पीवी नरसिम्हा रावः 65 की उम्र में कंप्यूटर, मौत से छह महीने पहले की-बोर्ड पर महारत

    • Author, बल्ला सतीश
    • पदनाम, बीबीसी तेलुगु संवाददाता

बात 1986 की है. राजीव गांधी तब भारत के प्रधानमंत्री थे. पीवी नरसिम्हा राव तब रक्षा मंत्री थे. राजीव गांधी की तरह ही पीवी नरसिम्हा राव का भी टेक्नोलॉजी के प्रति झुकाव था. हालांकि, नरसिम्हा राव को तब तक कंप्यूटर का ज्ञान नहीं था. वहीं राजीव गांधी को उसकी अच्छी समझ थी. राजीव अपने कक्ष में एक मित्र से बात कर रहे थे. नरसिम्हा राव भी तब पास ही मौजूद थे.

राजीव अपने मित्र से कह रहे थे कि वे इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटरों के आयात की अनुमति देना चाहेंगे. इसके बाद राजीव ने कहा, "पता नहीं पार्टी के पुराने सदस्य इसे कैसे लेंगे. उस पीढ़ी को टेक्नोलॉजी के बारे में कम समझ है."

नरसिम्हा राव ने उनकी ये पूरी बातें सुनीं.

उसी शाम नरसिम्हा राव ने अपने बेटे प्रभाकर राव को हैदराबाद फ़ोन किया.

अभी क़रीब 15 दिन ही हुए थे जब उनके बेटे ने अपने पिता को बताया था कि कैसे उनकी कंपनी कंप्यूटर के इस्तेमाल को लेकर एक शोध प्रस्तावित करना चाहती है.

नरसिम्हा राव को ये याद रहा. उन्होंने फ़ोन पर अपने बेटे से पूछा, "तुमने कंप्यूटर टेक्नोलॉजी के बारे में बात की थी? क्या तुम्हारे पास वो सैंपल मौजूद हैं. अगर हैं, तो एक सैंपल मुझे भेजो."

प्रभाकर राव हैदराबाद में अपनी कंपनी चलाते थे. वे टीवी और कंप्यूटर से जुड़ी एक यूनिट स्थापित करने की योजना बना रहे थे. उन्होंने कुछ स्पेयर पार्ट्स के साथ तीन प्रोटो टाइप डेस्कटॉप पहले ही बना रखे थे. इसके बाद उन्होंने टीवी के बिजनेस में कदम रखा.

पीवी नरसिम्हा राव के फ़ोन करने के बाद प्रभाकर राव ने उन तीन में से एक कंप्यूटर दिल्ली भेजा. साथ ही उन्होंने अपने पिता को कंप्यूटर का इस्तेमाल सिखाने के लिए एक टीचर की व्यवस्था भी की.

इस प्रकार 65 वर्ष की आयु में नरसिम्हा राव के कंप्यूटर सीखने की शुरुआत हुई.

नरसिम्हा राव के बेटे प्रभाकर राव बीबीसी से कहते हैं, "उन दिनों कंप्यूटर के कलपुर्जों को आयात कर यहां जोड़ने का काम हुआ करता था. जहां तक याद है मुझे, वो आईबीएम का क्लोन कंप्यूटर था."

लेकिन नरसिम्हा राव को अपने कंप्यूटर टीचर पसंद नहीं आए. फिर उन्होंने अपने बेटे को कंप्यूटर चलाना सीखने के लिए मैनुअल और कुछ उपयोगी किताबें भेजने को कहा.

पीवी नरसिम्हा राव को टेक्नोलॉजी की समझ थी. उन्होंने उन किताबों से पढ़ कर कंप्यूटर का इस्तेमाल सीखना शुरू कर दिया.

छह महीने में पूरा नज़ारा बदल गया

छह महीने लगातार सुबह, शाम वे कंप्यूटर सीखने में लगे रहते. छह महीने के बाद उन्होंने अपने बेटे को फ़ोन किया और बताया कि उन्होंने कंप्यूटर का उपयोग करना अच्छी तरह सीख लिया है.

सामान्य ज़रूरतों के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल ही नहीं बल्कि उन्होंने कोडिंग और प्रोग्रामिंग भी सीख ली थी. तब कंप्यूटर के लिए कोबोल और बेसिक जैसी प्रोग्रामिंग लैंग्वेज प्रचलित थीं और नरसिम्हा राव ने उन्हें सीख लिया था. उन्होंने ऑपरेटिंग सिस्टम यूनिक्स में कोडिंग भी सीख लिया था.

