You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
समलैंगिक जोड़ों को भारत में शादी करने का अधिकार मिल पाएगा?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बीते सोमवार समलैंगिक जोड़ों के बीच शादी को क़ानूनी मान्यता दिए जाने के लिए दाख़िल की गई जनहित याचिका पर अपना पक्ष रखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट से कहा है कि भारतीय समाज, क़ानून और मूल्य इसकी इजाज़त नहीं देते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में नवतेज सिंह जौहर मामले में समलैंगिक जोड़ों के बीच रिश्तों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था.
इससे पहले तक समलैंगिक रिश्ते भारतीय क़ानून के तहत एक आपराधिक कृत्य थे जिसकी वजह से एलजीबीटीक्यू समुदाय को काफ़ी उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था.
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ से आए इस फ़ैसले के लगभग दो साल बाद समलैंगिकों के बीच शादी को क़ानूनी दर्जा दिए जाने की अपील दिल्ली हाई कोर्ट पहुँची है.
क्या कहती है ये याचिका?
दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस प्रतीक जालान की बेंच ने सोमवार को इस जनहित याचिका की सुनवाई की.
इस याचिका में हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन-5 का ज़िक्र किया गया है जो कहता है कि शादी दो हिंदुओं के बीच होनी चाहिए.
ये याचिका कहती है कि हिंदू मैरिज एक्ट का सेक्शन-5 होमोसेक्शुअ और हेट्रोसेक्शुअल जोड़ों के बीच भेदभाव नहीं करता है. ऐसे में समलैंगिक जोड़ों को उनके अधिकार मिलने चाहिए.
क्या बोले सॉलिसिटर जनरल मेहता
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि उन्हें अभी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से निर्देश लेने हैं लेकिन उनका क़ानूनी रुख़ ये है कि इसकी इजाज़त नहीं है.
उन्होंने कहा, “हमारे क़ानून, हमारी न्याय प्रणाली, हमारा समाज और हमारे मूल्य समलैंगिक जोड़े के बीच विवाह को मान्यता नहीं देते हैं. हमारे यहां विवाह को पवित्र बंधन माना जाता है.”
वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहंती ने बीबीसी को बताया कि सुनवाई के दौरान एक ऐसा मौक़ा भी आया जब दिल्ली हाई कोर्ट ने तुषार मेहता से पूछा कि क्या वह इस बारे में हलफ़नामा दाख़िल करेंगे?
इस पर मेहता ने कहा कि ये पूरी तरह से क़ानूनी मसले हैं और उन्हें नहीं लगता कि इस पर उन्हें हलफ़नामा दाख़िल करने की ज़रूरत है.
लेकिन मेहता ने ये स्पष्ट कर दिया कि वह इस बारे में सरकार से निर्देश लेंगे और एक नोट जारी करके सवाल उठाएंगे.
ये भी पढ़ें:कैसे और कितने दिन में बदल जाता है सेक्स
क्या कहते हैं संवैधानिक विशेषज्ञ
बीबीसी ने इस मामले के क़ानूनी पहलुओं को समझने के लिए संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर सूरत सिंह से बात की.
सूरत सिंह मानते हैं कि अभी हमें ये समझने की ज़रूरत है कि समलैंगिक रिश्तों को अपराध के रूप में नहीं देखा जाना और समलैंगिक विवाह को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत क़ानूनी दर्जा दिया जाना अलग-अलग चीज़ें हैं.
वो कहते हैं, “सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में समलैंगिकों के बीच सेक्स को अपराध की श्रेणी से बाहर किया है. लेकिन अगर कोई कहता है कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत उसकी शादी पंजीकृत कर दी जाए तो ऐसा नहीं हो सकता है क्योंकि हिंदू मैरिज समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं देता है.”
“इसके लिए स्पेशल मैरिज एक्ट अलग बनाना पड़ेगा. उदाहरण के लिए, ग़ैर हिंदुओं की शादियां हिंदू मैरिज एक्ट में पंजीकृत नहीं होती हैं, बल्कि स्पेशल मैरिज एक्ट में होती हैं.''
