथ नज़र आता है.

यानी ओबीसी वोट बैंक को लेकर राज्यों के चुनाव में बीजेपी उतनी आश्वस्त नहीं है, जितनी आश्वस्त वो 'अपर कास्ट' के वोट को लेकर है. 'अपर कास्ट' का वोट बैंक बीजेपी के साथ हमेशा रहा है, चाहे बीजेपी चुनाव हारे या जीते. लेकिन ओबीसी वोट के साथ बीजेपी अभी भी ये बात दावे के साथ नहीं कह सकती. 

प्रोफ़ेसर संजय कुमार बिहार और उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ओबीसी वोट को दो हिस्सों में बाँटते हैं. एक को वो 'अपर ओबीसी' कहते हैं, जिसमें वो यादवों को रखते हैं और बाक़ी को वो 'लोअर ओबीसी' में रखते हैं. 

उनके मुताबिक बीजेपी ने ओबीसी वोट बैंक में ज्यादा सेंधमारी 'लोअर ओबीसी' में की है. 'अपर ओबीसी' अब भी बिहार में क्षेत्रीय पार्टी आरजेडी के साथ ही है.

लोकसभा और विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के साथ प्रोफ़ेसर संजय कुमार अपनी बात को समझाते हैं.

उनके मुताबिक, "1996 से लेकर 2019 तक बीजेपी का ओबीसी वोट शेयर 20 फ़ीसदी से बढ़ कर 37 फ़ीसद हो गया. वहीं क्षेत्रीय पार्टियों के लिए ये वोट शेयर 41 फ़ीसदी से घट कर 26 फ़ीसदी रह गया. 

लेकिन साल 2020 बिहार के विधानसभा चुनाव की बात करें तो 19 फ़ीसदी ओबीसी वोट बीजेपी को मिला और आरजेडी को 29 फ़ीसदी. अपर ओबीसी यानी यादवों की बात करें तो वहाँ आँकड़े बीजेपी के लिए और भी बुरे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में 3 फ़ीसदी यादवों ( अपर ओबीसी) ने बीजेपी के लिए वोट किया जबकि आरजेडी को 55 फ़ीसदी यादवों का वोट मिला.

इसी मजबूरी में बिहार में बीजेपी जातिगत जनगणना का सपोर्ट कर रही है. प्रदेश इकाई को लगता है कि बिहार में बीजेपी की स्थिति थोड़ी सी भी ख़राब हुई तो ओबीसी वोट ( ख़ास तौर पर लोअर ओबीसी) उनके हाथ से कहीं फिसल न जाए. 

प्रोफ़ेसर संजय कहते हैं कि जब बिहार की दो मुख्य पार्टियां (आरजेडी और जेडीयू) जातिगत जनगणना के समर्थन में हैं, जिसमें से एक ( जेडीयू) सत्ता में उनकी साझेदार है, तो फिर बीजेपी कैसे उस मुद्दे पर विरोध में रह सकती है.

दूसरा डर ये है कि अगर दोनों पार्टियां इस मुद्दे पर दोबारा से एकजुट हो गईं तो बिहार में बीजेपी की राजनीति और मुश्किल हो जाएगी. 

बिहार की राजनीति में आरजेडी, जेडीयू के क़रीब आने की अटकलें भी लगनी शुरू हो गई है. दिल्ली में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव से ये सवाल पूछा भी गया है. 

यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि उत्तर प्रदेश की तरह ही बिहार में भी बीजेपी अकेले अपने दम पर सत्ता में आने का सपना संजोए बैठी है. लेकिन इस बार बहुमत का जादुई आँकड़ा अपने दम वो हासिल नहीं कर सकी. इस वजह से कम सीटों के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बना कर वो सत्ता पर काबिज़ हुई ताकि अपनी कुछ कल्याणकारी योजनाओं का लाभ जनता तक पहुँचा, कुछ नंबर बटोर सके.

बीजेपी की राजनीति में 'अपर कास्ट' फैक्टर

पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ में पूर्व निदेशक डॉ. डीएम दिवाकर कहते हैं कि बीजेपी जातिगत जनगणना पर भ्रम की स्थिति पैदा कर 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स' करते रहना चाहती है.

"अभी अगर बिहार में चुनाव होते, तो राज्य की बीजेपी इकाई के नेता जो कुछ कह रहे हैं, उसका कोई मतलब होता. लेकिन बिहार में बीजेपी अभी जो कुछ कह रही है, वो केवल जनता में भ्रम फैलाने की लिए है. आख़िरकार होगा वही जो केंद्र में बीजेपी कह रही है.

एक बार कर्नाटक में राज्य सरकार ने ऐसी जातिगत जनगणना करवाई थी, लेकिन आँकड़े सार्वजनिक नहीं किए. इसलिए राज्य स्तर पर कोई फ़ैसला हो जाए, ये भी होता नहीं दिख रहा."

प्रोफ़ेसर दिवाकर आगे कहते हैं, "बिहार बीजेपी की मजबूरी है जातिगत जनगणना पर 'हाँ' कहना. अगर वो हाँ, नहीं कहेंगे तो ओबीसी वोट बैंक में सेंधमारी की जो पहल अब तक बीजेपी ने बिहार में की है, वो वोट बैंक दोबारा इनसे छिटक जाएगा.

लालू यादव अब बिहार की राजनीति में एक बार फिर से सक्रिय हुए हैं. बिहार में 'यादव प्लस' का जो वोट बैंक उनके साथ दिख रहा है, उसी को काउंटर करने के लिए दूसरी पार्टियां जातिगत जनगणना का सपोर्ट कर रही है. बिहार में 'पिछड़ी जाति' के बड़े नेता आज भी लालू यादव ही हैं. 

लेकिन बीजेपी, केंद्र में जातिगत जनगणना के समर्मथ में खुल कर सामने आ जाती है कि तो इससे देश भर में उनका 'अपर कास्ट' वोट बैंक छिटक सकता है. 

जातिगत जनगणना कराने का मतलब है आरक्षण के मुद्दे को एक बार फिर से तूल देना और 'अपर कास्ट' आरक्षण के मुद्दे पर हमेशा विरोध में रहती है. उनको लगता है कि जातिगत जनगणना से आरक्षण बढ़ेगा, जिसका सबसे ज़्यादा नुक़सान 'अपर कास्ट' को होगा.

यही वजह है कि बीजेपी केंद्र में इस समय इस पर कुछ नहीं बोल रही है. आरएसएस ने भी इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है."

हालांकि वो आगे इसकी भी आशंका जताते हैं कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के नज़दीक आते ही हो सकता है केंद्र सरकार के सुर बदल जाएं. वहाँ समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंधमारी के लिए बीजेपी को जातिगत जनगणना का समर्थन करते दिखना होगा.

प्रोफ़ेसर दिवाकर के मुताबिक़ बीजेपी की पकड़ 'अपर ओबीसी' में ज़्यादा है. इस मुद्दे पर वो प्रोफ़ेसर संजय कुमार की बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि कोरोना महामारी की वजह से फिलहाल जनगणना का काम रूका हुआ है. 

बीजेपी को जातिगत जनगणना पर राज्य में 'हाँ' और केंद्र में 'न' सूट करता है, ताकि जब जैसी ज़रूरत आए, उस पक्ष का इस्तेमाल किया जा सके. प्रोफ़ेसर दिवाकर इस पूरे मुद्दे को 'राजनीतिक अवसरवाद' की संज्ञा देते हैं.

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