प्रभाकर कहते हैं, "इसके बाद से अपने ख़ाली समय में जब भी राजीव गांधी और नरसिम्हा राव के बीच बातचीत होती थी तो ये टेक्नोलॉजी पर हुआ करती थी. क्योंकि दोनों को टेक्नोलॉजी और कंप्यूटर में विशेष रुचि थी. वे कंप्यूटर और उसके लेटेस्ट ट्रेंड पर बातें करते थे."

जब बेटी को कंप्यूटर में पेटिंग करने कहा

तेलंगाना की विधायक (एमएलसी) पीवी नरसिम्हा राव की बेटी सुरभि वाणी देवी अपने पिता के कंप्यूटर ज्ञान को याद करते हुए बताती हैं, "एक बार मैं किसी काम से दिल्ली में थी. संसद जाते वक़्त, उन्होंने मुझे कंप्यूटर में पेंटिंग बनाने के लिए कहा. उन दिनों कंप्यूटर में पेंटिंग ब्रश के साथ एक बेसिक प्रोग्राम हुआ करता था (शायद एमएस पेंट). उन्होंने मुझसे उसमें पेंटिंग बनाने को कहा. मुझे कंप्यूटर के एबीसीडी की जानकारी तक नहीं थी."

सुरभि कहती हैं, "जब मैंने उन्हें ये बात बताई तो उन्होंने वहीं पड़े कंप्यूटर मैनुअल को उठाने और पढ़ने और उसकी सहायता से पेंटिंग बनाने को कहा. इतना ही नहीं उन्होंने मुझे एक फ्लॉपी देते हुए उसमें की गई पेंटिंग को सेव कर लेने को कहा. मुझे कुछ समझ नहीं आया. मैंने मन ही मन सोचा कि मैनुअल पढ़ कर भला कोई कंप्यूटर कैसे सीख सकता है. आज भी मेरे पास उस कंप्यूटर की फ्लॉपी है. उस दिन तो मैंने जैसे तैसे काम कर लिया लेकिन उसे फ्लॉपी में सेव नहीं कर सकी. लेकिन मैं खुश थी कि मुझे कंप्यूटर छूने दिया गया."

नरसिम्हा राव के बेटे प्रभाकर कहते हैं कि उनके पिता की लाइब्रेरी में कंप्यूटर की कई किताबें भरी पड़ी थीं.

वे कहते हैं, "2002 में एक दिन उनके कंप्यूटर में हार्डवेयर की एक समस्या पैदा हुई और उसे ठीक करने वाला टेक्निशियन उपलब्ध नहीं था. फिर उन्होंने मैनुअल पढ़ कर कंप्यूटर को ख़ुद ही ठीक कर लिया."

अपडेट की समस्या

प्रोफ़ेसर विनय सीतापति ने अपनी किताब 'हाफ लायन' में लिखा है कि पीवी नरसिम्हा राव कंप्यूटर कितने जानकार थे.

आईटी एशिया सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान उन्होंने कंप्यूटर की अपनी जानकारी जाहिर की. आज की तारीख़ में हर कोई जो कंप्यूटर और स्मार्ट फ़ोन इस्तेमाल करता है वह अपडेट की समस्या से वाकिफ है.

उस सम्मेलन में उन्होंने भी इसी मुद्दे पर अपनी नाराज़गी जाहिर की थी.

आईटी एशिया सम्मेलन में उनका भाषण एक शिकायत की तरह था.

उन्होंने कहा था, "मैं वर्ड के एक वर्जन का इस्तेमाल करता हूं. उसके अपडेट वर्षों तक आते रहते हैं. लेकिन जब मैं अपडेट करता हूं, तो उसमें कोई ख़ास अंतर नहीं दिखता. हमें इन अपडेट्स को लेकर सतर्क रहना चाहिए. अगर हम चार अपडेट न करें और पांचवा करते हैं तो यह उपयोगी हो सकता है. तब ये अपडेट की तरह दिख सकता है. साफ़्टवेयर कंपनियाँ इसे ग़लत भावना से न लें." लेकिन नरसिम्हा राव को इस समस्या का सामना करना पड़ा.

प्रणब दा के संस्मरण से...

2012 में एक निजी मीडिया कंपनी, हैदराबाद मीडिया हाउस की एक बैठक में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक दिलचस्प बात सुनाई.

उन्होंने बताया कि वे कंप्यूटर से परिचित नहीं थे और इसलिए पीवी नरसिम्हा राव उन्हें छेड़ा करते थे.

