कोरोना से लड़ाई में कितनी काम आई मोदी सरकार की आयुष्मान भारत -PMJAY योजना? बीबीसी पड़ताल

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • योजना में ज़रूरत की तुलना में बहुत कम अस्पताल शामिल हैं और वो भी नज़दीक नहीं है
  • कोविड19 के इलाज की सुविधा सभी पैनल में शामिल अस्पतालों में नहीं
  • आयुष्मान भारत के लाभार्थियों तक अस्पतालों की पूरी सूचना नहीं पहुँच पाई है
  • निजी अस्पतालों में ली जाने वाली रकम योजना की तय सीमा से बहुत अधिक हैं
  • कोविड पर योजना के तहत अब तक केवल 12 करोड़ रुपए खर्च हुए

"तीन रातों से भाई नीम का थाना के सरकारी अस्पताल में भर्ती था. कोरोना हुआ है. वहाँ डॉक्टरों से बात नहीं संभली तो उन्होंने प्राइवेट अस्पताल में जाने को कह दिया. पिछली रात को ही भाई को इस प्राइवेट अस्पताल में दाखिला करवाया है. ऑक्सीजन लेवल 80 तक पहुँच गया था. अभी भर्ती हुए 24 घंटे भी नहीं हुए हैं और हम अस्पताल वालों को 1 लाख 30 हजार रुपये दे चुके हैं."

बस इन तीन-चार लाइनों के बाद फोन पर दूसरी तरफ़ चुप्पी छा जाती है. राजेंद्र प्रसाद फफक कर रोने लगते हैं. आवाज़ में अनकही लाचारगी और बेबसी साफ़ महसूस की जा सकती है.

जयपुर से 17 किलोमीटर दूर नीम का थाना, सीकर के रहने वाले राजेंद्र प्रसाद सीकर के एक प्राइवेट अस्पताल में अपने भाई सुभाष चंद का इलाज करवाने पहुँचे हैं. उनके भाई अस्पताल के आईसीयू में ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं.

हाथ में उनके भाई सुभाष के नाम का आयुष्मान कार्ड है, जिस पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर छपी है.

राजेंद्र प्रसाद आंसू पोंछने के साथ बताते हैं, "तीन दिन तक तो सरकारी अस्पताल में थे, वहाँ इलाज में कोई पैसा नहीं लगा. हमें लगा कि ये कार्ड यहाँ भी काम आएगा. डॉक्टरों ने कहा तो हम भी यहाँ भाई को लाकर भर्ती करवा दिए. लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों ने कहा, पहले पैसे जमा करो, हम रसीद दे देंगे, जहाँ से वापसी लेनी हो आप ले लेना... बताओ मैडम, इस पर्चे/कार्ड का अब क्या करें. किस काम के मोदी जी... किस काम का उनका ये कार्ड?"

इतना कहते हुए, उनकी आँखों से फिर आँसू बहने लगे, सिसकियाँ तेज़ हो गईं. सुभाष के घर पर उनकी पत्नी हैं, एक बेटा और एक बेटी है. दोनों बी.ए. की पढ़ाई कर रहे है. परिवार के अकेले कमाने वाले सदस्य सुभाष एक छोटा सा स्कूल चलाते हैं, जो पिछले एक साल से बंद पड़ा है.

आयुष्मान भारत-PMJAY क्या है?

आयुष्मान कार्ड मतलब मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना आयुष्मान भारत का कार्ड. आयुष्मान भारत योजना के दो हिस्से हैं, एक है उनकी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम जिसे आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत-PMJAY) और दूसरी है हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर योजना.

आयुष्मान भारत-PMJAY देश की ही नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम है- ऐसा केंद्र सरकार का हमेशा से दावा रहा है.

सितंबर, 2018 में इस योजना को रांची में लॉन्च किया गया था. लेकिन उससे पहले अगस्त में ही ट्रायल के दौरान हरियाणा के करनाल में इस योजना के तहत पैदा हुई बच्ची 'करिश्मा' को इस योजना का पहली लाभार्थी माना जाता है.

