कानपुर में 1984 के सिख दंगों से जुड़े सबूत मिलने का दावा, मकान मालिक ने क्या कहा?

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

कानपुर में साल 1984 में हुए सिख दंगों की जाँच कर रही एसआईटी ने दस अगस्त को दावा किया कि एक घर के दो बंद पड़े कमरों में उन्हें 36 साल पुरानी घटना के कई साक्ष्य मिले हैं जिनमें मानव रक्त और शरीर के कुछ नमूनों के अलावा शवों को जलाए जाने के साक्ष्य भी शामिल हैं.

लेकिन उसी मकान में रह रहे मौजूदा मकान मालिक ने इन सभी दावों को ख़ारिज कर दिया है.

मकान मालिक का कहना है कि उनके पिता ने साल 1990 में यह मकान ख़रीदा था और तब से उनके घर में न तो कोई कमरा बंद पड़ा है और न ही दस अगस्त को आई एसआईटी टीम ने ऐसे कोई साक्ष्य यहां से जुटाए हैं.

एसआईटी ने जिन दो कमरों के बंद होने और वहां से साक्ष्य जुटाने का दावा किया है, बीबीसी की टीम अगले ही दिन जब वहां पहुँची तो उन कमरों में पुताई का काम चल रहा था.

हालांकि विशेष जाँच दल यानी एसआईटी अपनी बात पर क़ायम है.

एसआईटी का क्या है कहना?

एसआईटी के पुलिस अधीक्षक बालेंदु भूषण ने बीबीसी को बताया, "फ़ोरेंसिक टीम को दीवार पर और फ़र्श पर मानव रक्त के नमूने मिले हैं और इनकी पुष्टि भी हुई है. जाँच कर रही टीम ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र किया है. इससे पहले भी जनवरी में एक मकान में ऐसे ही साक्ष्य मिले थे. इन सबसे इस बात की पुष्टि होती है कि यहां हत्या हुई थी."

बालेंदु भूषण कहते हैं कि इन्हीं कमरों में दो लोगों की हत्या हुई थी. उनके मुताबिक़, इस बात को सभी जानते हैं लेकिन एसआईटी ने फ़ोरेंसिक टीम से भी इसकी पुष्टि की है. उनका कहना है कि इससे ज़्यादा अब कोई साक्ष्य मिल भी नहीं सकते हैं क्योंकि घटना इतनी पुरानी हो चुकी है और ज़्यादातर मकान उसी स्थिति में नहीं रह गए हैं, जिस स्थिति में घटना के समय थे.

हालांकि इस सवाल पर एसपी बालेंदु भूषण ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया कि क्या ये दोनों कमरे घटना के बाद से बंद पड़े थे? क्योंकि मकान के मालिक और जाँच टीम के मुआवने के दौरान वहां मौजूद अन्य लोगों ने भी इस बात से साफ़ इनकार किया है कि ये कमरे बंद थे या फिर यहां किसी तरह का कोई साक्ष्य मिला है.

"15-20 मिनट की जाँच में कहां ख़ून के धब्बे मिले?"

कानपुर के दबौली मोहल्ले के एल ब्लॉक स्थित इस मकान के मालिक अंगद सिंह रोषी ने बीबीसी को बताया, "इस मकान को मेरे पिता हरविंदर सिंह ने साल 1990 में ख़रीदा था. पिछले साल मेरे पिता का देहांत हो गया. मुझे बहुत ज़्यादा इसके बारे में मालूम नहीं है. लेकिन जब से यह मकान हमने ख़रीदा है तब से इसका एक भी कमरा बंद नहीं है."

उन्होंने कहा, "एसआईटी और फ़ोरेंसिक टीम मंगलवार को आईं थी. उन्होंने मुझसे और मोहल्ले के कई लोगों से पूछताछ भी की थी. मेरे साथ कुछ पुलिस वाले यहीं बैठे रहे और कुछ लोगों ने अंदर जाकर कुछ जाँच-पड़ताल की. मुझे वहां नहीं आने दिया गया और कहा गया कि मैं यहीं बैठा रहूं. 15-20 मिनट जाँच-पड़ताल करने के बाद टीम चली गई. मुझे नहीं पता कि मेरे घर में कहां उन्हें ख़ून के धब्बे मिल गए, कहां शव जलाने के निशान मिल गए."

"कमरे में 10 साल से पानी का प्लांट लगा था"

दबौली स्थित इस मकान में एक नवंबर 1984 को एक व्यवसायी तेज प्रताप सिंह और उनके बेटे सत्यवीर सिंह की हत्या करने के बाद शव जला दिया गया था. उनके परिवार के अन्य लोग उस समय मकान छोड़कर बाहर चले गए. बाद में यह मकान हरविंदर सिंह ने ख़रीद लिया. हरविंदर सिंह अब जीवित नहीं हैं लेकिन उनके बेटे अंगद सिंह अपने परिवार के साथ यहां रहते हैं.

अंगद सिंह कहते हैं, "जिन कमरों से एसआईटी ख़ून के धब्बे मिलने का दावा कर रही है, उन कमरों में हम लोग पिछले दस साल से पानी का प्लांट चला रहे थे. पिछले साल मेरे पिताजी की मृत्यु हो गई तो हमने प्लांट बंद कर दिया था. अब कमरों की साफ़-सफ़ाई और पुताई कराकर उसे किराये पर देने की तैयारी कर रहे हैं."

दंगों का दंश झेल चुके लोग क्या कहते हैं?

