अडानी ग्रुप के शेयरधारकों को एक दिन में इतना नुक़सान कैसे हो गया?

    • Author, विशाल शुक्ला
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सोमवार की सुबह अडानी ग्रुप के निवेशकों के लिए अच्छी साबित नहीं हुई. पहले इकनॉमिक टाइम्स में ख़बर आई कि अडानी ग्रुप के शेयर ख़रीदने वाले तीन विदेशी फंड्स (फ़ॉरेन पोर्टफ़ोलियो इन्वेस्टमेंट) को फ़्रीज़ कर दिया गया है.

इसके बाद कंपनी के शेयरों की क़ीमतों में गिरावट का दौर शुरू हुआ. अडानी ग्रुप की सभी 6 कंपनियों के शेयरों ने 5 से 25 फ़ीसदी तक गोता लगाया. वहीं, अडानी की कुल संपत्ति को क़रीब 55,692 करोड़ रुपए का नुक़सान हुआ.

अडानी ग्रुप में निवेश करनेवाली जिन तीन कंपनियों के खाते फ़्रीज़ किए जाने की ख़बर आई, वो तीनों मॉरीशस स्थित फ़ंड्स- अल्बुला इन्वेस्टमेंट फंड, क्रेस्टा फंड और एपएमएस इन्वेस्टमेंट फंड हैं. इन तीनों फ़ंड्स के पास अडानी ग्रुप की चार कंपनियों के 43,500 करोड़ रुपए से ज़्यादा के शेयर हैं.

हालाँकि, अडानी ग्रुप ने इन ख़बरों को ख़ारिज किया था और इस सिलसिले में NSDL को मेल किया. NSDL के उपाध्यक्ष राकेश मेहता ने कहा भी कि अडानी ग्रुप के शेयरों के सबसे बड़े ख़रीदारों में शुमार तीनों फ़ॉरेन फ़ंड्स ऐक्टिव हैं, लेकिन तब तक डैमेज हो चुका था. दिन ख़त्म होते-होते शेयरों की हालत सुधरी भी, लेकिन वो नुक़सान के आगे बहुत कम थी.

एफ़पीआई क्या होते हैं, अडानी ग्रुप के शेयरों में इतनी तेज़ गिरावट की वजह और इस मामले में मॉरीशस स्थित कंपनियों पर क्यों है संदेह... आइए जानते हैं.

क्या होते हैं फ़ॉरेन पोर्टफ़ोलियो इन्वेस्टमेंट

एस्कॉर्ट्स सिक्योरिटीज़ के रिसर्च प्रमुख आसिफ़ इक़बाल बताते हैं कि मान लीजिए भारत में कोई कंपनी स्टॉक मार्केट में लिस्टेड है. अब अगर इसमें भारत के बाहर बैठा कोई शख़्स या संस्था निवेश करती है, तो इसे फ़ॉरेन इन्वेस्टमेंट पोर्टफ़ोलियो कहा जाएगा.

इसके लिए निवेशक को पहले सेबी के ज़रिए रजिस्ट्रेशन कराना होता है. इस तरह के निवेश का इकलौता नियम ये है कि निवेशक कंपनी की कुल क़ीमत का 10 फ़ीसदी से ज़्यादा निवेश नहीं कर सकता. अगर वो 10% से ज़्यादा निवेश करता है, तो ये FDI यानी फ़ॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट की श्रेणी में आ जाएगा.

इस गिरावट से नुक़सान किसका हुआ है?

जैसा हमने आपको बताया कि शेयरों के गोता लगाने से अडानी की कुल संपत्ति में 55,692 करोड़ रुपए का नुक़सान हुआ है. वहीं अडानी समूह की कंपनियों की बात करें, तो अडानी एंटरप्राइज के शेयर की क़ीमत 1,601.45 से 1,201 रुपए हो गई. अडानी पोर्ट्स का शेयर 18.75% टूटा. अडानी ग्रीन एनर्जी का शेयर 5% टूटा. अडानी टोटल गैस 5% टूटा. अडानी ट्रांसमिशन 5% टूटा और अडानी पावर में 4.99% का शेयर टूटा.

इस गिरावट से सबसे ज़्यादा नुक़सान किसे हुआ है, इस सवाल पर वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन के CEO धीरेंद्र कुमार बताते हैं, "इससे सबसे ज़्यादा नुक़सान ट्रेडर्स का हुआ है. अडानी का अपना होल्डिंग है, इसलिए ये नहीं कह सकते कि उन्हें भारी नुक़सान हुआ है. ये छोटे वक़्त के लिए निवेश करने वाले लोगों का नुक़सान है और लोगों के लिए एक वेकअप कॉल भी है."

आसिफ़ भी यही जवाब देते हुए एक बात जोड़ते हैं, "अडानी की संपत्ति नोशन वेल्थ है, इसलिए ये नहीं कह सकते कि अडानी को बहुत ज़्यादा नुकसान हुआ है. जो कम वक़्त के लिए या सट्टे के तौर पर शेयर ख़रीदते हैं, उनका ज़्यादा नुक़सान हुआ है."

