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तरुण तेजपाल: बलात्कार, यौन उत्पीड़न, क़ानून और मीडिया के बारे में क्या बताता है यह केस?
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2013 में न्यूज़ मैगज़ीन तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल पर बलात्कार के आरोप लगने के बाद, 'तेजपाल का तहलका कांड' और 'तरुण तेजपाल ने ख़ूब कमाई दौलत और शोहरत, स्कैंडल ने कर दिया बर्बाद' जैसी हेडलाइन्स के साथ कई लेख छपे.
एक नामचीन और रसूख़दार पत्रकार के ख़िलाफ़ इतना संजीदा आरोप सामने आने को मीडिया ने काफ़ी तरजीह दी.
ये वो वक़्त था जब भारत में यौन हिंसा से जुड़े क़ानूनों में बड़े परिवर्तन किए गए थे और डिजिटल रेप, शादी में बलात्कार, काम की जगह पर यौन उत्पीड़न, शारीरिक संबंध बनाने में महिलाओं की सहमति जैसे मुद्दों पर खुलकर बहस होनी शुरू हुई थी.
क़रीब आठ साल बाद अब गोवा की एक फ़ास्ट-ट्रैक अदालत ने तरुण तेजपाल को अपनी सहकर्मी के बलात्कार, यौन उत्पीड़न और जबरन बंधक बनाने के सभी आरोपों से बरी कर दिया है.
भारत में महिलाओं के अधिकारों के लिए बड़ी उथल-पुथल के वक़्त सामने आए इस केस से बलात्कार, यौन उत्पीड़न और मीडिया के बारे में कई बातें सामने आती हैं.
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बलात्कार के कड़े क़ानून और न्याय
दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक चलती बस पर सामूहिक बलात्कार और हत्या के केस के बाद यौन हिंसा से जुड़े क़ानूनों की समीक्षा की गई.
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा (रिटायर्ड) की अध्यक्षता वाली समिति ने सुझाव दिए जिनमें से कई को अपनाते हुए दशकों पुराने क़ानून को बदला गया.
साल 2013 में बलात्कार की परिभाषा को 'फ़ोर्स्ड पीनो-वैजाइनल पेनिट्रेशन' से बढ़ाया गया. नई परिभाषा के मुताबिक़ 'महिला के शरीर में किसी भी चीज़ या शारीरिक अंग को ज़बरदस्ती डालना' बलात्कार माना गया.
तेजपाल का मामला इस नई परिभाषा के तहत किसी रसूख़दार व्यक्ति के ख़िलाफ़ आया पहला केस था.
महिलावादी ऐक्टिविस्ट और ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन्स एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णनन के मुताबिक़ सिर्फ़ क़ानूनी परिभाषा बदलने से हिंसा की समझ नहीं बदलती है.
फ़ैसला आने के बाद उन्होंने कहा, "पिछले सालों में पुलिस और न्याय व्यवस्था में क़ानून के बदलाव पर काफ़ी बैकलैश देखा गया है, बार-बार ऐसे मामलों को बलात्कार से कम - छेड़छाड़ - जैसा ही माना जाता है, औरत की 'ना' की ध्वनि पर सवाल उठते हैं या पहले से रही दोस्ती को अनकही सहमति की वजह मान लिया जाता है."
अहम बात ये भी है कि तरुण तेजपाल की सहकर्मी ने उनके ख़िलाफ़ पुलिस केस करने की मंशा कभी ज़ाहिर ही नहीं की.
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जाँच दफ़्तर करे या पुलिस?
तरुण तेजपाल पर गोवा में उनकी मैगज़ीन के एक बड़े आयोजन के दौरान अपनी जूनीयर सहकर्मी के साथ यौन हिंसा का आरोप लगा था.
ये घटना उनके दफ़्तर में नहीं हुई थी पर काम से संबंधित आयोजन में होने की वजह से इसे काम की जगह पर यौन उत्पीड़न की श्रेणी में माना गया.
काम की जगह पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए साल 2005 में बनाई गई विशाखा गाइडलाइन्स को उसी साल क़ानून की शक्ल दी गई थी.
इसके तहत हर दफ़्तर को काम की जगह पर यौन उत्पीड़न की जाँच और फ़ैसले के लिए इंटर्नल कम्प्लेनट्स कमेटी बनानी होती है.
नवंबर 2013 में उस महिला ने अपने दफ़्तर को चिट्ठी लिख पूरे मामले की जानकारी दी थी और जाँच की माँग की.
संशोधित भारतीय क़ानून के मुताबिक़ अगर कोई महिला काम की जगह पर यौन उत्पीड़न की शिकायत करना चाहती है तो ये उसकी मर्ज़ी है कि वो इसके लिए दफ़्तर में इंटर्नल कमेटी के तहत जाँच की माँग करे या क्रिमिनल लॉ के सेक्शन 354(ए) के तहत पुलिस के पास जाए.
'नेटवर्क फ़ॉर वुमेन इन मीडिया इन इंडिया' की सह-संस्थापक और पत्रकार लक्ष्मी मूर्ति 'ग़ैर-ज़रूरी या मामूली' समझे जानेवाले आरोपों के लिए महिलाओं के पुलिस के पास जाने से झिझकने की कई वजह बताती हैं.
