मेडल जीतीं, दिल भी जीता, लेकिन क्या लोगों की मानसिकता बदलेगी?

रानी रामपाल

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

''लड़की निकर और टी-शर्ट में हॉकी खेलेगी, बाहर जाकर ये करेगी वो करेगी. समाज ने ताने दिए, हमें समझाया''.

रामपाल,रानी रामपाल के पिता

''अपनी बेटी को कहां बाहर भेजोगे, अगर ऊंच-नीच हो जाएगी तो क्या करोगे. बाहर अकेली है, पता नहीं क्या करती होगी?'' कुलदीप सिंह, कमलप्रीत के पिता

ये कुछ ऐसे शब्द थे जिन्हें ज़मीन से उठकर टोक्यो ओलंपिक में अपना लोहा मनवाने वाली लड़कियों और उनके परिवार वालों को सुनने पड़े.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महिला हॉकी टीम को 'शेरनियां' कहा और खिलाड़ियों की हौसला अफ़ज़ाई की. महिला खिलाड़ी चाहे वो महिला हॉकी टीम हो, मीरा चानू , पीवी सिंधु, कमलप्रीत, दीपिका कुमारी हों - सब मीडिया में भी छाई रहीं और इन्हें जमकर प्रशंसा मिली.

प्रधानमंत्री ने अब खिलाड़ियों को 15 अगस्त के मौके पर विशेष अतिथि के तौर पर लाल क़िला आने का निमंत्रण भी दिया है.

महिला हॉकी टीम

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लेकिन क्या आज से दशकों पहले भी महिला खिलाड़ियों के लिए यही जोश दिखता था? आज जो समर्थन और प्रोत्साहन समाज में दिख रहा है वो आगे भी बरक़रार रहेगा? क्या भारतीय संस्कृति के नाम पर महिलाओं पर थोपी गई धारणाएं और मानसिकता बदल जाएगी?

खेल पत्रकार और समाचार पत्र एशियन एज में पूर्व डिप्टी खेल संपादक रह चुकी हरप्रीत कौर लांबा क़रीब दो दशकों से खेल कवर कर रही हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि पहले खेल को एक पेशे के तौर पर नहीं लिया जाता था और महिला खिलाड़ियों की बात करें तो उनकी संख्या भी कम थी. उनसे इतनी ही उम्मीद लगाई जाती थी कि वे अगर क्वालीफ़ाई ही कर लेंगी तो बड़ी बात होगी.

कर्णम मल्लेश्वरी का अनुभव

वेटलिफ़्टर और ओलंपिक पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी भी इस बात से इतेफ़ाक रखती हैं .

उन्होंने फ़ोन पर बीबीसी से बातचीत में एक घटना का ज़िक्र किया. उन्होंने बताया, ''मैं साल 1994 में इस्तांबुल में वर्ल्ड चैम्पियनशिप खेलने गई थी. उस समय यही सोच चल रही थी चीन गोल्ड लेकर जाएगा और सिल्वर और ब्रॉन्ज़ दूसरे लेकर जाएंगे. लेकिन इस चैम्पियनशिप में मुझे सिल्वर मिला. फिर चीन की खिलाड़ी का डोपिंग मामला सामने आया और मुझे गोल्ड मिल गया तो मेरे साथी ही बोलने लगे कितनी किस्मत वाली है देखो. यानी वहां मेरी क़ाबिलियत को नहीं समझा जा रहा था.''

कर्णम मल्लेश्वरी

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श्रीकाकुलम, आँध्रप्रदेश में जन्मी कर्णम मल्लेश्वरी ने साल 2000 में सिडनी में हुए महिलाओं के 69 किलोवर्ग की भारोत्तोलन प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता था और वो मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनी थीं.

उन्होंने बीबीसी के साथ एक और घटना साझा करते हुए बताया, ''साल 1995 में चीन में चैम्पियनशिप हुई और मैंने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया. जब राष्ट्र गान बजाने की बारी आई तो वहां राष्ट्र गान नहीं था तो हमारी टीम और मैंने राष्ट्र गान ख़ुद गाया. तो आप समझ जाइए क्या सोच थी यानी खेल और महिला का पदक लाना एक दूर की बात मानी जाती थी तो फिर जीतने की तैयारी कैसे होती?''

ऐसा नहीं है कि खेल में महिलाएं नहीं आ रही थीं. कर्णम मल्लेश्वरी से पहले पीटी उषा ने धावक के तौर पर अपनी पहचान बना ली थी. वो उड़न परी के नाम से मशहूर थीं. 1982 के एशियन गेम्स और 2002 के कॉमनवेल्थ गेम्स में सोना भारत की महिला हॉकी टीम के हाथ में था.

