सरकार बनाम सोशल मीडिया कंपनियां: क्या नए दिशानिर्देश असहमति और आलोचना को दबाने की कोशिश हैं?

    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत में मंगलवार (25 मई) को ऐसी अटकलें ज़ोरों पर थीं कि आधी रात के बाद देश में ट्विटर और फे़सबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म बंद हो जायेंगे.

ये अटकलें बेवजह नहीं थीं. दरअसल, केंद्र सरकार ने फ़रवरी में जिन नए सोशल मीडिया दिशा निर्देशों को लागू किया था उन पर अमल की समय सीमा 25 मई की रात को ख़त्म हो रही थी और कई बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों ने अब तक निर्देशों का पालन नहीं किया था.

मंगलवार को ही मैसेजिंग ऐप व्हाट्सएप ने दिल्ली उच्च न्यायालय में सरकार के नए सोशल मीडिया नियमों को चुनौती देते हुए केस दायर किया जिसमें उसने कहा कि इन नियमों के तहत अगर वो एन्क्रिप्टेड संदेशों तक पहुँच प्रदान करती है तो उससे लोगों के 'निजता के अधिकार का हनन' होगा.

ग़ौरतलब है कि फ़रवरी में जारी किये गए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 4(2) में कहा गया है कि 50 लाख से अधिक उपभोक्ता वाले सोशल मीडिया मध्यस्थों को ये सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी चैट या सन्देश की उत्पत्ति की पहचान हो सके.

निजता के अधिकार पर वार?

एक बयान में व्हाट्सएप के प्रवक्ता ने कहा कि "मैसेजिंग ऐप्स से चैट को "ट्रेस" करना हमें व्हाट्सएप पर भेजे गए हर एक संदेश का फ़िंगरप्रिंट रखने के लिए कहने के बराबर है जो एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन को तोड़ देगा और मौलिक रूप से लोगों के निजता के अधिकार को कमज़ोर कर देगा".

व्हाट्सएप प्रवक्ता ने यह भी कहा कि वे "लोगों, समाज और दुनिया भर के विशेषज्ञों के साथ लगातार ऐसी ज़रूरतों का विरोध करने में शामिल हुए हैं जो हमारा ऐप उपयोग करने वालों की गोपनीयता का उल्लंघन करेंगी".

उन्होंने यह भी कहा कि इस बीच वे लोगों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से व्यावहारिक समाधानों पर भारत सरकार के साथ जुड़े रहेंगे और इसमें उपलब्ध जानकारी के लिए वैध क़ानूनी अनुरोधों का जवाब देना भी शामिल है.

गुरुवार को ट्विटर ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से नए नियमों का पालन करने के लिए तीन और महीने का समय देने का आग्रह किया.

ट्विटर के एक प्रवक्ता ने गुरुवार को बीबीसी को बताया, "फ़िलहाल हम भारत में अपने कर्मचारियों के बारे में हालिया घटनाओं और लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संभावित ख़तरे से चिंतित हैं."

रिपोर्टों के अनुसार फ़ेसबुक ने कहा है कि उनका लक्ष्य आईटी नियमों के प्रावधानों का पालन करना और कुछ ऐसे मुद्दों पर चर्चा करना जारी रखना है जिनके लिए सरकार के साथ अधिक जुड़ाव की आवश्यकता है. आईटी नियमों के अनुसार वे परिचालन प्रक्रियाओं को लागू करने और दक्षता में सुधार करने के लिए काम कर रहे हैं.

वहीं गूगल की तरफ़ से दिए गए बयान में कहा गया है कि वे महसूस करते हैं कि उनके प्लेटफ़ॉर्मों को सुरक्षित रखने का काम पूरा नहीं हुआ है और वे अपने मौजूदा दृष्टिकोण को बेहतर करना जारी रखेंगे. अपनी नीतियों को विकसित करेंगे और निर्णय लेने के तरीक़े के बारे में यथासंभव पारदर्शी होंगे.

सरकार का पलटवार

व्हाट्सएप के अदालत में जाने पर भारत सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.