इस योजना के तहत ग़रीब परिवारों के हर सदस्य का आयुष्मान कार्ड बनता है, जिसमें अस्पताल में भर्ती होने पर 5 लाख रुपये तक का इलाज मुफ़्त होता है. माना जाता है कि देश की कुल आबादी के आर्थिक रूप से कमज़ोर निचले 40 फ़ीसदी लोगों के लिए ये योजना है. इसके तहत देश भर में 20 हजार से ज़्यादा अस्पतालों में 1000 से ज़्यादा बीमारियों का इलाज मुफ़्त में करवाया जा सकता है.

इस योजना के लाभार्थी सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर तय किए जाते हैं, जिसके लिए 2011 में हुई सामाजिक और आर्थिक जनगणना के मानक बनाया गया है.

साल 2020 के शुरुआती महीनों में कोरोना महामारी भारत में पैर पसार रही थी, तब केंद्र सरकार ने कोविड-19 के मरीज़ों का इलाज भी आयुष्मान योजना के तहत करवाने की घोषणा की थी.

लेकिन देश में कोरोना महामारी के दौर में योजना का लाभ कार्ड धारकों को कितना मिल रहा है, उसकी जीती जागती मिसाल हैं सीकर के सुभाष चंद.

देश के हर कोने से कोरोना का इलाज करवाने के लिए मकान, जमीन और गहने बेचने की ना जाने कितने ही कहानियाँ सुनने में आ रही हैं, लेकिन जिनके पास बेचने के लिए कुछ नहीं है, उनके लिए ये कार्ड कितना उपयोगी होगा, इसका बखान करते केंद्र सरकार थकती नहीं थी.

पिछले साल मई में इस योजना का बढ़-चढ़ कर बखान करते हुए इसके तहत एक करोड़ लोगों का मुफ़्त इलाज करवाने की उपलब्धि का जश्न भी मनाया गया.

लेकिन बात जब कोरोना महामारी की चपेट में आए लोगों के इलाज की आई, तो आयुष्मान भारत-PMJAY का रिपोर्ट कार्ड वैसा नहीं दिखता जैसे दावे किए गए थे.

राजस्थान में आयुष्मान योजना का हाल

सबसे पहले बात राजस्थान की. सुभाष चंद की कहानी सुनने के बाद बीबीसी ने सम्पर्क किया राजस्थान की स्टेट हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम की मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुणा राजोरिया से.

उन्होंने बताया कि राजस्थान में आयुष्मान भारत-PMJAY का नाम 1 मई से 'मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना' हो गया है. उससे पहले इस योजना का नाम 'आयुष्मान भारत-महात्मा गांधी राजस्थान स्वास्थ्य बीमा योजना' था.

नाम बदलने के साथ-साथ इस योजना के लिए पात्रता का दायरा भी बढ़ा दिया गया है, जिसके तहत अब इस योजना का लाभ राज्य के 1.35 करोड़ लोगों को दिया जा रहा है. इसलिए केवल आयुष्मान भारत-PMJAY के लाभार्थियों की अलग लिस्ट नहीं रखते.

अरुणा राजोरिया का दावा है कि राजस्थान में आयुष्मान भारत-PMJAY के लाभार्थियों का 'मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य योजना' के तहत इलाज किया जा रहा है.

सुभाष चंद के मामले में उन्होंने कहा कि अगर वो कोरोना का इलाज इस योजना के पैनल में शामिल अस्पतालों में करवाते तो उन्हें भी मुफ़्त इलाज मिलता. लेकिन सुभाष चंद के भाई की दलील है कि उनको आयुष्मान भारत के पैनल में शामिल अस्पतालों के बारे में जानकारी नहीं है और ना ही उनके पास ऐसे अस्पतालों की कोई लिस्ट है.

इसके जवाब में राजोरिया ने बताया कि आयुष्मान भारत-PMJAY योजना के हर लाभार्थी के फ़ोन पर मैसेज के जरिए पैनल में शामिल अस्पतालों की लिस्ट का लिंक भेजा गया था.

ये मुमकिन है कि सुभाष चंद को ऐसा कोई मैसेज मिला हो और वो मैसेज के लिंक को खोलकर देख ये ना पाए हों कि किन निजी अस्पतालों में आयुष्मान भारत-PMJAY के तहत उनका इलाज हो पाएगा.