मीराबाई चानू

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लेकिन पत्रकार हरप्रीत बताती हैं कि पहले महिला खिलाड़ी जब टूर्नामेंट में आती थी तो वो एक बैगेज के साथ आती थीं जिसमें घर की ज़िम्मेदारी, बच्चा संभालना, खेल में करियर लंबा नहीं रखने की सोच, मौक़े सामने होने के बावजूद उन्हें नकार देना क्योंकि परिवार से शादी का दबाव होता था.

वो महिला हॉकी टीम का पुराना दौर याद करते हुए कहती हैं कि अब उन्हें खिलाड़ियों में ज़मीन आसमान का फ़र्क नज़र आता है.

वो बताती हैं, ''पहले महिला हॉकी खिलाड़ी लंबी लेगिंग्स में होती थीं. बातचीत करने पर कम बोलती थीं, ज़्यादातर में आत्मविश्वास की कमी दिखती थी. लेकिन आज की खिलाड़ी ज़्यादा फ़िट, मज़बूत, आत्मविश्वास से भरी हुई हैं, ड्रेसअप में स्टाइल दिखता है और जीत की भावना दिखाई देती है. इसमें ट्रेनर का भी बड़ा योगदान है जो उनकी शारीरिक, मानसिक और बातचीत के तरीकों जैसी क्षमताएं बढ़ाने पर भी काम कर रहे हैं.''

पीवी सिंधु

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साल 2001 में आई नई राष्ट्रीय खेल नीति में खिलाड़ियों को आधुनिक ढांचागत सुविधाएं देने, कोच का स्किल बढ़ाने, नेशनल स्पोर्ट्स फ़ेडेरेशन की कार्यकुशला बढ़ाने के अलावा खेल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया गया था.

पहले कैसा था माहौल

साल 2004 में नेशनल कमीशन फ़ॉर यूथ ने 1947 से पहले और बाद में महिलाओं की खेल में भागीदारी को लेकर रिपोर्ट भी तैयार की थी. इस रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं ने पहली बार ओलंपिक में 1952 में भाग लिया था. इसके बाद सरकार ने खेल में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के लिए साल 1975 में नेशनल स्पोर्ट्स फेस्टिवल फ़ॉर वीमेन का भी आयोजन किया था. हालांकि महिलाएं खेल में आगे आईं, लेकिन इस प्रयास में कुछ ख़ामियां भी नजर आईं.

खेल विश्लेषक नॉरिस प्रीतम मानते हैं कि खेल के मैदान में हम रानी और चानू जैसी खिलाड़ियों का जलवा देख रहे हैं, लेकिन ना जाने इनसे ज़्यादा प्रतिभाशाली लड़कियां रही होगीं जो मौका ना मिलने के कारण पीछे छूट गई हैं. इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं.

वो खिलाड़ियों में आत्मविश्वास बढ़ने के मुख्य कारणों में बेहतर होती ट्रेनिंग की सुविधा और आधुनिक तकनीक को भी अहम मानते हैं.

वो एक घटना बताते हैं, ''एक मैच से पहले मुझसे एक महिला खिलाड़ी ने बड़े संकोच से पूछा कि मेरी विरोधी की ख़ासियत क्या है. यानी पहले इतने साधन नहीं होते थे कि आप अपनी प्रतिद्वंदी के बारे में पूरी जानकारी भी हासिल कर सकें, पर अब खिलाड़ी जागरुक हुए हैं. उनके पास स्मार्ट फ़ोन हैं,आप पुराने मुकाबलों को देख सकते हैं, जो अपनी रणनीति बनाने का एक अच्छा आधार हो सकता है.''

कमलप्रीत

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वो बताते हैं कि पहले कोचिंग सेंटर के होने और वहां जाने के लिए कनेक्टिविटी की दिक्क़त भी होती थी. महिला या पुरुष खिलाड़ी खेल कर घर लौटते थे और अनफ़िट हो जाते थे. उन्हें शुरुआत से कोशिश करनी पड़ती थी, लेकिन अब बेहतर सुविधाएं हैं. सवाल ये है कि आगे क्या किया जाना चाहिए.

वो कहते हैं कि मेडल आने पर लड़कियों को काफ़ी प्रोत्साहित किया जा रहा है. सरकार खिलाड़ियों को सम्मान राशि देने की घोषणा कर रही है और मीडिया में भी ये ख़बरें छा रही हैं. लेकिन इन घोषणाओं पर जब अमल होता है तब रिपोर्टिंग होनी चाहिए क्योंकि घोषणा करने वाले नदारद हो जाते हैं.

वो सवाल उठाते हैं कि आज देश की बेटियां कहा जा रहा है उन्हें खिलाड़ी क्यों नहीं बोला जा रहा? ये केवल एक मिनट का फ़ेम है, लेकिन शेरनियां जब अपना हक़ मांगेंगी तो शेर मैदान छोड़कर चले जाएंगे. मीडिया से भी कौन क्रिकेट छोड़कर इनके मैच कवर करेगा ये भी देखना होगा.

