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रवींद्रनाथ टैगोर पर केंद्रीय मंत्री के बयान से क्यों भड़का विवाद?
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
क्या नोबेल पुरस्कार विजेता कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर काले या सांवले थे? और इसी वजह से माता या परिवार के दूसरे लोग उनको गोद में नहीं उठाते थे? पश्चिम बंगाल में बांकुड़ा के बीजेपी सांसद और केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार की मानें तो इन दोनों सवालों का जवाब हां में हैं.
उन्होंने कहीं और नहीं बल्कि उसी विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित एक समारोह में यह टिप्पणी की है, जिसकी स्थापना शांतिनिकेतन में ख़ुद टैगोर ने ही की थी.
बुधवार दोपहर को की गई इस टिप्पणी पर विवाद बढ़ने के बाद सुभाष सरकार ने रात को कहा कि उन्होंने कविगुरु का सम्मान बढ़ाने के लिए ही ऐसा कहा था.
उसके बाद उन्होंने चुप्पी साध ली है. लेकिन पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम के अलावा शिक्षाविदों ने मंत्री की टिप्पणी पर हैरत जताते हुए इसका विरोध किया है. टीएमसी ने तो इसे बंगाल का अपमान बताते हुए केंद्रीय मंत्री से माफ़ी माँगने तक की माँग की है.
क्या है मामला?
केंद्र सरकार में मंत्री बनने के बाद सुभाष सरकार पहली बार शांतिनिकेतन के दौरे पर थे जहां उनके सम्मान में एक समारोह का आयोजन किया गया था.
उनकी टिप्पणी पर बढ़ते विवाद का ज़िक्र करने से पहले यह जानते हैं कि आख़िर उन्होंने कहा क्या था?
बांग्ला में अपने भाषण के दौरान सरकार ने कहा था, "तार मा एबंग बाड़िर अनेके कालो बोले ताके कोले नितेन ना. सेई रवींद्रनाथ ठाकुर भारतेर होए विश्व जय कोरेछेन (उनकी मां और परिवार के दूसरे लोग काले होने की वजह से उनको गोद में नहीं लेते थे. उन्हीं रवींद्रनाथ ने भारत के लिए दुनिया जीती थी.)"
उनका कहना था कि दो तरह की गोरी त्वचा वाले लोग होते हैं. एक जो पीले रंग की आभा के साथ बहुत गोरे होते हैं और दूसरे जो गोरे तो होते हैं लेकिन लाल रंग की आभा का प्रभाव होता है. टैगोर दूसरी श्रेणी के थे. बयान पर विवाद पैदा होने के बावजूद बुधवार शाम को बांकुड़ा में पत्रकारों से बातचीत में भी उन्होंने अपनी टिप्पणी को जायज़ ठहराया.
सरकार ने कहा, "मेरे पास कविगुरु की त्वचा के रंग के बारे में की गई टिप्पणी को साबित करने के लिए दस्तावेज़ हैं."
बीबीसी ने केंद्रीय मंत्री का पक्ष जानने के लिए उनसे संपर्क करने का प्रयास किया. लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका.
तूल पकड़ता विवाद
केंद्रीय मंत्री की टिप्पणी के बाद टीएमसी समेत विभिन्न राजनीतिक दलों और शिक्षाविदों ने इस पर हैरत जताते हुए कहा है कि शिक्षा मंत्री के मुंह से ऐसी टिप्पणी शोभा नहीं देती. इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि आख़िर मंत्री को टैगोर के रंग का ज़िक्र करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?
प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "आख़िर मंत्री को टैगोर की त्वचा के रंग का ज़िक्र करने की क्या ज़रूरत थी? वहां वैसा कोई प्रसंग नहीं था और न ही कोई मौक़ा था."
टीएमसी के सांसद अभिषेक बनर्जी का कहना है, "सुभाष सरकार को इतिहास की कोई जानकारी नहीं है. यह सब जानते हैं कि रवींद्रनाथ की त्वचा का रंग गोरा था. मंत्री की यह टिप्पणी रंगभेदी और बंगाल के महापुरुषों का अपमान है. उनको दोबारा विश्व भारती में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए."
बीरभूम ज़िले, जिसके तहत शांतिनिकेतन है, के टीएमसी प्रमुख अणुब्रत मंडल कहते हैं, "उनको (बीजेपी नेताओं को) टैगोर के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है. इसीलिए वे उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास कर रहे हैं." मंडल का सवाल है कि आख़िर सुभाष बाबू को टैगोर के रंग का पता कैसे चला? क्या वे टैगोर से पहले पैदा हुए थे?
किस आधार पर की टिप्पणी?
सीपीएम ने भी लगभग यही बात कही है. पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "मंत्री की यह टिप्पणी बीजेपी की रंगभेदी और बंगाली-विरोधी मानसिकता की परिचायक है."
उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के दूसरे नेताओं को सरकार के बयान की निंदा करनी चाहिए.
सीपीएम नेता का आरोप है, "बीजेपी धर्म और जाति के आधार पर देश को बांटती रही है. अब उसने समाज को बांटने के लिए त्वचा के रंग को भी मुद्दा बना लिया है."
कोलकाता स्थित रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर रहे पवित्र सरकार कहते हैं, "मुझे नहीं पता कि आख़िर केंद्रीय मंत्री ने किस आधार पर यह टिप्पणी की है. पता नहीं उन्होंने टैगोर की जीवनी ध्यान से पढ़ी है या नहीं. आख़िर मंत्री साबित क्या करना चाहते थे? नोबेल पुरस्कार हासिल करने या कालजयी कृतियां रचने में त्वचा की क्या भूमिका है? शिक्षा मंत्री के मुंह से ऐसी टिप्पणी शोभा नहीं देती."
लेकिन बीजेपी ने सुभाष सरकार का बचाव किया है. पार्टी के प्रवक्ता शमीक भट्टाचार्य का कहना है कि सुभाष सरकार ने रवींद्रनाथ या उनके परिवार के ख़िलाफ़ कोई टिप्पणी नहीं की है. वे त्वचा के रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ़ बोल रहे थे. उनका मक़सद किसी का अपमान करना नहीं था. टीएमसी को हर मुद्दे को राजनीतिक रंग देने से बचना चाहिए.
बीजेपी के वरिष्ठ नेता और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत राय ने भी कहा है कि मंत्री के बयान को बेवजह तूल दिया जा रहा है.
राय कहते हैं, "बंगाली परिवारों में शादी के विज्ञापनों में भी हमेशा गोरे वर-वधू का ज़िक्र किया जाता है. उनकी टिप्पणी रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव और ऐसी सामाजिक मानसिकता के ख़िलाफ़ थी."
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