बिहार: कोरोना का क़हर दिख रहा दिल दहलाने वाली कहानियों और ख़ौफ़नाक तस्वीरों में

    • Author, चिंकी सिन्हा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पीपीई किट पहने, मां का शव दफ़नाने के लिए गड्ढा खोदती एक युवती की तस्वीर ग्रामीण बिहार में कोरोना की दूसरी लहर का दर्दनाक सच बयां करती है. इस तस्वीर को दैनिक भास्कर अख़बार के चंदन चौधरी ने अपने कैमरे में क़ैद किया है.

अररिया के मधूलता में माता की कोविड-19 से मौत के बाद 18 साल की लड़की सोनी कुमारी और उसके भाई-बहन का गांववालों ने बहिष्कार कर दिया था. उन्हें माता-पिता का दाह संस्कार तक नहीं करने दिया गया.

मां के शव को दफ़नाने के लिए अकेली लड़की की गड्ढा खोदती तस्वीर अख़बार में प्रकाशित होने के बाद मामला सुर्ख़ियों में आया.

सोनी कुमारी के पिता वीरेंद्र मेहता एक 'झोला छाप' डॉक्टर थे. स्थानीय लोगों के मुताबिक़ मरीज़ों का इलाज करने के दौरान वो संक्रमित हो गए थे.

इस घटना पर लगातार नज़र बनाये रखनेवाले अररिया की 'मैं मीडिया' नाम की संस्था के रिपोर्टर मेराज ख़ान बताते हैं कि सोनी के पिता की मौत तीन मई को पूर्णिया में हो गई थी. उसकी 12 साल की एक बहन और 10 साल का एक भाई है.

परिवार ने वीरेंद्र मेहता के इलाज के लिए उनके पास बची जो थोड़ी ज़मीन और मवेशी थे, उसे बेच डाला. लेकिन पूर्णिया के एक प्राइवेट नर्सिंग होम में भर्ती कराने के बावजूद मेहता बच नहीं सके.

गांव का कोई व्यक्ति मेहता के अंतिम संस्कार में मदद के लिए नहीं आया तो तीनों बच्चों ने ही गड्ढा खोद कर पिता के शव को दफ़ना दिया.

तीन दिनों बाद, सात मई को बच्चों की मां प्रियंका देवी की भी मौत हो गई. बच्चों ने मां के शव को भी पिता की क़ब्र के बग़ल में गड्ढा खोद कर दफ़ना दिया.

अफ़वाहों, मौतों और सामाजिक बहिष्कारों की कहानी

मेराज कहते हैं कि इस घटना को लोगों के सामने लाना ज़रूरी है.

बिहार सरकार ने इन पीड़ितों को मुआवज़े में चार लाख रुपये का चेक दिया है. प्रियंका देवी का मृत्यु प्रमाण पत्र मिल गया था जिसके बाद ज़िला प्रशासन ने मुआवज़े के तौर पर चार लाख रुपए का चेक दे दिया है. लेकिन अभी तक पिता की मौत का प्रमाण पत्र नहीं मिल सका है. मेराज उसे हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि बच्चों को पिता की मौत का भी मुआवज़ा मिल सके.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महामारी में मारे गए लोगों के परिजनों को मुख्यमंत्री राहत कोष से चार लाख रुपये देने का एलान किया था. मेराज कहते हैं कि कुछ लोग बाद में मदद के लिए आगे आए.

मेराज कहते हैं, "यह घटना बिहार में कोरोना महामारी की कहानी का सार है. ये कहानियां हैं अफ़वाहों, मौतों और गांवों में हो रहे सामाजिक बहिष्कारों की."

यह कहानी है अपनों की मौत के बाद अकेले पड़ जाने की. जैसे सोनी की दास्तां या फिर कहानी उन शवों की जो बक्सर में गंगा नदी के तट पर बहकर किनारे लग गए.