सरकार ने एक बयान में कहा है कि अक्टूबर 2018 के बाद से गंभीर अपराधों के संबंध में पहले उत्प्रेरक यानी मामले की शुरुआत करने वाले का पता लगाने की आवश्यकता को लेकर व्हाट्सएप ने भारत सरकार से लिखित रूप में कोई विशेष आपत्ति नहीं की. सरकार ने कहा है कि व्हाट्सएप ने दिशानिर्देशों को लागू करने के लिए समय बढ़ाने के लिए समय माँगा लेकिन यह नहीं कहा कि कोई संदेश कहा से शुरू हुआ ये पता लगाना संभव नहीं है.

सरकार ने यह भी कहा है कि पर्याप्त समय और अवसर मिलने के बावजूद व्हाट्सएप का कोर्ट में जाना दिशानिर्देशों को प्रभावी होने से रोकने का दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास है.

'जनहित में नियम'

संदेशों की उत्पत्ति का पता लगाने वाले प्रावधान के बारे में सरकार ने कहा है, "यह जनहित में है कि इस तरह के अपराध को अंजाम देने वाली शरारत की शुरुआत किसने की उसका पता लगाया जाये और उसे दंडित किया जाये."

साथ ही यह भी कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि "कैसे मॉब लिंचिंग और दंगों आदि के मामलों में बार-बार व्हाट्सएप संदेश प्रसारित और प्रसारित किए जाते हैं जिनकी सामग्री पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में है. इसलिए उत्पत्ति करने वाले की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है."

सरकार का कहना है कि एक तरफ़ व्हाट्सएप गोपनीयता नीति को अनिवार्य बनाना चाहता है जिसमें वो अपने सभी उपयोगकर्ता के डेटा को अपनी मूल कंपनी फ़ेसबुक के साथ विपणन और विज्ञापन उद्देश्यों के लिए साझा करेगा और वहीं दूसरी ओर वो मध्यस्थ दिशानिर्देशों को लागू करने से इनकार करने के लिए हर संभव प्रयास करता है जो क़ानून-व्यवस्था को बनाए रखने और फ़ेक न्यूज़ के ख़तरे को रोकने के लिए ज़रूरी हैं.

सरकार ने यह भी कहा है कि व्हाट्सएप एक अपवाद बनाकर मध्यस्थ दिशानिर्देशों को लागू करने से इनकार करता है कि प्लेटफ़ॉर्म पर संदेश एंड टू एंड एन्क्रिप्टेड हैं. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार सूचना के पहले स्रोत का पता लगाने का नियम प्रत्येक महत्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यस्थ के लिए अनिवार्य है चाहे उनके संचालन का तरीक़ा कुछ भी हो.

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि यह पूरी बहस ग़लत है कि एन्क्रिप्शन को बनाए रखा जाएगा या नहीं. उनके अनुसार यह पूरी तरह से सोशल मीडिया मध्यस्थ के दायरे की बात है कि एन्क्रिप्शन तकनीक या किसी अन्य तकनीक का उपयोग करके गोपनीयता का अधिकार सुनिश्चित किया जाता है या नहीं.

उनके अनुसार भारत सरकार अपने सभी नागरिकों की निजता का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और साथ ही सार्वजनिक व्यवस्था सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने के लिए आवश्यक साधन और जानकारी माँग रही है. उनके अनुसार इन दोनों बातों को सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी समाधान खोजना व्हाट्सएप की ज़िम्मेदारी है चाहे वो एन्क्रिप्शन के माध्यम से हो या किसी और तरीक़े से.

क्या हैं नए नियम?

25 फ़रवरी को भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 को अधिसूचित किया. मंत्रालय ने कहा कि ऐसा डिजिटल मीडिया से संबंधित उपयोगकर्ताओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और अधिकारों की कमी के बारे में बढ़ती चिंताओं के बीच और जनता और हितधारकों के साथ विस्तृत परामर्श के बाद किया गया.

इन नए नियमों के अनुसार सोशल मीडिया सहित सभी मध्यस्थों को ड्यू डिलिजेंस या उचित सावधानी का पालन करना होगा. अगर वे ऐसा नहीं करते तो उन्हें क़ानून के द्वारा दी गईं सुरक्षाएं नहीं मिलेंगी. साथ ही ये नियम मध्यस्थों को शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने को कहते हैं और उपयोगकर्ताओं, विशेष रूप से महिला उपयोगकर्ताओं की ऑनलाइन सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी मध्यस्थ पर डालते हैं. इन नियमों के अनुसार ग़ैर-क़ानूनी जानकारी को हटाने की ज़िम्मेदारी भी मध्यस्थों की होगी और उन्हें उपयोगकर्ताओं को सुनने का अवसर देना होगा और एक स्वैच्छिक उपयोगकर्ता सत्यापन तंत्र की स्थापना करनी होगी.

