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प्रफुल पटेल कौन हैं और लक्षद्वीप में उनकी वजह से विवाद क्यों हो रहा है?
- Author, जयदीप वसंत
- पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए
सोमवार और मंगलवार को सोशल मीडिया पर दिन भर दो हैशटैग #SaveLakshadweep और #Lakshadweep ट्रेंड करते रहे. सोशल मीडिया यूज़र्स लक्षद्वीप के प्रशासक को हटाने की माँग कर रहे थे.
इस समय प्रफुल खोड़ाभाई पटेल लक्षद्वीप के प्रशासक हैं और उनके कुछ फ़ैसलों से स्थानीय लोगों में भारी ग़ुस्सा है. लोगों का मानना है कि इन फ़ैसलों से उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को नुक़सान पहुँचेगा.
पटेल गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार में गृह मंत्री रह चुके हैं. वह पहले भी कई बार विवादों के केंद्र में रहे हैं. लक्षद्वीप में लिए गए उनके फ़ैसलों से फैली नाराज़गी से पहले भी उनका नाम दमन के सांसद मोहन देलकर की रहस्यमयी मौत के मामले में आ चुका है.
काँग्रेस, एनसीपी और वामपंथी पार्टियों के सांसदों ने पटेल को हटाने के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा है.
हिंद महासागर में मौजूद लक्षद्वीप 10 द्वीपों का एक समूह है. यहाँ 75 से लेकर 80 हज़ार लोग रहते हैं. यह क्षेत्र सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर केरल के नज़दीक है. रणनीतिक तौर पर यह भारत के लिए बेहद अहम इलाक़ा है.
प्रफुल खोड़ाभाई पटेल को लेकर क्या विवाद है?
केरल के सीपीएम सांसद और पार्टी के राज्यसभा में नेता एलमरम करीम ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को एक पत्र लिख कर मांग की है कि प्रफुल खोड़ाभाई पटेल को लक्षद्वीप के प्रशासक पद से हटा दिया जाए.
बीबीसी से बातचीत में करीम ने कहा, "वह (प्रफुल पटेल) मनमाने ढंग से व्यवहार कर रहे हैं. वह यहाँ के स्थानीय पंचायतों, प्रशासन या नेताओं से कभी सलाह-मशविरा नहीं करते और मनमाने ढंग से ख़ुद फ़ैसले लेते हैं. उनके इस रवैए ने स्थानीय लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को ख़तरे में डाल दिया है."
उन्होंने कहा, "लक्षद्वीप में पशुओं के संरक्षण के नाम पर बीफ़ बैन कर दिया गया है, जबकि यहाँ की 95 फ़ीसद से ज़्यादा आबादी मुसलमानों की है. बीफ़ के उत्पादन, बिक्री और ढुलाई पर नियंत्रण लगा दिया गया है."
करीम कहते हैं, "यह बात तो समझ में आती है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पाँच सितारा होटलों और कुछ पर्यटन स्थलों पर शराब की बिक्री की इजाज़त दी जा सकती है. लेकिन अब पूरे लक्षद्वीप में शराब बेचने की इजाज़त दे दी गई है. इससे लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हो रही है."
करीम ने चेतावनी दी है उनकी पार्टी सीपीएम और इसके कार्यकर्ता कोविड-19 को लेकर लागू प्रतिबंधों की वजह से सड़कों पर नहीं उतर रहे हैं. लेकिन अगर पटेल के काम करने का तरीक़ा नहीं बदला, तो सीपीएम उनके ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करेगी.
"दरअसल लक्षद्वीप ख़ूबसूरत और बेशक़ीमती है. पटेल विकास के नाम पर यहाँ की ज़मीन कॉरपोरेट कंपनियों को सौंपना चाहते हैं."
केरल के काँग्रेस और वामपंथी पार्टियों के कुछ राज्यसभा और लोकसभा सांसदों ने भी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चिट्ठी लिख कर पटेल के काम करने के तरीक़े पर सवाल खड़े किए हैं और उन्हें हटाने की मांग की है.
