कोरोना: वो भयावह रात, ऑक्सीजन ख़त्म, स्टाफ़ लापता और दम तोड़ते मरीज़

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले महीने के अंत में दिल्ली से सटे गुरुग्राम के कृति अस्पताल से ख़बर आई कि वहां ऑक्सीजन की कमी से छह लोगों की मौत हो गई है.
इसके साथ आया एक दर्दनाक वायरल वीडियो भी जिसमें कुछ लोग एक बंद कमरे में घुसते हुए दिख रहे हैं. मेडिकल उपकरणों से लैस बिस्तरों पर मृत लोग नज़र आते हैं.
पीछे से एक व्यक्ति की आवाज़ आती है, "मर गया. मर गया. सब. ऐसे ही पड़े हुए हैं." वीडियो में अस्पताल का एक भी स्टाफ़ नज़र नहीं आता.
कोरोना महामारी से देश के अस्पतालों में लगातार ऑक्सीजन की कमी से मरीज़ों की मौत की खबरें आ रही हैं.
अप्रैल महीने में दिल्ली तीन अस्पतालों में अलग-अलग घटनाओं में ऑक्सीजन की कमी होने पचास से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. कर्नाटक के एक अस्पताल में 24 लोगों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई.
मेरठ, तिरुपति, रेवाड़ी, गुरुग्राम, और कई इलाकों से ऐसी ही खबरें आईं. घरों में, सड़कों पर, अस्पताल के बाहर ऑक्सीजन की कमी या फिर अस्पताल के आईसीयू बेड की कमी से लोगों की मौत हो रही है.
लेकिन किसी अस्पताल में शायद ही ये पहली बार हुआ था कि डॉक्टर सहित पूरा स्टाफ़ आईसीयू में मृत मरीज़ों को छोड़कर चला गया हो.
गुरुग्राम के डिप्टी कमिश्नर यश गर्ग ने बीबीसी को बताया कि मामले की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए गए हैं और रिपोर्ट जल्द ही आने की उम्मीद है.
30 अप्रैल की रात कृति अस्पताल में आख़िर क्या हुआ?
हमने मृतकों के रिश्तेदारों, अस्पताल की प्रमुख और प्रशासन से बात करके उस रात के घटनाक्रम को जानने-समझने की कोशिश की. साथ ही, हमारे साथ उस रात के वीडियो साझा किए गए जिनमें उस रात अस्पताल के गलियारों, कमरों की तस्वीरें कैद हैं.
अस्पताल में उस रात आईसीयू में 76 साल की गीता सिन्हा, 53 साल के मोहिंदर सिंह चावला, 49 साल के विशाल जैन और 61 साल की शकुंतला देवी की मौत हुई. बाकी दो मृत लोगों के बारे में पता नहीं चल पाया है.