जिन सोशल मीडिया मध्यस्थों के 50 लाख से ज़्यादा उपभोक्ता हैं उनके लिए सरकार ने कहा कि उन्हें एक मुख्य अनुपालन अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी जो अधिनियम और नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए ज़िम्मेदार होगा.

साथ ही इन बड़े मध्यस्थों को क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ चौबीसों घंटे समन्वय के लिए एक नोडल संपर्क अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी और एक शिकायत अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी जो शिकायत निवारण तंत्र के अंतर्गत कार्यों को करेगा. इन पदों पर उन्हीं लोगों की नियुक्ति होगी जो भारत के निवासी हों. साथ ही प्राप्त शिकायतों के विवरण और शिकायतों पर की गई कार्रवाई के साथ-साथ इन सोशल मीडिया मध्यस्थों द्वारा सक्रिय रूप से हटाई गई सामग्री के विवरण का उल्लेख करते हुए एक मासिक अनुपालन रिपोर्ट प्रकाशित करनी होगी.

इन नियमों को लाने की क्या वजहें दी गईं?

सरकार ने कहा था कि ये नियम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के सामान्य उपयोगकर्ताओं को उनकी शिकायतों के निवारण के लिए और उनके अधिकारों के उल्लंघन के मामले में जवाबदेही माँगने के लिए काफ़ी हद तक सशक्त बनाते हैं.

सरकार ने ये भी कहा था कि जहाँ तक सोशल मीडिया मध्यस्थों के विकास की बात है तो वे अब शुद्ध मध्यस्थ की भूमिका निभाने तक सीमित नहीं रह गए हैं और अक्सर वे प्रकाशक बन जाते हैं और ये नियम 'उदार स्व-नियामक ढांचे के साथ उदार स्पर्श' का एक अच्छा मिश्रण हैं.

साथ ही ये भी साफ़ किया गया कि ये नियम ऑनलाइन या ऑफ़लाइन सामग्री पर लागू होने वाले देश के मौजूदा क़ानूनों पर काम करते हैं. सरकार ने कहा था कि "समाचार और समसामयिक मामलों के संबंध में प्रकाशकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे भारतीय प्रेस परिषद के पत्रकारिता आचरण और केबल टेलीविज़न नेटवर्क अधिनियम के तहत कार्यक्रम संहिता का पालन करें, जो पहले से ही प्रिंट और टीवी पर लागू हैं. इसलिए केवल एक समान खेल मैदान प्रस्तावित किया गया है."

इन नियमों का ख़ुलासा करते समय सरकार ने कहा था कि सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स ने आम भारतीयों को अपनी रचनात्मकता दिखाने, प्रश्न पूछने, सूचित होने और सरकार और उसके पदाधिकारियों की आलोचना सहित अपने विचार स्वतंत्र रूप से साझा करने में सक्षम बनाया है.

'क़ानून के प्रति जवाबदेह होना होगा'

साथ ही यह भी कहा था कि सरकार लोकतंत्र के एक अनिवार्य तत्व के रूप में आलोचना और असहमत होने के प्रत्येक भारतीय के अधिकार को स्वीकार करती है और उसका सम्मान करती है. यह कहते हुए कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा खुला इंटरनेट समाज है, सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों का भारत में काम करने, व्यापार करने और मुनाफ़ा कमाने के लिए स्वागत करते हुए कहा था कि "उन्हें भारत के संविधान और क़ानूनों के प्रति जवाबदेह होना होगा."

सरकार का कहना है कि जहां सोशल मीडिया का प्रसार एक ओर नागरिकों को सशक्त बनाता है वहीं दूसरी ओर कुछ गंभीर चिंताओं और परिणामों को जन्म देता है जो हाल के वर्षों में कई गुना बढ़ गए हैं. सरकार ने कहा था कि "इन चिंताओं को समय-समय पर संसद और इसकी समितियों, न्यायिक आदेशों और देश के विभिन्न हिस्सों में नागरिक समाज विचार-विमर्श सहित विभिन्न मंचों पर उठाया गया है" और "इस तरह की चिंताएं पूरी दुनिया में भी उठाई जाती हैं और यह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है."

