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राज्यसभा में मॉनसून सत्र के आख़िरी दिन जो हुआ, उस पर रूल बुक क्या कहती है?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इस साल भारत की संसद का मॉनसून सत्र हंगामे की भेट चढ़ गया. दोनों ही सदन, कामकाज के लिहाज से अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए. आँकड़ों की बात करें तो लोकसभा में 21 फ़ीसदी ही कामकाज हो पाया और राज्यसभा में केवल 28 फ़ीसदी काम हुआ.
संसद के दोनों सत्रों को समय से दो दिन पहले ही स्थगित कर दिया गया.
इसके पीछे विपक्ष, सत्ता पक्ष को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है और सत्ता पक्ष के सांसद विपक्षी सांसदों पर दुर्व्यवहार का आरोप लगा रहे हैं.
गुरुवार को केंद्र सरकार की तरफ़ से आठ मंत्रियों ने राज्यसभा में आख़िरी दिन जो कुछ हुआ, उस पर प्रेस कॉन्फ़्रेंस को संबोधित किया.
केंद्र सरकार के मंत्रियों की तरफ़ से विपक्ष पर कुछ आरोप लगाए गए. उनका दावा था कि राज्यसभा में जो कुछ हुआ वो शर्मसार करने वाला था, निंदनीय था और उन्हें (विपक्ष) को घड़ियाली आंसू बहाने के बजाए देश से माफी मांगनी चाहिए.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में 4 अगस्त, 9 अगस्त और 11 अगस्त की घटनाओं का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा गया कि 4 अगस्त को राज्यसभा के सभापति ने टीएमसी के 6 सांसदों को सदन की कार्यवाही से एक दिन के लिए सस्पेंड किया था.
उन सांसदों ने शीशा तोड़ कर अंदर आने की कोशिश की, जिसमें महिला कर्मचारी घायल हो गई. इस बात की शिकायत उन्होंने लिखित में की है और कार्रवाई की माँग की है.
उसके बाद 9 अगस्त की घटना का जिक्र करते हुए कहा गया, "राज्यसभा में जब किसानों के मुद्दे पर चर्चा हो रही थी, कोई बिल पास कराने की कोशिश नहीं हो रही थी, बीजेडी के सांसद बोल रहे थे, उस वक़्त विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया. कुछ सांसद टेबल के ऊपर चढ़ गए. रूल बुक को सभापति के चेयर की तरफ़ फेंका. शुक्र है कोई उस वक़्त चेयर पर बैठा नहीं था. लेकिन साफ़ है कि चेयर और सेक्रेटरी जनरल पर हमला किया गया. सांसदों को लग रहा था कि उन्होंने बहुत अच्छा किया है. वीडियो शूट करा कर ट्वीट भी करा दिया है."
11 अगस्त की बात करते हुए विपक्ष पर ये आरोप भी लगाया गया कि ये धमकी दी गई थी कि ओबीसी बिल के अलावा इंश्योरेंस बिल या कोई और बिल, केंद्र सरकार ने पास कराने की कोशिश की तो अंजाम और बुरा हो सकता है.
हालांकि सत्ता पक्ष के आरोपों पर विपक्ष ने भी संसद से सड़क तक मार्च निकाला और केंद्र सरकार पर विपक्ष के आवाज़ दबाने का आरोप लगाया.
विपक्ष ने भी राज्यसभा के सभापति से मुलाक़ात कर एक ज्ञापन सौंपा जिसमें कहा गया कि राज्यसभा में इंश्योरेंस बिल जब पेश किया गया, उस समय सदन में बाहरी सिक्योरिटी स्टाफ़ को बुलाया गया था जो सुरक्षा विभाग के कर्मचारी नहीं थे. ज्ञापन में कहा गया कि विपक्ष के सदस्यों और ख़ास तौर पर महिला सदस्यों, के साथ बदसलूकी भी की गई.
इसके बाद राज्यसभा के अंदर की ढाई मिनट की क्लिप भी सामने आई, जिसमें धक्का मुक्की की तस्वीरें साफ़ देखी जा सकती थी. क्लिप पर विपक्ष ने निशाना साधते हुए कहा कि जानबूझ कर 'छोटी सिलेक्टिव क्लिप' जारी की गई है, हिम्मत है तो पूरी क्लिप सामने लाएँ.