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली पीएन वसंती कहती हैं कि 'ओलंपिक में मेडल लेकर आना वाक़ई में ये मौका लड़कियों के चमकने और उन्हें आदर देने का है. इनसे भावी खिलाड़ी और लोग भी प्रोत्साहित होंगे इसमें कोई शक़ नहीं है. लेकिन लोगों के ज़हन में इसकी याद कितनी देर तक ज़िंदा रहेगी और समाज का रवैया कितना बदलेगा वो अभी कहना मुश्किल है.?

वो कहती हैं, ''आज भी समाज का एक बड़ा तबका लड़कियों को खेल में जाने से रोकता है. अभी भी उनके रोल को किचन और बेडरूम में देखा जाता है. ऐसे में जब तक हम महिला को बराबरी में नहीं देखेंगे तब तक बदलाव नहीं आएगा. इन लड़कियों का प्रदर्शन और जीत, प्रेरणा तो ज़रूर बनेंगे, लेकिन समाज की सोच और धारणा को बदलने में समय लगेगा.''

वीडियो कैप्शन, पीवी सिंधु ने टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीता

इतने सालों में क्या कुछ भी नहीं बदला?

हरप्रीत बताती हैं कि 'मेरी जब भी इन महिला हॉकी खिलाड़ियों से बात हुई तो उसके आधार पर मैं कह सकती हूं कि मौजूदा टीम में भी एक चौथाई लड़कियों पर शादी का दबाव था, लेकिन उन्होंने उन बैरियर्स को तोड़ा है.'

रानी रामपाल के पिता ने बीबीसी से बताया, ''जो लोग हमें ताने देते थे अब उन्होंने अपने बच्चों का हॉकी में दाख़िला करा लिया है और कहते हैं रानी रामपाल बनकर दिखाओ.''

वो कहते हैं ''मैंने पहले रानी को हॉकी खेलने से मना किया क्योंकि मेरे जैसे मज़दूर आदमी के लिए इतना ख़र्च उठाना संभव नहीं था, लेकिन अब मैं यही कहूंगा लड़कियों को रोको मत, वो कुछ करके ज़रूर दिखाएंगी.''

कमलप्रीत के पिता कुलदीप कहते हैं कि कमलप्रीत की लंबाई और कदकाठी मज़बूत थी, उसके नाना भी मेलों में डिसकस थ्रो खेलते थे.

पेशे से किसान कुलदीप कहते हैं, ''कमलप्रीत की मां नहीं चाहती थीं कि वो खेल में जाए, लोग भी तरह-तरह की बात करते थे. लेकिन मुझे अपनी कमलप्रीत पर गर्व है.''

वो फ़ोन पर हंसते हुए कहते हैं, ''जब भी कमलप्रीत सफ़र कर रही होती है तो उसकी मां जागी रहती है और सुमिरन करती है. मां का दिल है डरती है, लेकिन अब वो उसे रोकती नहीं है.''

वीडियो कैप्शन, गुरजीत कौरः पंजाब के गांव से भारत की ड्रैग फ़्लिकर बनने तक का सफ़र

सतबीर कौर बॉक्सिंग कोच हैं. हरियाणा के सिरसा ज़िले से आने वाली सतबीर सीनियर इंडियन बॉक्सिंग टीम के कोच का काम भी देख रही हैं.

वे मानती हैं कि महिला खिलाड़ियों का मेडल लाना उभरती हुई खिलाड़ियों को मोटिवेट करता है. 20 साल पहले जब उन्होंने शुरुआत की थी तो लोग ताने मारते थे कि बाहर जाती है, लड़की है, कुछ ग़लत हो जाएगा. धक्के खा कर वापस लौट आएंगी. लेकिन अब उन्होंने अपने ही गांव में बॉक्सिंग कोचिंग सेंटर खोला है जिसमें 30 से अधिक लड़कियां बॉक्सिंग सीख रही हैं.

खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि खेल का जज़्बा मज़बूत करने के लिए ज़मीनी स्तर पर स्कूल में सुविधाएं देकर शुरुआत करनी होगी और ढांचागत सुविधाओं को मज़बूत बनाना होगा जैसा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और चीन जैसे देश कर रहे हैं.

लड़की अकेले सामाजिक रुढ़ियों और बेड़ियों को तोड़कर देहरी लांघने की हिम्मत तो दिखा रही हैं, लेकिन डर ये है कि अगर उसे खेल के लिए वो सुविधाएं नहीं मिलेंगी जिसकी वो हक़दार है तो ये चमक फीकी पड़ती चली जाएगी और फिर ग़ायब हो जाएगी.

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