इन नियमों को बनाने के पीछे अपनी मंशा बताते हुए सरकार ने कहा था कि "हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर कुछ बहुत ही परेशान करने वाले घटनाक्रम देखे गए हैं" और "फ़र्ज़ी ख़बरों के लगातार प्रसार ने कई मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों को तथ्य-जांच तंत्र बनाने के लिए मजबूर किया है"

सरकार ने कहा था, "सोशल मीडिया पर महिलाओं की मॉर्फ्ड छवियों और रिवेंज पोर्न से संबंधित सामग्री को साझा करने के लिए बड़े पैमाने पर दुरुपयोग ने अक्सर महिलाओं की गरिमा को ख़तरे में डाल दिया है" और "कॉरपोरेट प्रतिद्वंद्विता को खुले तौर पर अनैतिक तरीक़े से निपटाने के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग व्यवसायों के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय बन गया है". साथ ही ये भी कहा था कि "अपमानजनक भाषा के उपयोग, अपमानजनक और अश्लील सामग्री और धार्मिक भावनाओं के प्रति अनादर के उदाहरण इन प्लेटफ़ॉर्मों के माध्यम से बढ़ रहे हैं."

नए नियम बनाने की ज़रुरत बताते हुए सरकार ने कहा था कि "पिछले कुछ वर्षों में अपराधियों, राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा सोशल मीडिया के दुरुपयोग की बढ़ती घटनाओं ने क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं" और "इनमें आतंकवादियों की भर्ती के लिए प्रलोभन, अश्लील सामग्री का प्रसार, वैमनस्य का प्रसार, वित्तीय धोखाधड़ी, हिंसा को बढ़ावा देना, सार्वजनिक व्यवस्था आदि शामिल हैं".

सरकार के अनुसार ये पाया गया कि वर्तमान में कोई मज़बूत शिकायत तंत्र नहीं है जिसमें सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म के सामान्य उपयोगकर्ता अपनी शिकायत दर्ज कर सकें और निर्धारित समय सीमा के भीतर इसका निवारण कर सकें.

सरकार का कहना था कि पारदर्शिता की कमी और मज़बूत शिकायत निवारण तंत्र की अनुपस्थिति ने उपयोगकर्ताओं को पूरी तरह से सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की सनक और कल्पनाओं पर निर्भर कर दिया है. सरकार के अनुसार अक्सर यह देखा गया है कि एक उपयोगकर्ता जिसने सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल को विकसित करने में अपना समय, ऊर्जा और पैसा ख़र्च किया है, उसके पास कोई उपाय नहीं रह जाता है अगर उसे सुने जाने का अवसर दिए बिना उसके प्रोफ़ाइल को प्लेटफ़ॉर्म द्वारा प्रतिबंधित या हटा दिया जाता है.

सरकार की मंशा

इस पूरे घटनाक्रम पर साइबर क़ानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल का कहना है कि "सरकार अब पेंच कसना शुरू कर देगी".

वे कहते हैं कि इन नियमों ने कंपनियों के सिर पर एक तलवार लटका दी है और इस तलवार का इस्तेमाल कहां कंपनियों के ख़िलाफ़ किया जायेगा उसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता. उनके अनुसार इन नियमों के माध्यम से सरकार मध्यस्थों और सेवा प्रदाताओं पर अपना नियंत्रण मज़बूत करती है और उन्हें कुछ चीज़ें करने के लिए विवश करती है और अगर वे न करें तो उन्हें जेल भेजा सकता है.

उनके अनुसार इसका कारण ये है की जो नियम आये हैं उन्होंने पूरी तरह लीगल फ्रेमवर्क को बदल दिया है.

वे कहते हैं, "पहले ऐसा होता था कि सर्विस प्रोवाइडर से जानकारी माँगी जाती थी और अगर जानकारी नहीं मिलती थी तो बात आगे नहीं बढ़ती थी. नए नियमों के अनुसार अगर सर्विस प्रोवाइडर जानकारी नहीं देंगे तो उनके विरुद्ध क्रिमिनल कार्रवाई हो सकती है और उनको आईटी अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के लिए दंडित किया जा सकता है. तो 25 फ़रवरी से आपराधिक दायित्व स्थापित हो गया है. नियम 25 फ़रवरी से लागू हो गए तो नियम तो उसी दिन से अमल में लाने हैं. शिकायत अधिकारी नियुक्त करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया था. ये नियम उन सोशल मीडिया मध्यस्थों पर लागू होते हैं जिनके पास 50 लाख से अधिक उपयोगकर्ता हैं."