पटेल को दिसंबर 2020 में तत्कालीन प्रशासक दिनेश्वर शर्मा के निधन बाद लक्षद्वीप का प्रशासक बनाया गया था. पूर्व आईपीएस अफ़सर दिनेश्वर शर्मा ने इंटेलिजेंस ब्यूरो में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ काम किया था और वह जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर मुख्य वार्ताकार भी थे.
पटेल ने 'इंडियन एक्सप्रेस' से इस मुद्दे बात करते हुए कहा, "मेरे प्रस्तावित प्रावधानों का लक्षद्वीप के लोग विरोध नहीं कर रहे हैं. इसका विरोध वे लोग कर रहे हैं, जिनके अपने स्वार्थ हैं. मुझे नहीं लगता कि इन प्रस्तावों का विरोध होना चाहिए."
वह कहते हैं, "मालदीव के नज़दीक होने के बावजूद वर्षों से लक्षद्वीप में कोई विकास नहीं हुआ है. जबकि मालदीव अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र है. हम लक्षद्वीप को भी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन, नारियल, मछली और समुद्री सेवाओं का हब बनाना चाहते हैं. यह क्षेत्र लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण बनने के बाद ही स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित हो सकेगा. अगर हम इस रणनीतिक क्षेत्र में असामाजिक गतिविधियों के ख़िलाफ़ क़ानून लाते हैं तो इसमें ग़लत क्या है?"
पटेल ने कहा कि अगर स्थानीय लोगों और उनके प्रतिनिधियों को लगता है कि कुछ ग़लत हो रहा है और तो वे प्रस्तावित प्रावधानों के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं. पटेल की ओर से लाए जा रहे एक प्रावधान का मसौदा 28 अप्रैल को सार्वजनिक किया गया.
पटेल, जो असामाजिक गतिविधि निरोधक क़ानून (गुंडा एक्ट ) लाने जा रहे हैं, उसके तहत किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना ज़मानत के एक साल तक जेल में क़ैद रखा जा सकता है. कुछ लोगों का मानना है कि लक्षद्वीप जैसे शांतिपूर्ण इलाक़े में इस तरह के कड़े क़ानून की कोई ज़रूरत नहीं है. यहाँ ऐसे भी अपराध की दर बहुत कम है.
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'टूलकिट का विरोध'
बीजेपी का मानना है कि काँग्रेस और वामपंथियों की ओर से पटेल का विरोध नरेंद्र मोदी सरकार के प्रदर्शन के ख़िलाफ़ नफ़रत की अभिव्यक्ति है. काँग्रेस और वामपंथी पार्टियाँ एक होकर एक 'टूलकिट कैंपेन' के तहत विरोध कर रही हैं.
इस मुद्दे पर बात करते हुए केरल बीजेपी अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने कहा, "लक्षद्वीप में जो हो रहा है, वहाँ के विकास के लिए हो रहा है. यह यहाँ के पर्यटन क्षेत्र और स्थानीय लोगों के लिए फ़ायदेमंद साबित होगा. केंद्रीय एजेंसियों ने लक्षद्वीप में सुरक्षा हालातों को लेकर चिंता जताई है."
"अप्रैल, 2021 में यहाँ के समुद्र तट से 3000 करोड़ रुपये की ड्रग्स एक बड़ी खेप बरामद हुई थी. केरल में पहले भी हथियार बरामद किए जा चुके हैं. आईएसआईएस से जुड़े लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है. यही वजह है कि यहाँ गुंडा एक्ट के कड़े प्रावधानों की ज़रूरत है. ये क़दम यहाँ की सुरक्षा को चाकचौबंद करने के लिए उठाए जा रहे हैं."
प्रफुल पटेल पर कोविड-19 से जुड़े नियमों को मनमाने ढंग से बदलने के आरोप लग रहे हैं. कहा जा रहा है इन क़दमों की वजह से लक्षद्वीप में कोविड-19 फैल गया.
