केंद्र के 'ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई एक भी मौत' वाले बयान पर सियासत गर्म

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केंद्र सरकार ने मंगलवार को संसद में बताया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से ऐसी कोई सूचना नहीं मिली कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत हुई है. अंग्रेज़ी अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में ये ख़बर प्रकाशित हुई है.
इस पर विरोध होने के बाद स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने ट्वीट किया कि ये आंकड़ा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की रिपोर्ट के आधार पर दिया गया है.
स्वास्थ्य मंत्री से सवाल पूछा गया था कि क्या ऑक्सीजन की कमी से कोविड-19 के मरीज़ों की बड़ी संख्या में सड़क पर और अस्पतालों में मौत हुई थी.
राज्यसभा में सरकार ने बताया कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश कोरोना से होने वाली मौतों की जानकारी नियमित आधार पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को देते हैं. लेकिन किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने ऑक्सीजन की कमी से होने वाली मौत को लेकर जानकारी नहीं दी है.
स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये भी बताया कि पहली लहर के मुकाबले दूसरी लहर में मेडिकल ऑक्सीजन की मांग काफ़ी बढ़ गई थी. पहली लहर में जहां 3,095 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की मांग थी, तो दूसरी लहर में यही मांग 9,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी.
सरकार के इस जवाब पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट करके इसे संवेदनशीलता की कमी बताया. उन्होंने लिखा, "सिर्फ़ ऑक्सीजन की ही कमी नहीं थी. संवेदनशीलता व सत्य की भारी कमी तब भी थी, आज भी है."
वहीं, कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने कहा कि वो स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाएंगे. उन्होंने कहा, "मैं हैरान हूं कि सरकार कह रही है कि ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई. ग़लत जानकारी देकर उन्होंने सदन को गुमराह किया है. हम उनके ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाएंगे.

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14 वैश्विक नेता निशाने पर
पेगासस जासूसी मामले में लीक हुए डेटा से पता चलता है कि दुनिया भर के 14 बड़े नेता भी जासूसी सॉफ़्टेवेयर 'पेगासस' के निशाने पर थे.
इसमें अलग-अलग देशों के मौजूदा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और पूर्व प्रधानमंत्री भी शामिल हैं.
न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' के मुताबिक लीक डेटाबेस से पता चलता है कि एक किंग, तीन राष्ट्रपति और तीन प्रधानमंत्रियों को निशाना बनाया गया था.
मोरक्को के किंग मोहम्मद VI, फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, इराक़ के राष्ट्रपति बरहाम सालीह और दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफ़ोसा के नाम इसमें शामिल हैं.
इनके अलावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान, मिस्र के प्रधानमंत्री मुस्तफ़ा मैदबोली और मोरक्को के प्रधानमंत्री साद-ए-दिन-एल-ओठमानी निशाने पर थे.
इस सूची में सात पूर्व प्रधानमंत्रियों के नंबर भी मिले हैं. जिन्हें तब सूची में शामिल किया गया था जब वो अपने पद पर थे. इनमें लेबनान के साद हरीरी, युगांडा के रुखाना रुगुंडा, अल्जीरिया के नुवेद्दीन बेदुई और बेल्जियम के चार्ल्स मिशेल शामिल हैं.

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एक इसराइली कंपनी 'एनएसओ ग्रुप' ये पेगासस स्पाईवेयर अलग-अलग देशों की सरकारों को बेचती है.
कंपनी के क्लाइंट्स की जिन लोगों में दिलचस्पी थी, उनसे जुड़े 50 हज़ार नंबरों का एक डेटाबेस लीक हुआ है और उसमें 300 से ज़्यादा नंबर भारतीय लोगों के हैं.
'द वायर' के मुताबिक एनएसओ 36 सरकारों को अपना ग्राहक बताती है और कंपनी का कहना है कि इस डेटाबेस का उससे, उसके स्पाइवेयर या क्लाइंट्स से कोई संबंध नहीं है.
मंगलवार को जारी किए एक बयान में एनएसओ ने कहा है कि सूची में शामिल कम से कम तीन नाम इमैनुएल मैक्रों, मोरक्को के किंग मोहम्मद VI और विश्व स्वास्थ्य संगठन के निदेशक कभी भी निशाने पर नहीं रहे.