बक्सर में गंगा नदी के किनारे तैरती लाशों की घटना सामने आने के बाद पटना हाई कोर्ट ने अलग-अलग सरकारी एजेंसियों की ओर से बताई जाने वाली मौतों की संख्या में अंतर पर ख़ासी नाराज़गी जताई है.

जजों ने बिहार के प्रमुख स्वास्थ्य सचिव से पूरी तरह जाँच-पड़ताल के बाद दो दिन बाद नए सिरे से रिपोर्ट दाख़िल करने को कहा है.

डिवीज़नल कमिश्नर के आधिकारिक बयान के मुताबिक़ 5 से 14 मई के बीच बक्सर के चारधाम घाट पर 789 शवों का अंतिम संस्कार हुआ था.

बिहार के ग्रामीण इलाक़ों से लगातार इस तरह की भयावह ख़बरें आ रही हैं. तस्वीरों में ख़ौफ़नाक मंज़र दिख रहे हैं.

लोग दिल दहलाने वाली घटनाएं सुना रहे हैं. उन्हीं से पता चल रहा है कि किस तरह से कोरोना से मरने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है. मौतों का लेखा-जोखा अब इन्हीं तस्वीरों और कहानियों से मिल रहा है.

गांवों में जिस तेज़ी से संक्रमण फैला है उसकी कई वजहें हैं. इनमें प्रवासी मज़दूरों के शहर से गांव लौटने का कोई प्रोटोकॉल न होना भी शामिल है. पिछले साल शहर से गांव लौट रहे लोगों के लिए क्वारंटीन सेंटरों की व्यवस्था थी. लेकिन इस बार ऐसी कोई व्यवस्था नहीं दिख रही है.

बिहार के स्वतंत्र पत्रकार उमेश कुमार राय कहते हैं कि राज्य में प्रवासी मज़दूरों के लिए बने क्वारंटीन सेंटर बंद कर दिए गए हैं. इस वजह से ग्रामीण इलाक़ों में कोरोना संक्रमण फैल रहा है.

प्रवासी मज़दूरों को नहीं मिल रही मदद

उन्होंने 20 अप्रैल को लुधियाना से पटना आए एक प्रवासी मज़दूर की कहानी बताई. उन्होंने कहा कि 40 साल के राजेश पंडित को ट्रेन में ही बुख़ार आना शुरू हो गया था.

शाम को पटना जंक्शन पर उतरने के बाद रात उन्होंने स्टेशन पर ही बिताई. सुबह उन्होंने समस्तीपुर स्थित अपने गांव जाने के लिए बस पकड़ी. घर पहुँचते-पहुँचते राजेश की हालत बिगड़ गई. बुख़ार बढ़ने पर उन्होंने गांव में ही डिस्पेंसरी चलाने वाले एक झोला-छाप डॉक्टर को दिखाया.

कुमार कहते हैं, "डॉक्टर ने पंडित को कुछ इंजेक्शन लगाए. लेकिन उनकी हालत नहीं सुधरी. इसके बाद उन्हें समस्तीपुर के एक प्राइवेट क्लिनिक में भर्ती कराया गया. जब वहां भी ठीक नहीं हुए तो उन्हें दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया. वहां उनकी मौत हो गई."

बिहार सरकार के पास इस बार, बाहर से लौट रहे प्रवासी मज़दूरों पर निगरानी के लिए कोई मैकेनिज़्म नहीं है, जबकि पिछले साल मई में सरकार ने लगभग हर पंचायत में क्वारंटीन सेंटर बनवाए थे.

मई से जून के आख़िर के बीच बाहर से आने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए दो सप्ताह का क्वारंटीन अनिवार्य था. उस वक़्त आशा कार्यकर्ताओं को बाहर से लौटे प्रवासियों पर निगरानी रखने की ज़िम्मेदारी दी गई थी.