राज्यसभा के सत्र की समाप्ति के बाद केंद्र सरकार के मंत्रियों की माँग है कि पूरे मामले में शामिल सांसदों पर उच्च स्तरीय कमेटी बना कर जाँच कराई जाए और दोषी पाए जाने पर उन पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई की जाए. तो दूसरी तरफ़ विपक्ष कह रहा है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए वो अपना संघर्ष जारी रखेंगे.
ऐसे में आइए आपको बताते हैं कि राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान हुए हंगामे में शामिल सांसदों पर रूल बुक क्या कहती है?
सांसदों का आचरण
पूरे मामले पर रूल बुक को समझने के लिए हमने बात की विवेक अग्निहोत्री से. विवेक अग्निहोत्री 2007 से लेकर 2012 कर राज्यसभा के सेक्रेटरी जनरल रह चुके हैं.
राज्यसभा के संचालन के लिए अलग से रूल बुक है, जिसमें सांसदों के आचरण का विस्तार से ज़िक्र है.
उस किताब के रूल 235 में सांसदों के व्यवहार के लिए तीन बातों का विवेक अग्निहोत्री ख़ास तौर पर जिक्र करते हैं.
नियमों के मुताबिक़:
• राज्यसभा को संबोधित करते समय सांसद अपनी सीट पर रहेंगे, वहाँ से उठेंगे नहीं.
• जब सांसद बोल नहीं रहे हों या उन्हें बोलने की इजाज़त नहीं है, तो वो शांत रहेंगे.
• सदन की कार्यवाही में किसी भी तरीके का व्यवधान उत्पन्न नहीं करेंगे. इस रूल में अंग्रेजी के 'HISS' शब्द का प्रयोग किया गया है, यानी सांसदों को फुसफुसाकर भी व्यवधान उत्पन्न करने की इजाज़त नहीं है.
अगर ऊपर लिखी किसी भी बात का पालन सांसद नहीं करते हैं तो रूल बुक में सांसद के ख़िलाफ़ एक्शन लेने की बात कही गई है.
नियमों का पालन न करने पर क्या हो सकता है?
रूल बुक में नियमों का पालन नहीं होने पर सांसदों पर तीन तरह की कार्रवाई का ज़िक्र है.
पहला - नियमानुसार आचरण नहीं होने पर चेयरमैन सांसद को सदन छोड़ कर जाने के लिए कह सकते हैं. इसके अलावा सदस्य को सस्पेंड किया जा सकता है. जैसे 4 अगस्त को इस बार के मॉनसून सत्र के दौरान देखा गया. ये सस्पेंशन एक दिन के लिए, कुछ दिन के लिए या पूरे सत्र के लिए हो सकता है.
दूसरा - बात ज़्यादा बढ़ जाए तो मामला कमेटी को रेफ़र किया जा सकता है. इसके लिए राज्यसभा की एथिक्स कमेटी होती है और प्रिविलेज कमेटी भी है.
यहाँ दो बात ग़ौर करने ये है कि सांसदों का दुर्व्यवहार कई तरह का हो सकता है - मसलन किसी सांसद ने पैसे लेकर कर सवाल पूछा हो, दो सांसदों के बीच में कुछ कहासुनी हुई हो, या फिर कुछ सांसदों ने मिल कर हंगामा ही खड़ा किया हो.
आम तौर पर पैसे लेकर सवाल पूछने जैसे मसलों पर एक्शन लेने की ज़िम्मेदारी एथिक्स कमेटी की होती है. लेकिन अगर मामला सांसदों के विशेषाधिकार के हनन का हो तो वो विषय प्रिविलेज कमेटी के पास जाता है.
11 अगस्त में राज्यसभा में जो कुछ हुआ, उस पर विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि ये मामला दोनों ही कमेटियों के पास भेजा जा सकता है. कौन सा विषय किस कमेटी के पास जाएगा, इसके बारे में राज्यसभा के सभापति तय करते हैं. ये उनका विशेषाधिकार होता है.