पटेल ने स्थानीय लोगों से मशविरा किए बग़ैर बाहर से आनेवालों लोगों के लिए क्वारंटीन के अनिवार्य नियमों को हटा दिया. इसकी बजाय कहा गया कि बाहर से लक्षद्वीप आने वाले लोगों के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च की ओर से मान्यता प्राप्त लेबोरेट्रीज़ से हासिल निगेटिव आरटी-पीसीआर रिपोर्ट ही पर्याप्त होगी.
लक्षद्वीप में बेहतरीन हेल्थकेयर सुविधाओं के अभाव में स्थानीय लोगों को कोविड के इलाज के लिए कोच्चि, कोझिकोड या कालीकट पर निर्भर रहना पड़ता है. इस वक्त लक्षद्वीप में कोविड-19 के छह हज़ार केस हैं. सांस्कृतिक और आर्थिक तौर पर केरल और लक्षद्वीप एक दूसरे से काफ़ी निकट हैं. लक्षद्वीप के स्टूडेंट्स उच्च शिक्षा के लिए केरल जाना पसंद करते हैं.
के सुरेंद्रन का कहना है कि पटेल का विरोध जानबूझ कर किया जा रहा है. यह काँग्रेस और वामपंथी दलों की राजनीतिक स्ट्रेटजी है.
दमन और लक्षद्वीप में समानता
पिछले दिनों तटरक्षक क़ानून के विभिन्न प्रावधानों के तहत लक्षद्वीप के तटीय इलाक़े से एक अस्थायी निर्माण हटा दिया गया. यहाँ पर मछुआरे अपने जाल रखते थे. इसके अलावा यहाँ आंगनवाड़ी और पर्यटन विभाग से जुड़े अस्थायी कर्मचारियों को हटा दिया गया है.
2019 के लोकसभा चुनावों के बाद यहाँ लाइटहाउस और जम्पोर तट के बीच की सार्वजनिक जगहों को ज़बरदस्ती ख़ाली करा दिया गया था. इसके बाद यहाँ 144 धारा लागू कर दी गई और दो स्कूलों को अस्थायी जेल में तब्दील कर दिया गया.
"पटेल के काम करने का तरीक़ा अलग"
पटेल के काम करने के तरीक़े से परिचित एक अधिकारी ने कहा, "अभी लक्षद्वीप में जो रहा है, वह पहले दमन में हो चुका है. पटेल का काम करने का अपना तरीक़ा है. यह स्टीरियोटाइप नहीं है. पहले तो वह बिचौलियों और सरकार के काम में टांग अड़ानेवालों को हटा देते हैं. इससे लोगों में असंतोष फैल जाता है. इसके बाद समझबूझ का दौर चलता है और फिर बातचीत शुरू होती है. इसके बाद विकास का रास्ता साफ़ हो जाता है."
वह कहते हैं कि सिलवासा रिंग रोड पिछले 10 साल से भी अधिक समय से अटका पड़ा था. लेकिन पटेल ने आते ही इस पर अपने तरीक़े से काम करवाना शुरू किया और दो साल के अंदर प्रोजेक्ट तैयार हो गया. अगर उन्होंने यह काम हाथ में नहीं लिया होता. प्रोजेक्ट को पूरा होने और 10-15 साल लग जाते.
पहले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अफ़सर प्रशासक नियुक्त किए जाते थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पंरपरा को छोड़ कर पटेल को नियुक्त किया.
उन्होंने विक्रम देव दत्त के बाद पदभार ग्रहण किया, जो एजीएमयूटी (अरुणाचल प्रदेश, गोवा मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेश) कैडर के थे और 2016 में यहाँ का प्रशासन देख रहे थे.
उस अधिकारी ने कहा, "अमूमन प्रशासनिक अधिकारी पद पर बैठते ही अपनी नौकरी बनाए रखने के लिए चिंतित हो जाता है. लिहाज़ा वह नेताओं की दखलंदाजी बर्दाश्त करने लगता है. पटेल के सिर पर ऊपर वालों का हाथ है, लिहाज़ा वह इन चीज़ों की परवाह नहीं करते. अगर अफ़सर ने कुछ ग़लत नहीं किया है तो पटेल उसका पूरा समर्थन और बचाव करते हैं. यह उनके व्यक्तित्व का एक सकारात्मक पहलू है."