ये तो हुई राजस्थान की बात. अब बात पूरे देश की.

गाँवों में कोरोना और आयुष्मान का लाभ

कोरोना महामारी की दूसरी लहर अब गाँवों की ओर बढ़ रही है, ऐसा आँकड़े बता रहे हैं और अब तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कह रहे हैं.

और गाँवों में ही बसते हैं इस योजना के ज़्यादातर कार्ड धारक भी.

मार्च की शुरुआत में जब दूसरी लहर का प्रकोप बढ़ रहा था, तब 38 फ़ीसदी नए मामले ऐसे ज़िलों में दर्ज किए जा रहे थे जहाँ 60 फ़ीसदी से अधिक आबादी ग्रामीण इलाक़ों में रहती है. लेकिन अप्रैल के अंत तक ये आंकड़ा बढ़ कर 48 फ़ीसदी तक हो चुका था.

अब तक इस योजना के तहत तकरीबन 15 करोड़ 88 लाख कार्ड बन चुके हैं, जिनमें ज़्यादातर लोग ग्रामीण इलाकों में रहते है.

आयुष्मान भारत के डिप्टी सीईओ विपुल अग्रवाल के मुताबिक़ पिछले एक साल में-

• आयुष्मान भारत-PMJAY के तहत 14 अप्रैल 2021 तक देश भर में 4 लाख लोगों को मुफ़्त कोरोना इलाज मुहैया करवाया गया.

• 10 लाख कार्ड धारकों का कोरोना टेस्ट भी करवाया गया है.

• इन सब पर कुल ख़र्च हुआ है महज़ 12 करोड़ रुपये.

ये जानकारी आयुष्मान भारत के ट्विटर हैंडल से ट्वीट की गई एक रिपोर्ट में दी गई है. ये रिपोर्ट आयुष्मान भारत के डिप्टी सीईओ विपुल अग्रवाल के साक्षात्कार पर आधारित है.

बीबीसी ने इन आँकड़ों को और बारीकी से समझने के लिए आयुष्मान भारत के डिप्टी सीईओ डॉक्टर विपुल अग्रवाल और आयुष्मान भारत के सीईओ आरएस शर्मा से भी सम्पर्क किया. लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

इसलिए ये आँकड़े नहीं मिल पाए कि आयुष्मान भारत-PMJAY के तहत ख़र्च हुए 12 करोड़ रुपयों में किस राज्य की हिस्सेदारी कितनी है?

कोरोना महामारी के बीच आयुष्मान भारत-PMJAY के ये आँकड़े कहाँ खड़े होते हैं ये समझने के लिए भारत का कोरोना ग्राफ़ समझने की भी ज़रूरत है.

आँकड़ों को कैसे समझें?

सबसे पहले तो ये जानना ज़रूरी है कि भारत में इस समय कोरोना से तक़रीबन दो करोड़ लोग ठीक हो चुके हैं और 40 लाख एक्टिव मामले हैं. यानी भारत में अब तक कोरोना के कुल मामले तक़रीबन 2 करोड़ 40 लाख हैं.

भारत सरकार के मुताबिक़ 80-90 फ़ीसद मरीज़ घर पर ही इलाज से ठीक हो जाते हैं.

केवल 10-20 फ़ीसद मरीज़ों को ही अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत पड़ती है.

मान लीजिए 10 फ़ीसद को ही इलाज के लिए अस्पताल जाने की ज़रूरत पड़ी.

यानी 2 करोड़ 40 लाख में क़रीब 24 लाख लोगों को अस्पताल में जाने की ज़रूरत पड़ी होगी.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक उनमें से केवल 4 लाख मरीज़ों को ही इस इंश्योरेंस स्कीम के तहत लाभ मिला है.

और इन 4 लाख लोगों के इलाज पर सरकार ने 12 करोड़ रुपये ख़र्च किए हैं.

यहाँ आपको ये बता दें कि आयुष्मान भारत-PMJAY का सालाना बजट तकरीबन 6400 करोड़ रुपये का है.