दुग्गल का कहना है कि कुछ कंपनियों ने ये नियुक्तियां कर ली हैं और कुछ ने नहीं की हैं और जिन्होंने यह नियुक्तियां नहीं की हैं उन पर आपराधिक कार्रवाई हो सकती है. "आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान है तो सही लेकिन वो लागू होगा या नहीं ये आने वाला समय या राजनीतिक इच्छाशक्ति बताएगी."

एक्सेस नाउ 2009 में स्थापित एक ग़ैर-लाभकारी संस्था है जो दुनिया भर के लोगों के डिजिटल नागरिक अधिकारों का बचाव और विस्तार करती है. इसके वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय परामर्शदाता और एशिया प्रशांत नीति निदेशक रमन चीमा से बीबीसी ने बात की.

चीमा के अनुसार सरकार द्वारा जारी किए गए नियम काफ़ी अभूतपूर्व और व्यापक हैं. वे कहते हैं कि सरकार को केवल दूरसंचार कंपनियों, नेटवर्क कंपनियों, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, सर्च इंजन या समाचार वेबसाइट जैसे इंटरनेट मध्यस्थ जो उपयोगकर्ता टिप्पणियों की मेज़बानी कर सकते हैं उनके लिए केवल ड्यू डिलिजेंस या उचित सावधानी परिभाषित करनी थी. "लेकिन एक संकीर्ण विषय को परिभाषित करने के बजाय उन्होंने संसद में जाये बिना एक क़ानून बना दिया है जिसका मक़सद यह लग रहा है की तकनीकी प्लेटफ़ॉर्म विरोध न कर सकें और सरकार या राजनीतिक निर्देशों का पालन करने के लिए मजबूर हो जाएं."

चीमा कहते हैं कि यह सेक्टर को डराने और मारने की कोशिश है. जिस समय इन नियमों को लाया गया वो बहुत संदिग्ध है. वे कहते हैं, "यह ट्विटर के साथ सरकार के विवाद के तीन सप्ताह बाद किया गया था जब ट्विटर ने कहा कि उनसे जो कुछ भी पूछा जा रहा था वह सरकार के अपने क़ानूनों के अनुसार क़ानूनी नहीं है."

ट्विटर ऑफ़िस में दिल्ली पुलिस

कुछ ही दिन पहले ट्विटर ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता संबित पात्रा के एक ट्वीट पर "मैनिपुलेटेड मीडिया" का लेबल लगाया था.

भाजपा के नेताओं ने हाल ही में ट्विटर पर एक दस्तावेज़ के स्क्रीनशॉट साझा किए थे जिसमें कहा गया था कि यह मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा महामारी से निपटने में सरकार की विफलता को उजागर करने के लिए बनाया गया था.

कांग्रेस ने ट्विटर से शिकायत की कि दस्तावेज़ फ़र्ज़ी थे जिसके बाद ट्विटर ने पात्रा के ट्वीट सहित कुछ पोस्टों को "मैनिपुलेटेड मीडिया" के तौर पर चिह्नित किया था. ट्विटर नियमों के तहत उन पोस्टों पर "मैनिपुलेटेड मीडिया" टैग लगाया जाता है जिनमे जिनमें ऐसी वीडियो, ऑडियो और छवियां शामिल हैं जिन्हें भ्रामक रूप से बदल दिया गया है या गढ़ा गया है.

दिल्ली पुलिस ने सोमवार को कहा कि पात्रा के ट्वीट को वर्गीकृत किए जाने की शिकायत मिलने के बाद पुलिस अधिकारी कंपनी के प्रबंध निदेशक को नोटिस देने के लिए ट्विटर कार्यालय गए थे.

ट्विटर प्रवक्ता ने कहा है कि "हम भारत और दुनिया भर में नागरिक समाज में कई लोगों की तरह हमारी वैश्विक सेवा की शर्तों को लागू करने के जवाब में पुलिस द्वारा धमकाने की रणनीति के उपयोग और नए आईटी नियमों के मूल तत्वों के संबंध में चिंतित हैं."