उदाहरण के तौर पर इस बात को आसान भाषा में यूं समझ सकते हैं कि अगर किसी व्यक्ति ने डेढ़ साल पहले एक शेयर 100 रुपए में और सोमवार से पहले तक उस शेयर क़ीमत 800 रुपए हो चुकी थी, तो सोमवार को शेयर की क़ीमत 600 रुपए रह जाने के बावजूद वो व्यक्ति ओवरऑल फ़ायदे में ही रहेगा. वहीं अगर किसी शख़्स पिछले सोमवार को 750 रुपए में एक शेयर ख़रीदा और आज शेयर 500 रुपए का रह गया, तो निश्चित तौर पर उसका नुक़सान होगा.

एक ख़बर से इतना बड़ा नुक़सान कैसे हो गया?

इसका जवाब देते हुए धीरेंद्र कहते हैं, "अडानी के शेयरों की क़ीमत पिछले एक साल में बहुत तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन इन कंपनियों की पब्लिक शेयरहोल्डिंग यानी लोगों के ख़रीदे हुए शेयरों की संख्या अभी कम ही है. जब ये कंपनियाँ छोटी थीं, तो थोड़ी सी ख़रीद पर ही दाम तेज़ी से बढ़ जाता था, लेकिन आज पूँजी ज़्यादा होने के बावजूद लोगों का भरोसा कम है, क्योंकि मार्केट कैप तो ज़्यादा है, लेकिन शेयर की उम्र उतनी ज़्यादा नहीं है."

धीरेंद्र बताते हैं कि शेयर बाज़ार में दो क़िस्म के निवेशक होते हैं. पहले, खूब जाँच-परखकर पैसा लगाने वाले. दूसरे, शेयर की क़ीमत की रफ़्तार देखकर पैसा लगानेवाले. ऐसे में कम समय में बढ़ोतरी के बाद जब गिरावट शुरू हुई, तो निवेशकों में भगदड़ मच गई. बाज़ार के थमने के लिए लोगों का भरोसा ज़रूरी है.

लोगों के इस कम भरोसे की वजह पूछने पर धीरेंद्र बताते हैं, "इसकी वजह ये है कि कंपनी की बॉरोइंग्स यानी उधार या क़र्ज़ बहुत ज़्यादा है. ऐसे में उतार-चढ़ाव से नुक़सान ज़्यादा होता है. अनिल अंबानी की कंपनियों का जो हाल हुआ, उसमें भी यही देखने को मिलता है. कंपनी के उधार या कर्ज़ लेने से निवेशकों में भरोसा नहीं रह जाता है और निवेशकों को इसका नतीजा भुगतना पड़ता है."

क्या मॉरीशस की कंपनियों में कुछ संदेहास्पद है?

इसके जवाब में आसिफ़ बताते हैं कि सबसे अहम बात ये है कि NSDL ने ये कह दिया है कि मॉरीशस स्थित फ़ंड्स के खाते फ़्रीज़ नहीं किए गए हैं. अब NSDL अथॉरिटी है, तो उसी की बात मानी जाएगी. लेकिन जो मुद्दा उठा है, वो भी संवेदनशील है कि मॉरीशस से मनी रूटिंग या शेल कंपनी से इन्वेस्टमेंट लाने का मुद्दा न हो. ये जाँच का विषय है और जाँच की जानी है या नहीं, ये अथॉरिटीज़ को निर्धारित करना है.

आसिफ़ कहते हैं, "इसमें संदेह की बात बस इतनी सी है कि किसी फ़ंड ने अपनी क़रीब 95 फ़ीसदी पूंजी को एक ही जगह निवेश किया हुआ है. आप ख़ुद एक निवेशक की तरह सोचिए, तो क्या आप ऐसा करेंगे या आप अपने पैसे को डाइवर्सिफ़ाई करेंगे. बाक़ी तो अथॉरिटी को तय करना है."

वहीं, धीरेंद्र कहते हैं, "सेबी के नियमों के हिसाब से ये पता लगाना बहुत आसान है कि पैसा कहाँ से आया है. पहले ऐसा होता था कि पैसे का सोर्स पता नहीं चलता था, लेकिन अब डिक्लेरेशन ज़रूरी है. अथॉरिटीज़ को उस आख़री व्यक्ति के बारे में पता होना चाहिए, जिसकी जेब में मुनाफ़ा जा रहा है या जाने वाला है. अथॉरिटी को शेयर होल्डर्स के बारे में पता होना चाहिए. अब मॉरीशस जैसे टैक्स हेवेन होने चाहिए या नहीं, ये एक अलग बहस है. अपनी सारी पूँजी एक ही जगह निवेश करना अवैध नहीं है, लेकिन ये समझदारी भरा क़दम भी नहीं लगता है."

इकनॉमिक टाइम्स की ख़बर में भी यही दावा किया गया था कि हो सकता है कि बेनिफ़िशयल ओनरशिप की पर्याप्त जानकारी न देने की वजह से ये बैन लगा हो. प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट के तहत ये जानकारी देना अनिवार्य होता है.

हालाँकि, एक टीवी चैनल से बात करते हुए अडानी ग्रुप के CFO जुगशिंदर सिंह ने कहा है कि इन फंड्स के पास साल 2010 से अडानी एंटरप्राइसेस के शेयर हैं और इनके पास दूसरी कंपनियों में भी शेयर हैं.

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