प्राइवेट अस्पतालों की लूट और आयुष्मान भारत-PMJAY का रेट कार्ड

आयुष्मान भारत-PMJAY का ये रिपोर्ट कार्ड अच्छा है या बुरा, ये समझने के लिए हमने कुछ हेल्थ एक्सपर्ट्स से बात की. जिनमें एक हैं ऊमेन सी. कुरियन, जो ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के साथ सीनियर फ़ेलो के तौर पर जुड़े हैं.

ऊमेन सी. कुरियन ने बीबीसी से कहा, "जब देश में रोजाना औसतन 20-25 हजार PMJAY के अस्पतालों में दाखिले के नए मामले आ रहे हों, तब साल भर में सरकारी स्कीम के तहत केवल 4 लाख मरीज़ों का इलाज, इतनी बड़ी हेल्थ स्कीम के लिए अच्छा कैसे माना जा सकता है?

ग़ौरतलब है कि इस साल मार्च-अप्रैल से शुरू हुई दूसरी लहर में तो भारत में एक दिन में 4 लाख नए मामले तक आए हैं."

"इस सरकार की दिक़्क़त यही है कि ये डेटा साझा नहीं करती. अब ये 4 लाख मरीज, किस हाल में थे, किस राज्य में कितने थे, ये बताने में भी इन्हें दिक़्क़त है, तो फिर समझा जा सकता है कि ये क्या छुपाना चाह रहे हैं."

पिछले साल दिसंबर 2020 तक के आँकड़े कुछ हद तक पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म पर हैं, उनसे कुछ संदर्भ निकाले जा सकते हैं. ये आँकड़े बताते हैं कि कोरोना महामारी के दौरान इस योजना के तहत इलाज माँगने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही थी, लेकिन सबको अस्पतालों में इलाज नहीं मिल पाया.

ऊमेन मानते हैं कि इसके पीछे एक बड़ी वजह कोविड19 के इलाज के लिए आयुष्मान भारत-PMJAY का रेट कार्ड भी है.

आयुष्मान भारत-PMJAY के तहत हरियाणा का रेट कार्ड कुछ इस प्रकार है:

• आईसीयू बेड (वेंटिलेटर के साथ) 5000 रु प्रति दिन

• आईसीयू बेड - 4000 रु प्रति दिन

• हाई डेंसिटी यूनिट बेड - 3000 रु. प्रति दिन

• जनरल वार्ड बेड - 2000 रु. प्रति दिन

चूंकि कोविड-19 के इलाज में पीपीई किट की ज़रूरत भी पड़ती है, इस वजह से हरियाणा सरकार ने इस पर 20 फ़ीसद रेट बढ़ाने का फैसला किया था. जिसके बाद आईसीयू बेड, वेंटिलेटर के साथ 6000 रु. प्रति दिन का पड़ेगा.

हालांकि इतना करने के बाद भी हरियाणा का रिपोर्ट कार्ड कहता है कि वहाँ पिछले एक साल में सिर्फ़ 10 हजार लोगों का इस योजना के तहत इलाज हुआ, लेकिन वहां के आयुष्मान भारत कार्ड धारकों की संख्या 15.5 लाख है और वहाँ कोरोना के मरीज साढ़े 6 लाख से ज़्यादा है. साथ ही हरियाणा में कोरोना के इलाज की सुविधा 600 से ज्यादा अस्पतालों में है.

कमोबेश हरियाणा सरकार जैसे रेट कार्ड ज़्यादातर राज्यों का भी है.

ऐसे में सवाल उठता है कि सुभाष चंद जैसे क्रिटिकल मरीज़ों को प्राइवेट अस्पताल वाले आयुष्मान योजना के तहत सिर्फ़ 6000 रुपये रोज़ाना के लिए क्यों भर्ती करेंगे? वो भी तब कोरोना महामारी के बीच उस आईसीयू बेड के एवज में प्राइवेट अस्पताल वाले बड़े आराम से मोटी रकम वसूल सकते हैं.

ऊमेन के मुताबिक़ ये एक बड़ी वजह है जिसके चलते कोविड-19 जैसे क्राइसिस में इस योजना के तहत ज़्यादा लोगों को मुफ़्त इलाज का फ़ायदा नहीं मिल पाया. कोरोना महामारी को प्राइवेट अस्पतालों ने पैसा बनाने का एक ज़रिया बना लिया है.