दरभंगा के मुरैठा में काम करने वाली आशा कार्यकर्ता ममता बताती हैं कि वह अपने गांव के लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जाकर टेस्ट कराने के लिए कहती हैं.

लेकिन 53 साल की ममता देवी आजकल ज़्यादातर वक़्त घर पर ही रहती हैं.

वह कहती हैं, "लॉकडाउन लगा हुआ है. फिर भी मैं गांव में घूम-घूम कर लोगों से मास्क पहनने को कहती रहती हूं. अगर किसी को सर्दी-खांसी है तो हम उन्हें दवा देते हैं. लोग अस्पताल नहीं जा रहे हैं. उन्हें लगता है कि वहां जाकर मर जाएंगे".

उलझा हुआ है लाशों की गिनती का गणित

मुज़फ़्फ़रपुर के एक स्थानीय रिपोर्टर अक्सर शाम को मुक्तिधाम श्मशान में आने वाले शवों की गिनती करते हैं और मौतों के सरकारी आंकड़ों से उसका मिलान कराते हैं.

उन्होंने कहा कि सोमवार को सरकारी आंकड़ों में मौतों की संख्या आठ बताई गई लेकिन स्थानीय श्मशान और क़ब्रिस्तान के केयरटेकर ने बताया कि उस दिन 15 लाशें लाई गई थीं.

22 अप्रैल को श्मशान के केयरटेकर अशोक कुमार ने यहां के स्थानीय रिपोर्टरों को बताया कि मध्य अप्रैल से शवों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा हुआ है. पहले एक दिन में सात-आठ शव लाए जाते थे लेकिन अब इनकी संख्या लगभग 25 तक पहुँच जाती है.

नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय मीडिया रिपोर्टर ने कहा कि "हर दिन के आंकड़ों में 10-15 शवों का अंतर होता है. ये लाशें यहां अस्पताल से लाई जाती हैं. मैं पिछले एक महीने से मौतों के सरकारी आंकड़ों और श्मशान में लाई जाने वाली लाशों की संख्या का मिलान कर रहा हूं."

"अस्पताल से जो पर्ची मिलती है उसमें लिखा होता है मरीज़ की मौत फेफड़े के फ़ेल होने या हार्ट अटैक से हुई है. नगर निगम ने ऐलान किया है कि कोविड-19 से मरने वालों के अंतिम संस्कार के लिए वह सात हज़ार रुपये देगा."

वो कहते है, "अगर आप कोविड-19 के लक्षण के बारे में पूछेंगे तो वो सांस लेने में दिक़्क़त, बुख़ार, खांसी वगैरह लिख देंगे."

कोरोना की दूसरी लहर से बिहार के गांवों में हाहाकार मचा है. इन गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं नदारद हैं, लिहाज़ा करोना से मौतों की संख्या बढ़ती ही जा रही है.

रिपोर्टर के मुताबिक़, "मौतों की सही संख्या कितनी है, यह हम कभी नहीं जान पाएंगे. पंचायत कार्यालय बंद हैं इसलिए डेथ सर्टिफ़िकेट जारी नहीं हो रहे हैं. हर गांवों के अपने-अपने घाट हैं और वहां कोई बाहरी आदमी घुस नहीं सकता."

इलाज के लिए मोटी रक़म कहां से लाएं?

जो प्राइवेट अस्पताल कोविड-19 के कथित मरीज़ों के इलाज के लिए मोटी रक़म वसूल रहे हैं उन्हें नोटिस जारी किए गए हैं.

स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक़ मुज़फ़्फ़रपुर के साहेबगंज इलाक़े की एक पूर्व सरपंच सरस्वती देवी को जब दो सरकारी अस्पतालों में बेड नहीं मिला तो उन्हें एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया.