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34 साल के नवीन कुमार पाठक के परिवार ने हमें बताया कि उनकी मौत अगले दिन तड़के सुबह अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से दिल का दौरा पड़ने से हुई.
मीडिया में आई रिपोर्टों के मुताबिक़ उस रात अस्पताल में कम से कम छह मरीज़ों की मौत हुई थी.
लेकिन हमारे साथ साझा किए गए उस रात के वीडियो में एक जगह सात और आठ व्यक्तियों की मौत की बात सुनाई देती है जिसकी पुष्टि नहीं हो पाई है.
शाम 7.00 बजे से रात 10.00 बजे के बीच क्या हुआ?
परिवारों ने हमें बताया कि 30 अप्रैल की शाम करीब साढ़े सात बजे उन्हें स्टाफ़ से पता चलना शुरू हो गया था कि अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई कम है.
जिन परिवारों से हमने बात की, उन सभी ने आरोप लगाया कि उन्हें इससे पहले बिल्कुल नहीं पता था कि अस्पताल में ऑक्सीजन की कोई कमी है.
उधर अस्पताल की मालिक डॉक्टर स्वाति सिंह राठौर ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि ऑक्सीजन की कमी के बारे में सभी को बताया गया था.
डॉक्टर राठौर के मुताबिक़ वो पिछले दो दिनों से ऑक्सीजन के लिए कोशिश कर रही थीं लेकिन कोई भी अधिकारी उन्हें कोई जवाब नहीं दे रहा था.
गुरुग्राम पुलिस के डिप्टी कमिश्नर यश गर्ग का कहना है कि उन्हें भी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी के बारे में नहीं पता था.
ऑक्सीजन की कमी से कई मौत की खबरें सुन चुके रिश्तेदारों को जब एहसास हुआ कि कृति अस्पताल में भी ऑक्सीजन कम है, तो वो बेचैन होने लगे.
वक्त से साथ लोगों की बढ़ती बेचैनी
गीता सिन्हा के पोतेकौस्तव ऋत्विक भी वहीं बाहर गलियारे में खड़े थे. उन्होंने बताया कि डॉक्टरों ने इमर्जेंसी रूम और आईसीयू रूम को अंदर से बंद कर रखा था इसलिए परिवारों को मरीज़ों के बारे में कुछ पता नहीं लग रहा था.
उस रात रिकॉर्ड किए गए वीडियो में मास्क पहने रोते, नाराज़, परेशान लोग अस्पताल के गलियारों में इधर उधर अपनों की खोज-ख़बर लेते नज़र आते हैं, और ऐसा लगता है कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वो क्या करें.
जब कई कोशिशों के बाद परिवारों को कोई जानकारी नहीं मिली तो बाहर शोर बढ़ना शुरू हो गया. रात 8.30-9.00 बजे तक बेचैनी और बढ़ने लगी थी.
अस्पताल में उस वक्त अमनदीप भी मौजूद थे. उनके पिता मोहिंदर सिंह चावला आईसीयू में भर्ती थे. उन्होंने बताया कि रात दस बजे के आसपास किसी मरीज़ की मौत हो गई और डॉक्टर मरीज़ के परिवार को मौत की बात बताने के बाद आईसीयू लॉक करके अंदर चले गए. इससे लोगों की बेचैनी और बढ़ गई.
अस्पताल की मालिक डॉक्टर स्वाति सिंह राठौर के मुताबिक़ आईसीयू मेन गेट लॉक करने की वजह ये सुनिश्चित करना था कि ठीक हो रहे मरीज़ "कहीं ट्रॉमा का शिकार न हो जाएँ."
रिश्तेदारों के मुताबिक रात साढ़े नौ या दस बजे उन्होंने देखा कि अस्पताल का स्टाफ़ जैसे रिसेप्शनिस्ट, डॉक्टर, फार्मेसिस्ट, वहां कोई भी नज़र नहीं आ रहा था. आख़िर रात क़रीब दस बजे दरवाज़े को पार करते हुए लोग आईसीयू के भीतर दाखिल हो गए.
'पापा को रिवाइव करने की कोशिश'
आईसीयू में दाखिल होने वालों में 17 साल के कक्षा 12 के छात्र नमो जैन भी थे. उन्होंने देखा कि सामने पड़े छह बिस्तरों में एक पर उनके पिता विशाल जैन भी थे जो 29 अप्रैल की रात 12 बजे अस्पताल में भर्ती हुए थे.
नमो बताते हैं कि उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि क़रीब ढाई घंटे पहले ही साढ़े सात बजे वो अपने पिता से मिलने आईसीयू गए थे और उनकी वाशरूम जाने को लेकर उनसे बात हुई थी.
उन्होंने तुरंत अपनी बहन को फ़ोन कर गुरुग्राम साउथ सिटी के अपने घर पर रखा ऑक्सीजन सिलेंडर लाने को कहा था. नमो ने बताया कि उनके घर में तीन ऑक्सीजन सिलेंडर रखे हुए थे और इलाज के लिए हर इंतज़ाम कर रखा था.
वो कहते हैं, "एक बार कोई बताता तो कि अस्पताल में ऑक्सीजन ख़त्म हो गई है. वो तो आईसीयू लॉक करके भाग गए."
नमो को सीपीआर (कार्डियो प्ल्म्नरी रिससासिटेशन) देना आता था. उन्होंने सीपीआर के ज़रिए पिता की सांस चलाने की कोशिश शुरू की. बहन ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर आईं तो उन्होंने भी सीपीआर दिया.
बहन के साथ नमो की मां भी आईसीयू आईं. विशाल जैन को ऑक्सीजन देने की कोशिश की गई, उनके शरीर को रगड़कर गर्माने की कोशिश हुई. उनसे कहा गया 'पापा उठो, मम्मी आ गईं,' लेकिन पापा नहीं उठे.

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'रूह कांप गई'
आईसीयू के भीतर जाने वालों में दिल्ली के इंदरपुरी के रहने वाले अमनदीप भी थे. जब से उनके पिता मोहिंदर सिंह चावला अस्पताल में भर्ती हुए थे, वो लगातार रिसेप्शन के आसपास, इधर-उधर मंडरा रहे थे.
30 अप्रैल शाम साढ़े सात बजे के आसपास जब ऑक्सीजन की कमी की बात फैलनी शुरू हुई तो अमनदीप के मुताबिक़ उन्हें भरोसा दिलाया गया कि अस्पताल की दो गाड़ियों ऑक्सीजन लेने गई हुई हैं इसलिए उन्हें फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं.
वो कहते हैं कि जब वो उस रात आईसीयू के भीतर पहुंचे तो उनकी "रूह कांप गई." वो कहते हैं, "जब मैंने अंदर बिस्तर पर पापा को देखा, मुझसे अंदर रहा नहीं गया."
उन्होंने बताया, "लोगों ने जब अंदर जाने की कोशिश की तो उन्होंने देखा कि अंदर कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं है, कोई अटेंडेंट नहीं, कोई स्टाफ़ नहीं था. सब गायब थे. वो भाग गए थे."
"डॉक्टर्स की ड्यूटी होती है कि उनके सामने अगर मर रहा हो तो उनकी मदद करे, न कि उन्हें छोड़कर भाग जाए."
उनकी अपने पिता से आख़िरी मुलाक़ात मात्र तीन घंटे पहले हुई थी. वो बताते हैं, "पापा को वाशरूम जाना था, लेकिन आईसीयू का वाशरूम खाली नहीं था इसलिए वो उन्हें व्हीलचेयर पर बाहर लेकर आए. तब मिला पापा से मैं. तब वो बिल्कुल ठीक थे."
डर गया था स्टाफ़?
अस्पताल की मालिक डॉक्टर स्वाति सिंह राठौर ने बताया कि अस्पताल के 25 लोग हिंसा के डर से अस्पताल के तीसरे माले पर बनी मात्र 15 मिनट के लिए छिप गए थे क्योंकि उनके अस्पताल में 24 अप्रैल को एक अन्य मृत मरीज़ के परिवार ने हिंसा और तोड़फोड़ की थी जिससे अस्पताल को लाखों का नुक़सान हुआ था.
उन्होंने बताया, "ऑक्सीजन की कमी का मामला हमारे हाथ में नहीं है. हम अपना काम कर रहे हैं. हम और नहीं पिटेंगे. हमें जब लोग मारने के लिए आएंगे तो हम छिपेंगे."
राठौर ने बताया कि जब उन्हें सुरक्षा का भरोसा हुआ तभी सब लोग नीचे आए.

