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पश्चिम बंगाल: एनएचआरसी की गोपनीय रिपोर्ट आख़िर कैसे लीक हुई?
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद की हिंसा के आरोपों की जाँच के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की सात सदस्यीय टीम ने अपनी रिपोर्ट में राज्य की टीएमसी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कई कड़ी सिफ़ारिशें की हैं.
लेकिन अब इस बात पर विवाद बढ़ रहा है कि आख़िर सीलबंद लिफ़ाफ़े में अदालत को सौंपी गई यह गोपनीय रिपोर्ट लीक कैसे हो गई?
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पर गहरी नाराज़गी जताई है. उनका कहना है कि जिस आयोग में बीजेपी के कार्यकर्ता भरे हों, उससे यही उम्मीद थी. तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि सरकार की छवि ख़राब करने के लिए ही उस रिपोर्ट को जानबूझ कर ऑनलाइन लीक किया गया है.
अब सरकार अगली सुनवाई से पहले इस रिपोर्ट पर अपना हलफ़नामा दायर कर मज़बूती से अपना पक्ष रखने और इसमें लगे तमाम आरोपों को बिंदुवार खंडन करने की तैयारी कर रही है.
दूसरी ओर, आयोग ने बृहस्पतिवार शाम को जारी एक बयान में इस आरोप का खंडन किया है. उसका कहना था कि यह रिपोर्ट इस मामले से जुड़े वकीलों के साथ शेयर की गई थी. आयोग के स्तर पर कोई लीक नहीं हुआ है.
कैसी बनी एनएचआरसी की टीम
राज्य में विधानसभा चुनाव के बाद कई इलाक़ों में हिंसा और आगज़नी की ख़बरें सामने आई थीं. बीजेपी ने इस हिंसा के लिए टीएमसी को ज़िम्मेदार ठहराते हुए अपने दर्जनों कार्यकर्ताओं के मारे जाने और हज़ारों के बेघर होने का दावा किया था.
इस मुद्दे पर हाईकोर्ट में कई जनहित याचिकाएं भी दायर की गई थीं. उन पर सुनवाई के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने बीते 18 जून के अपने फ़ैसले में हिंसा के मामलों की जाँच आयोग से कराने का निर्देश देते हुए सरकार को इसमें सहयोग करने को कहा था.
राज्य सरकार ने अदालत के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका भी दायर की थी. लेकिन उसे ख़ारिज करते हुए अदालत ने सरकार की कड़ी आलोचना की थी. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल ने साफ़ कहा था कि अदालत को इस मामले में सरकार पर भरोसा नहीं है.
उन्होंने सवाल किया था कि आख़िर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जाँच पर सरकार को आपत्ति क्यों है? पाँच जजों की बड़ी बेंच ने कहा था कि पहले तो राज्य सरकार हिंसा के आरोपों को स्वीकार नहीं कर रही है. लेकिन अदालत के पास ऐसी कई घटनाओं के सबूत हैं.
अदालत के निर्देश पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हिंसा के कथित मामलों की जाँच के लिए आयोग के सदस्य राजीव जैन की अध्यक्षता में एक सात-सदस्यीय टीम का गठन किया था.
इस टीम ने 20 दिनों के दौरान राज्य के 311 स्थानों का दौरा कर हिंसा से प्रभावित लोगों से बातचीत की थी और 13 जुलाई को अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. लेकिन उसके दो दिनों के भीतर ही यह रिपोर्ट लीक हो गई.
क्या है रिपोर्ट में?
50 पेज की अपनी रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि बंगाल में क़ानून का शासन नहीं, बल्कि शासक (टीएमसी) का क़ानून चल रहा है.
उसने हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों की जाँच सीबीआई से कराने की सिफ़ारिश करते हुए कहा है कि यह मुख्य विपक्षी दल के समर्थकों के ख़िलाफ़ सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों की ओर से की गई बदले की हिंसा थी. इस वजह से हज़ारों लोगों के जीवन और आजीविका में मुश्किलें पैदा हुईं.
आयोग ने हिंसा के मामलों की सुनवाई राज्य से बाहर करने की सिफ़ारिश की है. रिपोर्ट में ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली सरकार की तीखी आलोचना करते हुए आरोप लगाया गया है कि वह चुनाव के बाद हुई हिंसा को रोकने में नाकाम रही है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में जिस तरह से हिंसा हुई है, उससे ऐसा लगता है कि यह संगठित अपराध था और राज्य सरकार पीड़ितों को लेकर चिंतित नहीं थी. हिंसा के दौरान राज्य सरकार के कुछ लोग और संगठन मूकदर्शक बने बैठे रहे.
आयोग ने राज्य सरकार के एक मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक समेत टीएमसी के कई नेताओं को अपराधी क़रार दिया है.
रिपोर्ट लीक पर विवाद
इस रिपोर्ट के लीक होने पर विवाद लगातार बढ़ रहा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि बंगाल को बदनाम करने की राजनीतिक साज़िश के तहत ही रिपोर्ट को ऑनलाइन लीक किया गया है.
उनका कहना है कि बीजेपी अब भी अपनी हार पचा नहीं पाई है और इसलिए इस तरह के हथकंडे अपना रही है.
रिपोर्ट लीक होने की ख़बरें सामने आने के बाद बृहस्पतिवार को यहां पत्रकारों से बातचीत में टीएमसी प्रमुख ने राज्य सरकार के विचार जाने बिना एनएचआरसी की सिफ़ारिशों पर हैरानी जताई.
उनका कहना था, "बीजेपी अब हमारे राज्य की छवि ख़राब करने और राजनीतिक बदला लेने के लिए निष्पक्ष एजेंसियों का सहारा ले रही है. एनएचआरसी को अदालत का सम्मान करना चाहिए था. मीडिया में रिपोर्ट को लीक करने के बजाय उसे पहले इसे अदालत में दाख़िल करना चाहिए था."
दूसरी ओर, रिपोर्ट में हिंसा के अपराधी क़रार दिए गए टीएमसी के वरिष्ठ नेता और राज्य सरकार के मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक ने इस पर हैरानी जताते हुए पार्टी से सलाह-मशविरा कर क़ानूनी कार्रवाई करने की बात कही है.
वह कहते हैं, "मैं रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों से हैरान हूं. पता नहीं आयोग को यह सूचना कैसे और कहां से मिली? मेरे ख़िलाफ़ देश के किसी भी थाने में कोई एफ़आईआर या शिकायत तक दर्ज नहीं है."
अपराधियों की सूची में शामिल नंदीग्राम के टीएमसी नेता शेख़ सुफ़ियान कहते हैं, "आयोग की टीम ने बीजेपी के कथित समर्थकों के घरों का ही दौरा किया था. हिंसा में हमारा एक समर्थक भी मारा गया था. लेकिन टीम के सदस्य उसके घर नहीं गए. मुख्यमंत्री का चुनाव एजेंट होने की वजह से ही रिपोर्ट में मुझे अपराधी बताया गया है."
राजनीतिक पर्यवेक्षक समीरन पाल कहते हैं, "रिपोर्ट से पता चलता है कि इनमें उन तमाम आरोपों को सही ठहराया गया है जो बीजेपी दोहराते आ रही थी. इससे साफ़ संकेत मिलता है कि इसे राजनीतिक बदले की भावना से तैयार किया गया है."
"इसमें सिर्फ़ उन लोगों का ही ज़िक्र है जो बीजेपी के कार्यकर्ता या समर्थक थे. सरकार के ख़िलाफ़ जिस तल्ख़ भाषा में टिप्पणियां की गई हैं वह भी अप्रत्याशित है."
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