मई महीने में वह तीन दिन तक इस अस्पताल में थीं. सिर्फ तीन दिन के लिए उनके परिवार वालों को दो लाख रुपये देने के कहा गया. परिवारवालों के पास इतना पैसा नहीं था कि उन्हें अस्पताल में और ज़्यादा दिनों तक रख सकें. लिहाज़ा वे उन्हें घर ले आए, जहां उनकी मौत हो गई.

परिवारवालों की शिकायत पर 11 मई को अस्पताल पर छापा पड़ा.

पत्रकारों के मुताबिक़ एक तरफ़ गांव के लोग प्राइवेट अस्पतालों का ख़र्चा नहीं उठा सकते, तो दूसरी तरफ़ हालात ये हैं कि सरकारी अस्पताल पूरी तरह भरे हुए हैं.

गांववालों को इस बात का भी डर लगा रहता है कि अस्पताल में भर्ती होने पर जान चली जाएगी.

एक स्थानीय रिपोर्टर ने बताया कि मुज़फ्फ़रपुर के कुरहानी ब्लॉक के चैनपुर गांव से प्राथमिक चिकित्सा केंद्र 30 किलोमीटर दूर है.

वे कहते हैं, "दस-बारह गांवों के बीच में कोई वैक्सीनेशन कैंप नहीं है. लगता है कि हर चीज़ ऑनलाइन हो गई है. गांववाले अपना रजिस्ट्रेशन नहीं करा पाते हैं."

रविवार को इस गांव में एक शख़्स की मौत हो गई. पिछले कुछ दिनों से उनमें कोविड-19 के सारे लक्षण दिख रहे थे. गांव के मुखिया ने किसी तरह पाँच दिनों तक ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था कर दी थी. इसके दम पर वह पाँच दिन तक जीवित रहे, लेकिन जैसे ही सिलेंडर ख़ाली हुआ, उनकी मौत हो गई.

उनके परिवारवालों से कहा गया कि प्राइवेट अस्पताल में इलाज के लिए 50 हज़ार रुपये जमा करने होंगे. परिवार के पास इतना पैसा नहीं था.

छिपाए जा रहे हैं आंकड़े

उस मरीज़ की कभी कोविड-19 टेस्टिंग नहीं हुई. बीमारी के दौरान लोग उन्हें देखने आते थे और लोग उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुए थे.

रिपोर्टर का कहना है कि अब गांव के दूसरे लोग भी बीमार पड़ रहे हैं. सिवान में एचटीवी न्यूज़ के फ़ाउंडर अन्सारुल हक़ कहते हैं कि कोरोना से मौतों के वास्तविक आंकड़े आधिकारिक आंकड़ों से बहुत ज़्यादा हैं.

वह कहते हैं, "मैं सिवान के एक क़ब्रिस्तान में गया था. वहां के लोगों ने बताया कि सिर्फ़ तीन दिन में ही 15 लाशें आ चुकी हैं. पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था."

एचटीवी न्यूज़ के क़ासिद अनवर नाम के एक रिपोर्टर की कुछ दिनों पहले मौत हो गई थी. टेस्टिंग में वह कोरोना पॉज़िटिव पाए गए थे.

हक़ बताते हैं, "उनका ऑक्सीजन लेवल 35 पर पहुँच गया था. उन्हें मोतिहारी ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई. हमें उनके लिए बेड नहीं मिल पाया. उनकी मौत को कोविड से हुई मौत में नहीं गिना जाएगा. क़ासिद सिर्फ़ 37 साल के थे".

क़ासिद की मौत के तीन दिन बाद उनके पिता मोहम्मद तसलीम की भी कोविड-19 से मौत हो गई.

हक़ कहते हैं, "हम उन्हें आईसीयू में शिफ़्ट कराने की कोशिश में लगे थे. हमें सदर अस्पताल के एक वार्ड में एक बेड मिला था. लेकिन पता चला कि वहां कोई वेंटिलेटर ही नहीं है. आख़िर सात मई को उनकी मौत हो गई."