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तो फिर आख़िर के तीन-चार घंटों में क्या हुआ?
जिन परिवारों से हमने बात की, उनका कहना है कि उनके मरीज़ चंद घंटे पहले तक तो ठीक थे और उनका ऑक्सीजन स्तर भी ठीक था. इसके उलट अस्पताल की मालिक डॉक्टर राठौर का कहना है कि मरीज़ों की हालत नाज़ुक थी.
डॉक्टर स्वाति ने बताया कि ऑक्सीजन की सप्लाई शाम छह बजे से रात 11 बजे तक कटी थी जिससे अस्पताल के 15 मरीज़ों पर असर पड़ा और ऐसे में डॉक्टर एंबू कर रहे थे.
एंबू एक तरह का विशेष उपकरण होता है जिससे मैन्युअल पंप के ज़रिए मरीज़ों की मदद की जाती है जो ठीक से सांस न ले पा रहे हों. ऑक्सीजन ख़त्म होने के बाद आईसीयू का माहौल क्या रहा होगा इसका इशारा ऋत्विक की बातों से मिलता है. उनकी 76 वर्षीय नानी गीता सिन्हा भी आईसीयू में थीं.
उन्होंने बताया कि जब शाम सात बजे वो अस्पताल पहुंचे थे तब उन्हें पता चला कि नानी आईसीयू में हैं और बेहोश हैं.
उन्होंने बताया कि काफ़ी कोशिशों के बावजूद जब किसी ने उन्हें नानी की हालत के बारे में कुछ नहीं बताया तो करीब साढ़े आठ बजे मौका देखकर वो अपने मामा के साथ इमर्जेंसी रूम से होते हुए आईसीयू में चले गए जहां उन्होंने देखा कि मरीज़ों पर मैन्युअली पंप किया जा रहा है.
उन्होंने बताया, "हमें तब पता चला कि उनके पास तो ऑक्सीजन ही नहीं है."
ऋत्विक ने बताया कि उन्होंने देखा कि उनकी नानी की छाती ऊपर-नीचे हो रही है तो उन्हें लगा कि उनकी हल्की सांस चल रही है.
ख़ुद को भाजपा महिला मोर्चा की ज़िला उपाध्यक्ष बताने वाली डॉक्टर स्वाति के मुताबिक़ उन क्षणों वो "असहाय भी थीं और नाउम्मीद भी."
वो कहती हैं, "हम इमोशनल थे और हर तरफ से ट्रॉमा में थे. मरीज़ जिनका हम ध्यान रख रहे थे, वो हमारे सामने जा रहा था. अटेंडेंट हिंसा पर उतारू हो रहे थे. मीडिया समझने को तैयार नहीं थी. तो हम भी हर तरफ़ से हताश हो गए थे."

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लेकिन क्या मरीज़ों के परिवार हिंसा पर उतारू था जिसके डर से अस्पताल का स्टाफ़ कैंटीन में छिप गया था?
अमनदीप के मुताबिक़ शुरुआत में लोग गुस्से में थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनके अपनों की मौत हो गई है, वो सारे रोने लग गए. उस रात के साझा किए गए वीडियो में नाराज़ लोग गालियों देते भी सुनाई देते हैं लेकिन तोड़फोड़ करते नहीं.
एक अन्य वीडियो में परिवारों से घिरा अस्पताल का एक स्टाफ़ लोगों को समझाने की कोशिश कर रहा है लेकिन लोग कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे. ये वीडियो किस वक्त रिकॉर्ड किया गया, ये साफ़ नहीं है.
बीबीसी से साझा किए गए वीडियो में लोग पुलिस से भी नाराज़ दिखे. उनका आरोप है कि पुलिस मात्र मूकदर्शक थी और डॉक्टरों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं कर रही थी.
अस्पताल की मालिक के मुताबिक़ अस्पताल में अभी ऑक्सीजन की व्यवस्था ठीक है.
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