जनवरी, 2020 में केंद्र शासित प्रदेश दमन और दीव को मिला दिया गया. इसके बाद पटेल को इसका पहला प्रशासक बनाया गया.
कड़क चेहरा, कठोर आचरण
केंद्र शासित प्रदेश में केंद्र सरकार के एक उद्यम में बतौर अफ़सर काम करते हुए पटेल के प्रदर्शन को नज़दीक से देख चुके एक शख्स ने कहा, "उनकी दाढ़ी सफेद और बाल काले हैं. उनका स्वभाव बेहद कड़क है. पटेल जो सोचते हैं, उसका भाव चेहरे पर नहीं आने देते. वह केंद्र शासित प्रदेश में अकेले रहते हैं. उनका परिवार दूसरे शहर में रहता है."
वह कहते हैं, "वे बेहद सख़्त स्वभाव के व्यक्ति हैं. कभी-कभी उनका हाव-भाव बड़ा कठोर हो जाता है. यह उनके व्यक्तित्व का सकारात्मक पहलू भी और नकारात्मक भी. केंद्र सरकार की ओर से दमन और दादरा नगर हवेली में बिजली वितरण व्यवस्था के निजीकरण की घोषणा से पहले सारे इंतजाम पटेल ने करवाए थे. इससे अंदरुनी विवाद पैदा हुआ और पटेल पर दबाव भी बढ़ा."
'मोदी के क़रीबी'
2007 के विधानसभा चुनाव में प्रफुल पटेल ने कांग्रेस के क़द्दावर नेता सीके पटेल को हराया था. पटेल पर नरेंद्र मोदी के भरोसे को इसी बात से समझा जा सकता है जब अमित शाह को गुजरात में एक पुलिस मुठभेड़ के मामले में राज्य से बाहर रहने को कहा गया, तो उनके बदले पटेल को ही गृह मंत्री बनाया गया.
वह 2010 से 2012 तक गुजरात के गृह मंत्री रहे. वे पहली बार विधायक बने थे इसके बावजूद उन्हें इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी दी गई थी.
2012 में वह विधानसभा चुनाव हार गए. इसके बाद वह राजनीति में ख़ास सक्रिय नहीं थे. हालाँकि वह अपने काम करने के नियमों और काम से काम रखने की शैली की वजह से मोदी को प्रभावित करते रहे.
उत्तर गुजरात में दो दशकों से सक्रिय रहे एक बीजेपी नेता के मुताबिक़ प्रफुल पटेल के पिता खोड़ा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय थे. मोदी की खोड़ाभाई से गाढ़ी दोस्ती थी.
वे बताते हैं, "पटेल ने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है और पहले सरकारी सड़कों का ठेका लिया करते थे. और बीजेपी की स्थानीय इकाई में सक्रिय थे. पार्टी में संगठन स्तर पर काम के आधार पर उन्हें 2007 के विधानसभा चुनाव के लिए टिकट दिया गया. जबकि 2012 में उन्हें उनके प्रशासनिक प्रदर्शन के आधार पर टिकट मिला. वह हिम्मतनगर से पाँच साल से बाहर हैं लेकिन अपने पाटीदार समुदाय के प्रतिनिधियों से लगातार संपर्क में हैं."
उनका कहना है, "वह बीजेपी के स्थानीय नेताओं के लगातार संपर्क में रहते हैं. पटेल की माली हालत बेहद अच्छी है. वह दूसरे मामलों में नहीं पड़ते. अपने नज़दीकी लोगों की ज़रूरत पड़ने पर वह मदद करते रहते हैं. पटेल दफ़्तर में बैठ कर काम नहीं करते. वह फ़ील्ड में ज़्यादा सक्रिय रहते हैं. यह उनकी ख़ासियत है."
