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पश्चिम बंगाल, असम चुनावों का क्या आगामी लोकसभा चुनावों पर होगा असर?
- Author, विजदान मोहम्मद कवूसा
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
भारत के चार राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश में हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे दो मई को आए. इन विधानसभा चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति में खासा महत्व माना जा रहा है.
ये चुनाव जहाँ तीन क्षेत्रीय पार्टियों के लिए अपनी ताक़त के प्रदर्शन का ज़रिया साबित हुए, वहीं कांग्रेस के लिए एक झटका और दूसरे राज्यों में अपने पैर जमाने की कोशिश करने वाली भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बीजेपी के लिए आंशिक सफलता ही साबित हुए.
मज़बूत हो कर उभरीं क्षेत्रीय पार्टियाँ
जिन चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव थे, उनमें से तीन में निर्णायक जनादेश क्षेत्रीय पार्टियों के नाम रहा.
पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और केरल में कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले गठबंधन लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) को स्पष्ट जनादेश मिला.
न केवल इन पार्टियों को चुनावों में जीत मिली, बल्कि बीते विधानसभा चुनावों की तुलना में देखा जाए तो इनके प्रदर्शन में भी सुधार आया है.
पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने अपनी हैट्रिक पूरी की यानी पार्टी के लिए ये लगातार तीसरी बार जीत थी. वहीं तमिलनाडु में डीएमके लिए दो दशकों में सबसे बड़ी जीत थी.
रही बात केरल की, तो वहाँ का इतिहास रहा है कि एक पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में नहीं लौटी. लेकिन इस बार पिनराई विजयन ने इतिहास बदल दिया और उनके नेतृत्व वाले गठबंधन ने एक बार फिर चुनाव में बहुमत हासिल किया.
भारत की आबादी का 16 फ़ीसदी हिस्सा इन तीन राज्यों में रहता है. वहीं संसद के निचले सदन लोकसभा की 19 फ़ीसदी सीटों और ऊपरी सदन राज्यसभा की 18 फ़ीसदी सीटों के प्रतिनिधि इन्हीं राज्यों से हैं.
राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव राज्य की विधानसभा के चुने सदस्य करते हैं और इसी कारण विधानसभा चुनावों के नतीजे बेहद अहम हो गए हैं. आने वाले वक्त में चुनावों में बहुमत हासिल करने वाली पार्टियों का प्रतिनिधित्व राज्यसभा में होगा.
इधर असम और पुडुचेरी की बात की जाए, तो यहाँ मुख्य मुक़ाबला दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों - बीजेपी और कांग्रेस के नेतृत्व में बने गठबंधन के बीच था. इन राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन उनका प्रदर्शन गठबंधन के सदस्य के रूप में देखा जा रहा है.
कांग्रेस के लिए झटका
स्वतंत्र भारत में पाँच दशक तक सत्ता में रही कांग्रेस को साल 2019 के लोकसभा चुनावों में 52 सीटें मिली थी. कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए भी सौ के आँकड़े को छू नहीं पाई थी. इस बार के विधानसभा चुनाव के नतीजे भी कांग्रेस के लिए कोई नई उम्मीद की किरण ले कर नहीं आ सके.
पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में देखा जाए, तो चार राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश में कांग्रेस की सीटें कम हुई हैं. जहाँ इन राज्यों में पिछले चुनावों में उसे 114 सीटें मिली थी, इस बार इसके खाते में केवल 70 सीटें ही आईं.
कांग्रेस के हाथों से फिसलने वाली इनमें से अधिकांश सीटें पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में थीं.
पिछले चुनावों में पश्चिम बंगाल में पार्टी ने 44 सीटें अपने नाम की थीं, लेकिन इस बार वो एक भी सीट बचा नहीं पाई. वहीं पुडुचेरी में पार्टी के पास पहले 14 सीटें थी, लेकिन अब केवल दो सीटों पर ही उसे जीत मिली.
केरल और असम में पार्टी लगभग उतनी ही सीटों पर जीत सकी, जितने उसने पिछले चुनावों में जीते थे. वहीं तमिलनाडु में पार्टी ने दो सीटें बढ़ाईं यानी पिछले चुनावों में जहाँ उसे आठ सीटों पर जीत मिली थी, इस बार 10 सीटें उसके हाथ में आईं.
लेकिन बीते तीन दशकों में इन पाँच राज्यों में पार्टी का जो प्रदर्शन रहा है, उसे इस साल हुए चुनाव के नतीजों के आधार पर आँकना सही नहीं होगा.
साल 1991 में इन पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में कुल 822 सीटों में से 28 फ़ीसदी कांग्रेस के पाले में आए थे, लेकिन इस साल के चुनावों में ये आँकड़ा केवल 8.5 फ़ीसदी तक सिमट कर रह गया.
2019 के लोकसभा चुनावों में इन पाँच राज्यों में पार्टी का प्रदर्शन महत्वपूर्ण रहा था. पार्टी ने पूरे देश में 421 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए और 52 सीटें जीती. इनमें से आधी से अधिक सीटें इन्हीं पाँच राज्यों से थीं. अगर कांग्रेस और उसके गठबंधन सहयोगियों की बात की जाए,तो जीती गई 65 फ़ीसदी सीटें इन पाँच राज्यों से थीं.
वहीं लोकसभा चुनावों में इन पाँच राज्यों में बीजेपी के प्रदर्शन की बात की जाए, तो जो सीटें उसने इन राज्यों में जीतीं वो उसकी जीत का केवल आठ फ़ीसदी थी.
इन राज्यों में कांग्रेस की सीटें कम होना इस बात की ओर इशारा है कि आने वाले संसदीय चुनावों में कांग्रेस के लिए यहाँ राह आसान नहीं होगी.
बीजेपी के लिए आंशिक सफलता
बीते सात सालों से केंद्र में सत्ता में रही बीजेपी असम में एक बार फिर वापसी कर रही है और पुडुचेरी में भी सरकार बनाने जा रही है.
बीजेपी के लिए ये राहत की बात है कि इस बार असम में उसका वोट प्रतिशत 3.7 फ़ीसदी बढ़ा है, जबकि पुडुचेरी में बीजेपी का वोट प्रतिशत 11.2 फ़ीसदी बढ़ा है.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी कभी पैर नहीं जमा सकी थी, लेकिन इन चुनावों के बाद यहाँ उसका प्रदर्शन बेहतर हुआ है.
ये बात सच है कि बीजेपी का उद्देश्य पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने का था, लेकिन पहली बार प्रदेश उसने 77 जीती हैं ऐसी स्थिति में है जहाँ उसे विपक्ष का दर्जा मिल गया है.
प्रदेश में उसके एक चौथाई सीटें अपने नाम की है और उसका वोट प्रतिशत 38 फ़ीसदी है. पिछले विधानसभा चुनावों में तुलना में ये उसके लिए बड़ी कामयाबी है. पिछली बार उसे केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी और उसका वोट प्रतिशत 10 फ़ीसदी था.
रही केरल की बात तो, यहाँ बीजेपी को वोट प्रतिशत बढ़ कर क़रीब 11.3 फ़ीसदी हो गया है लेकिन एक बार फिर बीजेपी यहाँ एक भी सीट जीतने में नाकाम रही है.
माना जा रहा है बीजेपी के लिए असम में एक बार फिर सत्ता में वापसी का रास्ता साफ होने और पश्चिम बंगाल में उसके वोट प्रतिशत के बढ़ने का असर साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में पड़ सकता है.
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