कमेटी के तमाम सदस्य उस विषय का अध्ययन कर अपना सुझाव सदन को ही भेजते हैं, जिसे स्वीकार करना या अस्वीकार करना सदन पर होता है. राज्यसभा की सभी समितियाँ केवल एक्शन लेने पर सुझाव या सिफ़ारिश ही कर सकती है. सिफ़ारिश में अधिकतम सज़ा सांसद की सदस्यता खारिज़ करने तक की दी सकती है.
हालांकि राज्यसभा में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए किसी सांसद की सदस्यता ख़त्म की गई हो - ऐसा कोई उदाहरण विवेक अग्निहोत्री को याद नहीं है.
इस समय राज्यसभा के प्रिविलेज कमेटी के चेयरमैन हरिवंश हैं और एथिक्स कमेटी के चेयरमैन राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ला है. दोनों ही कमेटियों में अलग अलग पार्टी के 10 सदस्य हैं.
संविधान के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं कि इन दोनों तरीक़े के अलावा एक तीसरा एक्शन भी लिया जा सकता है, पूरे मामले की जाँच के लिए एक अस्थायी कमेटी भी बनाई जा सकती है.
इसी तरह की कमेटी बनाने की बात बीजेपी के मंत्री भी कर रहे हैं. इस कमेटी का गठन और सदस्यों के चयन सभापति कर सकते हैं. हालांकि इनमें से किसी कमेटी पर रिपोर्ट कब तक देनी है इसकी समय सीमा निर्धारित नहीं होती है.
ये तो हुई सदन में सांसदों के व्यवधान उत्पन्न करने पर की जाने वाली संभावित कार्रवाई की बात. लेकिन एक मामला राज्यसभा के सिक्योरिटी स्टॉफ और सांसदों के बीच हुए धक्का मुक्की का भी है, जिसमें सिक्योरिटी स्टॉफ़ को चोट लगने की बात भी कही जा रही है.
राज्यसभा में मौजूद मार्शल या सिक्योरिटी स्टॉफ़ की जिम्मेदारी
विपक्ष का आरोप है कि राज्यसभा में उस दिन कुछ ज़्यादा सिक्योरिटी स्टॉफ मौजूद थे, जो आम तौर पर सदन में नज़र नहीं आते. विपक्ष ने राज्यसभा के सभापति को जो ज्ञापन दिया है उसमें महिला सदस्यों के साथ बदसलूकी का भी जिक्र है.
हालांकि राज्यसभा में सदन के नेता पीयूष गोयल ने इस पर कहा है कि उस दिन मात्र 12 महिला सिक्योरिटी स्टाफ़ और 18 पुरुष सिक्योरिटी स्टॉफ़ यानी कुल 30 स्टाफ़ वहाँ मौजूद थे.
ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर एक समय में राज्यसभा में कितने मार्शल या सिक्योरिटी स्टाफ़ होंगे, ये कौन तय करता है और कैसे तय होता है?
इस पर विवेक अग्निहोत्री कहते हैं कि संसद के दोनों सदनों की सुरक्षा एक होती है. परंपरा के मुताबिक़ दोनों सदनों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लोकसभा स्पीकर की होती है, क्योंकि राज्यसभा के सभापति देश के उप राष्ट्रपति होते हैं. इस वजह से सभी प्रशासनिक ज़िम्मेदारियाँ लोकसभा स्पीकर की होती है जिसमें सुरक्षा भी शामिल है. सिक्योरिटी स्टाफ़ के लिए जो लोग चयनित होते हैं उनमें से कुछ लोगों को राज्यसभा में लगाया जाता है और कुछ को लोकसभा में.
कितने सिक्योरिटी स्टाफ़ एक समय में राज्यसभा में मौजूद होंगे, इस बारे में सुभाष कश्यप कहते हैं कि इसकी संख्या पहले से निर्धारित नहीं होती. ये ज़रूरत के हिसाब से सदन के सभापति तय कर सकते हैं.
सिक्योरिटी स्टाफ़ किसी पक्ष के नहीं होते हैं. उनका काम राज्यसभा के सभापति, टेबल, सदन और संसद की सुरक्षा का होता है.
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