वे कहते हैं, "पटेल बहुत कड़वा बोलते हैं और यह उनके व्यक्तित्व का नकारात्मक पहलू है. दरअसल प्रफुल वास्तव में एक 'ताक़तवर पटेल' हैं. वह राजनीति के 'छुपे रुस्तम' हैं. वह भविष्य में गुजरात या केंद्र की राजनीति में बड़ी भूमिका अदा करेंगे."
सांसद सुसाइड केस
दमन से निर्दलीय सांसद मोहन देलकर ने मुंबई के एक होटल में आत्महत्या कर ली थी. मौत से पहले उन्होंने गुजराती में 15 पेज का एक सुसाइड नोट लिखा था. उसमें कुछ प्रशासनिक और पुलिस अफ़सरों के साथ बीजेपी नेताओं के नाम लिए गए थे.
देलकर के बेटे अभिनव ने इसके बाद दादरा और नगर हवेली और दमन-दीव के प्रशासक प्रफुल खोड़ाभाई पटेल और आठ अन्य लोगों के ख़िलाफ़ मुंबई पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी.
अभिनव ने आरोप लगाया था कि पटेल ने उनके पिता से 25 करोड़ रुपये माँगे थे. पैसे नहीं देने पर पटेल ने उनके ख़िलाफ़ असामाजिक गतिविधि निरोधक क़ानून के तहत केस दर्ज कराने की धमकी दी थी.
महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने इस केस को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम को सौंपा था. मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने पहले आरोप लगाया था कि उन पर मोहन देलकर केस में प्रफुल पटेल को फँसाने का दबाव डाला गया था.
आईएएस अफ़सर से जुड़ा विवाद
प्रशासक रहने के दौरान प्रफुल पटेल ने मई 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन कलक्टर कन्नन गोपीनाथन के ख़िलाफ़ नोटिस जारी किया था.
गोपीनाथन को एक कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा गया था कि वह अपने वरिष्ठों के आदेश की अवहेलना क्यों कर रहे थे. नोटिस कलक्टर के तौर पर गोपीनाथन के काम पर जारी नहीं किया गया था. लेकिन उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाले दूसरे विभाग में किए गए उनके काम को लेकर जारी हुआ था.
इसके बाद गोपीनाथन ने केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त के पास शिकायत दर्ज कराई थी, क्योंकि उस समय चुनाव आचार संहिता लागू थी.
रिपोर्टों के मुताबिक़ मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह मामला चुनाव आयोग को सौंप दिया. आयोग ने पटेल को नोटिस वापस लेने को कहा था.
लक्षद्वीप पर हाल के विवाद के बाद गोपीनाथन ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए लिखा. प्रिय प्रधानमंत्री @narendramodi, जी आपने पहले दादरा नगर हवेली में प्रफुल पटेल को प्रशासक बना कर वहाँ के लोगों को प्रताड़ित किया. यहाँ तक कि इससे एक सांसद की ख़ुदकुशी भी हुई. अब लक्षद्वीप उनकी सनक को झेल रहा है. गुजरात बीजेपी के अंदरुनी झगड़े और उन्हें पार्टी के अंदर बनाए रखने की मजबूरी का मतलब यह नहीं है कि यह नागरिकों के लिए प्रताड़ना बन जाए."
गोपीनाथन ने 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन उनका इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं हुआ बल्कि उन्हें दफ़्तर से ग़ैर-हाजिर रहने के लिए नोटिस जारी किया गया है.
हालाँकि गोपीनाथन ने स्पष्ट कर दिया है वह अब सर्विस जॉइन नहीं करेंगे. इस वक्त वह सामाजिक क्षेत्र से जुड़ कर काम कर रहे हैं.
बीबीसी से उन्होंने कहा, "मैंने इस मुद्दे पर जो कहना था वह ट्वीट कर कह दिया है. मैं अब इसमें कुछ भी जोड़ना नहीं चाहता हूँ."
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