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समलैंगिक लड़के की आपबीती, जिसने 'कन्वर्जन थेरेपी' का उत्पीड़न झेला
- Author, जान्हवी मूले
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"अगर कोई व्यक्ति बाएं हाथ से काम करता है, तो क्या आप उसे दाएं हाथ से काम करने के लिए मजबूर करें? अगर उसे ये नहीं पसंद तो क्यो वो ऐसा कर पाएगा? समलैंगिकता के साथ भी ऐसा ही है."
कनवर्ज़न थेरेपी पर बात करते हुए मुंबई के सुमित (बदला हुआ नाम) ने ऐसा कहा.
'कनवर्ज़न थेरेपी' एक ऐसे 'इलाज' या 'मनोवैज्ञानिक इलाज' को कहते हैं जिसका मकसद जबरन किसी व्यक्ति के सेक्शुअल ओरिएंटेशन और लैंगिक पहचान को दबाना होता है. इसमें कई ख़तरनाक उपाय शामिल हो सकते हैं जैसे-इलेक्ट्रिक शॉक देना, किसी को भूखे रखना, शारीरिक और मानसिक हिंसा.
समलैंगिकता को लेकर गलत जानकारियां लोगों को इन उपचारों की ओर ले जाती हैं. लेकिन अब मद्रास हाई कोर्ट ने इस थेरेपी पर रोक लगा दी है और देश भर में एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है.
सुमित ने भी कोर्ट के फैसले की सराहना की.
वो कहते हैं, ''हाईकोर्ट का फैसला एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन हमें अभी एक लंबा रास्ता तय करना है. यह एक अच्छी शुरुआत है."
सुमित कहते हैं, "आज भी अगर कोई खुद को समलैंगिक बताता है तो बहुत से लोग उसे गलत तरीके से देखते हैं. वे उस व्यक्ति को सुझाव देते हैं कि ये मनोवैज्ञानिक विकार है और इसका इलाज किया जा सकता है. माता-पिता भी इन्हीं भ्रांतियों में विश्वास करते हैं. मुझे उम्मीद है कि अदालत के फैसले से इन दलीलों पर पूर्ण विराम लग जाएगा."
पहचान स्वीकार करने का संघर्ष
सुमित को अपने यौन रुझान का एहसास तब हुआ जब वह एक कॉलेज में पढ़ रहे थे. लेकिन, उन्हें अपनी पहचान स्वीकार करने में कई साल लग गए.
वो कहते हैं, "मैं अपनी भावनाओं को मानने से इनकार करता था. मुझे लगा कि यह एक दौर है जो ख़त्म हो जाएगा. हमारे समाज में पुरुषों पर ऐसा प्रभाव होता है कि कई बार वे अपनी वास्तविक पहचान को स्वीकार नहीं करते हैं."
आख़िरकार एक दिन सुमित ने हिम्मत जुटाई और अपने माता-पिता के सामने अपने मन का बोझ उतार दिया. शुरुआत में उन्होंने उसकी समलैंगिक पहचान को मिटाने की कोशिश की.
सुमित याद करते हैं, "यह काफी दर्दनाक था. मैं खुद अपनी भावनाओं को नकार रहा था. मैंने कुछ लड़कियों को डेट करने की कोशिश की. इसने मेरे माता-पिता को और भ्रमित कर दिया. वे मुझसे पूछते थे कि मैं कैसे कह सकता हूं कि मैं समलैंगिक हूं, जबकि मेरी इतनी सारी गर्लफ्रेंड हैं."
आत्महत्या का ख़याल
सुमित ने भावनात्मक उलझन को सुलझाने के लिए कुछ 'उपचार' कराने की कोशिश की. लेकिन, इन अनुभवों ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया.
उन्होंने बताया "कनवर्ज़न थेरेपी के दौरान कुछ लोगों को इलेक्ट्रिक शॉक ट्रीटमेंट से गुजरना पड़ता है. सौभाग्य से मुझे ऐसी चीजों का सामना नहीं करना पड़ा. लेकिन कई लोगों को लगा कि मेरी समलैंगिकता एक विसंगति है. कुछ आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने दवा दी. वे कहते थे कि जो मेरा रुझान है वो स्वाभाविक नहीं है."