दुग्गल का मानना है कि दिल्ली पुलिस ट्विटर को एक छोटा सा समन देने नहीं गई थी.

वे कहते हैं, "पुलिस एक सन्देश देने गई थी कि कंपनियां अपनी कमर कस लें और अगर उनसे माँगी हुई जानकारी नहीं दी तो उनपर कार्रवाई होगी. समन तो ईमेल से भी भेजा जा सकता था. और वर्क फ्रॉम होम के समय में पुलिस किसी कंपनी के दो दफ्तरों में क्यों जाएगी? तो सन्देश बहुत साफ़ है."

चीमा कहते हैं कि सरकार आईटी कंपनियों को बड़ी संख्या में आदेश और राजनीतिक निर्देश भेज रही है और कई कम्पनियां इनका ये कहकर विरोध कर रही हैं कि वो आदेश या तो कंपनी की नीतियों को तोड़ते हैं या सरकार के अपने निर्देशों से मेल नहीं खाते हैं.

वे कहते हैं, "सरकार ने दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल को एक राजनेता के ट्वीट की लेबलिंग के मसले को अपने हाथ में लेने को कहा. अगर आप फ़रवरी में पारित इन नियमों में सरकार के स्वयं के निर्देशों को देखें तो वे वास्तव में चाहते थे कि प्लेटफ़ॉर्म अधिक स्वचालित तकनीकों का उपयोग करें और सामग्री को अधिक सक्रिय रूप से लेबल करें. लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार चाहती थी कि वे तब तक ऐसा करें जब तक कि यह उनसे जुड़े किसी राजनेता से संबंधित न हो."

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ आईटी मंत्रालय ने कहा है कि ट्विटर "अपनी कार्रवाई के ज़रिए भारत की क़ानून प्रणाली को कमतर दिखाना चाहता है."

वहीं, दुग्गल के अनुसार समस्या ये है कि आईटी रूल्स 2021 में कोई नियंत्रण और संतुलन नहीं है.

वे कहते हैं, "तो संभावित तौर पर उसका जो दुरूपयोग होने की सम्भावना है उसे ख़ारिज नहीं किया जा सकता. पुलिस की शक्तियों पर भी तो कुछ नियंत्रण होना चाहिए. इन शक्तियों के इस्तेमाल से आप राजनीतिक विरोधियों या आलोचकों को निशाना बनाना चाहते हैं क्या? इन नियमों का ग़लत इस्तेमाल न हो इसीलिए ज़रूरी है कि इनमे चेक्स एंड बैलेंसेस होने चाहिए."

वे कहते हैं कि क़ानून नहीं मानता कि यह कंपनियां अपने उपभोक्ताओं को विवश कर सकती हैं कि वे किसी तरह की सामग्री प्रकाशित न करें. "क़ानून कहता है कि आप नियम लाइए, गोपनीयता नीति लाइए, उपयोगकर्ता का समझौता लाइए जिससे आप उपभोक्ताओं को बताएंगे कि वो क्या क्या नहीं कर सकते. अगर कंपनियों ने नियम लागू कर दिए और हर छह महीने में लोगों को सूचित कर दिया कि लोग उनका पालन करें तो उसके बाद भी कोई नियम का उल्लंघन करता है तो कंपनियों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी. यदि कंपनियां ड्यू डिलिजेंस के मापदंडों का अनुपालन कर लेंगी तो उन्हें सेक्शन 79 के तहत क़ानूनी दायित्व से वैधानिक छूट का सुरक्षा कवच मिल जाता है ."

दुग्गल के अनुसार मुख्य बात यह है कि सरकार ने कहा है कि फ़ेक न्यूज़ से निपटने की ज़िम्मेदारी भी सर्विस प्रोवाइडर की होगी. वे कहते हैं, "जैसे जैसे चीज़ें उभर रही हैं, हम उस दिशा में जा रहे हैं जहाँ सर्विस प्रोवाइडर्स को विवश किया जा सकता है कि वो कुछ परिस्थितियों में कार्रवाई करें. अब तो सर्विस प्रोवाइडर के हाथ में कुछ रहा ही नहीं. उससे जो जानकारी सरकारी एजेंसियां मांगेंगी उसे देनी होगी. नहीं देंगी तो उन पर और उनके शीर्ष प्रबंधन पर आपराधिक मुक़दमा होगा. तो ये खेल बदलने वाला नियम है. अभी तक कंपनियों को इन पहलुओं का आभास नहीं हुआ है."