वे कहते हैं, "यहां तो पैरासिटामॉल भी नहीं मिल रही है. गांवों की तो ख़बरें ही नहीं आ रही हैं. मोतिहारी में सदर अस्पताल के अलावा कोविड-19 के लिए सिर्फ़ तीन अस्पताल हैं. इस वजह से बड़ी तादाद में लोगों की मौत हो रही है."

"हर घर में लोग कह रहे हैं उनके यहां किसी न किसी को टाइफ़ाइड है. ये सब बाहर से लौटे मज़दूर हैं. क्वारंटीन सेंटर बंद हो चुके हैं. और लोग कोविड-19 के लिए लगाए प्रोटोकॉल को नहीं मान रहे हैं."

बिहार के पत्रकार विष्णु नारायण कहते हैं कि कैमूर में उनके गांव में दवा की कोई दुकान नहीं है. जबकि वहां 700 लोग रहते हैं.

नारायण कहते हैं, "मौतों की कोई गिनती नहीं हो रही है. जो मौतें हो रही हैं उनकी गितनी कोविड-19 से हुई मौतों में नहीं की जा रही है."

मौत ने उन्हें अछूत बना दिया है

बिहार में 37 हज़ार गांव हैं. ज़्यादातर गांवों में कोविड-19 से एक या दो लोगों की मौत की ख़बर है और यह संख्या बढ़ती ही जा रही है.

सरकार ने हर मौत पर परिजनों को चार लाख रुपये का मुआवज़ा देने का ऐलान किया है. लेकिन यह पूरी प्रक्रिया लालफ़ीताशाही में फँसा दी जाती है.

मुआवज़े की राशि के लिए आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट के अलावा इलाज का पूरा ब्योरा अटैच करना होता है- दवा की रसीद, डॉक्टर का पर्चा, लक्षण का ब्योरा, डेथ सर्टिफ़िकेट और सिविल सर्जन के दफ़्तर से मौत को अटेस्ट करता हुए हलफ़नामा भी जमा करना होता है.

यहां तक कि श्मशान या क़ब्रिस्तान में कोविड-19 के कथित मरीज़ों की दूसरी बीमारियों का भी ज़िक्र होता है. कई लोगों का कहना है इससे कोरोना वायरस से होने वाली मौतों के वास्तविक आंकड़ों को तोड़ने-मरोड़ने का मौक़ा मिल जाता है.

लेकिन दूर-दराज़ के गांवों से कोरोना से जुड़ी तमाम कहानियां सामने आ रही हैं.

बिहार के गया ज़िले में एक एनजीओ में काम करने वाले विजय केवट कहते हैं कि गांवों में जिन लोगों की मौत हो रही है उनमें से अधिकतर की उम्र 35 से 50 साल के बीच है.

वह कहते हैं, "हमें जब-तब मौतों की ख़बर मिलती रहती है. इन इलाकों में भीषण ग़रीबी है. लोगों के पास इलाज कराने के लिए पैसे नहीं हैं.

इसके अलावा कोरोना वायरस से जिन घरों में मौत हुई है, उसके लोगों का सामाजिक बहिष्कार होने लगता है. यह बड़ी चिंता की बात है."

गया ज़िले में डुमरिया ब्लॉक के गांव चाहरा पहरा के दिहाड़ी मज़दूर प्रवेश कुमार मांझी की दो मई को मौत हो गई. उन्हें चार दिन से बुख़ार आ रहा था और सांस लेने में तकलीफ़ हो रही थी.

उनका गांव दूर बसा हुआ है और वहां कार से भी नहीं जाया जा सकता.

केवट बताते हैं, "वहां तक पहुँचने के लिए लंबा चलना पड़ता है और फिर एक नदी पार करनी पड़ती है. गया से इसकी दूरी कम से कम 40-45 किलोमीटर होगी."