वो कहती हैं, "ये प्रावधान भी अन्य किसी क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन जैसा ही रास्ता है, जिसमें लंबा वक़्त लग सकता है (इस केस में 7.5 साल), पैसा और वक़्त ख़र्च होता है (हर सुनवाई के लिए गोवा जाना), डिफ़ेन्स लॉयर की टीम के सवालों के जवाब देने पड़ते हैं, मीडिया के आकलनों से निपटना, सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाएं इत्यादि."
लक्ष्मी के मुताबिक़ इसीलिए कई महिलाएं 'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऐट वर्कप्लेस' ऐक्ट के तहत दफ़्तर में शिकायत करना बेहतर मानती हैं जिसके तहत उन्हें अन्य तरह की राहत मिल सकती है.
शिकायत सही पाए जाने पर छुट्टी, डिपार्टमेंट या टीम बदला जाना, मैनेजर बदला जाना, आर्थिक भुगतान और काउंसलिंग जैसा न्याय मिल सकता है.
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कितनी कारगर है दफ़्तर की जाँच?
तरुण तेजपाल मामले के वक़्त तहलका मैगज़ीन में कोई इंटर्नल कम्प्लेनट्स कमेटी नहीं थी. शिकायतकर्ता ने इसी कमेटी के तहत जाँच की माँग की थी.
यौन उत्पीड़न के बारे में खुलकर बोलने के आंदोलन #MeToo के दौरान ट्विटर पर #MeTooIndia@IndiaMeToo हैंडल चलानेवाली ऋतुपर्णा चैटर्जी बताती हैं कि भारत के निजी क्षेत्र में कितनी कंपनियों ने ये कमेटी बनाई है इसका कोई आंकड़ा तक मौजूद नहीं है.
वो कहती हैं, "पिछले सालों में बदलाव इस हद तक आया है कि अब लोगों में इस बारे में थोड़ी जागरूकता है कि कैसा व्यवहार ग़लत है और यौन उत्पीड़न की परिभाषा में आ सकता है, पर दफ़्तरों की नीयत अब भी न्याय दिलाने की नहीं है, कमेटियां या तो बनाई ही नहीं जातीं या सदस्यों का चयन क़ानून के मुताबि़क नहीं होता, या उसकी जानकारी दफ़्तर में सबको नहीं दी जाती."
मार्च 2020 में काम की जगह पर यौन उत्पीड़न पर हुए एक सर्वे में पत्रकार जगत से भाग लेने वाली 456 महिलाओं में से एक-तिहाई ने कहा कि उनके साथ ऐसा हुआ है लेकिन 50 फ़ीसद ने इसके बारे में किसी को नहीं बताया.
'नेटवर्क फ़ॉर वुमेन इन मीडिया, इंडिया' और 'जेंडर ऐट वर्क' के इस सर्वे की लेखकों में से एक लक्ष्मी मूर्ति के मुताबिक़ कमेटी की प्रक्रिया को अब भी संजीदगी से नहीं लिया जाता है.
उन्होंने कहा, "इसके बार में जागरूकता बढ़ाई जाए तो ये दफ़्तरों में सेक्सिस्ट, मिसॉजिनिस्ट (औरत को नीचा दिखाने वाली), जाति सूचक व्यवहार की संस्कृति को बदलने के सबसे कारगर तरीक़ों में से एक हो सकता है."
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मीडिया की मदद या ट्रायल?
तरुण तेजपाल के जिस केस में फ़ैसला आया है वो महिला ने नहीं, गोवा पुलिस ने ख़ुद मीडिया में आई जानकारी का संज्ञान लेकर उनके ख़िलाफ़ दायर किया था.
कई अख़बारों, वेबसाइट और टीवी चैनलों ने तरुण तेजपाल और महिला सहकर्मी की एक-दूसरे को और दफ़्तर को लिखे ई-मेल्स बिना सहमति लिए छाप दिए थे.
इंटरनेट पर अब भी शिकायतकर्ता की अपनी संस्था को लिखी वो ई-मेल मौजूद है जिसमें उनके साथ की गई हिंसा का पूरा विवरण था. ये ई-मेल केस के कुछ ही समय बाद 'लीक' हो गया था.
एक न्यूज़ चैनल ने होटल की लिफ़्ट के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरे का फ़ुटेज भी दिखाया था. मीडिया में शिकायतकर्ता महिला का नाम नहीं बताया गया, लेकिन उसके कपड़ों, उम्र, तहलका मैगज़ीन में उसके काम इत्यादि के बारे में विस्तृत चर्चा की गई.
कविता कृष्णनन के मुताबिक़, "बिना शिकायतकर्ता की सहमति के, न्याय के नाम पर उसके ई-मेल्स छापना या होटल का सीसीटीवी फ़ुटेज दिखाना, उसकी मदद करना नहीं बल्कि उससे उसकी मर्ज़ी छीनना है."
गोवा सरकार ने अब निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील करने का ऐलान किया है.
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