प्रणब मुखर्जी के शब्दों में, "पीवी नरसिम्हा राव एक अच्छे ड्राफ्ट्समैन थे. बिना उनके देखे कांग्रेस पार्टी से जुड़ा कोई भी पेपर बाहर नहीं आता था. हालांकि 1991 के घोषणापत्र की प्रारंभिक कॉपी मैंने तैयार की जिसे उन्होंने अंतिम रूप दिया."

उन्होंने कहा, "टेक्नोलॉजी उनके जुनून में से एक थी. वे कंप्यूटर से बहुत अच्छी तरह वाकिफ थे. लेकिन मैं उस तरह से नहीं था. कभी कभी जब मैं उनके पास हाथ से लिए दस्तावेज़ ले जाता तो वे उन्हें अस्वीकार करते हुए डिस्केट में सॉफ़्ट कॉपी भेजने को कहते थे. मैं उससे भली भांति परिचित नहीं था. लेकिन उन्हें ये वैसे ही पसंद था. उनकी तब की उस सोच का परिणाम आज हम देख रहे हैं."

सॉफ़्टवेयर उद्योग रहा सुधारों का हिस्सा

विनय सीतापति ने 'हाफ लायन' के कुछ और अध्यायों में कंप्यूटर के साथ पीवी नरसिम्हा राव के जुड़ाव के बारे में लिखा है.

"पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से बहुत ज़्यादा नहीं बोलते थे लेकिन अपनी भावनाओं को वे डिजिटल डायरी में गुप्त रूप से लिखा करते थे. मई 1991 में उन्होंने दिल्ली छोड़ने का फ़ैसला लिया. अपनी बहुत सी किताबें, कंप्यूटर, प्रिंटर सावधानी से एक ख़ास बक्से में पैक करके उन्होंने भिजवाए. अपनी लाइब्रेरी में वे लैपटॉप पर टाइप किया करते थे. जब वे प्रधानमंत्री थे तब भी उनके शयन कक्ष के बगल में एक कंप्यूटर कक्ष हुआ करता था. न्यूज़पेपर आने से पहले का समय वे कंप्यूटर पर काम करते हुए बिताते थे."

वे जिन क्षेत्रों में बदलाव लाए उसका हिस्सा सॉफ़्टवेयर उद्योग भी था.

82 साल की उम्र में डीटीपी और फॉन्ट की शिक्षा

उनकी तेलुगु संस्करण की आत्मकथा में कुछ बदलाव करने के लिए एक पब्लिशिंग हाउस ने पुरुषोत्त कुमार को दिल्ली भेजा.

नरसिम्हा राव ने उससे अलग अलग फॉन्ट के उपयोग और कंप्यूटर में भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल कैसे करें, ये सीख लिया.

तब लीप ऑफिस हुआ करता था. इस प्रोग्राम को भारत सरकार के 'सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग' ने विकसित किया था.

पुरुषोत्त कुमार बताते हैं कि नरसिम्हा राव ने इसकी बारीक जानकारी हासिल की. हालांकि दिल्ली में जिस काम के लिए मुझे भेजा गया था वो ख़त्म हो गया था लेकिन मुझे भारतीय भाषाओं का उपयोग करते हुए पीवी नरसिम्हा राव को डीटीपी पढ़ाने के लिए रुकना पड़ा.

तेलुगू में फाइल कैसे क्रिएट और ओपन करें. कैसे डाउनलोड करें. फॉन्ट कैसे बदलें, लेआउट कैसे बनाएं, आदि. ये सब उन्होंने सीखा. बाद में जब नरसिम्हा राव अमेरिका गए तो खाली समय में उन्होंने अपनी किताब के डीटीपी पर काम किया.

बाद में जब भी वे हैदराबाद आते, मुझे राजभवन ज़रूर बुलाते थे और कंप्यूटर से जुड़ी नई टेक्नोलॉजी के बारे में पता करते थे.

तेलुगू फॉन्ट की तरक़्क़ी की दिशा में क्या चल रहा है ये पूछते. वे पूछते थे, जिस तरह हम अंग्रेज़ी में इतनी आसानी से एडिट कर लेते हैं, उसी तरह तेलुगू या अन्य भारतीय भाषाओं में क्यों नहीं कर सकेंगे? तेलुगू और अन्य भारतीय भाषाओं में अधिक फॉन्ट नहीं मिल सकते?

पुरुषोत्त कुमार कहते हैं कि तब ये संभव नहीं था. लेकिन आज वो सभी चीज़ें मौजूद हैं.