वो कहते हैं, ''अगर मैं इस बारे में किसी से बात करता, तो उनकी मुझे लेकर उनकी धारणा बदल जाती. वे कहते कि उन्होंने मुझसे ऐसी उम्मीद नहीं की थी."
सुमित के लिए ये सब सहना बहुत मुश्किल हो गया था.
वो बताते हैं, "मैं चिढ़ जाता था, और मुझे गुस्सा आता था. मैं लोगों के साथ मिलजुल कर नहीं रह पाता था. मैंने आत्महत्या के बारे में भी सोचा."
उनके माता-पिता को लगा कि सुमित को कुछ मानसिक परेशानी है.
सुमित बताते हैं, "वे मानसिक विकार और सेक्शुअल ओरिएन्टेशन के बीच भ्रमित हो गए. वे मुझसे पूछते थे कि क्या मैं डिप्रेशन में हूं, और क्या यही मुझे समलैंगिक आकर्षण की ओर ले जा रहा है? लेकिन,डिप्रेशन के कारण ऐसा नहीं था. बल्कि मैं उदास महसूस करने लगा था क्योंकि मेरी पहचान को स्वीकार नहीं किया गया था."
"सौभाग्य से, मेरे माता-पिता ने मुझ पर शादी के लिए दबाव नहीं डाला. मैंने उन्हें समझा दिया कि इस तरह की शादी से जटिलताएं बढ़ सकती हैं. मैंने कुछ लोगों को इससे गुज़रते देखा है. कम से कम मुझे इतनी आज़ादी तो दी गई. हालाँकि माता-पिता के रूप में वे मेरी स्थिति से पूरी तरह सहानुभूति नहीं रखते थे, लेकिन वे इसे धीरे-धीरे समझने की कोशिश कर रहे हैं. "
"मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैं एक अच्छे काउंसलर से मिला. मुझे एहसास हुआ कि मेरी पहचान में कुछ भी गलत नहीं है."
"जब मैं असमंजस से गुज़र रहा था, तब पुणे के समपथिक ट्रस्ट के एक डॉक्टर ने मुझे समझाया. उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं खुद को एक विशेष पहचान के लिए क्यों मजबूर कर रहा हूं? उन्होंने मुझसे कहा कि जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा मुझे खुद अपनी असली पहचान का एहसास होगा."
"डॉक्टर ने मुझे समझाया कि अगर हम एक त्रिभुज में एक चतुर्भुज फिट करने की कोशिश करते हैं, तो वो फ़िट नहीं होगा. अंत में मुमकिन है कि हम महसूस करें कि कि हम न तो त्रिभुज थे और न ही चतुर्भुज, बल्कि एक वृत्त. इसलिए, अपने आप पर दबाव डालने का कोई मतलब नहीं है."
धीरे-धीरे सुमित अपनी पहचान को स्वीकार करने लगे. अब, 34 साल की उम्र में सुमित मुंबई की एक आईटी कंपनी में टीम लीडर हैं. वो आत्मविश्वास के साथ जी रहे हैं. लेकिन यह अवसर सभी को नहीं मिलता.
'कन्वर्ज़न थेरेपी' के शिकार
मनोवैज्ञानिक हेमांगी म्हापरकर कहती हैं, ''मनोविज्ञान के अनुसार कनवर्ज़न थेरेपी एक तरह की बिहेवियर थेरेपी है. इसका अर्थ है कि यदि किसी व्यक्ति को कोई मानसिक विकार है, तो इस चिकित्सा का उपयोग संबंधित व्यक्ति के व्यवहार में आवश्यक परिवर्तन लाने के लिए किया जा सकता है.''
लेकिन वह स्पष्ट करती हैं, कि समलैंगिकता एक विकार नहीं है, इसलिए इस तरह के इलाज से गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं.
वो कहती हैं, "कभी-कभी इसमें कई खतरनाक तरीके आजमाए जाते हैं जिससे अन्य मानसिक जटिलताएं पैदा हो सकती हैं."
पिछले साल, केरल की एक बाइसेक्शुअल लड़की अंजना हरीश के आत्महत्या करने के बाद कनवर्ज़न थेरेपी को लेकर बहस तेज़ हुई. आत्महत्या करने से पहले अंजना ने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमें उसने खतरनाक 'इलाज' के बारे में बताया था.