प्रवेश कुमार मांझी के 14 साल के बेटे प्रिंस कुमार का कहना है कि उसके पिता की मौत इसलिए हो गई क्योंकि वह काफ़ी ग़ुस्सा करते थे.

लेकिन केवट कहते हैं कि प्रिंस ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि क्योंकि उसे पता है कि असली वजह बताने पर गांव के लोग उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार शुरू कर देंगे.

केवट कहते हैं, "प्रवेश के घरवालों के पास कुछ भी नहीं है. उनकी घरवाली को अब तीन बच्चे पालने हैं. हमने अंतिम संस्कार के लिए उन्हें पैसे दिए. प्रवेश की टेस्टिंग नहीं हुई थी क्योंकि उनका गांव बहुत दूर था. लेकिन हर किसी को पता है कि उन्हें कोविड था."

गांव में एकमात्र आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं. इन गांवों में कोविड-19 से होने वाली मौतों को स्वाभाविक मौत मान लिया जा रहा है.

केवट कहते हैं, "एक और अफ़वाह यह उड़ी हुई है कि अस्पताल में मौत हुई तो लाश नहीं मिलेगी. जबकि हिंदू धर्म में मरे हुए व्यक्ति का अंतिम संस्कार अनिवार्य होता है वरना उसे मोक्ष नहीं मिलता."

एक ऐसे माहौल में जहां लोगों के कोरोना संक्रमण या इससे मौत की अफ़वाह से सामाजिक बहिष्कार हो रहे हैं, वहां इससे होने वाली मौतों का सही आंकड़ा जुटाना काफ़ी मुश्किल काम बना हुआ है.

सिवान के सामाजिक कार्यकर्ता श्रीनिवास यादव कहते हैं कि उनकी टीम ज़िले के अलग-अलग गांवों में जाकर मारे गए मारे गए लोगों का श्मशान या क़ब्रिस्तान में अंतिम संस्कार में मदद कर रही है.

वे कहते हैं, "हम मारे गए लोगों की लाशें ले लेते हैं और आख़िरी कर्मकांड करते हैं. हम लोगों को जागरुक भी करते हैं. अब तक हमने 25 शवों का अंतिम संस्कार किया होगा."

ज़ीरादेई के एक गांव में एक एंबुलेंस को गांव में घंटों इंतज़ार करना पड़ा क्योंकि गांववाले अपने यहां शव का अंतिम संस्कार नहीं करने दे रहे थे.

वह कहते हैं, "तड़के पाँच बजे से दोपहर तीन बजे तक एंबुलेंस वहीं खड़ी रही. हम दोपहर में पहुँचे. गांववालों के विरोध के बावजूद हमने शव का अंतिम संस्कार किया. गांववालों का कहना था चिता से उठते धुएं से भी कोरोना फैल सकता है."

"कोरोना के वायरस गांवों में भी फैल चुके हैं. हमारे पास मरीज़ों के जो आंकड़ें हैं उनसे पता चलता है कि ज़्यादातर केस गांवों के हैं. अस्पतालों में बेड भरे पड़े हैं. सदर अस्पताल में सिर्फ़ चार वेंटिलेटर तो हैं लेकिन कोई ऑपरेटेर नहीं है."

आख़िर में हमारे पास कुछ कहानियां और तस्वीरें ही बची रह गई हैं. उस लड़की की तस्वीर की तरह जो नीला पीपीई किट पहन कर अपने पिता की क़ब्र के बग़ल में मां को दफ़नाने के लिए गड्ढा खोद रही है.

यहां हर मौत की एक कहानी है. इन मौतों का सिर्फ़ ज़ुबानी रिकार्ड है.

पूछेंगे तो यही बताएंगे कि मारे गए शख़्स को बुख़ार था और सांस लेने में तकलीफ़ हो रही थी.

मौतों के बारे में जानने का यही एक तरीक़ा रह गया है. आधिकारिक तौर पर कोई जानकारी नहीं हैं.

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