दुग्गल की मानें तो ये नियम केवल बड़े सर्विस प्रोवाइडर जैसे ट्विटर और फ़ेसबुक पर ही नहीं बल्कि 99.9 प्रतिशत भारतीय कंपनियों पर भी लागू होते हैं. वे कहते हैं, "भारतीय कंपनियां अपनी नींद से जगी नहीं हैं. ये नियम मध्यस्थों पर लागू होते हैं. आईटी एक्ट में मध्यस्थों की परिभाषा इतनी विशाल है कि लगभग 99.9 प्रतिशत कंपनियां बिचौलिया मानी जा सकती हैं."

दुग्गल के अनुसार अगर कोई भी कंपनी इलेक्ट्रॉनिक डाटा या कम्प्यूटरों का इस्तेमाल कर रही है या थर्ड पार्टी डाटा को अपने सिस्टम में रख रही है, चाहे वो उसके कर्मचारियों का ही डाटा क्यों न हो, तो वो मध्यस्थ या बिचौलिया बन जाती है. "एक बार आप बिचौलिया बन जाएं तो आईटी एक्ट की धारा 79 में कहा गया है कि आपको अपने दायित्वों का निर्वहन करते समय ड्यू डिलिजेंस अपनाना पड़ेगा."

दूसरे देशों में क्या है स्थिति?

क्या इस तरह के नियम दुनिया के और देशों में भी हैं. दुग्गल कहते हैं कि जिस तरह यह नियम भारत में विकसित किये जा रहे हैं उससे मेल खाने वाले नियम दुनिया में फ़िलहाल कहीं नज़र नहीं आते.

वे कहते हैं, "अमेरिका मॉडल के अनुसार सर्विस प्रोवाइडर को एक पाइप प्रोवाइडर माना जाता है और उस पाइप के अंदर क्या बह रहा है उसके लिए प्रोवाइडर को ज़िम्मेदार नहीं माना जाता. तो अमेरिका में क़ानूनी दायित्व से पूर्ण छूट है. भारत ने कहा कि अगर आप कुछ चुनिंदा शर्तें मानेंगे तो हम आपको वैधानिक प्रतिरक्षा देंगे. वो चुनिंदा शर्तें इन नियमों में आ गईं हैं. इसका मतलब ये है कि अगर आप इनमे से एक भी नियम के एक भी प्रावधान को नहीं मानेंगे तो दो तरह के परिणाम होंगे. पहला ये के जो आईटी एक्ट के तहत कंपनियों की क़ानूनी दायित्व से वैधानिक छूट है वो चली जाएगी और दूसरा ये कि कंपनियों पर फ़ौजदारी मुक़दमे होंगे."

दुग्गल मानते हैं कि बिना चैक्स और बैलेंसिस के इन नियमों के दुरूपयोग होने की ज़बरदस्त सम्भावना है और आने वाले दिनों में वो कंपनियों के लिए दुखदाई हो सकता है. वे कहते हैं कि "इकोसिस्टम को सुरक्षित, सुदृढ़ और स्थिर तरह से विकसित हो इसके लिए ज़रूरी है कि इन नियमों में कुछ अंकुश लगाए जाएं. वो अंकुश या तो सरकार ख़ुद लगाए या अदालतों को लगाने पड़ेंगे."

रमन चीमा के अनुसार सरकार इस बात से बहुत चिंतित प्रतीत होती है कि तकनीकी प्लेटफ़ॉर्म पर अभद्र भाषा और इंटरनेट पर मौजूद अन्य सामग्री को प्रतिबंधित करने का अधिक दबाव है और इससे भारत में कुछ राजनेताओं को प्रतिबंधित किया जा सकता है. वे कहते हैं, "टैक प्लेटफ़ॉर्म द्वारा डोनाल्ड ट्रंप को हटाने और अमेरिका में अभद्र भाषा को बढ़ावा देने वाले अन्य राजनेताओं पर प्रतिबंध लगने से भारत में खलबली सी मच गई है."

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