उन्होंने कहा था कि उन्हें किसी ईसाई संगठन के एक कमरे में बंद कर दिया गया था और उसे रोबोट की तरह काम करने के लिए जबरदस्ती कई दवाएं खिलाई गईं.
उन्होंने लिखा था, "मेरे अपने परिवार ने मेरे साथ ऐसा किया, यही मुझे सबसे ज्यादा दुखी करता है. जो मेरी रक्षा करने वाले थे, उन्होंने मुझे प्रताड़ित किया."
अंजना के परिवार के सदस्यों ने आरोपों का खंडन किया था, लेकिन इस घटना के बाद केरल और देश भर में कन्वर्ज़न थेरेपी की भारी आलोचना हुई थी.
हाल ही में अदाकारा निशिगंधा वाड ने महाराष्ट्र में इस थेरेपी को लेकर कुछ विवादित बयान दिए थे जिससे पता चलता है कि महाराष्ट्र में इसे लेकर किस तरह की भ्रांतियां हैं. उन्होंने बाद में अपने बयानों को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया था.
इस तरह की भ्रांतियां देश में आम हैं.
दूसरे देशों का क्या है हाल?
कई दूसरे देशों में भी स्थिति ऐसी ही है. यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम में भी समलैंगिकता को सही नहीं माना जाता.
आज भी यूरोप और अमेरिका में ऐसे कई लोग हैं जो समलैंगिकता का विरोध और कन्वर्ज़न थेरेपी का समर्थन करते हैं.
जर्मनी, कनाडा, मैक्सिको, माल्टा, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कुछ राज्यों में समलैंगिक संबंधों पर बैन है.
भारत में तीन साल पहले तक समलैंगिकता को अपराध माना जाता था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 6 सितंबर 2018 के फ़ैसले के बाद से ये अपराध नहीं रहा.
अब मद्रास हाई कोर्ट ने यह ऐतिहासिक फैसला दिया है.
ऐतिहासिक फैसला
मदुरै में, जब दो लड़कियों ने अपने-अपने परिवारों को अपने समलैंगिक संबंधों के बारे में बताया, तो उन्हें अपने परिवार के सदस्यों के विरोध का सामना करना पड़ा.
लड़कियों पर कन्वर्ज़न थेरेपी के लिए दबाव डाला गया. इसके बाद लड़कियां चेन्नई भाग गईं.
पुलिस ने माता-पिता की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए दोनों बच्चियों को गिरफ्तार कर लिया है. पुलिस की पूछताछ के दौरान लड़कियों को अजीबोगरीब सवालों का सामना करना पड़ा.
बाद में लड़कियों ने पुलिस जांच के दौरान अभियोजन पक्ष और कन्वर्ज़न थेरेपी के लिए परिवार के दबाव के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में अपील की.
सुनवाई के दौरान जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश ने ऐतिहासिक बयान दिया.
उन्होंने कहा, "एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों को अपनी सेक्शुएलिटी को छिपाने का अधिकार है. उन्हें अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर फ़ैसला करने का भी अधिकार है. इसके बारे में फैसला करने, इसके बारे में सार्वजनिक रूप से बोलने, अपनी यौन इच्छाओं को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने और अपनी पसंद का साथी चुनने का भी अधिकार है. उन्हें समाज में सम्मान मिलना चाहिए."
अदालत ने कन्वर्ज़न थेरेपी को लेकर फटकार लगाई और यह भी कहा कि इस तरह की गतिविधि में शामिल डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाएंगे.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने दिशानिर्देश जारी किए ताकि नियमित सेक्शुअल ओरिएंटेशन से अलग बच्चों के साथ सहानुभूति रखने का प्रयास किया जा सके और यह भी कहा कि स्कूलों में माता-पिता और शिक्षक इस संबंध में सहायता प्रदान कर सकते हैं.
हेमांगी इसे एक महत्वपूर्ण कदम मानती हैं. "हमें यह समझने की जरूरत है कि पिछली पीढ़ियों को समलैंगिकता के बारे में खुलकर बात करना भी मुश्किल लगता था. यह ज़रूरी है कि माता-पिता अपने बच्चों को वैसे ही स्वीकार करें जैसे वे हैं, लेकिन उन लोगों को भी खुद को स्वीकार करना होगा. उन्हें ये स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.''
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