योजना के तहत अस्पतालों का नेटवर्क

हमारे दूसरे एक्सपर्ट हैं डॉक्टर चंद्रकांत लहरिया. डॉक्टर लहरिया भारत के जाने माने जन-नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ हैं.

हाल ही में कोरोना महामारी पर आई किताब 'टिल वी विन: इंडियाज़ फ़ाइट अगेंस्ट कोविड-19 पैन्डेमिक' के सह-लेखक भी हैं.

डॉक्टर चंद्रकांत कहते हैं, "इन आँकड़ों के मद्देनज़र दो बातों को ध्यान में रखने की ज़रूरत है. इस योजना का उद्देश्य ही देश के निचले तबके के 40 फ़ीसद लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करना है. यानी एक बहुत छोटे वर्ग के लिए ये योजना थी. दूसरी बात ये है कि कोरोना महामारी के समय बहुत सारे अस्पतालों में इस नई बीमारी के इलाज की सुविधा नहीं थी."

वो मानते हैं कि ये बड़ा मुद्दा है. ये आँकड़े इस बात को दर्शाते हैं कि ऐसी योजनाओं की ख़ामियां क्या हैं.

इस योजना के तहत देश भर में कुछ ही अस्पताल इनके पैनल पर होते हैं. जब जरूरतमंद लोगों को वास्तव में इसकी ज़रूरत होती है, तो सुविधाएँ उन तक नहीं पहुँचती हैं.

डॉक्टर चंद्रकांत इसके लिए उदाहरण भी देते हैं. अगर गाँव में किसी को कोरोना का टेस्ट कराना है तो हर जगह ये हो नहीं रहा, ऐसे में कार्ड धारक की मजबूरी होगी कि वो उसी अस्पताल में जाएं, जहाँ कोरोना टेस्ट होते हैं.

कोई भी मरीज़ पैनल वाले अस्पताल में जाने का इंतजार नहीं करेगा. उसी तरह से इलाज भी पैनल वाले अस्पतालों में ही मुफ़्त में संभव होता है. अब ज़रूरी नहीं कि इस योजना के तहत पैनल में आने वाले सभी अस्पताल कोविड-19 का इलाज कर ही रहे हों.

दरअसल सुभाष चंद के साथ भी यही हुआ. सरकारी अस्पताल से जिस प्राइवेट अस्पताल में उनको रेफ़र किया गया, वो आयुष्मान योजना के पैनल पर नहीं है.

बीबीसी के सहयोगी पत्रकार मोहर सिंह मीणा ने खंडाका अस्पताल के डॉक्टर सुधीर व्यास से बात की. डॉक्टर सुधीर व्यास का कहना है कि उनका अस्पताल आयुष्मान भारत योजना के पैनल में शामिल नहीं होना चाहता है क्योंकि दिसम्बर 2019 से राज्य की भामाशाह योजना के ही 16 लाख रुपये का अभी तक भुगतान नहीं किया गया है.

जब सुभाष के परिवार से इस बारे में पूछा गया कि वे उन्हें उस प्राइवेट अस्पताल में क्यों नहीं ले गए, जहाँ आयुष्मान योजना के तहत मुफ़्त में कोविड का इलाज हो सकता था? इस पर परिवार का कहना है कि उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं थी.

ये इस योजना की दूसरी बड़ी खामी है. पैनल में शामिल अस्पतालों के बारे में लाभार्थियों को पूरी जानकारी ना होना.

कोरोना महामारी के दौरान आर्थिक तौर पर कमज़ोर परिवारों को आयुष्मान भारत-PMJAY से जोड़ने के लिए कई नई मुहिम चलाई गईं. कई लोगों के कार्ड बनाए गए. आयुष्मान भारत के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर पिछले दो महीने के पोस्ट देखें तो इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे. लेकिन मार्च-अप्रैल में जब से भारत में दूसरी लहर शुरू हुई है, तब से एक भी पोस्ट ऐसी नहीं मिलेगी जो कोविड के इलाज के बारे में हो या कोविड अस्पतालों की लिस्ट और रेट कार्ड की जानकारी दे.