''इसी तरह से एक विकल्प ये है कि इसके लिए एक क़ानून बनाया जाए जिसमें इस सवाल का जवाब हो कि जब समलैंगिक रिश्ते जायज़ हैं तो उनकी शादी को किस क़ानून के तहत जायज़ ठहराया जाएगा. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक रिश्तों को अपराध की परिधि से बाहर किया है. लेकिन समलैंगिक जोड़ों की शादी को लेकर कुछ नहीं कहा है.”
समानता के अधिकार का उल्लंघन?
इस मामले में ये भी कहा जा रहा है कि समलैंगिक जोड़ों को शादी का अधिकार इस्तेमाल न करने देना संविधान के आर्टिकल-14 का उल्लंघन है जो कि समानता की बात करता है.
डॉ. सूरत सिंह बताते हैं, “वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से एसजी तुषार मेहता ये कह रहे हैं कि समलैंगिक विवाह हमारे मूल्यों से मेल नहीं खाती है. ये उनका और सरकार का सोचना है.''
''सवाल ये है कि क्या संविधान इसकी इजाज़त देता है या नहीं? इस पर अलग-अलग लोगों के अलग-अलग मत हो सकते हैं. कुछ इसे सांस्कृतिक मूल्यों के ख़िलाफ़ बता सकते हैं, कुछ कह सकते हैं कि ये समानता का अधिकार के ख़िलाफ़ है, ऐसे में समलैंगिकों को विवाह का अधिकार मिलना चाहिए.”
“अमरीका में आर्टिकल 14 की तर्ज़ पर भेदभाव रोकने के लिए एक नया शब्द जोड़ा गया है जेंडर ओरिएंटेशन. ये शब्द समलैंगिकों को किसी भी तरह के भेदभाव से बचाने के लिए है. लेकिन अब तक भारतीय समाज और भारतीय संविधान में ये शब्द नहीं जोड़ा गया है.''
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी से बाहर करके एक चरण तो पूरा कर लिया है. लेकिन समलैंगिक समाज को सहज: स्वीकार्यता मिल जाए, इस पर भारतीय समाज को आगे बढ़ना है. अब तक वहां न तो देश की संसद और न ही सुप्रीम कोर्ट अपनी व्याख्या में गई है.”
ग़लत नहीं है ये माँग
वहीं, दिल्ली हाई कोर्ट के अधिवक्ता जयंत भट्ट मानते हैं कि ये बात सही है कि हिंदू मैरिज एक्ट सेक्शन-5 में कहा गया है कि शादी दो हिंदुओं के बीच होनी चाहिए.
वह कहते हैं, “हिंदू मैरिज एक्ट में ये बात ज़रूर कही गई है कि शादी दो हिंदुओं के बीच होनी चाहिए लेकिन इसी एक्ट में एक जगह प्रजनन को लेकर भी बात कही गई है जिससे ये स्पष्ट होता है कि ये क़ानून महिला और पुरुष के बीच शादी को मान्यता देता है, और समलैंगिक शादी के लिए कोई ग्रे एरिया नहीं देता है. ऐसे में इस क़ानून के तहत तो ये संभव नहीं है.''
जयंत भट्ट ये भी कहते हैं कि एक माँग के रूप में ये ग़लत नहीं है क्योंकि जब साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया और साल 2019 में ट्रांसजेंडर एक्ट पारित हो गया है, तब इस समुदाय को क़ानूनी ढांचे में नहीं लाने का सवाल पैदा नहीं होता है.
उन्होंने कहा, ''अब सवाल ये खड़ा होता है कि सरकार हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन करे या नहीं. अगर सरकार ऐसा करती है तो दूसरे धर्मो को मानने वाले ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग किस क़ानून के तहत वैवाहिक संबंधों में बंध पाएंगे. ऐसे में ज़रूरी ये है कि एक विशेष क़ानून बनाया जाए अथवा ट्रांसजेंडर एक्ट में बदलाव करके उसी क़ानून में इसकी जगह दी जाए.”
दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई आगामी 21 अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दी गई है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)