यही नहीं, एसआईटी टीम की जाँच के दौरान 1984 दंगों के कुछ अन्य पीड़ित लोग भी वहां मौजूद थे और उन लोगों का भी यही कहना है कि इन कमरों की स्थिति ऐसी है कि यहां से ख़ून के धब्बों जैसे कोई साक्ष्य मिल ही नहीं सकते हैं.

गुमटी नंबर पाँच के पास दर्शनपुरवा में रहने वाले और जनरल स्टोर के मालिक विशाखा सिंह भी दंगों का दंश झेल चुके हैं. साल 1984 में वो भी दबौली में ही अपने परिवार के साथ रहते थे.

उनके चार भाइयों, एक बहन और माता-पिता समेत परिवार के कुल सात लोग दंगों की भेंट चढ़ गए थे. उस घर में अकेले विशाखा सिंह ही बचे थे जबकि उनके तीन अन्य भाई जो दबौली में ही दूसरे मकान में रहते थे, वो भी बच गए थे.

दर्शनपुरवा में विशाखा सिंह की दो दुकानें भी लूट ली गई थीं. दबौली में एसआईटी टीम अंगद सिंह के घर की जब जाँच कर रही थी उस वक़्त विशाखा सिंह भी वहां मौजूद थे.

विशाखा सिंह कहते हैं, "एसआईटी को न जाने कहां से कौन सा सबूत मिल गया है. तीस साल से घर इस्तेमाल हो रहा है. साफ़-सफ़ाई हो चुकी है, कितनी बार पुताई हो चुकी है, अब वहां कुछ भी मिलने का कोई सवाल ही नहीं है."

वे कहते हैं, "एसआईटी को कुछ न कुछ तो दिखाना ही है, इसलिए बीच-बीच में ऐसी बातें करती रहती है. दूसरी बात, ये सब चीज़ें अब मिल भी जाएं तो उनसे क्या होने वाला है. यह बात तो पहले ही पता चल चुकी है कि तेज सिंह और उनके बेटे को वहीं मारा गया, जलाया गया और घर तहस-नहस कर दिया गया. एसआईटी उसमें क्या नई चीज़ ढूंढ़ रही है? किसने मारा और इन सबके पीछे कौन लोग थे, उसके बारे में चश्मदीद लोगों के भी बयान नहीं लिए जा रहे हैं."

2019 में किया गया था एसआईटी का गठन

सिख विरोधी दंगों की जाँच के लिए दो साल पहले राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया था. हालांकि इससे पहले भी कई तरह की जाँच हुई, कई गवाहों के बयान लिए गए, चश्मदीदों से पूछताछ की गई, कई एफ़आईआर दर्ज हुईं लेकिन लगभग सभी मुक़दमों की फ़ाइलें यह कहकर बंद कर दी गईं कि अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कोई ख़ास साक्ष्य नहीं मिले हैं.

हालांकि एसआईटी के कुछ अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि कुछ लोगों के ख़िलाफ़ बहुत ही महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले हैं और उनकी गिरफ़्तारी भी हो सकती है. लेकिन सिख दंगों के पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे लोगों को इन सब बातों पर ज़्यादा भरोसा नहीं है.

अशोक नगर के रहने वाले सरदार मोकाम सिंह ख़ुद भी इन दंगों के चश्मदीद रहे हैं और उन्होंने अपने परिजनों को भी खोया है. पिछले कई सालों से वो पीड़ितों को न्याय दिलाने और मुआवज़ा दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत में सरदार मोकाम सिंह कहते हैं, "इस केस में एसआईटी को अब बहुत कुछ मिलने की उम्मीद नहीं है क्योंकि मृतकों के ज़्यादातर परिवार तो कानपुर छोड़कर चले गए हैं. शुरुआत में तो एसआईटी वालों ने कोई ख़ास जाँच नहीं की लेकिन पिछले कुछ दिनों से सक्रिय हुए हैं. लेकिन इन्हें भी गवाह और चश्मदीद नहीं मिल रहे हैं. कई लोग गवाही देने से झिझक रहे हैं. लोगों को अब किसी ख़ास न्याय की उम्मीद नहीं है और न्याय अब मिलना भी मुश्किल है क्योंकि बहुत देर हो गई है. जहां तक मुझे पता है एसआईटी के पास भी कोई ख़ास साक्ष्य नहीं मिला है जिससे कुछ हासिल हो सके."

सिख दंगे में मारे गए लोगों और लूट-पाट इत्यादि से संबंधित क़रीब दो दर्जन मामले शहर के अलग-अलग थानों मसलन, गोविंद नगर, बर्रा, फ़ज़लगंज, नौबस्ता इत्यादि में दर्ज हैं.

एसआईटी फ़िलहाल 19 एफ़आईआर की जाँच कर रही है. एसएसपी बालेंदु भूषण के मुताबिक़ अब तक पंजाब, दिल्ली और मध्य प्रदेश के अलावा कानपुर और यूपी के अन्य हिस्सों में कई जगह सौ से ज़्यादा लोगों के बयान दर्ज किए गए हैं.

साठ से ज़्यादा अभियुक्त संदेह के घेरे में थे जिनमें कई लोगों की मौत भी हो चुकी है. इन मामलों में अब तक किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, कानपुर में इन दंगों में 127 लोगों की मौत हुई थी जबकि घटना के प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि मरने वालों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा थी.

दंगों की नए सिरे से जाँच के लिए फ़रवरी 2019 में एसआईटी का गठन किया गया और छह महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया लेकिन क़रीब ढाई साल बीत जाने के बाद भी एसआईटी के हाथ कुछ ख़ास नहीं लग सका है.

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