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कोरोना: स्मार्टफ़ोन, इंटरनेट को टीके के लिए ज़रूरी बनाना कितनी जानों के लिए जोखिम?
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना की वैक्सीन लगावाने के लिए आपको कोविन ऐप पर ख़ुद को रजिस्टर करके टीकाकरण की जगह और समय बुक करना होता है, टीका लगवाने का यही तरीका सरकार ने तय किया है.
यही वजह है कि टीकाकरण की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं, कहा जा रहा है कि बहुत सारे लोग जिनके पास टेक्नोलॉजी या उसे इस्तेमाल करने का अभ्यास नहीं है वे इस दायरे से बाहर रह जाएँगे, और यह संख्या कोई मामूली नहीं है.
सवाल पूछे जा रहे हैं कि भारत जैसे देश में वो लोग वैक्सीन कैसे लगवाएंगे जिनके पास स्मार्टफ़ोन नहीं है, जिन्हें स्लॉट बुक करना समझ में नहीं आ रहा है, या फिर जो डिजिटल दुनिया से दूर हैं.
कोरोना के समय में जब लोग सामाजिक दूरी का पालन कर रहे हैं, आख़िर कौन और कैसे उनकी मदद करेगा?
रघुनाथ खाखर आदिवासी हैं और वो ठाणे ज़िले के आदिवासी-बहुल वललिवारे गांव में रहते हैं.
रघुनाथ के मुताबिक उनके गांव के क़रीब 700 लोगों में से क़रीब 40-50 के पास स्मार्टफ़ोन होगा जबकि सिर्फ़ 20-25 लोगों को अपने स्मार्टफ़ोन पर ऐप डाउनलोड करना या उन्हें इस्तेमाल करना आता है.
देश में वैक्सीन कम है और वैक्सीन लगवाने वाले कहीं ज़्यादा, जिस वजह से 18-44 उम्र वर्ग के सभी स्लॉट्स पलक झपकते ही बुक हो जाते हैं.
रघुनाथ के गांव में ख़राब मोबाइल नेटवर्क की वजह से उनके लिए कोविन ऐप का इस्तेमाल और मुश्किल हो जाता है. जब तक वो अपने मोबाइल पर ऐप खोलते हैं, ओटीपी डालते हैं, और वैक्सीन के लिए स्लॉट खोजते हैं, तब तक सभी स्लॉट्स बुक हो जाते हैं.
वो कहते हैं, "रजिस्टर करने के बाद मोबाइल जो समय लेता है, उस पर बुकिंग नहीं हो पाती. स्लॉट्स पहले से ही बुक्ड दिखाता है. छह दिन से बुकिंग नहीं हो पा रही है. सुबह नौ बजे से पांच दस मिनट पहले स्लॉट दिखते हैं लेकिन जैसे ही नौ बजने वाले हुए, स्लॉट बुक दिखते हैं."
और ये स्लॉट्स ज़्यादातर वो लोग बुक कर लेते हैं जो शहरों में रहते हैं जहां मोबाइल नेटवर्क बेहतर होता है, या फिर जिनके पास वाइ-फ़ाई की सुविधा है.
रघुनाथ कहते हैं, "हमें मोबाइल पर जितना नेटवर्क चाहिए उतना नहीं मिल रहा है. शहर वाले लोग लैपटॉप, वाइफ़ाई का इस्तेमाल कर रहे हैं इसलिए वो वैक्सीन स्लॉट की बुकिंग जल्दी कर पाते हैं जबकि हमारा समय प्रोसेस करते-करते ख़त्म हो जाता है."
रघुनाथ खाखर के लिए सबसे नज़दीकी अस्पताल 25 किलोमीटर दूर है जहां वैक्सीन लग रही है लेकिन रघुनाथ के मुताबिक वहां वैक्सीन लगवाने वालों में शहरी इलाकों से आने वालों की तादाद ज़्यादा है.
वो कहते हैं, "वहां मुंबई, ठाणे से, इधर-उधर से लोग वैक्सीन लगवाने आ रहे हैं, और यहाँ के लोग देखते रह जाते हैं."
कैप्चा कोड की दिक़्क़त
रघुनाथ के गांव के नज़दीक उतारवाड़ी आदिवासी इलाक़े में रहने वाले एक शिक्षक भी परेशान हैं.
उन्होंने बताया, "कोविन ऐप में पहले कैप्चा कोड नहीं था. अब कैप्चा कोड आ रहा है. उससे दिक़्क़त आ गई. जब मैं कैप्चा कोड डालता हूँ, तो कभी-कभी वो ग़लत पड़ जाता है. जब तक आप ग़लती ठीक करें और कैप्चा कोड दोबारा डालें, वैक्सिनेशन का स्लॉट बुक हो जाता है."
कैप्चा कोड का इस्तेमाल वेबसाइट पर लॉगिन के दौरान होता है जब आपको कुछ अक्षरों या नंबरों को एक बॉक्स में लिखना होता है ताकि यह पता चल सके कि आप रोबोट नहीं हैं.
भारत में अभी तक क़रीब 18.5 करोड़ लोग वैक्सीन लगवा चुके हैं जिनमें से ज़्यादातर लोग शहरी, शिक्षित और डिजिटल टेक्नॉलोजी का इस्तेमाल करने के अभ्यस्त हैं.
भारत की एक बड़ी जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है और एक आंकड़े के मुताबिक देश की 58.5 प्रतिशत जनसंख्या ही इंटरनेट से जुड़ी है.
ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट से जुड़े लोगों का प्रतिशत 34.6 है. इससे कोविन ऐप और वैक्सिनेशन प्रक्रिया की सीमा का अंदाज़ा लगता है.
ऐप की चुनौतियां
सॉफ़्टवेयर फ़्रीडम लॉ सेंटर के लीगल डायरेक्टर प्रशांत सुगठन कहते हैं, "बिना स्मार्टफ़ोन और हाई स्पीड इंटरनेट के ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले नागरिकों के लिए ये ख़ासतौर पर चुनौतीपूर्ण है. उनके पास कोविन ऐप के इस्तेमाल की जानकारी नहीं है."
वो कहते हैं, "दूसरी चुनौती है ऐप में गड़बड़ियाँ, जिस तरह शहरी इलाक़ों से लोग वैक्सीन लगवाने के लिए ग्रामीण इलाकों में जा रहे हैं, इससे दोनों के बीच झगड़े हुए हैं."
सुगठन के मुताबिक़ इस ऐप के इस्तेमाल से डिजिटल असमानता को बढ़ावा मिलता है.
वो कहते हैं, "इस ऐप के इस्तेमाल का मतलब है कि आपको टीकाकरण के लिए अंग्रेज़ी आनी चाहिए, आपको तकनीक का ज्ञान होना चाहिए और इन वजहों से देश की एक बड़ी जनसंख्या दायरे से बाहर हो जाती है. टेक प्लेटफ़ॉर्म पर भरोसे से विकलांग लोग इन सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं."
ठाणे ज़िला परिषद के उप-प्रमुख सुभाष पवार के पास भी डिजिटल असमानता की वजह से टीकाकरण नहीं हो पाने की शिकायत पहुंची है और उन्होंने प्रशासन से इस मामले को उठाया है.
वो कहते हैं, "सब लोग फ़ोन करते हैं कि हम लोग तीन-चार दिन से कोशिश कर रहे हैं मगर हमारा लॉग-इन नहीं हो रहा है. शहरों में नेटवर्क पॉवरफ़ुल होता है इसलिए उनका जल्दी रजिस्ट्रेशन होता है."
रिपोर्टों के मुताबिक कुछ इलाकों में मांग उठी है कि उनके लिए वैक्सिनेशन स्लॉट बुक किए जाएं. साथ ही कुछ इलाकों में स्थानीय नेताओं ने वैक्सिनेशन के लिए बाहर से आने वाले लोगों पर रोक लगाने की मांग की है.
इस बारे में नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के प्रमुख और कोविन ऐप का संचालन करने वाले शीर्ष अधिकारी आरएस शर्मा से प्रयासों के बावजूद संपर्क नहीं हो सका, उनकी प्रतिक्रिया मिलने पर यह रिपोर्ट अपडेट कर दी जाएगी.
भारत में वैक्सिनेशन का इतिहास बहुत पुराना है. स्मॉल पॉक्स, पोलियो, मीज़ल्स आदि के लिए वैक्सीन सफलतापूर्वक लोगों को दी जाती रही है.
इतिहास बताता है कि साल 1802 में भारत में पहली बार स्मॉल पॉक्स की वैक्सीन दी गई.
जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े अमूल्य निधि कहते हैं, "पहले जो भी टीकाकरण हुआ, उस वक़्त कोई भी ऐप नहीं था." लेकिन ये पहली बार है कि एक ऐप टीकाकरण का मुख्य आधार बना दिया गया है.
सरकारी पक्ष
नौ मई को दायर हलफ़नामे में सरकार ने ग्राम पंचायतों के कॉमन सर्विस सेंटर का हवाला दिया और कहा कि वहां ग्रामीण लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं.
कॉमन सर्विस सेंटर मिनिस्ट्री ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नॉलोजी के अंतर्गत आता है और इसका मक़सद है शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच डिजिटल दूरी को कम करना.
लेकिन 14 मई की इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 11 मई को क़रीब तीन लाख कॉमन सर्विस सेंटर्स में से 54,460 काम कर रहे थे और उनमें सिर्फ़ 1.7 लाख लोग रजिस्टर हुए थे, जो कि कुल रजिस्ट्रेशन का आधा प्रतिशत भी नहीं है.
अपने हलफ़नामे में सरकार ने टीकाकरण के लिए ऐप के इस्तेमाल की कई वजहें गिनाईं - अगर लोगों को सीधे टीकाकरण सेंटर आने दिया गया तो वहां भीड़ बढ़ेगी, एक सीमित समय में दो टीके दिए जाने की वजह से लोगों का हिसाब रखे जाने की ज़रूरत है.
अमूल्य निधि के मुताबिक पुरानी वैक्सिनेशन पॉलिसी बहुत अच्छी थी. वो कहते हैं, "जिस तरीके से राष्ट्रीय इम्युनाइज़ेशन कार्यक्रम के आधार पर टीकाकरण हुआ, उससे कोई दिक़्क़त नहीं थी."
उधर हलफ़नामे में सरकार ने कहा कि वैक्सीन को लोगों के घर जाकर नहीं दिया जा सकता क्योंकि बार बार वैक्सीन कैरियर बॉक्स को खोलने से वैक्सीन को ज़रूरत के मुताबिक तापमान पर रखना मुश्किल होगा, इससे वैक्सीन की बर्बादी हो सकती है. साथ ही, घरों पर जाने से स्वास्थ्य कर्मियों पर आसपास के लोग टीका लगाने के लिए दबाव डाल सकते हैं जिससे उन्हें सुरक्षा देने की ज़रूरत पड़ेगी.
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