दूसरी बीमारियों का इलाज

आयुष्मान योजना के तहत दूसरी बीमारियों के इलाज में भी काफ़ी कमी आई है. पिछले साल मार्च से लेकर मई के दौरान की गई एक स्टडी में पाया गया है कि उन तीन महीनों के लिए महामारी के चलते आँखों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन में 90 फ़ीसद कमी आई.

कैंसर संबंधित इलाज में 57 फ़ीसद की कमी देखने को मिली, डायलिसिस के मामले में 10 से 20 फ़ीसद कम हुए तो वहीं सीज़ेरियन बच्चों की डिलिवरी में किसी किसी राज्य में 70 फ़ीसद तक गिरावट दर्ज़ की गई. बच्चों की बीमारियों के इलाज और इमरजेंसी सेवाओं में भी 15 से 20 फ़ीसद की गिरावट देखी गई, इसके पीछे की वजह लॉकडाउन, कोरोना फैलने का डर और लोगों की सजगता के अलावा कई अस्पतालों में दूसरी सेवाओं के बंद होने को भी माना गया.

ऊमेन के मुताबिक़ पिछले लॉकडाउन के बाद धीरे-धीरे सितंबर 2020 के बाद इस योजना के तहत बाकी बीमारियों के इलाज में थोड़ी तेज़ी आई थी, जो इस योजना के लिए अच्छी बात थी. पिछले साल जब कोरोना का क़हर कम हुआ तो दूसरी गंभीर बीमारियों के शिकार लोगों को इस योजना से काफ़ी मदद मिली. लेकिन कोविड-19 के मरीज़ों को उतनी मदद नहीं मिल पाई.

योजना को बेहतर बनाने के उपाय

डॉक्टर चंद्रकांत और ऊमेन दोनों इस योजना के पीछे की सोच को काफी सराहते हैं. डॉक्टर चंद्रकांत मानते हैं कि योजना के लॉन्च होने के डेढ़ साल तक इसका बहुत अच्छा इस्तेमाल हुआ, महामारी के समय में उनके रिपोर्ट कार्ड पर टिप्पणी थोड़ी जल्दबाज़ी के साथ नाइंसाफ़ी भी होगी. कोरोना काल में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बेहाल ही रहा.

इसे बेहतर बनाने के लिए वो समाधान भी सुझाते हैं.

डॉक्टर चंद्रकांत के मुताबिक, "ग़रीबों के लिए सरकार योजना बना रही है, अमीर ख़ुद के लिए इंश्योरेंस स्कीम ख़रीद लेते हैं. लेकिन जो लोग इन दोनों ही कैटेगरी में नहीं आते, सरकार को उनको भी इस योजना से जोड़ने की पहल करनी चाहिए. भले ही उसका ख़र्च जनता ख़ुद ही उठाए. इसे वो 'मिसिंग मिडिल' का नाम देते हैं. इस तरह से आयुष्मान भारत योजना का दायरा बढ़ेगा और ज़्यादा लोगों को इसका लाभ मिलेगा.

दूसरा तरीका है, आयुष्मान भारत योजना का दूसरा हिस्सा- जिसमें हेल्थ एंड प्राइमरी वेलनेस सेंटर के नेटवर्क को और सुदृढ़ बनाने की बात की गई है. जब आपके पड़ोस में स्वास्थ्य केंद्र होगा, जहाँ टेस्टिंग जैसी बेसिक सुविधाएं होंगी, तो लोगों को बड़े अस्पतालों में जाने की नौबत नहीं आएगी. ऐसे में अस्पतालों पर बोझ भी घटेगा, सरकार का ख़र्च भी कम होगा और शुरुआती लक्षण दिखने पर ही बीमारी पर काबू पाने में आसानी होगी. इस तरह की सुदृढ़ प्राथमिक सेवा मिलने पर लोगों की स्वास्थ्य संबंधी दिक़्क़तें दूर हो जाएंगी.

ऊमेन के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकारों को कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान इलाज के रेट कार्ड के बारे में भी सोचना चाहिए. अगर दूसरी जगह उस सेवा से अस्पताल वाले दोगुना कमा रहे हैं, तो फिर कोई भी सस्ते सरकारी पैकेज वाले मरीज़ों को अपने यहाँ भर्ती क्यों करेगा?

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