नरसिम्हा राव की याद में इस शख़्स ने भारतीय भाषा में पहला मल्टी कलर फॉन्ट रिलीज़ किया जिसे उनके ही नाम पर रखा गया है.

बेटे को याद आए पुराने दिन

प्रभाकर राव याद करते हैं, "पीवी नरिसिम्हा राव को विज्ञान में विशेष रुचि थी. उसी वजह से वे टेक्नोलॉजी की तरफ आकर्षित हुए. अपनी युवावस्था के दौरान जब गांव में बिजली नहीं होती थी वे ऑयल इंजन की ख़ुद ही मरम्मत किया करते थे. तब से लेकर कंप्यूटर तक, उन्हें टेक्नोलॉजी पसंद थी."

"2003 में बेंगलुरू के मेरे कुछ मित्र दिल्ली में मुझसे मिलने आए. वे सभी दूरसंचार अनुसंधान के क्षेत्र में कार्यरत थे और शिष्टाचार के नाते वे मेरे पिता से मिलना चाहते थे. उनसे परिचय के बाद मेरे पिता ने मेरे दोस्तों से उनकी जॉब के बारे में पूछा. इसके बाद उनके बीच दूरसंचार टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पुराने मुद्दों, इनोवेशन, बदलाव, उपयोग आदि पर दो घंटे तक बात चली."

पीवी नरसिम्हा राव की बेटी सुरभि वाणी देवी कहती हैं, "वे ख़ुद ही सीखा करते थे. उन्हें 'सेल्फ लर्निंग' पर विश्वास था. कंप्यूटर कैसे काम करेगा यह इस पर निर्भर करता है कि हम उसे कैसे प्रोग्राम करते हैं. उन्होंने जितने भी प्रोग्रामिंग लैंग्वेज सीखे वो 'सेल्फ लर्निंग' से ही सीखा."

वो कहती हैं, "किताबों के बाद उनके सबसे बढ़िया दोस्त कंप्यूटर थे. उन्होंने अपनी आत्मकथा को ख़ुद ही लैपटॉप में टाइप किया था. अपने लेख और भाषण वे ख़ुद ही अपने लैपटॉप में तैयार करते थे."

सुरभि वाणी देवी कहती हैं, "यहां तक कि मौत से 15 दिन पहले तक भी वे अपने लैपटॉप पर काम करते रहे."

म्यूज़िक- की बोर्ड

2002 में पीवी नरसिम्हा राव की उंगलियों में तक़लीफ़ होनी शुरू हुई.

डॉक्टर ने उन्हें एक सॉफ़्ट बॉल देते हुए एक्सरसाइज करने को बताया. उन्होंने दो दिन उसे किया लेकिन उन्हें ये पसंद नहीं आया. इसलिए उन्होंने म्यूज़िक की बोर्ड पर अपनी उंगलियां चलानी शुरू कीं. उन्हें संगीत बहुत पसंद था. युवावस्था में उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखा था और कभी कभार अभ्यास भी किया करते थे. उंगलियों में आई समस्या के बाद उन्होंने एक बार फिर इसका अभ्यास करना शुरू किया और की बोर्ड चलाने में महारत हासिल कर ली.

प्रभाकर राव कहते हैं, "अपनी मौत से छह महीने पहले उन्होंने मुझसे कहा था कि वे एक संगीत कार्यक्रम देने के लिए तैयार है. उन्होंने इस हद तक संगीत का अभ्यास किया था."

पीवी नरसिम्हा राव की आत्मकथा "द इनसाइडर" के तेलुगू संस्करण "लोपाली मनीषी" का अनुवाद करने वाले कल्लुरी भास्करम कहते हैं, "जहां तक मुझे पता है, कंप्यूटर के इस्तेमाल से ज़्यादा उनका ख़ुद का दिमाग ही एक कंप्यूटर जैसा था. जैसे कंप्यूटर चीज़ें सहेजता है वैसे ही वे अपने दिमाग में फ़ाइलें कंप्यूटर की भांति ही चीज़ों को याद रखते थे. अपने दिमाग में वे चीज़ें जस का तस सहेज लिया करते थे. हज़ारों लोगों से बातें किया करते थे लेकिन जब भी उनसे दोबारा मिलते तो वहीं से बातें शुरू किया करते जहां पिछली मुलाक़ात में ख़त्म हुई थीं. सालों बाद भी उन्हें अपनी बोली हुई बातें याद रहती थीं."

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