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जासूसी मामले में पहले भी हुई जांच
पेगासस जासूसी मामले में डेटाबेस लीक होने के बाद विपक्ष सरकार से इस मामले की जांच कराने की पुरज़ोर मांग कर रहा है.
लेकिन, इससे पहले भी जासूसी मामले में जांच की जा चुकी है जिसकी अध्यक्षता कांग्रेस नेता शशि थरूर ने की थी.
अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' के मुताबिक सूचना प्रौद्योगिकी पर एक स्थाई समिति ने 2019 में ऐसे ही एक मामले की जांच की थी जिसमें मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया था कि 121 लोग इस स्पाईवेयर से प्रभावित हुए हैं.
कुडनकुलम परमाणु संयंत्र में भी साइबर हमले की बात सामने आई थी. अख़बार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि परमाणु ऊर्जा विभाग और कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के अधिकारियों ने कहा था कि मलवेयर केवल संयंत्र के संचालन के प्रशासनिक पक्ष में पाया गया था.
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और गृह मंत्रालय ने इसमें सरकार की संलिप्तता को ना तो ख़ारिज किया था और ना स्वीकार किया था.

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सरकार ने ये भी स्पष्ट नहीं किया था कि वो 121 लोग कौन थे और क्या जांच के लिए उनसे संपर्क किया गया.
20 नवंबर 2019 को जब स्थाई समिति इस मुद्दे पर चर्चा करना चाहती थी तो बीजेपी के सदस्यों ने इसका ज़ोरदार विरोध किया था.
उनका कहना था कि इस मुद्दे पर चर्चा करना पैनल के दायरे से बाहर है और अवैध है. एजेंडा पर मतदान के बाद ही चर्चा शुरू हो सकती है.
पैनल के 31 सदस्यों में से केवल 25 ने बैठक में भाग लिया, जिनमें से 12 ने बैठक शुरू करने के ख़िलाफ़ मतदान किया, जबकि 12 ने पक्ष में मतदान किया. अंतिम निर्णायक वोट शशि थरूर ने डाला.
स्थायी समिति ने उन 17 लोगों से भी मुलाक़ात की थी जिन्हें जासूसी के लिए निशाना बनाया गया था. इनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया और जगदीश मेशरम, माओवादी दलित लेखक आनंद तेलतुंबडे, जगदलपुर लीग ऐड ग्रुप की सदस्य शालिनी गेरा और छत्तीसगढ़ आधारित नागरिक अधिकार कार्यकर्ता आलोक शुक्ला शामिल हैं.
पैनल ने इस बातचीत के आधार पर कोई रिपोर्ट नहीं दी थी.

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68 प्रतिशत लोगों में कोविड एंटीबॉडी
इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने मंगलवार को चौथे सीरो सर्वे के आंकड़े जारी किए हैं.
सर्वे के मुताबिक 67.6 प्रतिशत लोगों में कोविड एंटीबॉडी पाई गई है और 40 करोड़ आबादी पर कोरोना का ख़तरा बना हुआ है. ये सर्वे जून-जुलाई के बीच किया गया था.
अंग्रेज़ी अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के मुताबिक ये सीरो सर्वे 28,975 लोगों पर किया गया है जिसमें छह से 17 साल के बच्चों को भी शामिल किया गया है.
इनमें 6 से 9 साल के 2,892 बच्चे, 10 से 17 साल के 5,799 बच्चे और 18 साल से ऊपर के 20,284 लोगों को शामिल किया गया था.
आईसीएमआर को महानिदेशक डॉक्टर बलराम भार्गव ने सर्वे के नतीजे जारी करते हुए कहा कि इस नतीजों में उम्मीद है,़ लेकिन संतुष्ट होने की बात नहीं है. हमें कोविड के अनुरूप व्यवहार बनाए रखना होगा.
इस सर्वे में 45 से 60 साल की उम्र के 77.6 प्रतिशत सबसे ज़्याद लोगों में एंटीबॉडी पाई गई है.
इसमें शामिल किए गए लोगों में 62.2 प्रतिशत लोगों को कोरोना वैक्सीन नहीं लगी थी, 24.8 प्रतिशत लोगों ने वैक्सीन की एक डोज़ और 13 प्रतिशत लोग दोनों डोज़ ले चुके थे.

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बर्ड फ़्लू से पहली मौत
भारत में इस साल बर्ड फ़्लू से मौत का पहला मामला सामने आया है. दिल्ली के एम्स में 12 साल के बच्चे की बर्ड फ्लू से मौत हो गई है.
अंग्रेज़ी अख़बार 'मिंट' में बताया गया है कि बच्चे की मौत के बाद उसका इलाज करने वाले एम्स के स्टाफ़ को आइसोलेशन में रखा गया है.
दिल्ली में पिछले साल कई जगहों पर पक्षियों में बर्ड फ़्लू के मामले सामने आए थे. इस फ़लू से इंसानों के संक्रमति होने के बहुत ही कम मामले पाए जाते हैं, लेकिन इसके कुछ प्रकारों को इंसानों के लिए घातक भी बताया जाता है.
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